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साल 2024 की शुरुआत में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने एक नया मिसाइल मार्गदर्शन और प्रणोदन उन्नयन प्रणाली पेश की है, जिसका उद्देश्य भारत की हवाई मिसाइलों की उड़ान अवधि और हमले की सटीकता बढ़ाना है। इस तकनीक का सफल परीक्षण तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) और Su-30MKI जैसे प्लेटफॉर्म पर किया गया है, जिससे मिसाइल की रेंज 80 किमी से बढ़कर लगभग 110 किमी हो गई है और हमले की सटीकता में 25% की वृद्धि हुई है (Indian Express, 2024; DRDO Annual Report, 2023)। यह प्रगति भारत की हवाई युद्ध क्षमता और रणनीतिक निवारक शक्ति को मजबूत करती है, साथ ही आयातित मिसाइल तकनीक पर निर्भरता कम कर वैश्विक मानकों के करीब पहुंचाती है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: रक्षा प्रौद्योगिकी, स्वदेशी रक्षा उत्पादन, रणनीतिक सुरक्षा
  • GS पेपर 3: विज्ञान और तकनीक – मिसाइल सिस्टम और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग
  • निबंध: भारत का रक्षा आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता

DRDO के नए मिसाइल सिस्टम की तकनीकी विशेषताएं

यह नया DRDO सिस्टम उन्नत प्रणोदन तकनीकों को बेहतर मार्गदर्शन एल्गोरिदम और सीकर मैकेनिज्म के साथ जोड़ता है। प्रणोदन सुधार से मिसाइल की उड़ान अवधि में लगभग 30% की वृद्धि हुई है, जिससे रेंज बढ़ती है और उड़ान के दौरान ऊर्जा की बचत होती है (Indian Express, 2024)। मार्गदर्शन प्रणाली में बेहतर इनर्शियल नेविगेशन के साथ सक्रिय रडार होमिंग शामिल है, जो पिछले संस्करणों की तुलना में सटीकता में 25% सुधार करता है (DRDO Annual Report, 2023)। विमान के एवियोनिक्स के साथ इसका समाकलन एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) ने पूरा किया है, जिससे यह स्वदेशी और आयातित दोनों लड़ाकू विमानों के लिए उपयुक्त है।

  • प्रणोदन: उन्नत सॉलिड-फ्यूल रॉकेट मोटर्स, थ्रस्ट प्रोफाइल में सुधार के साथ
  • मार्गदर्शन: रडार और इन्फ्रारेड सेंसर वाला मल्टी-मोड सीकर
  • उड़ान रेंज: 80 किमी से बढ़कर लगभग 110 किमी
  • स्ट्राइक सटीकता: 25% बेहतर, सर्कुलर एरर प्रॉबैबल (CEP) में कमी
  • प्लेटफॉर्म समाकलन: तेजस LCA और Su-30MKI पर सफल परीक्षण

मिसाइल विकास के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचा

भारत में मिसाइल विकास और तैनाती एक मजबूत कानूनी ढांचे के तहत होती है। डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट, 1962 और आर्म्स एक्ट, 1959 मिसाइल प्रणालियों के निर्माण, कब्जा और उपयोग को नियंत्रित करते हैं। DRDO एक्ट, 1958 रक्षा तकनीक, विशेषकर मिसाइल प्रणोदन और मार्गदर्शन के अनुसंधान और विकास में DRDO की भूमिका तय करता है। इसके अलावा, मिसाइल निर्यात और तकनीकी हस्तांतरण को फॉरेन ट्रेड (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1992 के तहत नियंत्रित किया जाता है ताकि तकनीक के प्रसार को रोका जा सके। संविधान के अनुच्छेद 51A(g) में नागरिकों पर राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा का मौलिक कर्तव्य लगाया गया है, जो स्वदेशी मिसाइल क्षमताओं की रणनीतिक अहमियत को दर्शाता है।

  • DRDO एक्ट, 1958: रक्षा अनुसंधान एवं विकास के लिए DRDO का गठन
  • डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट, 1962: रक्षा उत्पादन और सुरक्षा का नियंत्रण
  • आर्म्स एक्ट, 1959: हथियार और मिसाइल कब्जे का नियमन
  • फॉरेन ट्रेड एक्ट, 1992: हथियार निर्यात और तकनीकी हस्तांतरण का प्रबंधन
  • संवैधानिक कर्तव्य: अनुच्छेद 51A(g) राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा पर जोर

स्वदेशी मिसाइल विकास के आर्थिक पहलू

भारत का रक्षा बजट 2023-24 में लगभग ₹5.94 लाख करोड़ रहा, जिसमें DRDO को विशेष रूप से मिसाइल तकनीकों समेत अनुसंधान एवं विकास के लिए ₹16,000 करोड़ आवंटित किए गए (संघीय बजट 2023-24)। पिछले तीन वर्षों में स्वदेशी मिसाइल उत्पादन क्षमता में 15% की वृद्धि हुई है, जो निवेश बढ़ने और तकनीक के परिपक्व होने का परिणाम है (SIPRI, 2023)। घरेलू मिसाइल बाजार की अनुमानित वार्षिक वृद्धि दर 7.5% तक है जो 2030 तक जारी रहने की उम्मीद है, इससे भारत की वार्षिक $2 बिलियन से अधिक की आयात निर्भरता कम होगी। यह बदलाव 'मेक इन इंडिया' के लक्ष्यों को सशक्त करता है और रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाता है।

  • रक्षा बजट 2023-24: ₹5.94 लाख करोड़; DRDO R&D आवंटन: ₹16,000 करोड़
  • मिसाइल R&D बजट में 2023-24 में 12% की वृद्धि
  • 2019-2023 के बीच स्वदेशी मिसाइल उत्पादन क्षमता में 15% की वृद्धि
  • 2030 तक स्वदेशी मिसाइल बाजार की CAGR 7.5% अनुमानित
  • आयात में कमी: घरेलू उत्पादन से $2 बिलियन से अधिक की बचत

प्रमुख संस्थान और उनकी भूमिका

यह मिसाइल उन्नयन प्रणाली कई संस्थानों के समन्वित प्रयासों का परिणाम है। DRDO प्रणोदन और मार्गदर्शन तकनीकों के अनुसंधान एवं विकास का नेतृत्व करता है। एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) विमान एवियोनिक्स और उड़ान नियंत्रण प्रणालियों के साथ मिसाइल प्रणाली के समाकलन का काम संभालती है। भारतीय वायु सेना (IAF) इसका मुख्य उपयोगकर्ता है, जो परिचालन तैनाती और फीडबैक देता है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) मिसाइल प्लेटफॉर्म का निर्माण और गुणवत्ता नियंत्रण सुनिश्चित करता है। यह संस्थागत सहयोग अनुसंधान से परिचालन तक की प्रक्रिया को सहज बनाता है।

  • DRDO: मिसाइल प्रणोदन और मार्गदर्शन प्रणाली विकास
  • ADA: विमान-मिसाइल समाकलन और एवियोनिक्स संगतता
  • IAF: परिचालन तैनाती और रणनीतिक मूल्यांकन
  • HAL: निर्माण और प्लेटफॉर्म समाकलन

तुलनात्मक अध्ययन: भारत का नया सिस्टम बनाम अमेरिकी AIM-120 AMRAAM

पैरामीटरभारत (नया DRDO सिस्टम)अमेरिका (AIM-120 AMRAAM)
उड़ान रेंजलगभग 110 किमीलगभग 160 किमी
स्ट्राइक सटीकता (CEP)25% सुधार, लगभग 10-15 मीटर5 मीटर के भीतर
मार्गदर्शन तकनीकमल्टी-मोड सीकर (रडार + IR)उन्नत ECCM के साथ सक्रिय रडार होमिंग
प्लेटफॉर्म संगततातेजस LCA, Su-30MKIF-15, F-16, F/A-18 और अन्य
स्वदेशी सामग्रीउच्च, लगातार बढ़ रहीपूरी तरह स्वदेशी

जहां AIM-120 AMRAAM रेंज और सटीकता में बेहतर है, वहीं भारत का नया DRDO सिस्टम इस अंतर को काफी हद तक कम कर रहा है, जिससे रणनीतिक स्वायत्तता और विदेशी तकनीक पर निर्भरता में कमी आ रही है।

प्रमुख तकनीकी चुनौतियां और अंतर

हालांकि प्रगति हुई है, भारत को मिसाइल घटकों के मिनिएचराइजेशन में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है ताकि स्टेल्थ और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर्स (ECCM) में सुधार हो सके। वर्तमान प्रणाली दुश्मन की जटिल हवाई रक्षा प्रणालियों के जामिंग और छल कपट से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। रेंज बढ़ाने पर ज़ोर देने से स्टेल्थ और उन्नत ECCM क्षमताओं की आवश्यकता कम ध्यान में आई है। इन कमियों को दूर करना आवश्यक है ताकि मिसाइलें विवादित हवाई क्षेत्रों में प्रभावी बनी रहें।

  • मार्गदर्शन और प्रणोदन घटकों का मिनिएचराइजेशन सीमित है
  • इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर्स (ECCM) क्षमताओं में सुधार की जरूरत
  • मिसाइल की पहचान कम करने वाले स्टेल्थ फीचर्स कम विकसित
  • रेंज पर ध्यान केंद्रित करने से जीवित रहने की क्षमता पर कम ध्यान

महत्व और आगे का रास्ता

DRDO का नया मिसाइल सिस्टम भारत की रक्षा तकनीक में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह हवाई हमले की क्षमता बढ़ाता है, IAF की परिचालन तत्परता को मजबूत करता है और सरकार के आत्मनिर्भरता लक्ष्य के अनुरूप है। आगे बढ़ने के लिए ECCM तकनीकों, स्टेल्थ इंटीग्रेशन और मिनिएचराइजेशन में निवेश जरूरी है। DRDO, ADA, HAL और IAF के बीच सहयोग बढ़ाकर विकास और तैनाती प्रक्रिया तेज की जा सकती है। नीति को रेंज और सटीकता सुधार के साथ-साथ जीवित रहने की क्षमता पर भी बराबर ध्यान देना होगा ताकि बदलते खतरे का सामना किया जा सके।

  • प्रणोदन के साथ ECCM और स्टेल्थ तकनीकों में R&D को प्राथमिकता दें
  • मिसाइल मिनिएचराइजेशन परियोजनाओं के लिए बजट बढ़ाएं
  • तेजी से तकनीकी समाकलन के लिए संस्थागत समन्वय मजबूत करें
  • विदेशी निर्भरता कम करने के लिए स्वदेशी निर्माण बढ़ाएं
📝 प्रारंभिक अभ्यास
नए DRDO मिसाइल मार्गदर्शन और प्रणोदन प्रणाली के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह मिसाइल की उड़ान रेंज लगभग 30% तक बढ़ाता है।
  2. यह प्रणाली केवल आयातित विमान प्लेटफॉर्म पर ही एकीकृत और परीक्षण की गई है।
  3. मार्गदर्शन एल्गोरिदम के उन्नयन से स्ट्राइक सटीकता में 25% सुधार हुआ है।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि मिसाइल रेंज 80 किमी से लगभग 110 किमी तक बढ़ी है, जो लगभग 30% वृद्धि है। कथन 2 गलत है क्योंकि प्रणाली का परीक्षण स्वदेशी (तेजस LCA) और आयातित (Su-30MKI) दोनों विमानों पर हुआ है। कथन 3 सही है क्योंकि बेहतर मार्गदर्शन एल्गोरिदम से स्ट्राइक सटीकता में 25% सुधार हुआ है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
मिसाइल सिस्टम वर्गीकरण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. एयर-टू-एयर मिसाइल मुख्य रूप से हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए होती हैं।
  2. एयर-टू-सर्फेस मिसाइल की रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल से स्वाभाविक रूप से लंबी होती है।
  3. मार्गदर्शन सटीकता एयर-टू-एयर मिसाइल के मुकाबले एयर-टू-सर्फेस मिसाइल के लिए कम महत्वपूर्ण होती है।
  • aकेवल 1
  • bऔर (c) केवल
  • cकेवल
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि एयर-टू-एयर मिसाइल हवाई खतरों को निशाना बनाती हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि रेंज डिजाइन और मिशन पर निर्भर करती है, न कि वर्गीकरण पर। कथन 3 गलत है क्योंकि मार्गदर्शन सटीकता दोनों प्रकार की मिसाइलों के लिए महत्वपूर्ण है।

मेन्स प्रश्न

DRDO के मिसाइल मार्गदर्शन और प्रणोदन प्रणाली में हालिया प्रगति भारत की रणनीतिक निवारक क्षमता और हवाई युद्ध कौशल को कैसे मजबूत करती है? शेष तकनीकी चुनौतियां क्या हैं और नीति को इन्हें कैसे संबोधित करना चाहिए? (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 - विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और रक्षा
  • झारखंड दृष्टिकोण: झारखंड में कई रक्षा निर्माण इकाइयां और DRDO प्रयोगशालाएं हैं जो मिसाइल अनुसंधान और उत्पादन में योगदान देती हैं।
  • मेन्स पॉइंटर: क्षेत्रीय औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा में स्वदेशी रक्षा तकनीक की भूमिका पर जोर।
मिसाइल विकास में DRDO की मुख्य भूमिका क्या है?

DRDO मिसाइल प्रणोदन, मार्गदर्शन प्रणाली और समाकलन तकनीकों के अनुसंधान और विकास के लिए जिम्मेदार है, जैसा कि DRDO एक्ट, 1958 में निर्धारित है। यह स्वदेशी मिसाइल तकनीक के नवाचार का नेतृत्व करता है ताकि आयात निर्भरता कम हो सके।

नए DRDO सिस्टम के साथ मिसाइल रेंज में कितना सुधार हुआ है?

मिसाइल की उड़ान रेंज 80 किमी से बढ़कर लगभग 110 किमी हो गई है, जो उड़ान अवधि और परिचालन पहुंच में लगभग 30% की वृद्धि दर्शाता है।

नए मिसाइल सिस्टम का परीक्षण किन विमान प्लेटफॉर्म पर किया गया है?

इस प्रणाली का सफलतापूर्वक समाकलन और परीक्षण स्वदेशी तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट और आयातित Su-30MKI लड़ाकू विमानों पर किया गया है।

भारत में मिसाइल विकास के लिए प्रमुख कानूनी ढांचे कौन-कौन से हैं?

प्रमुख कानूनों में डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट, 1962; आर्म्स एक्ट, 1959; DRDO एक्ट, 1958; और फॉरेन ट्रेड (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1992 शामिल हैं, जो मिसाइल तकनीकों के उत्पादन, कब्जा, अनुसंधान एवं विकास और निर्यात को नियंत्रित करते हैं।

भारत का नया मिसाइल सिस्टम अमेरिकी AIM-120 AMRAAM से कैसे तुलना करता है?

भारत की प्रणाली की रेंज लगभग 110 किमी है और सटीकता में 25% सुधार हुआ है, जबकि AIM-120 AMRAAM की रेंज लगभग 160 किमी है और इसकी सटीकता CEP के भीतर 5 मीटर है। हालांकि, स्वदेशी प्रगति के कारण अंतर कम हो रहा है।

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