अप्रैल 2024 में, केंद्र सरकार ने भारत के सुप्रीम कोर्ट में चार अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दी, जिससे कोर्ट की अधिकतम संख्या 34 से बढ़कर 38 हो गई। यह फैसला कॉलेजियम प्रणाली की सिफारिशों के बाद लिया गया है और इसका मकसद बढ़ते हुए लंबित मामलों की संख्या, जो 2023 में लगभग 27.5 लाख थी, को कम करना है। यह कदम संविधान के अनुच्छेद 124 और संस्थागत व्यवस्था के तहत लिया गया है, जो शीर्ष अदालत की कार्यक्षमता को बढ़ाने में मदद करता है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 2: भारतीय संविधान—न्यायपालिका और शासन
- न्यायिक नियुक्तियां, कॉलेजियम प्रणाली, और न्याय सुधार
- न्यायिक दक्षता और संवैधानिक शासन पर निबंध विषय
सुप्रीम कोर्ट नियुक्तियों के लिए संवैधानिक और कानूनी ढांचा
अनुच्छेद 124 भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और योग्यता का प्रावधान करता है। इसके तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जो भारत के मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों से सलाह लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट जजेस (नियुक्ति और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1958 इसके साथ सेवा की शर्तों को भी निर्धारित करता है।
- मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) नियुक्ति प्रक्रिया को औपचारिक बनाता है, जिसमें कॉलेजियम की भूमिका प्रमुख होती है।
- कॉलेजियम प्रणाली सुप्रीम कोर्ट ने Supreme Court Advocates-on-Record Association v. Union of India (1993) (तीन जजों का मामला) में स्थापित की, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ न्यायाधीश नियुक्तियों की सिफारिश करते हैं।
- NJAC निर्णय (2016) ने कॉलेजियम प्रणाली को पुनः स्थापित किया, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक ठहराते हुए न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा की।
न्यायिक लंबित मामले और आर्थिक प्रभाव
भारत की न्यायपालिका को गंभीर लंबित मामलों की समस्या का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें अकेले सुप्रीम कोर्ट में 2023 के वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 27.5 लाख मामले लंबित हैं। औसत निपटान समय पांच साल से अधिक है, जो न्याय मिलने में देरी का कारण बनता है। इस देरी की वजह से देश की अर्थव्यवस्था को प्रति वर्ष लगभग 2-3% GDP का नुकसान होता है, मुख्य रूप से अनुबंधों के प्रवर्तन और विवाद समाधान में देरी के कारण, जैसा कि वर्ल्ड बैंक डूइंग बिजनेस रिपोर्ट 2020 में बताया गया है।
- न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने का उद्देश्य लंबित मामलों को कम करना और निपटान प्रक्रिया को तेज करना है।
- केंद्र सरकार ने 2023-24 के बजट में न्यायपालिका के लिए ₹4,000 करोड़ आवंटित किए हैं, जिनका उपयोग बुनियादी ढांचे और डिजिटलीकरण में किया जाएगा, ताकि मानव संसाधन विस्तार के साथ न्यायिक प्रक्रिया बेहतर हो सके।
- पिछले तीन वर्षों में कॉलेजियम द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिशों में 15% की वृद्धि हुई है, ताकि लंबित मामलों को कम किया जा सके।
संस्थागत भूमिकाएं और नियुक्ति प्रक्रिया
भारत का सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च न्यायिक संस्था है, जो संवैधानिक मामलों में अंतिम निर्णय करता है। कॉलेजियम प्रणाली में मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते हैं, जो न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश करते हैं। ये सिफारिशें कानून और न्याय मंत्रालय को भेजी जाती हैं, जो उन्हें कैबिनेट की मंजूरी के लिए प्रस्तुत करता है। केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होती है।
- कॉलेजियम की पारदर्शिता की कमी और प्रक्रिया की अस्पष्टता पर आलोचना होती रही है, जिससे नियुक्तियों में देरी और पद रिक्त रहने की समस्या बनी रहती है।
- पद रिक्त होने से लंबित मामलों में वृद्धि होती है, जिससे न्यायिक कार्यक्षमता और जनता का विश्वास प्रभावित होता है।
- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) जैसे सुधार प्रयास विफल रहे, जिससे कॉलेजियम प्रणाली बनी रही, लेकिन पारदर्शिता के मुद्दे जस के तस हैं।
तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम अमेरिका सुप्रीम कोर्ट नियुक्ति प्रणाली
| पहलू | भारत | संयुक्त राज्य अमेरिका |
|---|---|---|
| नियुक्ति प्राधिकारी | राष्ट्रपति कॉलेजियम की सिफारिश पर नियुक्त करते हैं | राष्ट्रपति नामांकन करते हैं; सीनेट पुष्टि करती है |
| न्यायाधीशों की संख्या | 34 से बढ़ाकर 38 की गई | स्थिर 9 |
| पारदर्शिता | कॉलेजियम प्रणाली में सीमित सार्वजनिक जवाबदेही और अस्पष्टता | सार्वजनिक सीनेट सुनवाई और बहस; राजनीतिक रूप से खुला प्रक्रिया |
| औसत मामला निपटान समय | 5 वर्ष से अधिक | 1 वर्ष से कम |
| न्यायिक दक्षता पर प्रभाव | नियुक्ति में देरी से लंबित मामले और रिक्त पद बढ़ते हैं | स्थिर न्यायाधीश संख्या और पारदर्शी प्रक्रिया से दक्षता बेहतर |
महत्व और आगे का रास्ता
- सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या 38 करने का निर्णय लंबित मामलों को कम करने और न्याय वितरण को तेज करने के लिए रणनीतिक कदम है।
- न्यायिक बुनियादी ढांचे और डिजिटलीकरण में निवेश न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के प्रभाव को बढ़ाने के लिए जरूरी है।
- कॉलेजियम की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के सुधार आवश्यक हैं ताकि नियुक्ति प्रक्रिया में देरी न हो और न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहे।
- मामलों के आगमन के अनुसार न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या का समय-समय पर पुनरावलोकन न्यायिक क्षमता बनाए रखने के लिए जरूरी है।
- कॉलेजियम प्रणाली सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान की व्याख्या के माध्यम से स्थापित की गई थी।
- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) ने 2016 में कॉलेजियम प्रणाली की जगह ले ली थी।
- कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश शामिल होते हैं।
- 2024 में सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या 34 से बढ़ाकर 38 की गई।
- सुप्रीम कोर्ट के मामलों का औसत निपटान समय 2 वर्ष से कम है।
- न्यायिक देरी भारत की GDP का 2-3% वार्षिक नुकसान करती है।
मेन प्रश्न
भारत में सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति के संवैधानिक प्रावधान और संस्थागत व्यवस्था पर चर्चा करें। न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या बढ़ाने के प्रभाव का न्यायिक दक्षता और लंबित मामलों की कमी पर मूल्यांकन करें।
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 - भारतीय राजनीति और शासन
- झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों को भी लंबित मामलों की समस्या का सामना है, जो न्यायिक क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता दर्शाता है।
- मेन पॉइंटर: न्यायिक रिक्तियों का राज्य स्तर पर न्याय वितरण पर प्रभाव और सुप्रीम कोर्ट की ताकत का अपीलीय निगरानी में महत्व।
सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कौन सा संवैधानिक अनुच्छेद लागू होता है?
अनुच्छेद 124 भारत के संविधान का वह प्रावधान है जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और योग्यता को नियंत्रित करता है। इसमें कहा गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जो मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों से सलाह लेते हैं।
न्यायिक नियुक्तियों में कॉलेजियम प्रणाली क्या है?
कॉलेजियम प्रणाली एक न्यायिक रूप से विकसित व्यवस्था है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादलों की सिफारिश करते हैं। इसे सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के तीन जजों के मामले में स्थापित किया था।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को क्यों खारिज किया गया?
NJAC को सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में असंवैधानिक ठहराया क्योंकि इसने न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित करते हुए कार्यपालिका को न्यायिक नियुक्तियों में अत्यधिक नियंत्रण दिया था। इससे कॉलेजियम प्रणाली को पुनः स्थापित किया गया।
न्यायिक लंबित मामलों का भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होता है?
न्यायिक देरी अनुबंध प्रवर्तन में देरी करती है, जिससे भारत को प्रति वर्ष लगभग 2-3% GDP का आर्थिक नुकसान होता है, जैसा कि वर्ल्ड बैंक डूइंग बिजनेस रिपोर्ट 2020 में बताया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की अधिकतम संख्या में हाल ही में क्या बदलाव हुआ है?
2024 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने की मंजूरी दी है, ताकि लंबित मामलों को कम किया जा सके और न्यायिक दक्षता बढ़ाई जा सके।
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