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परिचय: झारखंड की जैव विविधता का परिचय

2000 में बिहार से अलग होकर बना झारखंड, भारत के पूर्वी हिस्से में स्थित है और इसका क्षेत्रफल लगभग 79,710 वर्ग किमी है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के 2021 के भारत के वन रिपोर्ट के अनुसार, यहां 29.55% वन क्षेत्र है जिसमें 5 राष्ट्रीय उद्यान और 12 वन्यजीव अभयारण्य शामिल हैं। राज्य में लगभग 1,200 वनस्पति प्रजातियां और 450 जीव-जंतु पाए जाते हैं, जिनमें संकटग्रस्त प्रजातियां जैसे एशियाई हाथी और भारतीय पेंगोलिन भी शामिल हैं। सागौन (Shorea robusta) वन क्षेत्र का लगभग 70% हिस्सा घेरे हुए है, जो पारिस्थितिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद, खनन, वनों की कटाई और मानवीय दबाव के कारण झारखंड की जैव विविधता को गंभीर खतरे का सामना करना पड़ रहा है, जिससे 2019 से 2021 के बीच वन क्षेत्र में 0.5% की गिरावट आई है (FSI 2021)।

JPSC परीक्षा के लिए प्रासंगिकता

  • JPSC जनरल स्टडीज पेपर 1: पर्यावरण और पारिस्थितिकी — झारखंड के वन क्षेत्र, संरक्षित क्षेत्र और प्रजातियां
  • JPSC जनरल स्टडीज पेपर 3: आर्थिक विकास — वन आधारित आजीविका और जैव विविधता से जुड़ी अर्थव्यवस्था
  • पिछले प्रश्न: बेतला राष्ट्रीय उद्यान, खनन का जैव विविधता पर प्रभाव (JPSC 2019, 2021)

वनस्पति विविधता और पारिस्थितिक विशेषताएं

झारखंड की वनस्पति मुख्यतः उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन है, जिसमें सागौन प्रमुख प्रजाति है। राज्य के जंगलों में सागौन के अलावा साग, महुआ, और बांस जैसी मिश्रित पर्णपाती प्रजातियां भी पाई जाती हैं। ये वन जनजातीय आजीविका के लिए आवश्यक औषधीय पौधों और गैर-काष्ठ वन उत्पादों (NTFPs) का स्रोत हैं। झारखंड जैव विविधता रिपोर्ट 2022 के अनुसार, यहां 1,200 से अधिक वनस्पति प्रजातियां हैं, जिनमें कई छोटानागपुर पठार के स्थानीय हैं। हालाँकि, खनन और परंपरागत खेती के कारण वनों के टुकड़े-टुकड़े हो जाने से दुर्लभ प्रजातियों को खतरा है और आनुवंशिक विविधता कम हो रही है।

  • सागौन के जंगल: वन क्षेत्र का 70% हिस्सा; लकड़ी और पारिस्थितिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण।
  • औषधीय पौधे: 200 से अधिक प्रजातियां, जो जनजातीय पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग होती हैं।
  • गैर-काष्ठ वन उत्पाद (NTFPs): महुआ के फूल, तेंदू पत्ता, और शहद शामिल हैं, जो ग्रामीण आय का सहारा हैं।
  • वन क्षेत्र का टुकड़े-टुकड़े होना: खनन गलियारों और सड़कों की वजह से आवासीय क्षेत्रों में विघटन।

जीव-जंतु विविधता और संरक्षण की स्थिति

झारखंड में एशियाई हाथी, तेंदुआ, भारतीय पेंगोलिन जैसे बड़े स्तनधारी पाए जाते हैं, साथ ही यहां पक्षी और सरीसृपों की भी समृद्ध विविधता है। 1974 में स्थापित बेतला राष्ट्रीय उद्यान बाघ और हाथी की आबादी के लिए प्रमुख संरक्षण क्षेत्र है। राज्य के 12 वन्यजीव अभयारण्य संकटग्रस्त प्रजातियों को आश्रय देते हैं, लेकिन शिकार और आवासीय क्षरण की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत 1.5 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में समुदाय के वन अधिकार मान्यता प्राप्त हैं, जिससे जनजातीय संरक्षण में भागीदारी बढ़ी है, लेकिन प्रबंधन की चुनौतियां बनी हुई हैं।

  • प्रमुख प्रजातियां: एशियाई हाथी, भारतीय पेंगोलिन, तेंदुआ, बाघ, और स्थानीय पक्षी।
  • संरक्षित क्षेत्र: 5 राष्ट्रीय उद्यान जिनमें बेतला राष्ट्रीय उद्यान शामिल है; 12 अभयारण्य विभिन्न सुरक्षा स्तरों के साथ।
  • समुदाय वन अधिकार: 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में जनजातीय संरक्षण को सशक्त बनाना।
  • खतरे: शिकार, आवासीय विखंडन, और मानव-वन्यजीव संघर्ष।

जैव विविधता संरक्षण के लिए कानूनी एवं संस्थागत ढांचा

झारखंड में जैव विविधता संरक्षण केंद्र और राज्य के कानूनों के जटिल संयोजन से संचालित होता है। संविधान के Article 48A में पर्यावरण संरक्षण का निर्देश दिया गया है, जिसे Wildlife Protection Act, 1972 के तहत अभयारण्यों (Section 18) और अपराधों (Section 29) के प्रावधानों से मजबूती मिली है। Forest Conservation Act, 1980 वन भूमि के उपयोग को नियंत्रित करता है, जबकि Biological Diversity Act, 2002 के तहत झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड (JSBB) का गठन हुआ है जो संरक्षण कार्यों की निगरानी करता है। राज्य के नियम जैसे झारखंड वन संरक्षण नियम, 2003 केंद्रीय कानूनों के पूरक हैं। सुप्रीम कोर्ट के T.N. Godavarman Thirumulpad v. Union of India (1996) जैसे निर्णयों ने वन संरक्षण को और सुदृढ़ किया है, जिसका प्रभाव झारखंड की नीतियों पर भी पड़ा है।

  • Article 48A: पर्यावरण संरक्षण के लिए राज्य को निर्देश।
  • Wildlife Protection Act, 1972: Sections 2, 18, 29 अभयारण्यों और संरक्षित प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण।
  • Forest Conservation Act, 1980: Sections 2 और 3 वन भूमि के हस्तांतरण को नियंत्रित करते हैं।
  • Biological Diversity Act, 2002: Sections 3 और 4 के तहत JSBB का गठन और जैव विविधता प्रबंधन।
  • झारखंड वन संरक्षण नियम, 2003: राज्य-विशिष्ट वन प्रबंधन नियम।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले: गोदावर्मन मामले ने वन संरक्षण के दायरे को बढ़ाया।

झारखंड की जैव विविधता का आर्थिक आयाम

वन झारखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाते हैं, जहां लगभग 30% ग्रामीण परिवारों की आय वन उत्पादों पर निर्भर है (State Forest Report 2021)। लकड़ी और गैर-काष्ठ वन उत्पादों का व्यापार सालाना ₹500 करोड़ से अधिक का है (MoEF, 2022)। 2023-24 के राज्य बजट में वन और जैव विविधता संरक्षण के लिए ₹1,200 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो नीति प्राथमिकता को दर्शाता है। बेतला राष्ट्रीय उद्यान के आसपास इकोटूरिज्म का अनुमानित वार्षिक राजस्व ₹150 करोड़ तक पहुंच सकता है, यदि इसे सतत विकास के साथ संचालित किया जाए (Jharkhand Tourism Department, 2023)। इसके विपरीत, जैव विविधता की हानि से पारिस्थितिक सेवाओं के क्षरण के कारण सालाना लगभग ₹250 करोड़ का आर्थिक नुकसान होता है (JSBB Report, 2022)।

  • वन आधारित आजीविका: ग्रामीण आय का 30% वन उत्पादों पर निर्भर।
  • लकड़ी और NTFP व्यापार: ₹500 करोड़ का वार्षिक बाजार मूल्य।
  • राज्य बजट आवंटन: 2023-24 में संरक्षण के लिए ₹1,200 करोड़।
  • इकोटूरिज्म की संभावना: सतत प्रथाओं के साथ ₹150 करोड़ वार्षिक राजस्व।
  • जैव विविधता हानि के कारण आर्थिक नुकसान: ₹250 करोड़ प्रति वर्ष।

तुलना: झारखंड बनाम कोस्टा रिका जैव विविधता प्रबंधन में

पहलूझारखंडकोस्टा रिका
वन क्षेत्र (2021)29.55%53% (2020)
वन क्षेत्र का रुझान (1987-2021)घटाव/स्थिरता (2019-21 में 0.5% गिरावट)21% से बढ़कर 53%
संरक्षण दृष्टिकोणकानूनी ढांचा, सीमित समुदाय सहभागितापारिस्थितिक सेवा के लिए भुगतान (PES), मजबूत समुदाय भागीदारी
जैव विविधता का आर्थिक प्रभावइकोटूरिज्म ~₹150 करोड़ वार्षिकजैव विविधता आधारित इकोटूरिज्म GDP का 6% से अधिक
समुदाय के अधिकारवन अधिकार अधिनियम के तहत 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्रव्यापक समुदाय-प्रबंधित रिजर्व और PES योजनाएं

झारखंड की जैव विविधता संरक्षण में चुनौतियां और नीति खामियां

झारखंड में पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान और वैज्ञानिक संरक्षण विधियों को समाहित करने वाली एक समग्र राज्य जैव विविधता कार्य योजना का अभाव है। इससे संरक्षण प्रयास टुकड़ों में रह जाते हैं और समुदाय की भागीदारी भी कम होती है। खनन से होने वाली वनों की कटाई और आवासीय विखंडन कानूनी प्रावधानों के बावजूद जारी हैं। केंद्रीय आदेशों और राज्य स्तर पर उनके क्रियान्वयन में भी अंतर है। साथ ही, जैव विविधता संरक्षण और जनजातीय आजीविका के बीच सामाजिक-आर्थिक संबंधों का पूरा लाभ नहीं उठाया जा रहा, जिससे प्रोत्साहन आधारित संरक्षण मॉडल सीमित रह जाते हैं।

  • एकीकृत राज्य जैव विविधता कार्य योजना का अभाव।
  • कानूनी ढांचे का विखराव और अधूरी क्रियान्वयन।
  • वन संरक्षण अधिनियम के बावजूद खनन और वनों की कटाई जारी।
  • समुदाय की भागीदारी के लिए सीमित प्रोत्साहन।
  • पर्याप्त डेटा आधारित निगरानी और मूल्यांकन की कमी।

आगे का रास्ता: झारखंड की जैव विविधता संरक्षण को मजबूत बनाना

  • जनजातीय ज्ञान और वैज्ञानिक डाटा को मिलाकर व्यापक राज्य जैव विविधता कार्य योजना बनाना।
  • JSBB की क्षमता बढ़ाकर निगरानी, डेटा संग्रह और समुदाय सहभागिता को मजबूत करना।
  • अंतरराष्ट्रीय सफल मॉडलों के आधार पर पारिस्थितिक सेवा के लिए भुगतान (PES) योजनाएं लागू करना।
  • वन संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण अधिनियमों के क्रियान्वयन को कड़ा करना और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाना।
  • स्थानीय समुदायों से जुड़े सतत इकोटूरिज्म को बढ़ावा देकर वैकल्पिक आजीविका के अवसर पैदा करना।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
झारखंड के वन क्षेत्र के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. FSI 2021 के अनुसार झारखंड का वन क्षेत्र लगभग 30% है।
  2. 2019 से 2021 के बीच वन क्षेत्र में 0.5% की वृद्धि हुई।
  3. सागौन झारखंड के वन क्षेत्र का 70% से अधिक हिस्सा घेरता है।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि FSI 2021 के अनुसार वन क्षेत्र 29.55% है। कथन 2 गलत है; 2019-21 के बीच वन क्षेत्र में 0.5% की गिरावट हुई है। कथन 3 सही है क्योंकि सागौन वन क्षेत्र का 70% से अधिक हिस्सा घेरता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
झारखंड में लागू वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. Section 18 राज्य सरकार को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का अधिकार देता है।
  2. Section 29 संरक्षित प्रजातियों से जुड़े अपराधों से संबंधित है।
  3. अधिनियम बिना पूर्व अनुमति के खनन के लिए वन भूमि के हस्तांतरण की अनुमति देता है।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
Section 18 और 29 का वर्णन सही है। Forest Conservation Act के Section 3 वन भूमि के हस्तांतरण को नियंत्रित करता है, न कि Wildlife Protection Act। इसलिए कथन 3 गलत है।

मुख्य प्रश्न

झारखंड में जैव विविधता संरक्षण के मुख्य चुनौतियों पर चर्चा करें और ऐसे नीति उपाय सुझाएं जो वनस्पति और जीव-जंतु के सतत प्रबंधन को बढ़ावा दें। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC के लिए प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: GS पेपर 1 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी), GS पेपर 3 (आर्थिक विकास और संरक्षण)
  • झारखंड का दृष्टिकोण: वन क्षेत्र, बेतला राष्ट्रीय उद्यान जैसे संरक्षित क्षेत्र और जनजातीय समुदाय के वन अधिकारों का राज्य-विशेष डेटा।
  • मुख्य बिंदु: कानूनी ढांचा, जैव विविधता के आर्थिक योगदान, राज्य बजट आवंटन, और क्रियान्वयन में खामियां।
झारखंड का नवीनतम FSI रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान वन क्षेत्र प्रतिशत क्या है?

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के भारत के वन रिपोर्ट 2021 के अनुसार, झारखंड का वन क्षेत्र उसके भौगोलिक क्षेत्र का 29.55% है।

झारखंड में कौन-कौन सी प्रमुख संकटग्रस्त प्रजातियां पाई जाती हैं?

झारखंड की संकटग्रस्त प्रजातियों में एशियाई हाथी, भारतीय पेंगोलिन, और वन क्षेत्र में प्रमुख सागौन का पेड़ शामिल है।

झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड का क्या कार्य है?

झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड (JSBB), जो जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत बना है, जैव विविधता संरक्षण का समन्वय करता है, राज्य स्तर की नीतियों को लागू करता है और समुदाय की भागीदारी को बढ़ावा देता है।

खनन झारखंड की जैव विविधता को कैसे प्रभावित करता है?

खनन से वनों की कटाई, आवासीय विखंडन और प्रदूषण होता है, जिससे 2019 से 2021 के बीच वन क्षेत्र में 0.5% की गिरावट आई है और वनस्पति एवं जीव-जंतु के आवास खतरे में हैं।

झारखंड में वनों की सुरक्षा के लिए प्रमुख कानूनी प्रावधान कौन से हैं?

प्रमुख कानूनों में संविधान का Article 48A, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972), वन संरक्षण अधिनियम (1980), जैव विविधता अधिनियम (2002), और झारखंड वन संरक्षण नियम (2003) शामिल हैं।

आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

संबंधित: JPSC नोट्स हब | झारखंड भूगोल नोट्स

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