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परिचय: DRDO का हाइपरसोनिक कम्बस्टर परीक्षण

साल 2024 में DRDO ने भारत के एक विशेष परीक्षण केंद्र पर एक नए हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के कम्बस्टर का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। यह कम्बस्टर माच 5 से अधिक की रफ्तार पर दहन को बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया है, जो हाइपरसोनिक उड़ान की परिभाषा है और मिसाइल के प्रोपल्शन सिस्टम के लिए बेहद जरूरी है। यह परीक्षण 2025 में होने वाले पूर्ण उड़ान परीक्षणों से पहले एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे भारत उन दस से कम देशों में शामिल हो गया है जिनके पास हाइपरसोनिक प्रोपल्शन तकनीक का प्रमाणित अनुभव है (Indian Express, 2024; CSIS Report, 2023)।

UPSC से प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: विज्ञान और तकनीक – रक्षा तकनीक, मिसाइल सिस्टम, स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास
  • GS पेपर 3: सुरक्षा – रणनीतिक निवारण, रक्षा में उभरती तकनीकें
  • निबंध: तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत की रक्षा आधुनिकीकरण

हाइपरसोनिक कम्बस्टर परीक्षण का तकनीकी महत्व

कम्बस्टर स्क्रमजेट इंजन का दिल होता है, जो अत्यधिक ताप और दबाव की स्थिति में ईंधन और हवा को मिलाकर माच 5 से ऊपर की गति पर दहन को स्थिर बनाए रखता है। DRDO के इस सफल परीक्षण से भारत की उस क्षमता का प्रमाण मिला है जो माच 5 से अधिक गति पर स्थिर दहन प्रणाली विकसित कर सकती है। यह तकनीक हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों के विकास की नींव है, जो उच्च गतिशीलता, कम पता लगने की संभावना और तेज़ हमले की क्षमता प्रदान करती हैं, जिससे दुश्मन के प्रतिक्रिया समय में भारी कमी आती है (DRDO आधिकारिक विज्ञप्ति, 2024)।

  • हाइपरसोनिक मिसाइलें माच 5 से ऊपर, यानी 6,000 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति से चलती हैं, जिससे लक्ष्य तक पहुंचने का समय बहुत कम हो जाता है।
  • कम्बस्टर परीक्षण से तापीय तनाव और शॉकवेव के खिलाफ सामग्री और डिजाइन की सहनशीलता की पुष्टि होती है।
  • इस सफल प्रोपल्शन तकनीक के साथ भारत अमेरिका, चीन, रूस जैसे चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास के संवैधानिक और कानूनी ढांचे

DRDO रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करता है और इसका संचालन DRDO Act, 1958 के तहत होता है, जो स्वदेशी रक्षा तकनीक के विकास को सुनिश्चित करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(d) में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का दायित्व नागरिकों पर है, जो आत्मनिर्भर रक्षा के राष्ट्रीय उद्देश्य के अनुरूप है। Arms Act, 1959 हथियार उत्पादन और विकास को नियंत्रित करता है, जिससे मिसाइल तकनीक कानूनी दायरे में रहती है। Defence Procurement Procedure (DPP) 2020 स्वदेशी विकास और खरीद को प्रोत्साहित करता है, जिससे रणनीतिक स्वतंत्रता को बढ़ावा मिलता है।

  • DRDO का अनुसंधान और विकास संविधान के वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय सुरक्षा के दायित्व के अनुरूप है।
  • DPP 2020 स्वदेशी तकनीक विकास को प्रोत्साहित करता है और आयात निर्भरता कम करता है।
  • कानूनी ढांचे के तहत मिसाइल तकनीक का विकास और तैनाती अंतरराष्ट्रीय एवं घरेलू कानूनों के अनुरूप होती है।

हाइपरसोनिक मिसाइल विकास के आर्थिक पहलू

भारत ने 2023-24 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास के लिए लगभग 14,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 15% अधिक है, और इसमें हाइपरसोनिक तकनीक को प्राथमिकता दी गई है (MoD Budget 2023-24)। वैश्विक हाइपरसोनिक मिसाइल बाजार 2030 तक 15 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें 12.5% की वार्षिक वृद्धि दर है (MarketsandMarkets, 2023)। स्वदेशी मिसाइल विकास से आयात निर्भरता कम होती है, जिससे सालाना लगभग 1.5 अरब डॉलर की बचत होती है (SIPRI, 2022), और यह Make in India पहल के तहत रक्षा निर्माण में 25% से बढ़कर 70% तक की वृद्धि को लक्षित करता है।

  • बढ़े हुए रक्षा अनुसंधान बजट से प्रोपल्शन और सामग्री अनुसंधान को बढ़ावा मिलता है।
  • स्वदेशी उत्पादन आर्थिक विकास, रोजगार और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देता है।
  • हाइपरसोनिक तकनीक विकास से भारत वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी हासिल कर सकता है।

भारत में हाइपरसोनिक तकनीक के प्रमुख संस्थान

DRDO हाइपरसोनिक मिसाइल अनुसंधान और विकास का नेतृत्व करता है, जिसमें Aeronautical Development Establishment (ADE) जैसे विशेष प्रयोगशालाएं एयरोडायनामिक्स और प्रोपल्शन पर ध्यान केंद्रित करती हैं। रक्षा मंत्रालय नीति निर्धारण और बजट आवंटन करता है। Indian Space Research Organisation (ISRO) के साथ सहयोग से प्रोपल्शन और उन्नत सामग्री विज्ञान में विशेषज्ञता मिलती है। Sahyadri Aerospace जैसी निजी कंपनियां भी इस क्षेत्र में तेजी से योगदान दे रही हैं, जो सार्वजनिक-निजी भागीदारी की मिसाल है।

  • DRDO की ADE स्क्रमजेट इंजन और कम्बस्टर डिजाइन में विशेषज्ञ है।
  • रक्षा मंत्रालय नीति समन्वय और वित्तीय प्राथमिकता सुनिश्चित करता है।
  • ISRO के साथ सहयोग से एयरोस्पेस सामग्री विज्ञान और प्रोपल्शन में अनुभव मिलता है।
  • Sahyadri Aerospace जैसी निजी कंपनियां नवाचार और निर्माण क्षमता में योगदान देती हैं।

भारत और चीन के बीच हाइपरसोनिक मिसाइल विकास की तुलना

मापदंडभारतचीन
तकनीकी स्थितिकम्बस्टर परीक्षण; 2025 तक पूर्ण उड़ान परीक्षण की योजना2019 से DF-17 हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन परिचालन में
मिसाइल गतिमाच 5 से ऊपर (स्क्रमजेट प्रोपल्शन)माच 10 के करीब
परासविकासाधीन; मध्यम दूरी की श्रेणी में अपेक्षितलगभग 1,800 किलोमीटर
रणनीतिक तैनातीविकास चरण; निवारण स्थिति मजबूत कर रहा हैPLA रॉकेट फोर्स के हथियारों में शामिल
तकनीकी चुनौतियांताप संरक्षण सामग्री, सूक्ष्म मार्गदर्शन प्रणालीउन्नत सामग्री और एआई-निर्देशित प्रणाली परिचालन में

मुख्य खामियां और चुनौतियां

भारत के हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम को अत्यधिक ताप सहन करने वाली उन्नत ताप संरक्षण सामग्री विकसित करने और हाइपरसोनिक गति पर सटीकता बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन और नियंत्रण प्रणालियों को सूक्ष्म बनाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका जैसे प्रतिस्पर्धी एयरोस्पेस और कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान में भारी निवेश कर अपनी परिचालन तत्परता बढ़ा रहे हैं। ये अंतर भारत के पूर्ण परिचालन तैनाती में देरी कर सकते हैं, हालांकि प्रोपल्शन तकनीक में प्रगति हुई है।

  • ताप संरक्षण प्रणालियों के लिए नए कंपोजिट सामग्री की जरूरत है ताकि संरचनात्मक विफलता न हो।
  • सूक्ष्म, मजबूत मार्गदर्शन प्रणाली लक्ष्य की सटीकता के लिए आवश्यक है।
  • एआई और सामग्री विज्ञान जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान का समन्वय भारत के लिए चुनौती बना हुआ है।

रणनीतिक और सुरक्षा प्रभाव

हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलें भारत की रणनीतिक निवारण क्षमता को बढ़ाती हैं, क्योंकि ये तेज, गतिशील हमले कर सकती हैं और मौजूदा मिसाइल रक्षा प्रणालियों को चकमा दे सकती हैं। इनके तैनाती से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण, खासकर चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में, बदल जाएंगे क्योंकि प्रतिक्रिया समय कम होगा और विरोधी की रक्षा योजना जटिल हो जाएगी। स्वदेशी विकास से भारत की रक्षा स्वतंत्रता मजबूत होती है और यह संविधान के निर्देशों तथा नीति ढांचे के अनुरूप है जो आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हैं।

  • हाइपरसोनिक मिसाइलें दुश्मन के प्रतिक्रिया समय को मिनटों से सेकंडों में घटा देती हैं।
  • इनकी गतिशीलता और गति मिसाइल रक्षा को रोकना मुश्किल बनाती है।
  • स्वदेशी क्षमता भारत की रणनीतिक निवारण और तकनीकी प्रतिष्ठा को बढ़ाती है।

आगे का रास्ता

  • उन्नत सामग्री अनुसंधान को प्रोपल्शन विकास के साथ तेजी से जोड़ना ताकि ताप संरक्षण चुनौतियों का समाधान हो सके।
  • एआई और सूक्ष्म मार्गदर्शन तकनीकों में निवेश बढ़ाकर मिसाइल की सटीकता और विश्वसनीयता बढ़ाना।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देकर नवाचार और उत्पादन क्षमता का विस्तार करना।
  • DRDO, ISRO और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत कर बहु-विषयक अनुसंधान को बढ़ावा देना।
  • Make in India के तहत स्वदेशी उत्पादन को प्राथमिकता देकर आयात निर्भरता कम करना और आर्थिक लाभ बढ़ाना।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
हाइपरसोनिक मिसाइलों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलें स्क्रमजेट प्रोपल्शन के जरिए माच 5 से अधिक गति से चलती हैं।
  2. हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन अपनी गति के लिए बैलिस्टिक मिसाइल मार्गों पर निर्भर होते हैं।
  3. भारत के पास अपनी सशस्त्र सेनाओं में पूरी तरह से परिचालित हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलें स्क्रमजेट इंजन का उपयोग कर माच 5 से ऊपर की गति बनाए रखती हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन केवल बैलिस्टिक मार्गों पर निर्भर नहीं होते, बल्कि वायुमंडल के भीतर हाइपरसोनिक गति से ग्लाइड करते हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि भारत अभी परीक्षण चरण में है और हाइपरसोनिक मिसाइलों को पूरी तरह परिचालित नहीं किया गया है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत की Defence Research and Development Organisation (DRDO) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. DRDO रक्षा मंत्रालय के अधीन DRDO Act, 1958 के तहत कार्य करता है।
  2. DRDO Arms Act, 1959 के तहत हथियार उत्पादन को नियंत्रित करता है।
  3. DRDO का हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम Defence Procurement Procedure 2020 के तहत पूरी तरह वित्तपोषित है।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि DRDO रक्षा मंत्रालय के अधीन DRDO Act, 1958 के तहत काम करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि Arms Act, 1959 हथियार उत्पादन को नियंत्रित करता है लेकिन DRDO नियामक प्राधिकरण नहीं है। कथन 3 गलत है क्योंकि Defence Procurement Procedure 2020 स्वदेशी विकास और अधिग्रहण के लिए दिशानिर्देश देता है लेकिन किसी एक कार्यक्रम के लिए पूर्ण वित्तपोषण की गारंटी नहीं देता।

मुख्य प्रश्न

DRDO द्वारा नए हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल के कम्बस्टर के सफल परीक्षण के रणनीतिक और तकनीकी महत्व का आलोचनात्मक विश्लेषण करें। हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक को परिचालित करने में भारत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और उन्हें दूर करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? (250 शब्द)

झारखंड और JPSC से प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – विज्ञान और तकनीक; पेपर 4 – सुरक्षा और रक्षा
  • झारखंड का नजरिया: झारखंड में रक्षा निर्माण इकाइयों और एयरोस्पेस अनुसंधान केंद्रों की मौजूदगी से हाइपरसोनिक तकनीक के विकास से लाभ हो सकता है।
  • मुख्य बिंदु: उत्तर में इस बात को उजागर करें कि कैसे स्वदेशी रक्षा अनुसंधान क्षेत्रीय औद्योगिक विकास और रोजगार से जुड़ा है, राष्ट्रीय सुरक्षा को स्थानीय विकास से जोड़ता है।
हाइपरसोनिक मिसाइल क्या होती है?

हाइपरसोनिक मिसाइल वह होती है जो माच 5 से अधिक गति से चलती है। यह स्क्रमजेट जैसे उन्नत प्रोपल्शन सिस्टम का उपयोग करती है, जिससे वायुमंडल के भीतर तेज़ और गतिशील हमले संभव होते हैं।

हाइपरसोनिक मिसाइल के प्रोपल्शन में कम्बस्टर की भूमिका क्या है?

कम्बस्टर ईंधन और उच्च गति वाली हवा को मिलाकर हाइपरसोनिक गति पर दहन को बनाए रखता है, जिससे स्क्रमजेट इंजन में निरंतर थ्रस्ट मिलता है। इसे उड़ान के दौरान अत्यधिक ताप और दबाव सहना पड़ता है।

DRDO किस कानूनी ढांचे के तहत काम करता है?

DRDO रक्षा मंत्रालय के अधीन DRDO Act, 1958 के तहत काम करता है। यह Arms Act, 1959 के तहत हथियारों के उत्पादन को नियंत्रित करता है और Defence Procurement Procedure 2020 के दिशानिर्देशों का पालन करता है।

स्वदेशी हाइपरसोनिक मिसाइल विकास भारत की अर्थव्यवस्था पर कैसे प्रभाव डालता है?

स्वदेशी विकास आयात निर्भरता कम करता है, जिससे सालाना लगभग 1.5 अरब डॉलर की बचत होती है। यह Make in India के तहत घरेलू निर्माण, रोजगार और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देता है।

हाइपरसोनिक मिसाइल विकास में भारत को मुख्य चुनौतियां क्या हैं?

भारत को अत्यधिक ताप सहने वाली उन्नत सामग्री विकसित करने और सूक्ष्म मार्गदर्शन प्रणाली बनाने में चुनौतियां हैं। एआई और एयरोस्पेस सामग्री विज्ञान के बीच समन्वय भी एक बड़ी चुनौती है।

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