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जून 2024 में कोलकाता उच्च न्यायालय ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में चल रही ₹75,000 करोड़ की ग्रेट निकोबार परियोजना के खिलाफ जनहित याचिकाओं पर केंद्र सरकार की आपत्तियों को खारिज कर दिया। इस परियोजना में ग्रेट निकोबार द्वीप पर एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और एक औद्योगिक कॉरिडोर का निर्माण शामिल है। न्यायालय के इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि विकास परियोजनाओं की पर्यावरणीय कानूनों और आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से न्यायिक जांच जरूरी है।

यह निर्णय भारत की विकास महत्वाकांक्षाओं और संविधान में आदिवासी समुदायों तथा पर्यावरण के संरक्षण के लिए निर्धारित प्रावधानों के बीच चल रहे संघर्ष को दर्शाता है, खासकर संविधान के अनुच्छेद 21 और 244 के तहत।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: गवर्नेंस — पर्यावरणीय गवर्नेंस, आदिवासी अधिकार, न्यायिक समीक्षा
  • GS पेपर 3: अर्थव्यवस्था — बुनियादी ढांचा विकास, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन
  • निबंध: भारत में विकास और पर्यावरणीय स्थिरता का संतुलन

ग्रेट निकोबार परियोजना के कानूनी पहलू

यह परियोजना पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कई कानूनी ढांचों से जुड़ी हुई है। अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, जिसे अदालतों ने स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार के रूप में भी व्याख्यायित किया है (MC Mehta बनाम भारत संघ, 1987)। अनुच्छेद 244 अनुसूचित क्षेत्रों के विशेष प्रशासन की व्यवस्था करता है, जिसमें आदिवासी सहमति और संरक्षण अनिवार्य है।

  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: केंद्र को पर्यावरणीय मंजूरी देने का अधिकार देता है (धारा 3 और 5)।
  • वन संरक्षण अधिनियम, 1980: वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए पूर्व अनुमति आवश्यक है (धारा 2)।
  • अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों (वन अधिकार) अधिनियम, 2006: व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है (धारा 3 और 5), जिसमें पूर्व सूचित सहमति का अधिकार शामिल है।
  • भारतीय वन अधिनियम, 1927: वन प्रबंधन और संरक्षण से संबंधित है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले जैसे T.N. Godavarman Thirumulpad बनाम भारत संघ (1997) ने पर्यावरण कानून को व्यापक बनाया, जबकि समथा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997) ने आदिवासी भूमि की वाणिज्यिक शोषण से सुरक्षा पर जोर दिया।

ग्रेट निकोबार परियोजना के आर्थिक पहलू

यह परियोजना भारत की समुद्री व्यापार क्षमता को 15-20% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखती है, जिसमें नया ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत के रणनीतिक और वाणिज्यिक शिपिंग मार्गों को मजबूत करेगा (शिपिंग मंत्रालय, 2023)। अनुमान है कि यह परियोजना अगले दशक में 50,000 से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा करेगी और भारत की GDP में लगभग 1.5% की वृद्धि करेगी (नीति आयोग रिपोर्ट, 2023)।

  • अनुमानित निवेश: ₹75,000 करोड़ (लगभग 10 अरब अमेरिकी डॉलर)।
  • रोजगार सृजन: 50,000 नौकरियां, जिनमें निर्माण, लॉजिस्टिक्स और सहायक उद्योग शामिल हैं।
  • GDP में योगदान: अगले 10 वर्षों में 1.5% तक।
  • भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक प्रमुख समुद्री हब के रूप में स्थापित करने की क्षमता।

हालांकि, परियोजना से लगभग 2,500 आदिवासी शॉम्पेन और निकोबारी समुदायों के विस्थापन का खतरा है (जनगणना 2011, आदिवासी मंत्रालय) और 20,000 हेक्टेयर से अधिक उष्णकटिबंधीय वर्षावन प्रभावित होंगे (वन सर्वेक्षण भारत, 2022), जो पारिस्थितिक स्थिरता और सामाजिक न्याय के लिहाज से चिंता का विषय है।

संस्थागत जिम्मेदारियां और न्यायिक निगरानी

कोलकाता उच्च न्यायालय इस मामले में पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों के मुद्दों पर न्यायिक समीक्षा करता है, केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारों तथा सार्वजनिक हित के बीच संतुलन बनाता है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) पर्यावरणीय मंजूरियों के लिए जिम्मेदार है। आदिवासी मामलों का मंत्रालय आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जिसमें वन अधिकार अधिनियम का पालन शामिल है।

  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT): पर्यावरणीय विवादों का निपटारा करता है, हालांकि कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से ओवरलैप होता है।
  • नीति आयोग: नीति नियोजन और आर्थिक प्रभाव आकलन करता है।
  • ग्रेट निकोबार विकास प्राधिकरण: परियोजना को लागू करता है और स्थानीय प्रशासन का प्रबंधन करता है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम इंडोनेशिया के रियाउ द्वीप विकास

पहलूग्रेट निकोबार परियोजना (भारत)बाटम फ्री ट्रेड जोन (इंडोनेशिया)
परियोजना का दायरापोर्ट, हवाई अड्डा, औद्योगिक कॉरिडोरऔद्योगिक और व्यापार क्षेत्र, पोर्ट सुविधाओं के साथ
पर्यावरण सुरक्षाविवादास्पद; वन मंजूरी और आदिवासी सहमति के मुद्देकड़े जोनिंग नियम; अनुमानित से 30% कम पारिस्थितिक नुकसान (विश्व बैंक, 2021)
आदिवासी/सामुदायिक सहभागितासीमित आदिवासी सहमति; चल रही याचिकाएंसक्रिय सामुदायिक भागीदारी और मुआवजा तंत्र
आर्थिक प्रभाव1.5% GDP वृद्धि, 50,000 नौकरियांसंतुलित पारिस्थितिकी के साथ महत्वपूर्ण औद्योगिक विकास

नीति में खामियां और कानूनी टकराव

मुख्य नीति खामी वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत आदिवासी सहमति और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया के बीच तालमेल की कमी है। इस असंगति के कारण कानूनी विवाद और परियोजना में देरी होती है, जिससे आदिवासी स्वायत्तता और परियोजना की समयसीमा प्रभावित होती है।

  • वन अधिकार अधिनियम आदिवासी समुदायों से वन भूमि के उपयोग से पहले पूर्व सूचित सहमति लेना अनिवार्य करता है।
  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम पर्यावरणीय मंजूरी देता है, लेकिन आदिवासी सहमति को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं करता।
  • इस असंगति के कारण न्यायिक हस्तक्षेप होते रहते हैं, जैसा कि कोलकाता उच्च न्यायालय के हालिया फैसले में देखा गया।

महत्त्व और आगे का रास्ता

  • न्यायिक जांच विकास परियोजनाओं में आदिवासी अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों को मजबूत करती है।
  • नीति सुधारों से पर्यावरणीय और आदिवासी सहमति प्रक्रियाओं का समन्वय करना चाहिए ताकि मुकदमों में कमी आए और परियोजना स्थिरता बढ़े।
  • MoEFCC, आदिवासी मंत्रालय और परियोजना प्राधिकरणों के बीच संस्थागत समन्वय को मजबूत करना जरूरी है।
  • इंडोनेशिया के रियाउ द्वीप जैसे अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से सीख लेकर सामुदायिक भागीदारी और पारिस्थितिक सुरक्षा बेहतर की जा सकती है।
  • विस्थापित आदिवासी समुदायों के लिए पारदर्शी प्रभाव मूल्यांकन और पुनर्वास योजनाएं सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक हैं।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
वन अधिकार अधिनियम, 2006 और पर्यावरणीय मंजूरी से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. वन अधिकार अधिनियम वन भूमि के उपयोग से पहले आदिवासी समुदायों से पूर्व सूचित सहमति मांगता है।
  2. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 पर्यावरणीय मंजूरी में आदिवासी सहमति को स्पष्ट रूप से अनिवार्य करता है।
  3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण के पास आदिवासी अधिकारों से जुड़े सभी पर्यावरणीय विवादों का विशेष अधिकार क्षेत्र है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि वन अधिकार अधिनियम पूर्व सूचित सहमति का प्रावधान करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम आदिवासी सहमति को स्पष्ट रूप से अनिवार्य नहीं करता। कथन 3 गलत है क्योंकि उच्च न्यायालयों का भी आदिवासी अधिकारों से जुड़े पर्यावरणीय मामलों में अधिकार क्षेत्र होता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. यह अनुसूचित क्षेत्रों और आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन के लिए प्रावधान करता है।
  2. यह भारत के सभी आदिवासी क्षेत्रों में समान रूप से लागू होता है।
  3. अनुच्छेद के तहत अनुसूचित क्षेत्र के राज्यपाल के पास विशेष अधिकार होते हैं।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 244 अनुसूचित और आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है। कथन 2 गलत है क्योंकि इसका लागू होना राज्यों और क्षेत्रों के अनुसार भिन्न होता है। कथन 3 सही है क्योंकि अनुसूचित क्षेत्रों के राज्यपाल के पास विशेष अधिकार होते हैं।

मेन प्रश्न

ग्रेट निकोबार परियोजना से उत्पन्न कानूनी और आर्थिक चुनौतियों पर चर्चा करें, विशेष रूप से भारत में पर्यावरण कानूनों और आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा के संदर्भ में। ऐसी चुनौतियों को दूर करने के लिए नीति सुधार कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि विकास स्थायी हो?

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 — शासन और पर्यावरण
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में आदिवासी आबादी और वन क्षेत्र अधिक हैं, इसलिए आदिवासी अधिकारों और पर्यावरण कानूनों के बीच संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • मेन पॉइंटर: झारखंड के आदिवासी अधिकार संरक्षण की तुलना राष्ट्रीय परियोजनाओं जैसे ग्रेट निकोबार से करते हुए कानूनी सुरक्षा और विकासात्मक चुनौतियों पर जवाब तैयार करें।
आदिवासी क्षेत्रों के संदर्भ में अनुच्छेद 244 का क्या महत्व है?

अनुच्छेद 244 अनुसूचित क्षेत्रों और आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन की व्यवस्था करता है, जिसमें राज्यपाल को आदिवासी हितों की रक्षा के लिए विशेष अधिकार प्रदान किए जाते हैं। यह भारत के संघीय ढांचे में आदिवासी स्वायत्तता को मान्यता देते हुए विशिष्ट शासन तंत्र की अनुमति देता है।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 आदिवासी समुदायों की कैसे रक्षा करता है?

यह अधिनियम वन भूमि और संसाधनों पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें आवास, खेती और संरक्षण के अधिकार शामिल हैं। वन भूमि के उपयोग से पहले पूर्व सूचित सहमति लेना अनिवार्य करता है, जिससे आदिवासी निर्णय प्रक्रिया में शामिल होते हैं।

ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़ी मुख्य पर्यावरणीय चिंताएं क्या हैं?

यह परियोजना 20,000 हेक्टेयर से अधिक उष्णकटिबंधीय वर्षावन को प्रभावित करती है, जैव विविधता को खतरा पहुंचाती है और नाजुक पारिस्थितिक तंत्र को बाधित करती है। इसके अलावा, संसाधनों के सतत उपयोग और दीर्घकालिक पारिस्थितिक संतुलन को लेकर भी गंभीर चिंता है।

भारत में पर्यावरणीय मंजूरी के लिए कौन-कौन सी संस्थाएं जिम्मेदार हैं?

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) पर्यावरणीय मंजूरी का मुख्य प्राधिकारी है, जबकि विवादों के समाधान के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कोलकाता उच्च न्यायालय के फैसले का ग्रेट निकोबार परियोजना पर क्या प्रभाव पड़ा है?

इस फैसले ने केंद्र की आपत्तियों को खारिज करते हुए परियोजना के खिलाफ दायर याचिकाओं पर न्यायिक जांच की अनुमति दी है। यह परियोजना के क्रियान्वयन से पहले संवैधानिक और विधिक सुरक्षा उपायों का पालन सुनिश्चित करने पर जोर देता है।

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