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अप्रैल 2024 में केंद्र सरकार की कैबिनेट ने भारत के सुप्रीम कोर्ट में चार अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दी, जिससे कोर्ट की अधिकृत संख्या 34 से बढ़कर 38 हो गई। इससे पहले कोर्ट में 34 की अधिकृत संख्या में से केवल 31 न्यायाधीश कार्यरत थे और लगभग 70,000 लंबित मामले निपटाए जाने का इंतजार कर रहे थे। इस फैसले का मकसद न्यायालय की क्षमता बढ़ाकर मामलों के निपटान की गति तेज करना और शीर्ष न्यायिक स्तर पर न्याय की देरी को कम करना है।

चार न्यायाधीशों की बढ़ोतरी से अधिकृत संख्या में 11.7% की वृद्धि हुई है, जो बढ़ती लंबित संख्या और प्रति मामले तीन से पांच साल तक की औसत निपटान अवधि को देखते हुए एक रणनीतिक कदम है। कैबिनेट की मंजूरी Article 124 के तहत संविधानिक प्रक्रिया के अनुसार हुई है और यह सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों पर आधारित है, जो न्यायिक ढांचे को मजबूत करने के निरंतर प्रयासों को दर्शाता है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: न्यायपालिका - सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति, कॉलेजियम प्रणाली, न्यायिक स्वतंत्रता
  • GS पेपर 2: शासन - न्यायिक नियुक्तियों में केंद्र सरकार और विधि मंत्रालय की भूमिका
  • GS पेपर 3: अर्थव्यवस्था - न्यायिक देरी का आर्थिक विकास और व्यवसाय में सुगमता पर प्रभाव
  • निबंध: न्यायपालिका और शासन व विकास में उसकी भूमिका

सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए संवैधानिक और कानूनी ढांचा

भारतीय संविधान का Article 124 सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदावसान से संबंधित है। इसके तहत राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों से सलाह लेकर न्यायाधीश नियुक्त करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट जजेस (नियुक्ति एवं सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1958 इस प्रक्रिया को लागू करता है, जबकि मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) नियुक्ति के लिए आवश्यक प्रक्रियात्मक कदमों का विवरण देता है।

न्यायिक फैसलों ने इस ढांचे को महत्वपूर्ण रूप से आकार दिया है। 1993 के सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ के फैसले ने कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना की, जो नियुक्तियों में न्यायपालिका को प्राथमिकता देती है ताकि उसकी स्वतंत्रता बनी रहे। 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस प्रणाली को बरकरार रखा और न्यायपालिका की स्वायत्तता को पुनः स्थापित किया।

  • Article 124(2): राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों से सलाह लेकर नियुक्ति करते हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट जजेस एक्ट, 1958: सेवा की शर्तों और नियुक्ति प्रक्रिया का प्रावधान।
  • मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर: कॉलेजियम सिफारिशें, कार्यपालिका की मंजूरी और नियुक्ति औपचारिकताओं का विवरण।
  • 1993 एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड केस: कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना।
  • 2015 NJAC निर्णय: न्यायिक प्राथमिकता और स्वतंत्रता की पुष्टि।

सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के आर्थिक प्रभाव

न्यायिक देरी से भारी आर्थिक नुकसान होता है। नीति आयोग की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार लंबित मुकदमों के कारण प्रतिवर्ष ₹3 लाख करोड़ से अधिक का आर्थिक नुकसान होता है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से लंबित मामलों में कमी आएगी, जिससे विवादों का निपटान तेज होगा और व्यापारियों व आम जनता के अवसर लागत में कटौती होगी।

केंद्र सरकार ने बजट 2023-24 में न्यायपालिका के लिए ₹6,500 करोड़ का आवंटन किया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12% अधिक है। इससे अवसंरचना और मानव संसाधन दोनों में सुधार होगा। तेज़ निपटान से भारत की विश्व बैंक की Ease of Doing Business रैंकिंग में सुधार होगा, जो 2020 में 63वें स्थान पर थी। न्यायिक प्रक्रिया की दक्षता निवेश आकर्षित करती है क्योंकि इससे अनुबंधों का पालन और कानूनी निश्चितता सुनिश्चित होती है।

  • न्यायिक देरी के कारण अनुमानित आर्थिक नुकसान: ₹3 लाख करोड़ प्रति वर्ष (नीति आयोग, 2023)।
  • न्यायपालिका बजट 2023-24: ₹6,500 करोड़, 12% वृद्धि के साथ।
  • भारत की Ease of Doing Business रैंक: 63वां स्थान (वर्ल्ड बैंक, 2020)।
  • तेज़ न्यायिक निपटान से मुकदमेबाजी के खर्च कम होते हैं और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।

सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश नियुक्ति में संस्थागत भूमिकाएं

सुप्रीम कोर्ट, शीर्ष न्यायिक संस्था के रूप में, कॉलेजियम प्रणाली के तहत नियुक्तियों की सिफारिश करती है। कॉलेजियम में मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं, जिनकी सिफारिशों को केंद्र की कैबिनेट मंजूरी देती है। विधि और न्याय मंत्रालय प्रशासनिक प्रक्रिया को सुगम बनाता है, जिसमें पृष्ठभूमि जांच और औपचारिक संवाद शामिल हैं।

कैबिनेट की भूमिका केवल औपचारिक मंजूरी तक सीमित है, जो कॉलेजियम की सिफारिशों के बाद होती है, ताकि न्यायपालिका की प्राथमिकता बनी रहे। यह व्यवस्था स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करती है, हालांकि पारदर्शिता और समयबद्धता के मामले में चुनौतियां बनी हुई हैं।

  • सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम: योग्यता और वरिष्ठता के आधार पर नियुक्ति सिफारिश करता है।
  • केंद्र कैबिनेट: संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार नियुक्ति को मंजूरी देती है।
  • विधि और न्याय मंत्रालय: प्रशासनिक समन्वय और नीति कार्यान्वयन।
  • राष्ट्रपति: Article 124 के तहत औपचारिक नियुक्ति प्राधिकारी।

डेटा विश्लेषण: न्यायाधीशों की संख्या और लंबित मामले

पैरामीटरमंजूरी से पहलेमंजूरी के बादस्रोत
सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की अधिकृत संख्या3438सुप्रीम कोर्ट वेबसाइट, 2024
वास्तविक कार्यरत संख्या3135 (संभावित)सुप्रीम कोर्ट वार्षिक रिपोर्ट, 2023
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलेलगभग 70,000समय के साथ कमी की उम्मीदसुप्रीम कोर्ट वार्षिक रिपोर्ट, 2023
औसत निपटान समय3-5 वर्षघटने की संभावनाPRS लेजिस्लेटिव रिसर्च, 2023
भारतीय न्यायपालिका में कुल लंबित मामले4.5 करोड़ से अधिकदीर्घकालीन कमी का लक्ष्यनेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड, 2024

तुलनात्मक अध्ययन: भारत और अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट नियुक्ति सिस्टम

विशेषताभारतसंयुक्त राज्य अमेरिका
नियुक्ति प्राधिकारीराष्ट्रपति कॉलेजियम की सिफारिश परराष्ट्रपति नामित करता है; सीनेट पुष्टि करता है
न्यायाधीशों की संख्यालचीली, वर्तमान में 38निश्चित, 9
पारदर्शिताकॉलेजियम प्रणाली में सीमित पारदर्शितासार्वजनिक सीनेट सुनवाई और राजनीतिक जांच
राजनीतिक प्रभावकम, कार्यपालिका की औपचारिक भूमिका सीमितउच्च, राजनीतिक विवादों के कारण रिक्त पद
नियुक्ति में देरीकॉलेजियम की अस्पष्टता के कारण अक्सरराजनीतिक गतिरोध के कारण कभी-कभार

संरचनात्मक कमजोरियां और नियुक्ति चुनौतियां

कॉलेजियम प्रणाली की पारदर्शिता की कमी और चयन के स्पष्ट मानदंडों के अभाव के कारण नियुक्तियों में देरी होती है और पक्षपात की आशंका बढ़ती है। Article 124(2) के प्रावधानों के बावजूद, पारदर्शिता की कमी समय पर नियुक्ति और अधिकृत संख्या के पूर्ण उपयोग में बाधा डालती है। यह संरचनात्मक कमी न्यायपालिका की क्षमता विस्तार को पूरी तरह से प्रभावी बनाने में रुकावट है।

पारदर्शिता बढ़ाने के लिए चयन मानदंडों और समयसीमा को सार्वजनिक करना आवश्यक है ताकि न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का वास्तविक लाभ मिल सके। यदि इन प्रक्रियात्मक अड़चनों को दूर नहीं किया गया तो न्यायालय में लंबित मामलों और देरी की समस्या बनी रहेगी।

  • कॉलेजियम प्रणाली में स्पष्ट मानदंड और समयसीमा का अभाव।
  • नियुक्तियों में देरी से न्यायिक क्षमता प्रभावित होती है।
  • पक्षपात की धारणा से जनता का विश्वास कमजोर होता है।
  • संख्या वृद्धि के साथ प्रक्रियात्मक पारदर्शिता का भी होना जरूरी।

महत्व और आगे का रास्ता

सुप्रीम कोर्ट के चार अतिरिक्त न्यायाधीशों की मंजूरी लंबित मामलों को कम करने और न्याय तक पहुंच बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस विस्तार से न्यायिक क्षमता में 11.7% की वृद्धि होगी, जो यदि प्रक्रियागत सुधारों के साथ हो तो लंबित मामलों और निपटान समय में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

अधिक प्रभावी परिणाम के लिए सरकार और न्यायपालिका को कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए, नियुक्तियों के लिए कड़े समयसीमा लागू करनी चाहिए और न्यायिक अवसंरचना में निवेश बढ़ाना चाहिए। इससे न्यायिक स्वतंत्रता मजबूत होगी, देरी से होने वाले आर्थिक नुकसान में कमी आएगी और भारत का वैश्विक व्यापार माहौल सुधरेगा।

  • पारदर्शी कॉलेजियम प्रक्रियाओं के माध्यम से समय पर नियुक्ति सुनिश्चित करें।
  • न्यायिक अवसंरचना और मानव संसाधन में निवेश बढ़ाएं।
  • मुकदमेबाजी की दर और लंबित मामलों में कमी पर निगरानी रखें।
  • चयन मानदंड और नियुक्ति समयसीमा सार्वजनिक कर जनता का विश्वास बढ़ाएं।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. राष्ट्रपति बिना किसी परामर्श के अपने विवेकानुसार न्यायाधीश नियुक्त करते हैं।
  2. कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना 1993 के सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन मामले में हुई थी।
  3. 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने NJAC अधिनियम को मंजूरी दी और कॉलेजियम प्रणाली को समाप्त किया।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2
  • cकेवल 2 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि Article 124 के अनुसार राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों से परामर्श के बाद नियुक्ति करते हैं। कथन 2 सही है; 1993 के एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड मामले ने कॉलेजियम प्रणाली स्थापित की। कथन 3 गलत है; 2015 में NJAC अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था और कॉलेजियम प्रणाली को पुनः स्थापित किया।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में न्यायिक देरी के आर्थिक प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. न्यायिक देरी के कारण अनुमानित आर्थिक नुकसान ₹3 लाख करोड़ से अधिक प्रतिवर्ष है।
  2. संसदीय बजट 2023-24 में न्यायपालिका के लिए ₹6,500 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 12% कमी है।
  3. तेज़ विवाद समाधान से भारत की Ease of Doing Business रैंकिंग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 नीति आयोग 2023 की रिपोर्ट के अनुसार सही है। कथन 2 गलत है; बजट में 12% वृद्धि हुई है, कमी नहीं। कथन 3 सही है क्योंकि तेज न्यायिक निपटान Ease of Doing Business में सुधार करता है।

मुख्य प्रश्न

भारत में सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति के संवैधानिक प्रावधान, संस्थागत तंत्र और चुनौतियों पर चर्चा करें। न्यायाधीशों की अधिकृत संख्या बढ़ाने से न्यायिक दक्षता और न्याय तक पहुंच पर क्या प्रभाव पड़ता है?

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (भारतीय राजनीति और शासन), न्यायपालिका और संवैधानिक प्रावधान
  • झारखंड संदर्भ: झारखंड उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों में भी लंबित मामलों की समस्या है; सुप्रीम कोर्ट की नियुक्तियां राज्य में अपीलीय न्याय वितरण को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।
  • मुख्य बिंदु: न्यायिक नियुक्तियों को झारखंड में न्याय तक पहुंच से जोड़ें, लंबित मामलों में कमी और आर्थिक विकास पर प्रभाव पर प्रकाश डालें।
सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की वर्तमान अधिकृत संख्या क्या है?

सुप्रीम कोर्ट की अधिकृत संख्या अप्रैल 2024 में कैबिनेट की मंजूरी के बाद 38 हो गई है, जो पहले 34 थी।

भारत में सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है?

नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के तहत होती है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं, जिनकी सिफारिशों को केंद्र की कैबिनेट मंजूरी देती है।

सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कौन सा संवैधानिक प्रावधान है?

Article 124 भारतीय संविधान में सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदावसान से संबंधित है।

NJAC अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज किया?

2015 में NJAC अधिनियम को इसलिए खारिज किया गया क्योंकि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होती थी और कार्यपालिका को अधिक नियंत्रण मिलता था।

सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का आर्थिक प्रभाव क्या होता है?

न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से लंबित मामलों और देरी में कमी आती है, जिससे अनुमानित ₹3 लाख करोड़ प्रतिवर्ष के आर्थिक नुकसान को रोका जा सकता है, व्यवसाय में सुगमता बढ़ती है और निवेश आकर्षित होता है।

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