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अप्रैल 2024 में केंद्र सरकार की कैबिनेट ने भारत के सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की अधिकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के लिए एक विधेयक को मंजूरी दी। यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट जजेस (नंबर ऑफ जजेस) एक्ट, 1956 में किया गया है, जो शीर्ष अदालत पर बढ़ते न्यायिक बोझ और लंबित मामलों की संख्या को ध्यान में रखते हुए न्यायपालिका की क्षमता बढ़ाने और फैसलों में देरी को कम करने की दिशा में सरकार की पहल है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: भारतीय संविधान—सुप्रीम कोर्ट नियुक्तियों और न्यायपालिका से संबंधित अनुच्छेद
  • GS पेपर 2: शासन—न्यायिक सुधार, न्यायिक स्वतंत्रता, कॉलेजियम प्रणाली
  • GS पेपर 3: अर्थव्यवस्था—न्यायिक देरी का आर्थिक विकास और व्यापार सुगमता पर प्रभाव
  • निबंध: शासन और आर्थिक विकास में न्यायपालिका की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट की संख्या को लेकर संवैधानिक और कानूनी ढांचा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार है, जो भारत के मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों से सलाह लेने के बाद की जाती है। न्यायाधीशों की अधिकृत संख्या सुप्रीम कोर्ट जजेस (नंबर ऑफ जजेस) एक्ट, 1956 द्वारा निर्धारित होती है, जिसमें शुरुआत में 8 न्यायाधीश थे जो बाद में बढ़ाकर 34 कर दिए गए थे। अब यह संशोधन इस सीमा को 38 तक बढ़ा रहा है ताकि बढ़ती न्यायिक मांग को पूरा किया जा सके।

  • 1993 में सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ के फैसले ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत किया और नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना की, जो अब नियुक्ति का मुख्य तरीका है।
  • कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश शामिल होते हैं, जो नियुक्ति और स्थानांतरण की सिफारिश करते हैं।
  • कानून और न्याय मंत्रालय (MoLJ) तथा न्याय विभाग (DoJ) न्यायिक नियुक्तियों और बुनियादी ढांचे से जुड़ी प्रशासनिक और विधायी जिम्मेदारियां संभालते हैं।

न्यायिक लंबित मामले और आर्थिक प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट वार्षिक रिपोर्ट 2023राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, 2023 के अनुसार औसत निपटान समय 3 से 5 वर्ष के बीच है, जो विवादों के समाधान में काफी देरी दर्शाता है।

  • 2022 में नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायिक देरी भारत की जीडीपी का 2-3% तक आर्थिक नुकसान पहुंचाती है।
  • इस देरी से व्यापार सुगमता प्रभावित होती है; विश्व बैंक की 2020 रिपोर्ट में भारत 63वें स्थान पर था, जो निवेश को रोकता है और मुकदमेबाजी की लागत बढ़ाता है।
  • न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से मामलों के निपटान की दर में सुधार, लंबित मामलों में कमी और निवेशकों का विश्वास बढ़ने की उम्मीद है।

न्यायिक क्षमता बढ़ाने में प्रमुख संस्थान

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया संवैधानिक और संघीय विवादों का निपटारा करती है और शीर्ष न्यायिक प्राधिकरण है। कानून और न्याय मंत्रालय न्यायिक सुधारों और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने जैसे विधायी प्रस्ताव प्रस्तुत करता है। न्याय विभाग न्यायिक बुनियादी ढांचे का प्रबंधन करता है और नियुक्तियों का समन्वय करता है। कॉलेजियम प्रणाली न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हुए न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश करती है।

सुप्रीम कोर्ट की संख्या: अंतरराष्ट्रीय तुलना

देशसुप्रीम कोर्ट की संख्यामामले प्रबंधननिपटान दरटिप्पणी
भारत34 (प्रस्तावित 38)लंबित मामलों की संख्या अधिक, औसत निपटान 3-5 वर्षकम (लंबित मामलों की संख्या अधिक)न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर लंबित मामलों को कम करना लक्ष्य
संयुक्त राज्य अमेरिका9 (1869 से स्थिर)चयनात्मक मामला सूची, आजीवन कार्यकालमध्यमछोटी संख्या से संस्थागत स्थिरता बनी रहती है
ब्राजील11उच्च मुकदमेबाजी, सक्रिय मामला प्रबंधन92% वार्षिक निपटान (2023)अधिक संख्या से निपटान दर बेहतर
यूनाइटेड किंगडम12 (2009 से सुप्रीम कोर्ट)मध्यम लंबित मामले, सीमित क्षेत्राधिकारउच्च निपटान दरप्रभावी मामले छंटाई प्रणाली

न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की सीमाएं

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से क्षमता जरूर बढ़ेगी, लेकिन यह न्यायपालिका की समग्र प्रणालीगत समस्याओं को पूरी तरह हल नहीं करता। अधीनस्थ न्यायालयों की देरी, पुरानी मामले प्रबंधन प्रणाली और बुनियादी ढांचे की कमी से शीर्ष अदालत पर मामला भार बढ़ता रहता है। निचली अदालतों में सुधार और प्रक्रियाओं के सरलीकरण के बिना लंबित मामलों में पर्याप्त कमी संभव नहीं है।

  • निचली अदालतों की देरी के कारण मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं, जिससे अदालत पर दबाव बढ़ता है।
  • डिजिटल केस प्रबंधन और न्यायालयीन बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण आवश्यक है।
  • न्यायाधीशों के प्रशिक्षण और प्रशासनिक समर्थन में भी सुधार जरूरी है।

महत्व और आगे की राह

  • 34 से 38 न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना सुप्रीम कोर्ट की क्षमता बढ़ाने और लंबित मामलों को कम करने की व्यावहारिक पहल है।
  • निचली अदालतों में सुधार और बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण सुधार को टिकाऊ बनाएगा।
  • कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाकर नियुक्ति प्रक्रिया और न्यायिक गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।
  • मामलों के आने और निपटान के आधार पर न्यायाधीशों की संख्या की नियमित समीक्षा आवश्यक है।
  • तकनीक का इस्तेमाल कर केस मैनेजमेंट और वैकल्पिक विवाद समाधान से लंबित मामलों को और कम किया जा सकता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की अधिकृत संख्या के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. अधिकृत संख्या भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित होती है।
  2. सुप्रीम कोर्ट जजेस (नंबर ऑफ जजेस) एक्ट, 1956 न्यायाधीशों की संख्या को नियंत्रित करता है।
  3. राष्ट्रपति केवल अधिकृत संख्या के भीतर ही न्यायाधीश नियुक्त कर सकते हैं।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि संविधान (अनुच्छेद 124) न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित नहीं करता; यह नियुक्ति का अधिकार देता है। कथन 2 सही है क्योंकि 1956 का एक्ट अधिकृत संख्या को नियंत्रित करता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि नियुक्ति अधिकृत संख्या से अधिक नहीं हो सकती।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
सुप्रीम कोर्ट की नियुक्तियों में कॉलेजियम प्रणाली के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना 1993 के सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन केस में हुई।
  2. कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  3. कॉलेजियम प्रणाली का स्पष्ट उल्लेख भारतीय संविधान में है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि कॉलेजियम प्रणाली 1993 में न्यायिक रूप से स्थापित हुई। कथन 2 भी सही है क्योंकि वर्तमान प्रथा के अनुसार यह सच है। कथन 3 गलत है क्योंकि संविधान में कॉलेजियम प्रणाली का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

मुख्य प्रश्न

भारत में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की अधिकृत संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के प्रभावों पर चर्चा करें। यह सुधार न्यायिक लंबित मामलों को कैसे संबोधित करता है, और इसकी सीमाएं क्या हैं? न्यायिक कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए अतिरिक्त उपाय सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (शासन) – न्यायपालिका और कानूनी सुधार
  • झारखंड की दृष्टि: झारखंड के उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों में भी लंबित मामले हैं; सुप्रीम कोर्ट के सुधार राज्य न्यायपालिका पर अपीलीय अधिकार और न्यायिक नियुक्तियों के माध्यम से प्रभाव डालते हैं।
  • मुख्य बिंदु: उत्तर तैयार करते समय सुप्रीम कोर्ट की क्षमता बढ़ाने को राज्य स्तर पर आवश्यक न्यायिक सुधारों के साथ जोड़कर जवाब दें, खासकर झारखंड में न्याय तक पहुंच पर जोर देते हुए।
सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कौन सा संवैधानिक प्रावधान लागू होता है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत राष्ट्रपति को भारत के मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों से सलाह लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त करने का अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की अधिकृत संख्या को वर्तमान में कौन सा एक्ट नियंत्रित करता है?

सुप्रीम कोर्ट जजेस (नंबर ऑफ जजेस) एक्ट, 1956 न्यायाधीशों की अधिकृत संख्या को नियंत्रित करता है, जो वर्तमान में 34 है और अब इसे 38 करने का प्रस्ताव है।

कॉलेजियम प्रणाली क्या है?

कॉलेजियम प्रणाली एक अनौपचारिक संस्था है जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश शामिल होते हैं, जो न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए सिफारिश करते हैं।

न्यायिक देरी भारतीय अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती है?

न्यायिक देरी से वार्षिक तौर पर भारत की GDP का 2-3% तक का आर्थिक नुकसान होता है, क्योंकि इससे मुकदमेबाजी की लागत बढ़ती है, निवेशकों का विश्वास कमजोर होता है और विवादों का निपटारा धीमा पड़ जाता है।

भारत की सुप्रीम कोर्ट की संख्या की तुलना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे है?

भारत की सुप्रीम कोर्ट की अधिकृत संख्या 34 (प्रस्तावित 38) है, जो अमेरिका (9) से अधिक है लेकिन ब्राजील (11) से कम है, जहां उच्च संख्या का संबंध बेहतर मामले निपटान दर से है।

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