परिचय: ग्रेट निकोबार द्वीप पर रणनीतिक विकास
2024 में प्रस्तावित ग्रेट निकोबार द्वीप पर ग्रीनफील्ड सिटी के ड्राफ्ट मास्टर प्लान का उद्देश्य द्वीप के कुल 1,045 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से लगभग 20% हिस्से में पर्यटन और बुनियादी ढांचे का विकास करना है। यह पहल उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय (MDoNER) द्वारा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह प्रशासन के सहयोग से संचालित की जा रही है। योजना के तहत अगले पांच वर्षों में लगभग 8,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा, जो क्षेत्रीय GDP और रोजगार में उल्लेखनीय वृद्धि का लक्ष्य रखती है, साथ ही पारिस्थितिक संवेदनशीलता और जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जाएगा।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 1: भारतीय भूगोल (द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र, जनजातीय क्षेत्र)
- GS पेपर 3: बुनियादी ढांचा विकास, पर्यावरण और पारिस्थितिकी, आर्थिक विकास
- निबंध: सतत विकास मॉडल, पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था का संतुलन
संवैधानिक और कानूनी ढांचा
ग्रेट निकोबार द्वीप भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244(2) और अनुसूची 5 के अंतर्गत आता है, जो जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष सुरक्षा प्रदान करते हैं, जिनमें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी शामिल हैं। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों की सुरक्षा) विनियम, 1956 स्थानीय जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करता है और ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाता है जो उनकी जीवनशैली को प्रभावित कर सकती हैं।
पर्यावरणीय मंजूरी पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत दी जाती है, विशेषकर इसके सेक्शन 3 और 5 के अंतर्गत, जो केंद्र सरकार को पर्यावरण के लिए हानिकारक गतिविधियों को नियंत्रित और प्रतिबंधित करने का अधिकार देते हैं। तटीय क्षेत्र नियमन अधिसूचना (CRZ), 2019 समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी की सुरक्षा के लिए तटीय विकास पर प्रतिबंध लगाती है, जिससे निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों को सीमित किया जाता है।
- अनुच्छेद 244(2) और अनुसूची 5: जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान, स्वशासन और सुरक्षा।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, सेक्शन 3 और 5: पर्यावरणीय मंजूरी के लिए नियामक ढांचा।
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों की सुरक्षा) विनियम, 1956: जनजातीय अधिकार और भूमि उपयोग प्रतिबंध।
- CRZ अधिसूचना, 2019: समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी की सुरक्षा के लिए तटीय विकास प्रतिबंध।
आर्थिक आयाम: निवेश, रोजगार और सामरिक समुद्री स्थिति
केंद्र सरकार ने ग्रेट निकोबार विकास योजना के तहत बुनियादी ढांचे और पर्यटन के विकास के लिए 8,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं (MDoNER, 2024)। योजना में सड़कों, बंदरगाहों और हवाई अड्डे का निर्माण शामिल है, जो 2030 तक वार्षिक पर्यटक आगमन को वर्तमान 50,000 से बढ़ाकर 1,20,000 करने का लक्ष्य रखती है (Indian Tourism Statistics, 2023)।
रोजगार सृजन का अनुमान 10,000 से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियों का है, जो निर्माण, आतिथ्य और संबंधित क्षेत्रों में फैला होगा (Economic Survey, 2024)। पोर्ट संरचना को वार्षिक 5 मिलियन TEUs संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिससे भारत की इंडो-पैसिफिक समुद्री व्यापार क्षमता में वृद्धि होगी (Ministry of Shipping, 2024)। क्षेत्रीय GDP में अगले दशक में लगभग 5% की वृद्धि की उम्मीद है, जो पर्यटन और लॉजिस्टिक्स के समेकित विकास के प्रभाव को दर्शाती है।
- 5 वर्षों में 8,000 करोड़ रुपये का बहु-मोडल बुनियादी ढांचा निवेश।
- विकास के बाद पर्यटक आवागमन में वार्षिक 15-20% की वृद्धि अपेक्षित।
- निर्माण, आतिथ्य और लॉजिस्टिक्स में 10,000 से अधिक रोजगार सृजन।
- पोर्ट क्षमता: वार्षिक 5 मिलियन TEUs, सामरिक समुद्री व्यापार को बढ़ावा।
- क्षेत्रीय GDP में 10 वर्षों में 5% की वृद्धि का अनुमान।
संस्थागत भूमिकाएं और पर्यावरणीय निगरानी
उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय (MDoNER) परियोजना के समन्वय और वित्तपोषण के लिए प्रमुख एजेंसी है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह प्रशासन स्थानीय शासन और विशेष रूप से जनजातीय कल्याण के लिए नियामक भूमिका निभाता है।
पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और टिकाऊ तकनीकी समाधान राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) द्वारा प्रदान किए जाते हैं। पर्यावरणीय मंजूरी और निगरानी की जिम्मेदारी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के पास है। भारतीय पर्यटन विकास निगम (ITDC) पर्यटन बुनियादी ढांचे के विकास और प्रचार में लगा है। ग्रेट निकोबार बायोस्फियर रिजर्व प्रबंधन प्राधिकरण पारिस्थितिक संरक्षण और जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
- MDoNER: परियोजना समन्वय और वित्तीय प्रबंधन।
- अंडमान और निकोबार प्रशासन: स्थानीय शासन और जनजातीय विनियमन।
- NIOT: पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और टिकाऊ तकनीकी समाधान।
- MoEFCC: पर्यावरणीय मंजूरी और अनुपालन निगरानी।
- ITDC: पर्यटन बुनियादी ढांचा और प्रचार।
- ग्रेट निकोबार बायोस्फियर रिजर्व प्रबंधन प्राधिकरण: पारिस्थितिक और जनजातीय सुरक्षा।
विकास के पैमाने और प्रभाव पर आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण
| परिमाण | वर्तमान स्थिति | विकास के बाद अनुमान |
|---|---|---|
| द्वीप का क्षेत्रफल | 1,045 वर्ग किलोमीटर | विकास सीमित 20% (~209 वर्ग किलोमीटर) |
| जनसंख्या | लगभग 8,000 (जनगणना 2011) | प्रवास और रोजगार के कारण वृद्धि |
| पर्यटक आगमन | वार्षिक 50,000 | 2030 तक 1,20,000 |
| निवेश | न्यूनतम | 5 वर्षों में 8,000 करोड़ रुपये |
| रोजगार | सीमित स्थानीय रोजगार | 10,000+ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार |
| पोर्ट क्षमता | अस्तित्वहीन | वार्षिक 5 मिलियन TEUs |
तुलनात्मक अध्ययन: ग्रेट निकोबार और जेजू द्वीप विकास मॉडल
ग्रेट निकोबार का विकास मॉडल दक्षिण कोरिया के जेजू द्वीप के समान है, जहां पर्यटन बुनियादी ढांचे के विस्तार के साथ सख्त पारिस्थितिक संरक्षण नीतियां अपनाई गई थीं। जेजू द्वीप में दस वर्षों में पर्यटक आगमन में 25% की वृद्धि हुई, बिना किसी बड़े पर्यावरणीय नुकसान के (Korean Ministry of Culture, Sports and Tourism, 2022)।
| पहलू | ग्रेट निकोबार द्वीप | जेजू द्वीप, दक्षिण कोरिया |
|---|---|---|
| विकसित क्षेत्र | द्वीप का 20% (~209 वर्ग किलोमीटर) | चयनित क्षेत्र और पारिस्थितिक बफर |
| पर्यटन वृद्धि | 2030 तक 140% अनुमानित वृद्धि | 10 वर्षों में 25% वृद्धि |
| पर्यावरण सुरक्षा | CRZ, बायोस्फियर रिजर्व, जनजातीय कानून | सख्त क्षेत्र निर्धारण और संरक्षण नीतियां |
| आर्थिक प्रभाव | क्षेत्रीय GDP में 5% वृद्धि का अनुमान | इको-टूरिज्म के साथ सतत आर्थिक विकास |
| रोजगार | 10,000+ नौकरियां अनुमानित | पर्यटन क्षेत्र में महत्वपूर्ण रोजगार सृजन |
महत्वपूर्ण कमियां: पारिस्थितिक क्षमता और जनजातीय अधिकारों का प्रवर्तन
ड्राफ्ट मास्टर प्लान में द्वीप की दीर्घकालिक पारिस्थितिक क्षमता का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया है, जिससे एक वैश्विक महत्व के बायोस्फियर रिजर्व में जैव विविधता के नुकसान का खतरा है। 1956 के विनियम और अनुसूची 5 के तहत जनजातीय अधिकारों के प्रवर्तन के लिए स्पष्ट और मजबूत तंत्र का अभाव है, जिससे विस्थापन और सांस्कृतिक विघटन की आशंका बनी हुई है।
ऐसे बड़े द्वीपीय विकासों में पारंपरिक रूप से पारिस्थितिक सीमाओं और जनजातीय संवेदनशीलताओं को कम आंका गया है, जिसके कारण अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति और सामाजिक संघर्ष हुए हैं। जनजातीय समुदायों के साथ निरंतर परामर्श और अनुकूल पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए बंधनकारी ढांचे की कमी एक गंभीर कमी है।
- पारिस्थितिक क्षमता और समग्र प्रभावों का अपर्याप्त आकलन।
- जनजातीय भूमि और सांस्कृतिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए कमजोर प्रावधान।
- स्थानीय समुदायों के लिए पारदर्शी और सहभागिता आधारित तंत्र का अभाव।
- पर्यटन बुनियादी ढांचे के विस्तार और संरक्षण लक्ष्यों के बीच संभावित टकराव।
महत्त्व और आगे का रास्ता
ग्रेट निकोबार ग्रीनफील्ड सिटी परियोजना रणनीतिक बुनियादी ढांचे और पर्यटन विकास को पारिस्थितिक और जनजातीय सुरक्षा के साथ जोड़ने का दुर्लभ अवसर प्रदान करती है। इसकी सफलता विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने पर निर्भर है।
- NIOT और MoEFCC के सहयोग से निरंतर पर्यावरणीय निगरानी को संस्थागत बनाना।
- अनुसूची 5 और 1956 के विनियम के तहत कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रोटोकॉल के माध्यम से जनजातीय अधिकारों के प्रवर्तन को मजबूत करना।
- पर्यावरणीय क्षमता के अनुसार पर्यटन आवागमन को नियंत्रित करने के लिए अनुकूल प्रबंधन अपनाना।
- जेजू द्वीप के अनुभवों से सीख लेकर सतत पर्यटन, स्थानीय आजीविका और संरक्षण को जोड़ना।
- योजना से लेकर क्रियान्वयन तक पारदर्शी हितधारक सहभागिता सुनिश्चित करना, जिसमें स्थानीय जनजातीय समुदाय शामिल हों।
- योजना द्वीप के 50% क्षेत्र में विकास का प्रस्ताव देती है ताकि आर्थिक उत्पादन अधिकतम हो सके।
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (आदिवासी जनजातियों की सुरक्षा) विनियम, 1956, क्षेत्र में जनजातीय अधिकारों को नियंत्रित करता है।
- तटीय क्षेत्र नियमन अधिसूचना, 2019, कुछ प्रकार के तटीय विकास कार्यों को प्रतिबंधित करती है।
- परियोजना से 10,000 से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की उम्मीद है।
- पोर्ट संरचना का लक्ष्य वार्षिक 5 मिलियन TEUs संभालना है।
- पारिस्थितिक प्रतिबंधों के कारण क्षेत्रीय GDP में गिरावट का अनुमान है।
मुख्य प्रश्न
ग्रेट निकोबार द्वीप पर ग्रीनफील्ड सिटी के ड्राफ्ट मास्टर प्लान में पर्यटन आधारित आर्थिक विकास को पारिस्थितिक और जनजातीय सुरक्षा के साथ संतुलित करने के प्रयासों पर चर्चा करें। योजना में कौन-कौन सी प्रमुख कमियां हैं, और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 1 (भूगोल और पर्यावरण), पेपर 2 (आर्थिक विकास)
- झारखंड दृष्टिकोण: झारखंड की जनजातीय आबादी और वन क्षेत्र विकास तथा पारिस्थितिक व जनजातीय अधिकारों के संतुलन से जुड़े समान मुद्दों का सामना करते हैं, जिससे ग्रेट निकोबार का मामला तुलनात्मक नीति विश्लेषण के लिए प्रासंगिक है।
- मुख्य बिंदु: संवैधानिक जनजातीय सुरक्षा, पर्यावरण कानून और बुनियादी ढांचे के आर्थिक लाभों को जोड़कर उत्तर तैयार करें, झारखंड के जनजातीय और पारिस्थितिक संदर्भों के साथ तुलना करते हुए।
ग्रेट निकोबार जैसे जनजातीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए कौन से संवैधानिक प्रावधान हैं?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244(2) और अनुसूची 5 जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष सुरक्षा और शासन ढांचा प्रदान करते हैं, जिनमें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भी शामिल हैं, जो स्वायत्तता और जनजातीय अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करते हैं।
ग्रेट निकोबार विकास में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की भूमिका क्या है?
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के सेक्शन 3 और 5 केंद्र सरकार को पर्यावरण के लिए हानिकारक गतिविधियों को नियंत्रित और प्रतिबंधित करने का अधिकार देते हैं, जिससे ग्रेट निकोबार द्वीप पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी अनिवार्य होती है।
ग्रेट निकोबार द्वीप पर विकास को तटीय क्षेत्र नियमन अधिसूचना, 2019 कैसे प्रभावित करती है?
CRZ अधिसूचना, 2019 तटीय क्षेत्रों में निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाती है ताकि समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी की सुरक्षा हो सके, जिससे ग्रेट निकोबार के तटीय विकास की सीमा और प्रकार नियंत्रित होते हैं।
ग्रेट निकोबार ग्रीनफील्ड सिटी परियोजना से कौन से आर्थिक लाभ अपेक्षित हैं?
परियोजना से 10,000 से अधिक रोजगार सृजित होने, पर्यटक आगमन को 50,000 से बढ़ाकर 2030 तक 1,20,000 करने, और क्षेत्रीय GDP में अगले दशक में 5% वृद्धि के साथ-साथ सामरिक समुद्री व्यापार के लिए पोर्ट क्षमता बढ़ाने की उम्मीद है।
ड्राफ्ट मास्टर प्लान के पर्यावरणीय और सामाजिक चिंताएं क्या हैं?
योजना में दीर्घकालिक पारिस्थितिक क्षमता का पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है और जनजातीय अधिकारों के प्रवर्तन के लिए मजबूत तंत्र का अभाव है, जिससे जैव विविधता के नुकसान और स्थानीय जनजातीय समुदायों के विस्थापन का खतरा है।
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