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मानसून का पूर्वानुमान और 2024 के शुरुआती संकेत

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने जून 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार, 2024 के दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा लम्बी अवधि के औसत (LPA) का 92% रहने का अनुमान लगाया है, जिसमें ±5% की त्रुटि सीमा है। यह सामान्य से कम मानसून है, लेकिन सूखे जैसी गंभीर कमी नहीं है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, खरीफ फसलों की बुवाई क्षेत्रफल पिछले दस वर्षों के औसत से 5% कम दर्ज किया गया है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में भूजल स्तर औसतन 0.33 मीटर प्रति वर्ष घटा है, जो लंबे समय तक जल संकट का संकेत है, भले ही वर्षा की वर्तमान भविष्यवाणी बेहतर हो।

  • IMD का मानसून पूर्वानुमान: 2024 में LPA का 92% (±5%)
  • खरीफ बुवाई क्षेत्रफल में 10-वर्ष औसत के मुकाबले 5% की गिरावट
  • भूजल स्तर में गिरावट: पिछले 10 वर्षों में 0.33 मीटर प्रति वर्ष
  • 2023 में शुद्ध बुआई क्षेत्र का 50.5% सिंचाई से कवर

कृषि और जल संसाधनों से जुड़े संवैधानिक और कानूनी प्रावधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 में राज्य को आधुनिक और वैज्ञानिक कृषि तथा पशुपालन को बढ़ावा देने का निर्देश दिया गया है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 केंद्र सरकार को जल संसाधनों सहित पर्यावरण की गुणवत्ता की रक्षा का अधिकार देता है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 6 और 10 प्राकृतिक आपदाओं जैसे सूखे के लिए तैयारियों और राहत कार्यों का कानूनी आधार प्रदान करती हैं। ये प्रावधान मानसून की अनिश्चितताओं और कृषि जोखिमों से निपटने में समन्वित प्रयास सक्षम करते हैं।

  • अनुच्छेद 48: वैज्ञानिक कृषि के लिए राज्य की जिम्मेदारी
  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: जल सहित पर्यावरण संरक्षण की केंद्र सरकार की भूमिका
  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005: सूखे की तैयारी और राहत के लिए कानूनी ढांचा

सामान्य से कम मानसून का आर्थिक प्रभाव और बचाव के उपाय

कृषि भारत के GDP में लगभग 18% का योगदान देती है (आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24)। मानसून वर्षा में 10% की कमी आमतौर पर खरीफ फसल उत्पादन में 5-7% की गिरावट लाती है (IMD, 2023)। हालांकि, 2023 में भारत का खाद्यान्न उत्पादन 316 मिलियन टन तक पहुंचा (कृषि मंत्रालय)। सरकार ने 2023-24 में सिंचाई और जल संरक्षण के लिए ₹1.32 लाख करोड़ आवंटित किए, जिससे कृषि क्षेत्र की मजबूती बढ़ी है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2023 में 11 करोड़ किसानों को ₹20,000 करोड़ वितरित किए गए, जिससे उनकी आय में स्थिरता आई।

  • कृषि का GDP में हिस्सा: लगभग 18%
  • वर्षा की कमी का प्रभाव: 10% कमी पर 5-7% खरीफ फसल की कटौती
  • 2023 में खाद्यान्न उत्पादन: 316 मिलियन टन
  • 2023-24 में सिंचाई और जल संरक्षण के लिए ₹1.32 लाख करोड़ का बजट
  • PM-KISAN के तहत FY 2023 में ₹20,000 करोड़ का भुगतान

मानसून पूर्वानुमान, जल प्रबंधन और आपदा प्रतिक्रिया में संस्थागत भूमिका

IMD मानसून पूर्वानुमान और जलवायु संबंधी आंकड़े प्रदान करता है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) जल संसाधनों का प्रबंधन करता है तथा बाढ़ और सूखे की स्थिति पर निगरानी रखता है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (MoA&FW) कृषि नीतियों और योजनाओं को लागू करता है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) आपदा तैयारी और राहत कार्य संभालता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) भूजल की स्थिरता पर नजर रखता है। नीति आयोग जल संसाधन प्रबंधन के लिए रणनीतियां बनाता है और जल उपयोग की दक्षता बढ़ाता है।

  • IMD: मानसून पूर्वानुमान और जलवायु आंकड़े
  • CWC: जल संसाधन प्रबंधन, बाढ़/सूखे की निगरानी
  • MoA&FW: कृषि नीति क्रियान्वयन
  • NDRF: आपदा तैयारी और राहत
  • CGWB: भूजल निगरानी और संरक्षण
  • नीति आयोग: जल प्रबंधन नीति निर्धारण

जल प्रबंधन और कृषि मजबूती: आंकड़े और रुझान

2018 में 48% से बढ़कर 2023 में शुद्ध बुआई क्षेत्र का 50.5% सिंचाई से कवर हुआ है (आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24), जिससे वर्षा पर निर्भरता कम हुई है। सूखे से प्रभावित क्षेत्र 2018 के 12 मिलियन हेक्टेयर से घटकर 2023 में 7.5 मिलियन हेक्टेयर हो गया है (MoA&FW)। भारत के खाद्यान्न भंडार जून 2024 तक 45 मिलियन टन था, जो लगभग तीन महीने की खपत के लिए पर्याप्त है (भारतीय खाद्य निगम)। हालांकि, सिंचित क्षेत्र का 40% हिस्सा जल-गहन फसलों में है, जो वर्षा की अनिश्चितता के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाता है (नीति आयोग, 2023)।

  • सिंचाई कवरेज: 2018 में 48% से 2023 में 50.5%
  • सूखे से प्रभावित क्षेत्र: 2018 में 12 मिलियन हेक्टेयर से 2023 में 7.5 मिलियन हेक्टेयर
  • खाद्यान्न भंडार: जून 2024 तक 45 मिलियन टन
  • जल-गहन फसलें: सिंचित क्षेत्र का 40%

भारत और ऑस्ट्रेलिया के कृषि जल प्रबंधन की तुलना

मापदंडभारतऑस्ट्रेलिया
मानसून/वर्षा पर निर्भरतामानसून वर्षा पर अधिक निर्भरकम निर्भरता; उन्नत सिंचाई व्यवस्था
जल प्रबंधनसीमित जल व्यापार; भूजल का अति दोहनसशक्त जल व्यापार बाजार; भूजल का नियंत्रित उपयोग
सूखे में कृषि GDP की अस्थिरता3-5% उतार-चढ़ाव1.5% से कम उतार-चढ़ाव
फसल विविधतासूखा-प्रतिरोधी किस्मों का कम उपयोगसूखा-प्रतिरोधी फसलों का व्यापक उपयोग

भारत के कृषि जल सुरक्षा में मुख्य चुनौतियां

भारत की मानसून वर्षा और भूजल पर अत्यधिक निर्भरता संरचनात्मक कमजोरी है। सटीक सिंचाई तकनीकों और फसल विविधीकरण को अपनाने की दर कम है, जिससे मजबूती सीमित होती है। नीतिगत रूप से इनपुट सब्सिडी पर जोर अधिक होने के कारण सतत जल प्रबंधन पर ध्यान कम रहता है, जो लंबी अवधि के जोखिमों को बढ़ाता है। ये कमियां मानसून की अनिश्चितताओं से निपटने की क्षमता को बाधित करती हैं।

  • भूजल का अत्यधिक दोहन, जबकि स्तर घट रहा है
  • सटीक और सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का कम उपयोग
  • जल-गहन फसलों का अधिक हिस्सा
  • नीति में सब्सिडी पर अधिक ध्यान, सतत जल प्रबंधन पर कम

महत्व और आगे का रास्ता

2024 के लिए सामान्य से कम मानसून का पूर्वानुमान चिंताजनक नहीं है क्योंकि संस्थागत ढांचे मजबूत हैं, सिंचाई कवरेज बढ़ा है और पर्याप्त भंडार मौजूद हैं। फिर भी, कृषि उत्पादकता बनाए रखने के लिए जल-कुशल तकनीकों और फसल विविधीकरण को तेजी से अपनाना आवश्यक है। भूजल पुनर्भरण बढ़ाना, सूखा-प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देना और जल व्यापार के उपाय विकसित करना संवेदनशीलता कम कर सकते हैं। IMD, CWC, MoA&FW और NDRF के बीच बेहतर समन्वय सूखे की स्थिति में समय पर प्रतिक्रिया सुनिश्चित करेगा।

  • सूक्ष्म सिंचाई और सटीक जल उपयोग तकनीकों को बढ़ावा दें
  • सूखा-प्रतिरोधी और कम जल-गहन फसलों को प्रोत्साहित करें
  • भूजल पुनर्भरण और सतत दोहन नीतियों को सुदृढ़ करें
  • जल व्यापार बाजार विकसित कर संसाधनों का बेहतर आवंटन करें
  • सूखा निगरानी और राहत के लिए एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाएं

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 1: भूगोल – भारतीय मानसून, जलवायु परिवर्तन, कृषि
  • GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – जल संसाधन प्रबंधन, आपदा प्रबंधन, कृषि
  • निबंध: भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
📝 प्रारंभिक अभ्यास
मानसून से संबंधित आपदा प्रबंधन में संस्थागत भूमिकाओं के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. भारतीय मौसम विभाग जल संसाधन प्रबंधन और बाढ़ निगरानी के लिए जिम्मेदार है।
  2. केंद्रीय जल आयोग जल संसाधनों का प्रबंधन करता है और सूखे की निगरानी करता है।
  3. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल आपदा तैयारी और राहत कार्य संभालता है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि भारतीय मौसम विभाग मौसम पूर्वानुमान प्रदान करता है, लेकिन जल संसाधन प्रबंधन या बाढ़ निगरानी नहीं करता। कथन 2 सही है क्योंकि केंद्रीय जल आयोग जल संसाधनों का प्रबंधन करता है और बाढ़ तथा सूखे की निगरानी करता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल आपदा तैयारी और राहत कार्य संभालता है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारतीय कृषि पर मानसून की अनिश्चितता के प्रभाव के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. मानसून वर्षा में 10% की कमी आमतौर पर खरीफ फसल उत्पादन में 5-7% की गिरावट लाती है।
  2. भारत का खाद्यान्न भंडार कम से कम छह महीने की खपत के लिए रखा जाता है।
  3. जल-गहन फसलें सिंचित क्षेत्र का लगभग 40% हिस्सा लेती हैं, जिससे वर्षा की अनिश्चितता बढ़ जाती है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है जैसा कि IMD के आंकड़े बताते हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि भारत का खाद्यान्न भंडार लगभग तीन महीने की खपत के लिए पर्याप्त होता है, छह महीने के लिए नहीं। कथन 3 सही है, नीति आयोग की 2023 रिपोर्ट के अनुसार।

मुख्य प्रश्न

सामान्य से कम मानसून के भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था पर प्रभावों पर चर्चा करें। संस्थागत व्यवस्थाएं और जल प्रबंधन रणनीतियां मानसून की अनिश्चितताओं से जुड़े जोखिमों को कैसे कम करती हैं? कृषि क्षेत्र की मजबूती बढ़ाने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए?

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – भूगोल और कृषि
  • झारखंड का पहलू: झारखंड की कृषि वर्षा-निर्भर है और सिंचाई कवरेज लगभग 30% है, जिससे मानसून की कमी के प्रति संवेदनशीलता अधिक है।
  • मुख्य बिंदु: राज्य में भूजल घटाव, मानसून पर निर्भरता, सूक्ष्म सिंचाई और सूखा-प्रतिरोधी फसलों के विस्तार की संभावनाओं पर प्रकाश डालें।
मानसून और कृषि के संदर्भ में अनुच्छेद 48 का क्या महत्व है?

संविधान का अनुच्छेद 48 राज्य को आधुनिक और वैज्ञानिक कृषि तथा पशुपालन को बढ़ावा देने का निर्देश देता है, जिससे मानसून की अनिश्चितताओं के प्रभाव को कम करने वाली नीतियां बनाना संभव होता है।

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 सूखे से निपटने में कैसे मदद करता है?

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 6 और 10 प्राकृतिक आपदाओं जैसे सूखे के लिए तैयारियों, राहत और पुनर्वास के लिए संस्थागत व्यवस्था प्रदान करती हैं, जिससे मानसून असफलता के दौरान समन्वित कार्रवाई संभव होती है।

सामान्य से कम मानसून के दौरान केंद्रीय जल आयोग की भूमिका क्या होती है?

केंद्रीय जल आयोग जल संसाधनों का प्रबंधन करता है, बाढ़ और सूखे की स्थिति पर नजर रखता है, और मानसून की कमी में जल आवंटन के लिए सलाह देता है ताकि जल का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित हो सके।

सिंचाई कवरेज बढ़ने के बावजूद भूजल घटाव चिंता का विषय क्यों है?

भूजल स्तर में औसतन 0.33 मीटर प्रति वर्ष की गिरावट दीर्घकालिक जल उपलब्धता के लिए खतरा है क्योंकि बढ़ी हुई सिंचाई अक्सर असतत भूजल दोहन पर निर्भर होती है, जो मानसून की अनिश्चितताओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाती है।

जल-गहन फसलें भारत की मानसून अस्थिरता के प्रति संवेदनशीलता को कैसे बढ़ाती हैं?

जल-गहन फसलें सिंचित क्षेत्र का 40% हिस्सा लेती हैं, जिससे पर्याप्त जल आपूर्ति पर निर्भरता बढ़ती है और सामान्य से कम मानसून वाले वर्षों में जोखिम बढ़ जाते हैं।

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