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परिचय: मौर्य वंश और धार्मिक संरक्षण

सम्राट अशोक (शासनकाल लगभग 268–232 ई.पू.) को मौर्य साम्राज्य के दौरान बौद्ध धर्म के व्यापक प्रसार का श्रेय दिया जाता है। उनका साम्राज्य लगभग 5 मिलियन वर्ग किलोमीटर तक फैला था, जिसमें आज का भारत, पाकिस्तान, नेपाल और अफगानिस्तान शामिल थे (रोमिला थापर, The Mauryan Empire, 1961)। अशोक के पोते सम्राट साम्प्रति (शासनकाल लगभग 224–215 ई.पू.) ने मुख्य रूप से पश्चिमी भारत के गुजरात और राजस्थान में शासन किया और परंपरागत रूप से उन्हें जैन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए जाना जाता है। साम्प्रति ने जैन मंदिरों का निर्माण और मिशनरी गतिविधियों को बढ़ावा दिया। जहां अशोक के बौद्ध संरक्षण के प्रमाण अनेक शिलालेखों द्वारा स्पष्ट हैं, वहीं साम्प्रति के जैन प्रचार के बारे में जानकारी मुख्यतः 12वीं सदी के जैन ग्रंथ, जैसे हेमचंद्र की परिशिष्टपरवन, से मिलती है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 1: प्राचीन भारतीय इतिहास – मौर्य साम्राज्य, धार्मिक आंदोलन
  • GS पेपर 1: कला और संस्कृति – धार्मिक वास्तुकला और संरक्षण
  • GS पेपर 1: भारतीय समाज – राज्य नीति में धर्म की भूमिका
  • निबंध: धार्मिक और सांस्कृतिक एकता में राज्य संरक्षण की भूमिका

बौद्ध धर्म के प्रसार में अशोक की भूमिका

कालींग युद्ध (लगभग 261 ई.पू.) के बाद अशोक का बौद्ध धर्म में परिवर्तन राज्य-प्रायोजित धार्मिक प्रचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उनके शिलालेख भारत, नेपाल, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में 14 स्थानों पर खुदे हुए पाए गए हैं (Indian Express, 2024), जो धम्म—बौद्ध नैतिक और धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित एक नैतिक कोड—का प्रचार करते हैं। अशोक ने श्रीलंका (जैसा कि महावंसा में वर्णित है), मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में मिशनरियों को भेजकर बौद्ध धर्म के पूरे एशिया में फैलाव को संभव बनाया।

  • शिलालेखों में अहिंसा, धार्मिक सहिष्णुता और कल्याणकारी नीतियों पर जोर दिया गया है।
  • राज्य ने मठों और स्तूपों के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की, जिससे बौद्ध संघ की संस्थागत मजबूती हुई।
  • मौर्य शासन के तहत बने बुनियादी ढांचे ने व्यापार मार्गों को बेहतर बनाया, जिससे मिशनरियों के आवागमन में सहूलियत हुई (रोमिला थापर, 1961)।

जैन धर्म में साम्प्रति का योगदान

सम्राट अशोक के पोते साम्प्रति को जैन परंपरा में गुजरात और राजस्थान में 1500 से अधिक जैन मंदिरों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है (हेमचंद्र, परिशिष्टपरवन)। उनके शासनकाल में जैन साधुओं और संघ की सक्रिय संरक्षण नीति देखने को मिलती है, जिसने पश्चिमी भारत में जैन धर्म को मजबूती दी। अशोक के विपरीत, साम्प्रति के धार्मिक संरक्षण के प्रमाण ज्यादातर साहित्यिक हैं और पुरातात्विक अवशेष कम हैं, जिससे इतिहास लेखन में एक अंतर पैदा होता है।

  • मंदिर निर्माण ने स्थानीय कारीगरों को रोजगार दिया, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला, हालांकि इसके आर्थिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
  • राजनीतिक सत्ता का उपयोग जैन समुदाय की सुरक्षा और मिशनरी गतिविधियों के समर्थन के लिए किया गया।
  • साम्प्रति ने मौर्य वंश की विरासत को जारी रखते हुए धार्मिक संरक्षण की परंपरा को बनाए रखा।

संरक्षण के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचा

अशोक और साम्प्रति से जुड़ी मौर्यकालीन स्मारकों का संरक्षण Archaeological Survey of India (ASI) Act, 1958 के तहत होता है। इसके महत्वपूर्ण प्रावधान हैं:

  • धारा 3: प्राचीन स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा।
  • धारा 20: खुदाई पर नियंत्रण और पुरावशेषों की सुरक्षा।

धार्मिक प्रचार में ऐतिहासिक रूप से अशोक के तहत बौद्ध संघ और साम्प्रति के शासनकाल में जैन संघ की भूमिका रही है। बाद में स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय (5वीं सदी ई.) ने बौद्ध और जैन अध्ययन के केंद्र के रूप में इस धार्मिक संरक्षण की विरासत को आगे बढ़ाया।

धार्मिक संरक्षण का आर्थिक प्रभाव

मौर्य साम्राज्य की आर्थिक एकता, जिसके वार्षिक राजस्व का अनुमान 4.5 मिलियन सिल्वर ड्रैक्मा है (रोमिला थापर, 1961), धार्मिक प्रचार के लिए स्थिर माहौल प्रदान करती थी। अशोक के अधीन बनी बुनियादी ढांचे ने संपर्क को बेहतर बनाया, जिससे मिशनरियों के आवागमन में सुविधा हुई। साम्प्रति का मंदिर निर्माण स्थानीय कारीगरों को रोजगार देकर आर्थिक गतिविधि बढ़ाने वाला रहा, हालांकि इसके सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

  • अशोक के शासनकाल में व्यापार मार्गों के सुधार से सांस्कृतिक और धार्मिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिला।
  • साम्प्रति के मंदिर निर्माण ने क्षेत्रीय केंद्रों में आर्थिक सक्रियता को बढ़ावा दिया।
  • धार्मिक संरक्षण ने सामाजिक एकता को मजबूत किया, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक स्थिरता को समर्थन मिला।

तुलनात्मक अध्ययन: अशोक, साम्प्रति और कॉन्स्टेंटाइन

पहलूसम्राट अशोकसम्राट साम्प्रतिसम्राट कॉन्स्टेंटाइन
प्रचारित धर्मबौद्ध धर्मजैन धर्मईसाई धर्म
राज्य संरक्षणशिलालेख, मिशनरी प्रेषण, मठों को वित्तीय सहायतामंदिर निर्माण, संघ का समर्थनमिलान का आदेश (313 ई.), चर्च निर्माण
भौगोलिक प्रसारदक्षिण एशिया से श्रीलंका, मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया तकपश्चिमी भारत (गुजरात, राजस्थान)रोमन साम्राज्य और उससे आगे
दस्तावेजीकरणविस्तृत शिलालेख (14 स्थल)मुख्यतः साहित्यिक (जैन ग्रंथ), सीमित पुरातात्विकविस्तृत शाही अभिलेख और चर्च परिषदें
कानूनी स्थितिराजकीय शिलालेखों के माध्यम से प्रचारराजनीतिक सत्ता के जरिए संरक्षणकानूनी मान्यता और राज्य धर्म का दर्जा

इतिहास लेखन में अंतर और इसके निहितार्थ

साम्प्रति के जैन संरक्षण के पुरातात्विक और शिलालेखीय प्रमाणों की कमी अशोक के बौद्ध शिलालेखों की तुलना में स्पष्ट है। इस अंतर के कारण जैन धर्म के प्रारंभिक विस्तार को मुख्यधारा के इतिहास में कम महत्व मिलता है। साम्प्रति के शासनकाल के बाद लिखे गए जैन ग्रंथों पर निर्भरता ऐतिहासिक घटनाओं के वस्तुनिष्ठ पुनर्निर्माण को जटिल बनाती है।

  • सीमित भौतिक प्रमाण साहित्यिक दावों की पुष्टि में बाधा डालते हैं।
  • इतिहास लेखन में अशोक के बौद्ध संरक्षण को अधिक महत्व दिया जाता है क्योंकि उनके शिलालेख प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
  • साम्प्रति से जुड़े जैन स्थलों पर अधिक पुरातात्विक शोध की आवश्यकता है।

महत्व और आगे का रास्ता

  • साम्प्रति की भूमिका को स्वीकार करने से प्राचीन भारत में धार्मिक बहुलता की समझ संतुलित होगी।
  • पुरातत्व, शिलालेख और साहित्यिक विश्लेषण को मिलाकर अंतरविषयक शोध इतिहास लेखन के अंतर को भर सकता है।
  • ASI के तहत जैन स्मारकों के संरक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि प्रमाणिक साक्ष्य बढ़ सकें।
  • अन्य साम्राज्यिक धार्मिक संरक्षण (जैसे कॉन्स्टेंटाइन) के साथ तुलनात्मक अध्ययन राज्य और धर्म के संबंधों को समझने में मदद करता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
सम्राट साम्प्रति के जैन धर्म प्रचार में भूमिका के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. साम्प्रति का शासन मुख्य रूप से बाद के जैन ग्रंथों के माध्यम से दर्ज है।
  2. उन्होंने अशोक की तरह जैन नैतिक सिद्धांतों को बढ़ावा देने वाले शिलालेख जारी किए।
  3. साम्प्रति को पश्चिमी भारत में 1500 से अधिक जैन मंदिरों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि साम्प्रति का शासन मुख्य रूप से हेमचंद्र के परिशिष्टपरवन जैसे जैन साहित्य से जाना जाता है। कथन 2 गलत है; साम्प्रति द्वारा अशोक जैसे शिलालेख जारी करने के कोई प्रमाण नहीं हैं। कथन 3 जैन ग्रंथों के अनुसार सही है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
अशोक के बौद्ध प्रचार के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. अशोक के शिलालेख आज के भारत के बाहर भी पाए गए हैं।
  2. अशोक ने सीधे नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी ताकि बौद्ध धर्म को बढ़ावा मिल सके।
  3. उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका में मिशनरी भेजे।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है; अशोक के शिलालेख नेपाल, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भी मिले हैं। कथन 2 गलत है; नालंदा विश्वविद्यालय 5वीं सदी में स्थापित हुआ था, जो अशोक के शासनकाल के बाद है। कथन 3 सही है, जैसा कि महावंसा में वर्णित है।

मुख्य प्रश्न

सम्राट अशोक और उनके पोते सम्राट साम्प्रति की बौद्ध और जैन धर्म के प्रसार में भूमिका की तुलना करें। उनके धार्मिक संरक्षण के ऐतिहासिक दस्तावेजों में अंतर के कारणों का मूल्यांकन करें। (250 शब्द)

सम्राट साम्प्रति कौन थे और जैन धर्म में उनका योगदान क्या था?

सम्राट साम्प्रति अशोक के पोते थे जिन्होंने लगभग 224–215 ई.पू. में पश्चिमी भारत में शासन किया। जैन ग्रंथ उन्हें गुजरात और राजस्थान में 1500 से अधिक जैन मंदिरों के निर्माण और जैन मिशनरी गतिविधियों के समर्थन के लिए मानते हैं, जिससे जैन धर्म का क्षेत्रीय विस्तार हुआ।

अशोक ने अपने शासनकाल में बौद्ध धर्म का प्रचार कैसे किया?

अशोक ने अपने साम्राज्य में विभिन्न स्थानों पर शिलालेखों के माध्यम से बौद्ध धर्म का प्रचार किया, श्रीलंका जैसे क्षेत्रों में मिशनरियों को भेजा, मठों को वित्तीय सहायता दी, और अहिंसा तथा सहिष्णुता जैसे धम्म के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया।

मौर्यकालीन स्मारकों की सुरक्षा के लिए कौन-कौन से कानूनी प्रावधान हैं?

मौर्यकालीन स्मारकों का संरक्षण Archaeological Survey of India Act, 1958 के तहत होता है, जिसमें धारा 3 प्राचीन स्मारकों की सुरक्षा और धारा 20 खुदाई और पुरावशेष की सुरक्षा को नियंत्रित करती है।

सम्राट साम्प्रति के जैन संरक्षण के लिए पुरातात्विक प्रमाण कम क्यों हैं?

सम्राट साम्प्रति का जैन संरक्षण मुख्य रूप से बाद के जैन ग्रंथों में दर्ज है, जबकि उनके शासनकाल के दौरान कोई व्यापक शिलालेख या स्मारक कम ही बचे हैं, जिससे उनके योगदान का ऐतिहासिक पुनर्निर्माण कठिन हो जाता है।

मौर्यकालीन धार्मिक संरक्षण का आर्थिक प्रभाव क्या था?

मौर्यकालीन धार्मिक संरक्षण ने व्यापार मार्गों और बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाया, जिससे धार्मिक प्रचार में मदद मिली। साम्प्रति के मंदिर निर्माण ने स्थानीय कारीगरों को रोजगार दिया और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित किया, हालांकि इसके सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

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