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2024 में ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS), नई दिल्ली द्वारा की गई एक लंबी अवधि की स्टडी में यह महत्वपूर्ण संबंध सामने आया है कि एक साल की उम्र से पहले रोजाना दो घंटे से अधिक स्क्रीन देखने वाले बच्चों में तीन साल की उम्र तक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के शुरुआती लक्षण दिखने की संभावना 30% अधिक होती है। यह रिसर्च, जो 2024 की शुरुआत में प्रकाशित हुई, भारत में शिशु स्क्रीन एक्सपोजर से जुड़ी न्यूरोडेवलपमेंटल जोखिमों को मापने वाली पहली बड़ी स्टडी में से एक है। ये नतीजे इसलिए भी चिंताजनक हैं क्योंकि 2018 से 2023 के बीच भारत में दो साल से कम उम्र के बच्चों का स्क्रीन टाइम 45% बढ़ा है (Nielsen India Report, 2023), वहीं नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (2019-21) में 27% बच्चों में विकासात्मक देरी की रिपोर्ट मिली है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: स्वास्थ्य नीतियां, बाल विकास, मानसिक स्वास्थ्य कानून
  • GS पेपर 3: डिजिटल मीडिया विनियमन, सार्वजनिक स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था
  • निबंध: डिजिटल तकनीक का बाल स्वास्थ्य और विकास पर प्रभाव

बाल स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण की सुरक्षा में संवैधानिक और कानूनी ढांचा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में स्वास्थ्य का अधिकार शामिल है, जिसे मानसिक स्वास्थ्य तक भी माना जाता है। मेन्टल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 (धारा 18 और 21) मानसिक स्वास्थ्य सेवा की पहुंच सुनिश्चित करता है और मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्तियों, जिनमें ASD वाले बच्चे भी शामिल हैं, के अधिकारों की रक्षा करता है। जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2015 में बच्चे की परिभाषा (धारा 2(14)) दी गई है और खतरनाक गतिविधियों से बचाने का प्रावधान है, जिसमें नशे की तरह स्क्रीन का आदी होना भी शामिल माना जा सकता है (धारा 23)। इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 डिजिटल कंटेंट की पहुंच को नियंत्रित करते हैं ताकि बच्चों को हानिकारक ऑनलाइन सामग्री से बचाया जा सके, हालांकि इसका क्रियान्वयन अभी भी असंगत है।

आर्थिक बोझ और डिजिटल बाजार की प्रवृत्तियां

भारत में मानसिक स्वास्थ्य विकारों पर वार्षिक स्वास्थ्य खर्च लगभग ₹15,000 करोड़ है (NIMHANS, 2023)। डिजिटल मीडिया मार्केट तेजी से बढ़ रहा है, जो 2025 तक $7 बिलियन पहुंचने का अनुमान है, 20.7% की वार्षिक वृद्धि दर के साथ (FICCI-EY Report, 2023), जिससे बच्चों का डिजिटल डिवाइस के संपर्क में आना बढ़ रहा है। ASD में शुरुआती हस्तक्षेप से जीवनभर के इलाज के खर्च में 40% तक की कमी आ सकती है (WHO Mental Health Report, 2022), जो रोकथाम की आर्थिक समझ को दर्शाता है। सरकार के नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत 2023-24 के बजट में ₹2,000 करोड़ आवंटित किए गए हैं, ताकि डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड में बाल विकास संबंधी डेटा भी शामिल किया जा सके, जिससे बेहतर निगरानी और जल्दी पहचान संभव हो।

स्क्रीन टाइम और ASD जोखिम से निपटने में प्रमुख संस्थागत भूमिका

  • AIIMS: स्क्रीन टाइम और ऑटिज्म लक्षणों के बीच संबंध पर महत्वपूर्ण लंबी अवधि की स्टडी की।
  • NIMHANS: महामारी विज्ञान डेटा और मानसिक स्वास्थ्य नीति संबंधी मार्गदर्शन प्रदान करता है।
  • MoHFW: बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम और डिजिटल स्वास्थ्य पहलों को लागू करता है।
  • ICMR: न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर रिसर्च को फंड करता है।
  • WHO: बाल विकास और स्क्रीन टाइम पर वैश्विक दिशा-निर्देश देता है।

भारत में स्क्रीन टाइम और ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के आंकड़े

  • एक साल से पहले रोजाना 2 घंटे से अधिक स्क्रीन देखने वाले बच्चों में तीन साल तक ASD के शुरुआती लक्षण 30% अधिक पाए गए (AIIMS, 2024)।
  • वैश्विक स्तर पर ASD की दर लगभग 1 में से 100 बच्चों के बराबर है (WHO, 2022)।
  • भारत में 5 साल से कम उम्र के 27% बच्चों में विकासात्मक देरी है; डिजिटल एक्सपोजर बढ़ता जोखिम है (NFHS-5, 2019-21)।
  • 2018 से 2023 तक दो साल से कम उम्र के बच्चों का स्क्रीन टाइम 45% बढ़ा है (Nielsen India Report, 2023)।
  • केवल 15% भारतीय माता-पिता WHO की स्क्रीन टाइम गाइडलाइंस से परिचित हैं (AIIMS सर्वे, 2024)।
  • तीन साल की उम्र से पहले हस्तक्षेप ASD की गंभीरता को 25-40% तक कम कर सकता है (Lancet Psychiatry, 2023)।

स्क्रीन टाइम विनियमन में भारत और दक्षिण कोरिया की तुलना

पहलूभारतदक्षिण कोरिया
नियामक ढांचाखंडित दिशानिर्देश; शिशु स्क्रीन टाइम पर कोई एकीकृत लागू नीति नहींडिजिटल मीडिया यूसेज एक्ट (2019) बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम सख्ती से नियंत्रित करता है
सार्वजनिक जागरूकताकेवल 15% माता-पिता को स्क्रीन टाइम गाइडलाइंस की जानकारी (AIIMS, 2024)सरकारी अभियान और स्कूल प्रोग्राम के कारण व्यापक जागरूकता
विकासात्मक देरी पर प्रभाव5 साल से कम उम्र के 27% बच्चों में विकासात्मक देरी, डिजिटल एक्सपोजर बढ़ रहा हैपिछले 5 वर्षों में शुरुआती विकासात्मक देरी में 15% कमी (कोरियन स्वास्थ्य मंत्रालय, 2024)
डिजिटल मार्केट वृद्धि2025 तक $7 बिलियन, 20.7% CAGRबच्चों के लिए डिजिटल कंटेंट और डिवाइस उपयोग पर सख्त नियंत्रण

भारत में नीतिगत खामियां

भारत में शिशु और नन्हे बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर कोई समन्वित, लागू की जाने वाली नीति नहीं है। मौजूदा दिशानिर्देश स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल मीडिया क्षेत्रों में बिखरे हुए हैं, जिससे क्रियान्वयन में असंगति रहती है। माता-पिता की जागरूकता कम है, और डिजिटल कंटेंट विनियमन विकासात्मक जोखिमों को पर्याप्त रूप से नहीं संभालता। ये खामियां शुरुआती हस्तक्षेप और रोकथाम प्रयासों में बाधा डालती हैं, जिससे ASD और अन्य विकासात्मक विकारों का बोझ बढ़ता है।

आगे का रास्ता: लक्षित हस्तक्षेप और नियामक उपाय

  • दो साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम सीमाओं पर एक राष्ट्रीय एकीकृत नीति बनाना, जिसमें स्वास्थ्य और डिजिटल मीडिया नियम शामिल हों।
  • इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी रूल्स, 2021 के क्रियान्वयन को मजबूत करना ताकि शिशुओं और नन्हे बच्चों को लक्षित हानिकारक कंटेंट और नशे की प्रवृत्ति वाले फीचर्स पर रोक लगाई जा सके।
  • स्वास्थ्यकर्मियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से सार्वजनिक जागरूकता अभियान बढ़ाना, जिससे माता-पिता को WHO की स्क्रीन टाइम गाइडलाइंस के बारे में शिक्षित किया जा सके।
  • बाल विकास स्क्रीनिंग और डिजिटल एक्सपोजर डेटा को नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन में शामिल करना ताकि जल्दी पहचान और हस्तक्षेप संभव हो।
  • ICMR और NIMHANS के माध्यम से स्क्रीन टाइम के न्यूरोडेवलपमेंटल प्रभावों पर रिसर्च के लिए फंडिंग बढ़ाना।
  • दक्षिण कोरिया जैसे देशों से सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाना, जिसमें नियमन के साथ समुदाय की भागीदारी भी शामिल हो।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
मेन्टल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह सभी व्यक्तियों, बच्चों सहित, को मानसिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच का अधिकार देता है।
  2. यह दो साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करता है।
  3. यह मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्तियों, जिनमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर वाले बच्चे भी शामिल हैं, के अधिकारों की रक्षा करता है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है क्योंकि धारा 18 मानसिक स्वास्थ्य सेवा की पहुंच की गारंटी देती है। कथन 2 गलत है; एक्ट स्क्रीन टाइम को स्पष्ट रूप से नियंत्रित नहीं करता। कथन 3 सही है क्योंकि धारा 21 मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करती है, जिसमें ASD भी शामिल है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. ये बच्चों को हानिकारक डिजिटल कंटेंट से बचाने के लिए कंटेंट को नियंत्रित करते हैं।
  2. ये पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों द्वारा देखे जाने वाले सभी डिजिटल कंटेंट के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य करते हैं।
  3. ये शिशुओं और नन्हे बच्चों के स्क्रीन टाइम की अवधि पर लागू सीमा लगाते हैं।
  • aकेवल 1
  • bऔर 3
  • cकेवल
  • dकेवल 1 और 2
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है; ये नियम हानिकारक डिजिटल कंटेंट को नियंत्रित करते हैं। कथन 2 गलत है; सभी कंटेंट के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य नहीं है। कथन 3 भी गलत है; स्क्रीन टाइम की कोई लागू सीमा नहीं है।

मेन प्रश्न

AIIMS 2024 की उस स्टडी के प्रभावों का मूल्यांकन करें जो शुरुआती स्क्रीन टाइम एक्सपोजर को तीन साल की उम्र तक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के लक्षणों से जोड़ती है। भारत में इस मुद्दे से जुड़े कानूनी और संस्थागत ढांचे पर चर्चा करें और जोखिम कम करने के लिए नीतिगत सुझाव दें।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (स्वास्थ्य और सामाजिक मुद्दे), बाल विकास और मानसिक स्वास्थ्य
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में राष्ट्रीय औसत से अधिक विकासात्मक देरी देखी गई है (NFHS-5), और ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल पहुँच बढ़ने से स्क्रीन एक्सपोजर का खतरा भी बढ़ रहा है।
  • मेन पॉइंट: राज्य स्तर पर स्वास्थ्य ढांचे की खामियां, जागरूकता अभियानों की जरूरत, और NDHM के तहत डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड के एकीकरण से ASD की जल्दी पहचान के उपायों को रेखांकित करें।
WHO के अनुसार दो साल से कम उम्र के बच्चों के लिए अनुशंसित स्क्रीन टाइम क्या है?

WHO के निर्देशानुसार दो साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम बिल्कुल नहीं होना चाहिए, और स्वस्थ विकास के लिए इंटरैक्टिव खेल और मानवीय संपर्क पर जोर दिया गया है।

प्रारंभिक हस्तक्षेप ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के परिणामों को कैसे प्रभावित करता है?

तीन साल की उम्र से पहले हस्तक्षेप ASD की गंभीरता को 25-40% तक कम कर सकता है, जिससे संज्ञानात्मक और सामाजिक परिणाम बेहतर होते हैं (Lancet Psychiatry, 2023)।

भारत में कौन सा कानून ASD सहित मानसिक रोग वाले बच्चों के अधिकारों की रक्षा करता है?

मेन्टल हेल्थकेयर एक्ट, 2017, विशेषकर धारा 18 और 21, मानसिक स्वास्थ्य सेवा की पहुंच और ASD सहित मानसिक रोगियों के अधिकारों की रक्षा करता है।

भारत में शिशुओं के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने में मुख्य चुनौतियां क्या हैं?

मुख्य चुनौतियों में स्वास्थ्य और डिजिटल क्षेत्रों में खंडित नीतियां, कम माता-पिता जागरूकता (15%), और स्क्रीन टाइम पर लागू सीमा का अभाव शामिल है।

दक्षिण कोरिया का डिजिटल मीडिया यूसेज एक्ट बाल विकास पर कैसे प्रभाव डालता है?

2019 में लागू यह एक्ट तीन साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम पर सख्त प्रतिबंध लगाता है, जिससे पिछले पांच वर्षों में शुरुआती विकासात्मक देरी में 15% की कमी आई है (कोरियन स्वास्थ्य मंत्रालय, 2024)।

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