झारखंड की जैव विविधता का परिचय
झारखंड, जो छोटानागपुर पठार पर स्थित है, 79,710 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला है और यहाँ शुष्क पर्णपाती वन से लेकर घास के मैदान तक विविध पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं। वन सर्वेक्षण भारत (FSI) 2021 के अनुसार, राज्य का वन क्षेत्रफल उसकी भौगोलिक सीमा का 29.67% है। यहाँ लगभग 1,500 प्रजातियों के पौधे पाए जाते हैं, जिनमें 150 औषधीय पौधे भी शामिल हैं। झारखंड की वनस्पति में प्रमुख हैं साल के वन (Shorea robusta), जबकि जीव-जंतुओं में संकटग्रस्त प्रजातियों जैसे एशियाई हाथी, भारतीय पेंगोलिन और बाघ शामिल हैं। राज्य में 4 टाइगर रिजर्व और 8 वन्यजीव अभयारण्य हैं, जो कुल भूमि क्षेत्रफल का 4.2% हिस्सा संरक्षित करते हैं (MoEFCC, 2023)।
झारखंड की जैव विविधता पारिस्थितिक संतुलन और ग्रामीण आजीविका के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां की 30% से अधिक आबादी वन संसाधनों पर निर्भर है (झारखंड वन विभाग रिपोर्ट, 2022)। हालांकि, तेजी से बढ़ रहे खनन और वनों की कटाई ने 2018-2021 के बीच वनों की कटाई की दर में 0.5% की वृद्धि की है (FSI, 2021), जो इस जैव विविधता के लिए खतरा है।
JPSC परीक्षा के लिए प्रासंगिकता
- पर्यावरण और पारिस्थितिकी पेपर: झारखंड के संरक्षित क्षेत्र, स्थानीय प्रजातियाँ और खनन के प्रभाव
- भूगोल पेपर: वन क्षेत्र की सांख्यिकी और छोटानागपुर पठार की जैव विविधता
- पिछले प्रश्न: बेतला नेशनल पार्क का महत्व (JPSC 2019), वनस्पति और जीव-जंतुओं पर खनन का प्रभाव (JPSC 2021)
झारखंड की वनस्पति: प्रजाति संरचना और पारिस्थितिक भूमिका
झारखंड की वनस्पति में साल के वन (Shorea robusta) प्रमुख हैं, जो राज्य के शुष्क पर्णपाती वन तंत्र का आधार हैं। अन्य महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजातियों में तेंदू (Diospyros melanoxylon), बांस और महुआ (Madhuca indica) शामिल हैं। राज्य में 150 औषधीय पौधों की प्रजातियाँ हैं, जो पारंपरिक चिकित्सा और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए अहम हैं।
- साल के वन कुल वन क्षेत्रफल का लगभग 60% हिस्सा घेरते हैं, जो प्रति वर्ष लगभग 12 मिलियन टन CO2 समतुल्य कार्बन अवशोषित करते हैं (FSI, 2021)।
- औषधीय पौधों जैसे अश्वगंधा (Asparagus racemosus) और अर्जुन (Terminalia arjuna) का आदिवासी समुदायों द्वारा व्यापक उपयोग होता है।
- खनन मार्गों के कारण वन क्षेत्रों का विखंडन पौधों की पुनरुत्पत्ति और बीज प्रसार में बाधा डालता है।
झारखंड के जीव-जंतु: प्रमुख प्रजातियाँ और संरक्षण स्थिति
झारखंड के जीव-जंतुओं में प्रमुख प्रजातियाँ हैं एशियाई हाथी, बाघ, भारतीय पेंगोलिन और तेंदुआ। बेतला नेशनल पार्क और पलामू टाइगर रिजर्व इन प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण आवास हैं। राज्य में विविध पक्षी और उभयचर भी पाए जाते हैं, जो स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत देते हैं।
- चार टाइगर रिजर्व हैं: पलामू, हजारीबाग, सरांडा और डालमा।
- संकटग्रस्त प्रजातियाँ: एशियाई हाथी (IUCN कमजोर), भारतीय पेंगोलिन (IUCN संकटग्रस्त)।
- संरक्षित क्षेत्र राज्य भूमि का 4.2% है, जो राष्ट्रीय औसत 5% से कम है।
- खनन और कृषि के कारण आवासीय कटाव से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा है।
झारखंड में जैव विविधता संरक्षण के कानूनी और संवैधानिक ढांचे
झारखंड में जैव विविधता संरक्षण कई कानूनी स्तरों पर संचालित होता है:
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी देता है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (संशोधित 2006) वन्यजीव संरक्षण का प्रबंधन करता है, जिसमें धारा 18 और 38 संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन पर केंद्रित हैं।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980 गैर-वन उपयोग के लिए वन भूमि के अपवर्तन को नियंत्रित करता है, जो खनन परियोजनाओं के लिए अहम है।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड (JSBB) स्थानीय जैव विविधता का प्रबंधन करता है और जैविक संसाधनों के उपयोग को विनियमित करता है।
- झारखंड वन संरक्षण नियम, 2004 राज्य-विशिष्ट वन संरक्षण तंत्र प्रदान करते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट का 2013 का आदेश वन भूमि के अपवर्तन पर कड़ी निगरानी करता है, खासकर खनन परियोजनाओं के संदर्भ में।
झारखंड में जैव विविधता प्रबंधन के संस्थागत तंत्र
झारखंड की जैव विविधता संरक्षण में प्रमुख संस्थाएँ शामिल हैं:
- झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड (JSBB): जैव विविधता अधिनियम लागू करता है, सामुदायिक जैव विविधता रजिस्टर बनाता है और सतत उपयोग को बढ़ावा देता है।
- झारखंड वन विभाग: वन संरक्षण, पुनर्वनीकरण और संरक्षित क्षेत्रों का प्रबंधन करता है।
- छोटानागपुर क्षेत्रीय वन्यजीव प्रभाग: टाइगर रिजर्व और वन्यजीव अभयारण्यों की देखरेख करता है, प्रजाति संरक्षण और शिकारी नियंत्रण सुनिश्चित करता है।
- पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC): केंद्रीय नीति मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
- झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB): पर्यावरण नियमों का पालन, विशेषकर खनन प्रदूषण की निगरानी करता है।
आर्थिक पहलू: झारखंड की जैव विविधता और आजीविका
वन क्षेत्र झारखंड की ग्रामीण आबादी के 30% से अधिक के लिए गैर-लकड़ी वन उत्पाद (NTFP), ईंधन लकड़ी और औषधीय पौधों के माध्यम से आजीविका का आधार है (झारखंड वन विभाग रिपोर्ट, 2022)। राज्य जैव विविधता संरक्षण और पुनर्वनीकरण के लिए लगभग INR 150 करोड़ वार्षिक आवंटित करता है (झारखंड पर्यावरण बजट 2023-24)। हालांकि, खनन राज्य के GDP का लगभग 6% हिस्सा है (अर्थव्यवस्था सर्वेक्षण झारखंड, 2023), जो आर्थिक विकास और पारिस्थितिक स्थिरता के बीच टकराव पैदा करता है।
- यदि सतत विकास किया जाए तो इकोटूरिज्म से वार्षिक INR 50 करोड़ की आय हो सकती है (झारखंड पर्यटन विभाग, 2023)।
- वनों की कार्बन अवशोषण क्षमता 12 मिलियन टन CO2 समतुल्य प्रति वर्ष है (FSI, 2021), जो जलवायु संरक्षण में योगदान देती है।
- खनन से होने वाली वनों की कटाई और प्रदूषण जैव विविधता और वन आश्रित आजीविका को खतरे में डालते हैं।
तुलनात्मक अध्ययन: झारखंड बनाम कोस्टा रिका जैव विविधता संरक्षण में
| पहलू | झारखंड | कोस्टा रिका |
|---|---|---|
| वन क्षेत्र (%) | 29.67% (FSI, 2021) | 53% (वर्ल्ड बैंक, 2021) |
| संरक्षित क्षेत्र कवरेज | राज्य भूमि का 4.2% (MoEFCC, 2023) | राष्ट्रीय क्षेत्र का 25% |
| संरक्षण दृष्टिकोण | नियामक, खनन और वनों के बीच खंडित प्रवर्तन | पेयमेंट फॉर इकोसिस्टम सर्विसेज (PES) द्वारा समुदाय की भागीदारी को प्रोत्साहन |
| जैव विविधता परिणाम | खनन और वनों की कटाई से गिरावट | जैव विविधता सूचकांकों में 30% वृद्धि (वर्ल्ड बैंक, 2021) |
| आर्थिक समावेशन | खनन प्रमुख, सीमित इकोटूरिज्म | इकोटूरिज्म GDP में बड़ा योगदानकर्ता |
झारखंड की जैव विविधता नीतियों में प्रमुख कमियां
झारखंड के जैव विविधता संरक्षण में खनन नियमन और वन संरक्षण के बीच समन्वय की कमी के कारण प्रवर्तन खंडित है। समुदाय की भागीदारी अपर्याप्त है, जिससे संसाधनों का सतत उपयोग सीमित होता है। अधिकांश अध्ययन केवल वन क्षेत्र की सांख्यिकी पर केंद्रित हैं, जबकि आजीविका निर्भरता और खनन दबाव जैसे सामाजिक-आर्थिक कारकों को नजरअंदाज किया जाता है, जिससे नीति में कई कमजोरियां बनी हैं।
आगे का रास्ता: झारखंड में जैव विविधता संरक्षण को मजबूत करना
- खनन और वन संरक्षण को मिलाकर समेकित भूमि उपयोग योजना लागू करें ताकि आवासीय विखंडन कम हो।
- संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क को 4.2% से बढ़ाकर राष्ट्रीय और वैश्विक लक्ष्यों के अनुरूप करें।
- कोस्टा रिका के मॉडल से सीख लेकर पेमेंट फॉर इकोसिस्टम सर्विसेज (PES) योजनाओं को बढ़ावा दें ताकि स्थानीय समुदायों को प्रोत्साहन मिले।
- झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड की क्षमता बढ़ाएं ताकि भागीदारी और लाभ-साझाकरण बेहतर हो।
- बेतला नेशनल पार्क जैसे जैव विविधता हॉटस्पॉट्स पर सतत इकोटूरिज्म विकसित कर वैकल्पिक आजीविका के अवसर बढ़ाएं।
- वन संरक्षण अधिनियम और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों का कड़ाई से पालन करें, साथ ही वन भूमि अपवर्तन पर न्यायिक निगरानी सुनिश्चित करें।
- साल (Shorea robusta) झारखंड के शुष्क पर्णपाती वनों की प्रमुख वृक्ष प्रजाति है।
- झारखंड के संरक्षित क्षेत्र राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 10% से अधिक हैं।
- एशियाई हाथी झारखंड में पाई जाने वाली संकटग्रस्त प्रजाति है।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002 झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड को अधिकार देता है।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980 खनन के लिए वन भूमि के बिना प्रतिबंध के अपवर्तन की अनुमति देता है।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण संरक्षण का दायित्व देता है।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
झारखंड और JPSC से जुड़ाव
- JPSC पेपर: पर्यावरण और पारिस्थितिकी (पेपर II), भूगोल (पेपर I)
- झारखंड का दृष्टिकोण: राज्य-विशिष्ट जैव विविधता आंकड़े, बेतला नेशनल पार्क जैसे संरक्षित क्षेत्र, खनन के वन और वन्यजीव पर प्रभाव
- मेन्स के लिए संकेत: झारखंड की अनूठी जैव विविधता, कानूनी ढांचे, खनन और संरक्षण के बीच आर्थिक संतुलन, तथा समेकित नीति उपायों को प्रमुखता से प्रस्तुत करें
झारखंड का वन क्षेत्र प्रतिशत नवीनतम आंकड़ों के अनुसार क्या है?
वन सर्वेक्षण भारत 2021 के अनुसार, झारखंड का वन क्षेत्र उसकी भौगोलिक सीमा का 29.67% है।
झारखंड के प्रमुख संरक्षित क्षेत्र कौन से हैं?
झारखंड में 4 टाइगर रिजर्व हैं जिनमें पलामू और डालमा शामिल हैं, साथ ही 8 वन्यजीव अभयारण्य भी हैं। बेतला नेशनल पार्क एक प्रमुख संरक्षित क्षेत्र है।
झारखंड में वन भूमि के अपवर्तन को कौन से कानूनी प्रावधान नियंत्रित करते हैं?
वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन भूमि के अपवर्तन को नियंत्रित करता है, जिसके लिए केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक है। इसके साथ झारखंड वन संरक्षण नियम, 2004 भी लागू होते हैं।
खनन झारखंड की जैव विविधता को कैसे प्रभावित करता है?
खनन से वनों की कटाई, आवास विखंडन, प्रदूषण और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है, जिससे 2018-2021 के बीच वनों की कटाई की दर में 0.5% की वृद्धि हुई है।
झारखंड में जैव विविधता संरक्षण का प्रबंधन कौन सा संस्थान करता है?
झारखंड राज्य जैव विविधता बोर्ड (JSBB) जैव विविधता अधिनियम, 2002 को लागू करता है और स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन का समन्वय करता है।
आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ाई के लिए
मेन्स अभ्यास प्रश्न
खनन गतिविधियों के बढ़ते प्रभाव के बीच झारखंड को अपनी जैव विविधता संरक्षण में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? राज्य में आर्थिक विकास और पारिस्थितिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाने के लिए कौन सी नीति उपाय सुझाए जा सकते हैं?
उत्तर का रूपरेखा: झारखंड की समृद्ध जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की वन संसाधनों पर निर्भरता को उजागर करें। बताएं कि खनन से वनों की कटाई, आवासीय हानि और प्रदूषण कैसे बढ़ता है। खनन और वन संरक्षण के बीच नीति समन्वय की कमी पर चर्चा करें। समेकित भूमि उपयोग योजना, कानूनी प्रवर्तन मजबूत करना, JSBB के माध्यम से समुदाय की भागीदारी और इकोटूरिज्म तथा PES योजनाओं को बढ़ावा देने का सुझाव दें।
और JPSC नोट्स देखें | झारखंड भूगोल नोट्सस्रोत: LearnPro Editorial | सामान्य अध्ययन | प्रकाशित: 12 March 2026 | अंतिम अपडेट: 26 April 2026
लर्नप्रो संपादकीय मानकों के बारे में
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