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DRDO की हाइपरसोनिक सफलता: क्या, कब, कौन, कहाँ

जनवरी 2024 में, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने Mach 6 की स्थिति में सक्रिय शीतलित पूर्ण आकार स्क्रमजेट कम्बस्टर का लंबी अवधि परीक्षण सफलतापूर्वक किया। यह परीक्षण भारत के एक उच्च गति प्रणोदन परीक्षण केंद्र में 20 सेकंड से अधिक समय तक चला, जो स्वदेशी हाइपरसोनिक प्रणोदन तकनीक में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ (स्रोत: PIB, 2024)। इस उपलब्धि के साथ भारत उन पांच देशों में शामिल हो गया है, जो पूर्ण आकार के स्क्रमजेट इंजन का परीक्षण कर सकते हैं और हाइपरसोनिक मिसाइलों के परिचालन को अपनी रणनीतिक ताकत में शामिल करने की दिशा में बढ़ रहे हैं।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: रक्षा तकनीक, स्वदेशी मिसाइल विकास, एयरोस्पेस प्रणोदन
  • GS पेपर 2: अंतरराष्ट्रीय संबंध – रणनीतिक निरोध और रक्षा सहयोग
  • निबंध: भारत की उभरती रक्षा तकनीकें और रणनीतिक स्वायत्तता

सक्रिय शीतलित स्क्रमजेट कम्बस्टर के तकनीकी पहलू

स्क्रमजेट (Supersonic Combustion Ramjet) इंजन हाइपरसोनिक गति (Mach 5 से ऊपर) पर स्थायी दहन को संभव बनाते हैं, क्योंकि ये दहन कक्ष में सुपरसोनिक वायु प्रवाह को बनाए रखते हैं। DRDO का कम्बस्टर उन्नत सक्रिय शीतलन प्रणाली से लैस है, जो 2000°C से अधिक तापमान को संभालने में सक्षम है, जो दीर्घकालिक संचालन के दौरान संरचनात्मक मजबूती बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है (DRDO तकनीकी बुलेटिन, 2023)। Mach 6 पर 20 सेकंड से अधिक का परीक्षण इस बात का प्रमाण है कि कम्बस्टर अत्यधिक परिस्थितियों में स्थिर दहन और ताप प्रबंधन कर सकता है।

  • सक्रिय शीतलन में ईंधन के पुनर्योजित प्रवाह द्वारा गर्मी अवशोषित की जाती है, जिससे सामग्री विफलता से बचती है।
  • पूर्ण आकार का कम्बस्टर डिजाइन वास्तविक उड़ान की परिस्थितियों का अनुकरण करता है, न कि केवल प्रयोगशाला मॉडल।
  • Mach 6 की वायु गति हाइपरसोनिक क्रूज चरण के लिए मिसाइल उड़ान प्रोफाइल के अनुरूप है।
  • ताप प्रबंधन की नई तकनीकें इंजन जलने के जोखिम को कम करती हैं और विश्वसनीयता बढ़ाती हैं।

रणनीतिक और रक्षा संबंधी प्रभाव

हाइपरसोनिक मिसाइलें, जो Mach 5 से अधिक की गति से चलती हैं, दुश्मन की प्रतिक्रिया समय को पांच मिनट से भी कम कर देती हैं, जिससे इन्हें रोकना कठिन हो जाता है और हमले की क्षमता बढ़ जाती है (Jane’s Defence Weekly, 2023)। भारत का स्वदेशी स्क्रमजेट प्रणोदन विकास हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) परियोजना के लिए अहम है, जिसका आरंभ 2010 में ₹450 करोड़ के बजट के साथ हुआ था (PIB, 2024)। यह सफलता भारत की रणनीतिक निरोध क्षमता को मजबूत करती है, तेज, सटीक और टिकाऊ स्ट्राइक प्लेटफॉर्म प्रदान करती है, जो चीन, रूस और अमेरिका जैसे देशों के हाइपरसोनिक विकास के बीच बहुध्रुवीय सुरक्षा माहौल में महत्वपूर्ण है।

  • हाइपरसोनिक मिसाइलें द्वितीय हमले की क्षमता और निरोध मुद्रा को बढ़ाती हैं।
  • स्वदेशी प्रणोदन विदेशी आपूर्तिकर्ताओं और निर्यात प्रतिबंधों पर निर्भरता कम करता है।
  • मिसाइल रक्षा और कमांड-कंट्रोल नेटवर्क के साथ एकीकरण में मदद करता है।
  • भारत की उच्च तकनीक रक्षा निर्यातों में विश्वसनीयता बढ़ाता है।

हाइपरसोनिक तकनीक के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचा

भारत का हाइपरसोनिक मिसाइल विकास एक मजबूत कानूनी ढांचे के तहत होता है, जो रणनीतिक निगरानी और निर्यात नियंत्रण सुनिश्चित करता है। Defence of India Act, 1962 और Arms Act, 1959 रक्षा उत्पादन और हथियार नियंत्रण का प्रबंधन करते हैं। Atomic Energy Act, 1962 द्वि-उपयोग तकनीकों पर नजर रखता है, जो उन्नत सामग्री और प्रणोदन प्रणालियों के लिए जरूरी है। संविधान के Article 246 के तहत रक्षा केंद्रीय सूची में है, जिससे नीति और वित्तीय निर्णय केंद्र सरकार के पास हैं। DRDO Act, 1982 DRDO के अनुसंधान और विकास के दायित्व निर्धारित करता है। मिसाइल तकनीक के निर्यात नियंत्रण Foreign Trade (Development and Regulation) Act, 1992 के तहत आते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय गैर-प्रसार नियमों का पालन सुनिश्चित करते हैं।

  • DRDO प्रणोदन अनुसंधान में ADA, ISRO, ARDE, और INMAS का सहयोग लेता है।
  • अंतर-एजेंसी समन्वय तकनीकी एकीकरण और परीक्षण की गुणवत्ता सुनिश्चित करता है।
  • निर्यात नियंत्रण अनधिकृत तकनीक हस्तांतरण रोकते हैं, जिससे रणनीतिक लाभ सुरक्षित रहता है।

स्वदेशी हाइपरसोनिक विकास के आर्थिक पहलू

संघीय बजट 2023-24 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास के लिए लगभग ₹15,000 करोड़ (~USD 1.8 बिलियन) आवंटित किए गए, जिनमें से बड़ी मात्रा एयरोस्पेस प्रणोदन तकनीकों के लिए है (Union Budget 2023-24)। हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक का स्वदेशी विकास महंगे विदेशी आयात पर निर्भरता कम करता है, जिससे अरबों रुपये की बचत हो सकती है और घरेलू उच्च तकनीक विनिर्माण उद्योग को बढ़ावा मिलता है। वैश्विक हाइपरसोनिक मिसाइल बाजार 2030 तक USD 15 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, जो 12.5% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है (MarketsandMarkets, 2023), जिससे भारत निर्यात के माध्यम से इस क्षेत्र में हिस्सा ले सकता है।

  • प्रणोदन तकनीक में निवेश एयरोस्पेस और सामग्री विज्ञान में नवाचार फैलाव को बढ़ावा देता है।
  • घरेलू विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा और उच्च तकनीक क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाता है।
  • विदेशी तकनीक प्रतिबंधों से जुड़े रणनीतिक कमजोरियों को कम करता है।

हाइपरसोनिक तकनीक में भारत बनाम चीन तुलना

पैरामीटरभारतचीन
कार्यक्रम की शुरुआत2010 (HSTDV परियोजना)2000 के प्रारंभ, DF-ZF 2014 से परीक्षण
परीक्षित तकनीकपूर्ण आकार सक्रिय शीतलित स्क्रमजेट कम्बस्टर (Mach 6)हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन (DF-ZF), कई उड़ान परीक्षण
परिचालन तैनाती2025-26 तक लक्ष्यपरिचालन तैनाती जारी
परीक्षण आवृत्तिसीमित लेकिन बढ़ती अवधि और जटिलताकई सफल उड़ान परीक्षण, हथियारबंद संस्करण सहित
रणनीतिक फोकसस्वदेशी प्रणोदन और मिसाइल प्रणाली विकासनेटवर्केड रक्षा प्रणालियों के साथ एकीकृत हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन

महत्वपूर्ण चुनौतियां और कमी

इस सफलता के बावजूद, भारत के पास पूर्ण रूप से एकीकृत हाइपरसोनिक मिसाइल प्रणाली, परिचालन तैनाती और मजबूत कमांड-कंट्रोल ढांचा अभी विकसित नहीं है। अमेरिका और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहनों और उन्नत मिसाइल रक्षा नेटवर्क के संयोजन वाले सिस्टम विकसित कर चुके हैं, जो बेहतर युद्धक्षेत्र जागरूकता और प्रतिक्रिया प्रदान करते हैं। भारत को प्रणालियों के एकीकरण में तेजी लानी होगी, हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन विकसित करने होंगे और मिसाइल कमांड नेटवर्क को मजबूत करना होगा ताकि यह तकनीक पूर्ण रूप से परिचालित हो सके।

  • मार्गदर्शन, नेविगेशन और नियंत्रण सहित अंत-से-अंत हाइपरसोनिक मिसाइल प्रणाली की आवश्यकता।
  • स्क्रमजेट प्रणोदन के पूरक के रूप में हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहनों का विकास।
  • समर्पित हाइपरसोनिक मिसाइल कमांड और नियंत्रण ढांचे की स्थापना।
  • विश्वसनीयता और परिचालन तत्परता सुधारने के लिए निरंतर परीक्षण।

महत्व और आगे का रास्ता

  • DRDO के परीक्षण ने स्वदेशी हाइपरसोनिक दहन बनाए रखने की क्षमता को प्रमाणित किया, जो मिसाइल प्रणोदन में मुख्य चुनौती है।
  • शत्रु की प्रतिक्रिया समय कम कर रणनीतिक निरोध को मजबूत करता है और रोकथाम को कठिन बनाता है।
  • महत्वपूर्ण रक्षा तकनीकों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है, आयात निर्भरता और कमजोरियों को कम करता है।
  • मिसाइल सिस्टम, कमांड नेटवर्क और परिचालन सिद्धांतों के साथ त्वरित एकीकरण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
  • DRDO, ISRO, ADA और उद्योग के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करता है ताकि तकनीक का शीघ्र विकास और तैनाती हो सके।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
स्क्रमजेट इंजन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. स्क्रमजेट इंजन सुपरसोनिक वायु प्रवाह में ईंधन दहन करते हैं।
  2. स्क्रमजेट केवल Mach 3 से नीचे की गति पर प्रभावी होते हैं।
  3. स्क्रमजेट कम्बस्टर में सक्रिय शीतलन अत्यधिक तापीय भार को नियंत्रित करने के लिए जरूरी है।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि स्क्रमजेट सुपरसोनिक वायु प्रवाह में ईंधन दहन करते हैं। कथन 2 गलत है; स्क्रमजेट Mach 5 से ऊपर प्रभावी होते हैं, Mach 3 से नीचे नहीं। कथन 3 सही है क्योंकि सक्रिय शीतलन अत्यधिक ताप को नियंत्रित करता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत के हाइपरसोनिक मिसाइल विकास के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. DRDO का HSTDV प्रोजेक्ट 2010 में ₹450 करोड़ बजट के साथ शुरू हुआ था।
  2. भारत ने पहले ही परिचालन हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन तैनात कर दिए हैं।
  3. मिसाइल तकनीक के निर्यात नियंत्रण Defence of India Act, 1962 के तहत आते हैं।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 1
  • cकेवल 2 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 सही है (PIB 2024 के अनुसार)। कथन 2 गलत है; भारत ने अभी तक परिचालन हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन तैनात नहीं किए हैं। कथन 3 गलत है; निर्यात नियंत्रण Foreign Trade (Development and Regulation) Act, 1992 के तहत आते हैं, Defence of India Act के तहत नहीं।

मुख्य प्रश्न

भारत की रक्षा क्षमता और क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्यों के संदर्भ में DRDO के सक्रिय शीतलित पूर्ण आकार स्क्रमजेट कम्बस्टर के लंबी अवधि परीक्षण की रणनीतिक महत्ता पर चर्चा करें। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (विज्ञान और प्रौद्योगिकी) और पेपर 3 (रक्षा और सुरक्षा)
  • झारखंड कोण: झारखंड में कई रक्षा निर्माण इकाइयाँ और अनुसंधान केंद्र हैं जो एयरोस्पेस और मिसाइल तकनीकों में योगदान देते हैं, DRDO की प्रगति से लाभान्वित होते हैं।
  • मुख्य बिंदु: स्थानीय उद्योग, रोजगार और रणनीतिक स्वायत्तता पर स्वदेशी तकनीक के प्रभाव को उजागर करते हुए उत्तर तैयार करें।
स्क्रमजेट इंजन क्या है और यह रामजेट से कैसे अलग है?

स्क्रमजेट (Supersonic Combustion Ramjet) इंजन सुपरसोनिक वायु प्रवाह में ईंधन दहन करता है, जिससे Mach 5 से ऊपर की हाइपरसोनिक गति संभव होती है। जबकि रामजेट दहन से पहले वायु प्रवाह को सबसोनिक कर देते हैं और Mach 3 तक प्रभावी होते हैं, स्क्रमजेट पूरे दहन कक्ष में सुपरसोनिक प्रवाह बनाए रखते हैं, जो उच्च गति संचालन की अनुमति देता है।

स्क्रमजेट कम्बस्टर में सक्रिय शीतलन क्यों जरूरी है?

हाइपरसोनिक दहन के दौरान उत्पन्न 2000°C से अधिक अत्यधिक तापीय भार को नियंत्रित करने के लिए सक्रिय शीतलन आवश्यक है, जो इंजन सामग्री को क्षति से बचाता है। यह आमतौर पर पुनर्योजित ईंधन शीतलन के माध्यम से होता है, जहां ईंधन दहन से पहले गर्मी अवशोषित करता है, जिससे दीर्घकालिक संचालन के दौरान संरचनात्मक मजबूती बनी रहती है।

भारत की मिसाइल तकनीक विकास और निर्यात को कौन से कानूनी अधिनियम नियंत्रित करते हैं?

मिसाइल विकास Defence of India Act, 1962, Arms Act, 1959, और DRDO Act, 1982 के तहत होता है। निर्यात नियंत्रण Foreign Trade (Development and Regulation) Act, 1992 के तहत आते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय गैर-प्रसार नियमों का पालन सुनिश्चित करते हैं और रणनीतिक तकनीकों की सुरक्षा करते हैं।

भारत का हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम चीन के मुकाबले कैसा है?

चीन का कार्यक्रम पहले शुरू हुआ है, जिसमें 2014 से कई हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन परीक्षण और परिचालन तैनाती शामिल है। भारत का कार्यक्रम DRDO के HSTDV परियोजना के नेतृत्व में है, जो स्वदेशी स्क्रमजेट प्रणोदन पर केंद्रित है और परिचालन लक्ष्य 2025-26 निर्धारित है, जो तेजी से तकनीकी अंतर को कम कर रहा है।

स्वदेशी हाइपरसोनिक मिसाइल विकास के आर्थिक लाभ क्या हैं?

स्वदेशी विकास आयात निर्भरता कम करता है, खरीद लागत में अरबों की बचत करता है, घरेलू उच्च तकनीक विनिर्माण को बढ़ावा देता है और भारत को 2030 तक USD 15 बिलियन के वैश्विक हाइपरसोनिक बाजार में हिस्सेदारी लेने के लिए तैयार करता है, जिससे आर्थिक और रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ती है।

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