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परिचय: झारखंड में वनों की कटाई और आदिवासी विस्थापन

2000 में बिहार से अलग होकर बना झारखंड 23,420 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र से संपन्न है, जो इसकी भौगोलिक सीमा का 29.6% हिस्सा है (Forest Survey of India, 2021)। राज्य के समृद्ध खनिज संसाधनों ने खनन और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया है, जिससे वनों की कटाई तेज हुई और आदिवासी समुदायों का विस्थापन हुआ। 2010 से 2020 के बीच खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण 50,000 से अधिक आदिवासी विस्थापित हुए (झारखंड आदिवासी कल्याण विभाग, 2022)। इस स्थिति से जैव विविधता और आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिरता दोनों को खतरा है, क्योंकि वे अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर हैं।

JPSC Exam Relevance

  • Paper 2: Environment and Ecology – झारखंड में वन संरक्षण की चुनौतियां
  • Paper 3: Tribal Welfare and Scheduled Areas – कानूनी सुरक्षा और विस्थापन से जुड़ी समस्याएं
  • पिछले साल के प्रश्न: 2019, 2021 – झारखंड में आदिवासी विस्थापन और वन शासन

झारखंड में वन और आदिवासी अधिकारों का कानूनी ढांचा

झारखंड के आदिवासी क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं, जिसमें अनुच्छेद 244(2) विशेष प्रशासनिक प्रावधान देता है। Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006 (FRA) वन भूमि और संसाधनों पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता देता है (धारा 3 और 4)। Forest Conservation Act, 1980 (धारा 2) वन भूमि के उपयोग में बदलाव को नियंत्रित करता है और गैर-वन उपयोग के लिए केंद्र की मंजूरी अनिवार्य करता है। Environment Protection Act, 1986 केंद्र को पर्यावरण सुरक्षा के तहत वन संरक्षण का अधिकार देता है। Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 (PESA) आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को प्राकृतिक संसाधनों, जिनमें वन भी शामिल हैं, के प्रबंधन का अधिकार देता है।

  • Samatha बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997): सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित क्षेत्रों में खनन पट्टों को गैर-आदिवासियों तक सीमित करने का फैसला दिया, जो झारखंड की खनन नीतियों के लिए अहम है।
  • इन कानूनों के बावजूद कार्यान्वयन में कमियां हैं, जो आदिवासी अधिकारों और वन संरक्षण को कमजोर करती हैं।
  • विस्थापित आदिवासी परिवारों में से केवल 15% को औपचारिक पुनर्वास लाभ मिला है (झारखंड राज्य मानवाधिकार आयोग, 2023)।

खनन और वनों की कटाई का आदिवासी आजीविका पर आर्थिक प्रभाव

खनन झारखंड की राज्य आय का लगभग 40% योगदान देता है, जिसमें कोयले का उत्पादन 140 मिलियन टन प्रति वर्ष है (Ministry of Coal, 2023)। लेकिन वन आधारित आजीविका 30% से अधिक आदिवासी परिवारों का सहारा है (Census 2011; Jharkhand Statistical Handbook, 2022)। गैर-लकड़ी वन उत्पाद (NTFP) की अर्थव्यवस्था लगभग ₹500 करोड़ प्रति वर्ष की है, जो 0.5% वार्षिक वन क्षेत्र की हानि से खतरे में है (Forest Survey of India, 2021)। खनन पट्टे झारखंड के वन क्षेत्र का 12% हिस्सा कवर करते हैं (Ministry of Mines Annual Report, 2023), जिससे भूमि विवाद और विस्थापन बढ़ रहा है।

  • पिछले दशक में खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण 50,000 से अधिक आदिवासी विस्थापित हुए (झारखंड आदिवासी कल्याण विभाग, 2022)।
  • राज्य ने 2023-24 के लिए ₹1,200 करोड़ का बजट वन संरक्षण और आदिवासी कल्याण के लिए आवंटित किया है, लेकिन पुनर्वास असंतोषजनक है।
  • वनों की कटाई से पारिस्थितिक तंत्र की सेवाएं प्रभावित होती हैं, जो आदिवासियों की आजीविका के लिए जरूरी हैं, जैसे जल संतुलन और जैव विविधता।

झारखंड में संस्थागत भूमिकाएं और चुनौतियां

झारखंड वन विभाग वन संरक्षण और कानून प्रवर्तन का प्रबंधन करता है। झारखंड आदिवासी कल्याण विभाग आदिवासी अधिकारों और पुनर्वास की देखरेख करता है। Forest Survey of India (FSI) वन आवरण और क्षरण का डेटा प्रदान करता है। Ministry of Environment, Forest and Climate Change (MoEFCC) वन भूमि के उपयोग परिवर्तन और पर्यावरण मंजूरी का नियमन करता है। झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) पर्यावरण अनुपालन की निगरानी करता है। National Mineral Development Corporation (NMDC) बड़े खनन प्रोजेक्ट संचालित करता है, जो वन क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं।

  • इन संस्थानों के बीच समन्वय की कमी वन कानूनों के प्रवर्तन को कमजोर करती है।
  • PESA के तहत ग्राम सभाओं में वन शासन के अधिकारों को लागू करने की क्षमता और जागरूकता कम है।
  • पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) में अक्सर आदिवासी समुदाय की प्रभावी भागीदारी नहीं होती।

वन आवरण में कमी और जैव विविधता का नुकसान

झारखंड का वन आवरण 2017 में 29.6% से घटकर 2021 में 28.9% हो गया है (FSI, 2021), जो लगातार जारी वनों की कटाई को दर्शाता है। इससे राज्य के उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनों के स्थानीय जीव-जंतुओं और जैव विविधता पर खतरा बढ़ गया है। खनन गलियारों के कारण वन क्षेत्र टुकड़ों में बंट रहे हैं, जिससे वन्यजीवों के आवास और पारिस्थितिक कनेक्टिविटी प्रभावित हो रही है।

परिमाण20172021
वन आवरण (%)29.6%28.9%
खनन पट्टों के अंतर्गत क्षेत्र (वन भूमि)11.5%12%
वार्षिक वन हानि दर0.4%0.5%
आदिवासी जनसंख्या (% राज्य की)26.2% (Census 2011)--

तुलनात्मक अध्ययन: झारखंड बनाम ब्राजील के अमेज़न आदिवासी वन शासन

ब्राजील के अमेज़न वर्षावन में Indigenous and Tribal Peoples Convention, 1989 (ILO Convention 169) के तहत आदिवासी समुदायों का सह-प्रबंधन होता है। इस कानूनी व्यवस्था ने आदिवासियों को वन प्रबंधन का अधिकार दिया है, जिससे गैर-संरक्षित क्षेत्रों की तुलना में उनके क्षेत्रों में वनों की कटाई की दर 30% कम है (INPE, 2022)। इसके विपरीत, झारखंड में FRA और PESA के तहत सामुदायिक अधिकार कमजोर कार्यान्वयन और सीमित भागीदारी के कारण प्रभावहीन हैं।

पहलूझारखंडब्राजील (अमेज़न आदिवासी क्षेत्र)
कानूनी ढांचाFRA 2006, PESA 1996, पांचवीं अनुसूचीILO Convention 169, राष्ट्रीय आदिवासी कानून
सामुदायिक भागीदारीसीमित, ग्राम सभा कमजोरमजबूत सह-प्रबंधन और स्वायत्तता
वन कटाई दर0.5% वार्षिक हानिआदिवासी क्षेत्रों में 30% धीमी
विस्थापितों का पुनर्वास15% औपचारिक रूप से पुनर्वासितस्थानीय संरक्षण पर अधिक ध्यान

कार्यान्वयन की कमियां और मुख्य चुनौतियां

झारखंड के कानूनी प्रावधान कागजों में मजबूत हैं, लेकिन व्यवहार में कमजोर पड़ जाते हैं। आदिवासी समुदायों को FRA और PESA के तहत अपने अधिकारों की जानकारी कम है। विस्थापित आदिवासियों के पुनर्वास के उपाय अधूरे हैं, केवल कुछ ही परिवारों को औपचारिक लाभ मिल पाता है। खनन पट्टे बिना ग्राम सभा की सहमति के जारी होते हैं, जो PESA का उल्लंघन है। पर्यावरण मंजूरियां कभी-कभी कड़ी जांच के बिना दी जाती हैं, जिससे वन संरक्षण कमजोर होता है।

  • ग्राम सभा सशक्तिकरण असमान है, जिससे सामुदायिक वन शासन सीमित रहता है।
  • राज्य की राजस्व प्राथमिकताएं और आदिवासी अधिकारों के बीच टकराव नीतिगत विरोधाभास पैदा करता है।
  • FSI और JSPCB जैसे संस्थानों द्वारा डेटा पारदर्शिता और निगरानी को मजबूत करने की जरूरत है।

आगे का रास्ता: कानूनी प्रवर्तन मजबूत करना और सामुदायिक भागीदारी बढ़ाना

  • आदिवासी समुदायों में FRA और PESA अधिकारों के बारे में जागरूकता और क्षमता बढ़ाने के लिए अभियान चलाएं।
  • वन भूमि के उपयोग परिवर्तन और खनन परियोजनाओं में Gram Sabha की सहमति को PESA और FRA के तहत अनिवार्य करें।
  • पुनर्वास योजनाओं को पारदर्शी, समयबद्ध और स्थायी आजीविका विकल्पों से जोड़कर बेहतर बनाएं।
  • वन विभाग, आदिवासी कल्याण विभाग, MoEFCC और JSPCB के बीच समन्वय मजबूत करें।
  • ब्राजील के आदिवासी सह-प्रबंधन मॉडल से प्रेरणा लेकर सामुदायिक वन शासन अपनाएं ताकि वनों की कटाई कम हो सके।
  • सैटेलाइट इमेजरी और GIS जैसी तकनीकों से वन आवरण और खनन प्रभाव की वास्तविक समय में निगरानी करें।

अभ्यास प्रश्न

📝 प्रारंभिक अभ्यास
झारखंड में Forest Rights Act (FRA), 2006 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. FRA वन भूमि और संसाधनों पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता देता है।
  2. FRA के तहत वन भूमि के सभी उपयोग परिवर्तन के लिए ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है।
  3. वन भूमि उपयोग परिवर्तन के मामलों में FRA, Forest Conservation Act, 1980 से ऊपर है।

इनमें से कौन सा/से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि FRA व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है। कथन 2 सही है क्योंकि कुछ वन अधिकारों और उपयोग परिवर्तन के लिए ग्राम सभा की सहमति जरूरी है। कथन 3 गलत है; FRA वन भूमि उपयोग परिवर्तन में Forest Conservation Act को ओवरराइड नहीं करता।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
झारखंड में आदिवासी विस्थापन के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. 2010 से 2020 के बीच खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण 50,000 से अधिक आदिवासी विस्थापित हुए।
  2. विस्थापित आदिवासी परिवारों में से 50% से अधिक को औपचारिक पुनर्वास लाभ मिला है।
  3. खनन पट्टे झारखंड के लगभग 12% वन भूमि को कवर करते हैं।

इनमें से कौन सा/से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है (झारखंड आदिवासी कल्याण विभाग)। कथन 2 गलत है; केवल 15% को औपचारिक पुनर्वास मिला है। कथन 3 सही है (Ministry of Mines Annual Report, 2023)।

मुख्य प्रश्न

झारखंड में खनन और औद्योगिक विस्तार से हुई वनों की कटाई ने आदिवासी आजीविका और जैव विविधता को कैसे प्रभावित किया है? आदिवासी विस्थापन और वन संरक्षण की चुनौतियों से निपटने के लिए कानूनी और नीतिगत उपाय सुझाएं।

झारखंड और JPSC से संबंधित

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी), पेपर 3 (आदिवासी कल्याण और अनुसूचित क्षेत्र)
  • झारखंड का दृष्टिकोण: वन आवरण में गिरावट, 50,000 से अधिक आदिवासी विस्थापन, और खनन का 40% राजस्व योगदान स्थानीय पारिस्थितिक और सामाजिक चुनौतियों को उजागर करता है।
  • मुख्य बिंदु: संविधानिक सुरक्षा (अनुच्छेद 244(2), पांचवीं अनुसूची), FRA और PESA प्रावधान, संस्थागत भूमिकाएं और झारखंड के लिए विशिष्ट कार्यान्वयन की कमियों को जोड़कर उत्तर तैयार करें।
झारखंड में आदिवासी क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए कौन से संवैधानिक प्रावधान हैं?

अनुच्छेद 244(2) और संविधान की पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक सुरक्षा देते हैं, जो झारखंड के आदिवासी इलाकों में स्वशासन और आदिवासी हितों की रक्षा सुनिश्चित करते हैं।

Forest Rights Act, 2006 झारखंड के आदिवासी समुदायों के लिए कैसे लाभकारी है?

FRA वन भूमि और संसाधनों पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता देता है, जिससे आदिवासी कानूनी रूप से वन संपदा के मालिक बनते हैं और अपनी आजीविका सुरक्षित कर पाते हैं।

PESA के तहत झारखंड में ग्राम सभाओं की क्या भूमिका है?

PESA के तहत अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभाओं को प्राकृतिक संसाधनों, विशेषकर वनों के प्रबंधन का अधिकार है और भूमि अधिग्रहण या उपयोग परिवर्तन से पहले उनकी सहमति जरूरी होती है, जिससे आदिवासी स्वशासन को बल मिलता है।

झारखंड में खनन के कारण आदिवासी विस्थापन का पैमाना क्या है?

2010 से 2020 के बीच खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण 50,000 से अधिक आदिवासी विस्थापित हुए, जिनमें से केवल 15% को औपचारिक पुनर्वास लाभ मिला है (झारखंड आदिवासी कल्याण विभाग, 2022; राज्य मानवाधिकार आयोग, 2023)।

झारखंड के वन आवरण नुकसान की तुलना ब्राजील के अमेज़न आदिवासी क्षेत्रों से कैसे है?

झारखंड में वार्षिक वन आवरण हानि 0.5% है, जबकि ब्राजील के अमेज़न आदिवासी क्षेत्रों में समुदाय आधारित सह-प्रबंधन के कारण यह दर 30% धीमी है (INPE, 2022)।

आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ाई के लिए

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