2025-26 में MGNREGS के पैमाने और कार्यदिवसों में गिरावट: एक समीक्षा
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS) ने वित्त वर्ष 2025-26 में अपने पैमाने और प्रति परिवार औसत कार्यदिवसों में कमी देखी। ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) के अनुसार, औसत व्यक्ति-दिवस रोजगार 2024-25 के 48.5 से घटकर 2025-26 में 42.3 रह गया। इसी अवधि में, केंद्रीय बजट 2025-26 में MGNREGS के लिए ₹73,000 करोड़ आवंटित किए गए, जो पिछले वर्ष के ₹76,800 करोड़ से 5% कम है। इस दौरान ग्रामीण बेरोजगारी दर सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़ों के अनुसार 6.3% से बढ़कर 7.1% हो गई, जबकि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने मजदूरी भुगतान में औसतन 15 दिनों की देरी की रिपोर्ट दी। ये संकेत ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के कार्यान्वयन और वित्तपोषण में मौलिक समस्याओं को दर्शाते हैं।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 2: शासन – सामाजिक कल्याण योजनाएं, ग्रामीण विकास
- GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था – रोजगार, बजट और सार्वजनिक व्यय
- निबंध: कृषि संकट में सामाजिक सुरक्षा जाल की भूमिका
MGNREGS का कानूनी ढांचा और संवैधानिक प्रावधान
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 के तहत धारा 3 के अंतर्गत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को प्रति वर्ष 100 दिन मजदूरी रोजगार का कानूनी अधिकार दिया गया है। धारा 7 राज्य सरकारों को मांग पर रोजगार उपलब्ध कराने का दायित्व देती है, जबकि धारा 17 मजदूरी का समय पर भुगतान सुनिश्चित करती है। ये प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 41 को लागू करते हैं, जो राज्य को रोजगार का अधिकार सुनिश्चित करने का निर्देश देता है। सुप्रीम कोर्ट ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम भारत संघ (2003) मामले में योजना की प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए मजदूरी भुगतान की समयबद्धता पर जोर दिया था।
- धारा 3: प्रति परिवार वार्षिक 100 दिन मजदूरी रोजगार का अधिकार।
- धारा 7: मांग पर रोजगार उपलब्ध कराने का राज्य सरकारों का दायित्व।
- धारा 17: कार्य पूरा होने के 15 दिनों के भीतर मजदूरी का भुगतान।
- अनुच्छेद 41: निर्देशक सिद्धांत जो रोजगार के अधिकार की गारंटी देता है।
2025-26 में MGNREGS के प्रदर्शन के आर्थिक संकेतक
2025-26 में ₹73,000 करोड़ के बजट आवंटन में 5% की कटौती के साथ प्रति परिवार औसत व्यक्ति-दिवस रोजगार में 13% की गिरावट आई, जो 48.5 से घटकर 42.3 रह गया। सक्रिय जॉब कार्ड की संख्या में 3% की कमी और महिला श्रमिकों की भागीदारी 54% से घटकर 50% हो गई, जो योजना की पहुंच कमजोर होने का संकेत है। मजदूरी भुगतान में औसत देरी 15 दिन तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष के 10 दिन से अधिक है, जिससे लाभार्थियों का भरोसा कमजोर हुआ। इस बीच, ग्रामीण बेरोजगारी दर 7.1% तक बढ़ गई, जो ग्रामीण आजीविका सुरक्षा में बढ़ती कमी को दर्शाती है।
- बजट आवंटन: 2025-26 में ₹73,000 करोड़ बनाम 2024-25 में ₹76,800 करोड़ (केंद्रीय बजट 2025-26)।
- प्रति परिवार औसत व्यक्ति-दिवस: 2025-26 में 42.3 बनाम 2024-25 में 48.5 (MoRD रिपोर्ट 2026)।
- ग्रामीण बेरोजगारी दर: 2025-26 में 7.1% बनाम 2024-25 में 6.3% (CMIE 2026)।
- मजदूरी भुगतान में देरी: 2025-26 में 15 दिन बनाम 2024-25 में 10 दिन (CAG 2026)।
- सक्रिय जॉब कार्ड: 2025-26 में 3% की गिरावट (MoRD MIS डाटा)।
- महिला श्रमिक: 54% से घटकर 50% (MoRD जेंडर रिपोर्ट 2026)।
संस्थागत भूमिकाएं और क्रियान्वयन में बाधाएं
ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) MGNREGS का मुख्य संचालन करता है, जबकि राज्य ग्रामीण विकास विभाग इसका क्रियान्वयन करते हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) वित्तीय उपयोग और मजदूरी भुगतान की दक्षता का ऑडिट करता है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) स्वतंत्र ग्रामीण रोजगार आंकड़े उपलब्ध कराता है, और राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (NIRDPR) अनुसंधान और क्षमता निर्माण में मदद करता है। इस ढांचे के बावजूद मजदूरी भुगतान में देरी और बजट में कटौती से समन्वय और वित्तीय प्राथमिकता की कमी स्पष्ट होती है।
- MoRD: नीति निर्माण और केंद्रीय निगरानी।
- राज्य ग्रामीण विकास विभाग: स्थानीय स्तर पर कार्यान्वयन।
- CAG: वित्तीय और प्रक्रियागत अनुपालन का ऑडिट।
- CMIE: ग्रामीण रोजगार के स्वतंत्र डेटा।
- NIRDPR: अनुसंधान, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण।
तुलनात्मक अध्ययन: MGNREGS और दक्षिण अफ्रीका की EPWP
| मापदंड | MGNREGS (भारत) | EPWP (दक्षिण अफ्रीका) |
|---|---|---|
| रोजगार गारंटी | प्रति परिवार वार्षिक 100 दिन (कानूनी अधिकार) | लचीला, प्रति लाभार्थी औसतन 40 दिन वार्षिक |
| मजदूरी भुगतान दक्षता | 2025-26 में औसतन 15 दिन की देरी | समय पर भुगतान, न्यूनतम देरी के साथ |
| बजट आवंटन प्रवृत्ति | 2025-26 में 5% कटौती | मांग के अनुसार स्थिर या बढ़ती आवंटन |
| ग्रामीण आजीविका पर प्रभाव | भागीदारी और कार्यदिवसों में गिरावट | ग्रामीण आय स्थिरता और भागीदारी में सुधार |
| लिंग समावेशन | महिला भागीदारी 50% तक घट गई | लगातार 50% से ऊपर, लक्षित समावेशन के साथ |
गिरावट के पीछे संरचनात्मक कमज़ोरियां
MGNREGS के पैमाने और कार्यदिवसों में कमी दो आपस में जुड़ी संरचनात्मक समस्याओं से हुई है: अपर्याप्त और विलंबित बजट आवंटन, तथा मजदूरी भुगतान की अक्षम व्यवस्था। कम बजट के कारण उपलब्ध कार्यदिवस घटते हैं, और मजदूरी भुगतान में देरी से लाभार्थियों का भरोसा टूटता है तथा उनकी भागीदारी कम होती है। नीति निर्माता ज्यादातर आवंटन की संख्या पर ध्यान देते हैं, जबकि समय पर भुगतान और कड़ी निगरानी की जरूरत को नजरअंदाज कर देते हैं। यह अंतर MGNREGS की सामाजिक सुरक्षा के रूप में भूमिका को कमजोर करता है, खासकर कृषि संकट के समय।
- बजट कटौती से उपलब्ध कार्यदिवस और जॉब कार्ड घटते हैं।
- मजदूरी भुगतान में देरी से लाभार्थियों का भरोसा कम होता है।
- अपर्याप्त निगरानी से क्रियान्वयन में कमियां बनी रहती हैं।
- महिला भागीदारी में गिरावट सामाजिक और संचालन संबंधी बाधाओं को दर्शाती है।
- ग्रामीण बेरोजगारी में वृद्धि मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ाती है।
महत्व और आगे का रास्ता
2025-26 में MGNREGS के पैमाने और कार्यदिवसों में कमी इसके संवैधानिक और विधायी दायित्व को कमजोर करती है, जो ग्रामीण रोजगार सुरक्षा प्रदान करता है। योजना की प्रभावशीलता बहाल करने के लिए सरकार को समय पर और पर्याप्त बजट आवंटन को प्राथमिकता देनी होगी, मजदूरी भुगतान प्रणालियों को सुदृढ़ करना होगा ताकि देरी खत्म हो, और निगरानी तंत्र को मजबूत करना होगा। साथ ही, घटती महिला भागीदारी को बढ़ाने और योजना की पहुंच बढ़ाने के लिए लक्षित प्रयास जरूरी हैं। इन कदमों के बिना, MGNREGS ग्रामीण संकट के खिलाफ सुरक्षा कवच के रूप में अपनी प्रासंगिकता खो सकता है।
- मांग के अनुसार पूर्ण और समय पर बजट जारी करना सुनिश्चित करें।
- मजदूरी भुगतान में देरी कम करने के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और रियल-टाइम निगरानी लागू करें।
- राज्य स्तर पर क्रियान्वयन क्षमता और शिकायत निवारण प्रणाली मजबूत करें।
- जागरूकता और सहायक उपायों के माध्यम से लिंग समावेशन बढ़ावा दें।
- पारदर्शिता और डेटा आधारित नीति सुधार के लिए तकनीक का उपयोग करें।
- MGNREGS हर ग्रामीण परिवार को अनिवार्य रूप से 100 दिन रोजगार की गारंटी देता है।
- MGNREGA की धारा 17 के तहत कार्य पूरा होने के 15 दिनों के भीतर मजदूरी भुगतान अनिवार्य है।
- PUCL बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने MGNREGS के तहत समय पर मजदूरी भुगतान पर जोर दिया।
- 2025-26 में MGNREGS के लिए बजट आवंटन 2024-25 की तुलना में बढ़ा।
- 2025-26 में प्रति परिवार औसत व्यक्ति-दिवस रोजगार घटा।
- 2025-26 में ग्रामीण बेरोजगारी दर कम हुई।
मुख्य प्रश्न
2025-26 में MGNREGS के कार्यदिवसों और पैमाने में गिरावट के कारणों पर चर्चा करें और इसके ग्रामीण रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर प्रभाव का विश्लेषण करें। क्रियान्वयन चुनौतियों को दूर करने के उपाय सुझाएं।
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 – शासन और ग्रामीण विकास
- झारखंड का नजरिया: कृषि और वन आधारित आजीविका पर निर्भर झारखंड की बड़ी ग्रामीण आबादी के लिए MGNREGS सुरक्षा जाल का काम करता है। यहां मजदूरी भुगतान में देरी और कार्यदिवसों में उतार-चढ़ाव से आदिवासी और हाशिए के समुदाय प्रभावित हुए हैं।
- मुख्य बिंदु: झारखंड की आजीविका सुरक्षा में MGNREGS की भूमिका, प्रशासनिक क्षमता की कमी से क्रियान्वयन की चुनौतियां, और लाभ वितरण सुधार के लिए राज्य-विशिष्ट सुधारों की आवश्यकता।
MGNREGS के तहत कार्यदिवसों के संबंध में कानूनी अधिकार क्या है?
MGNREGS के अधिनियम की धारा 3 के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को प्रति वर्ष 100 दिन मजदूरी रोजगार मांगने का अधिकार है, लेकिन यदि मांग आपूर्ति से अधिक हो तो अनिवार्य रोजगार की गारंटी नहीं है।
2025-26 में औसत व्यक्ति-दिवस रोजगार में गिरावट का कारण क्या था?
इस गिरावट के पीछे 5% बजट कटौती, औसतन 15 दिन की मजदूरी भुगतान में देरी, और 3% सक्रिय जॉब कार्ड की कमी थी, जिससे लाभार्थियों की भागीदारी और भरोसा कम हुआ।
मजदूरी भुगतान में देरी MGNREGS लाभार्थियों को कैसे प्रभावित करती है?
मजदूरी भुगतान में देरी से लाभार्थियों का भरोसा टूटता है, उनकी भागीदारी कम होती है, और योजना की ग्रामीण संकट के दौरान समय पर सहायता देने की भूमिका कमजोर पड़ती है।
MGNREGS के पीछे कौन सा संवैधानिक प्रावधान है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 41, जो राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा है, राज्य को रोजगार का अधिकार सुनिश्चित करने का निर्देश देता है और MGNREGS का संवैधानिक आधार है।
MGNREGS की तुलना दक्षिण अफ्रीका की EPWP से कैसे की जा सकती है?
MGNREGS प्रति परिवार 100 दिन रोजगार की गारंटी देता है लेकिन मजदूरी भुगतान में देरी और बजट कटौती की समस्या से जूझ रहा है, जबकि EPWP लचीला रोजगार औसतन 40 दिन देता है और समय पर भुगतान करता है, जिससे ग्रामीण आजीविका में बेहतर स्थिरता आती है।
आधिकारिक स्रोत एवं आगे पढ़ाई
लर्नप्रो संपादकीय मानकों के बारे में
लर्नप्रो की संपादकीय सामग्री सिविल सेवा तैयारी में अनुभवी विषय विशेषज्ञों द्वारा शोधित और समीक्षित है। हमारे लेख सरकारी स्रोतों, NCERT पाठ्यपुस्तकों, मानक संदर्भ सामग्री और प्रतिष्ठित प्रकाशनों जैसे द हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस और PIB से लिए गए हैं।
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