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अप्रैल 2024 में आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा के अध्यक्ष को सात सांसदों की सदस्यता रद्द करने की याचिका सौंपकर दसवें अनुसूची के तहत दलबदल विरोधी प्रावधानों को लागू करने की मांग की। यह कदम संविधान के दसवें अनुसूची में निहित दलबदल विरोधी कानूनों का हवाला देता है। याचिका इस बात पर जोर देती है कि संसद की गरिमा बनाए रखने और सरकार गठन में अस्थिरता से बचने के लिए दलबदल विरोधी कानूनों का सख्ती से पालन आवश्यक है।

UPSC Relevance

  • GS Paper 2: राजनीति और शासन – संसद से जुड़े संवैधानिक प्रावधान, दलबदल विरोधी कानून, स्पीकर/अध्यक्ष की भूमिका
  • GS Paper 2: राजनीतिक विज्ञान – संसदीय लोकतंत्र, राजनीतिक दल और चुनाव सुधार
  • निबंध: भारत में राजनीतिक स्थिरता और शासन सुधार

दलबदल विरोधी कानून का संवैधानिक और कानूनी ढांचा

दलबदल विरोधी कानून 1985 के 52वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया, जिसने दसवें अनुसूची को शामिल किया। संविधान के अनुच्छेद 102(2) और 191(2) सांसदों और विधायकों को दलबदल के आधार पर अयोग्य घोषित करने का संवैधानिक आधार प्रदान करते हैं। दसवें अनुसूची के सेक्शन 2 और 3 सदस्य की अयोग्यता के मानदंड तय करते हैं, जिनमें पार्टी छोड़ना या पार्टी के निर्देशों के खिलाफ मतदान करना शामिल है।

  • राज्यसभा के अध्यक्ष को राज्यसभा के नियम 64 के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने का अधिकार है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने Kihoto Hollohan v. Zachillhu (1992) 2 SCC 651 मामले में स्पीकर/अध्यक्ष के फैसले को मान्यता दी, जिससे न्यायिक मिसाल कायम हुई।
  • अयोग्यता के फैसले अर्ध-न्यायिक होते हैं, लेकिन स्पीकर/अध्यक्ष के विवेकाधिकार पर पक्षपात और देरी के आरोप लगते रहे हैं।

दलबदल के राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव

राजनीतिक दलबदल सरकार की स्थिरता को प्रभावित करता है, जिससे आर्थिक नीतियों की निरंतरता बाधित होती है। भारत की GDP वृद्धि दर वित्त वर्ष 2021-22 में 7.4% से घटकर अनुमानित 6.1% (वित्त वर्ष 2023-24) हो गई, जिसमें राजनीतिक अनिश्चितता की भूमिका रही (आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24)। अस्थिरता विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को भी प्रभावित करती है, जो वित्त वर्ष 2022-23 में 83.57 अरब डॉलर रहा (DPIIT), क्योंकि निवेशक स्थिर नीति वातावरण चाहते हैं।

  • बार-बार दलबदल से शासन लागत बढ़ती है, जो संसद और चुनाव प्रबंधन के लिए बजट आवंटन में 12% की वृद्धि के रूप में सामने आई है, जो वित्तीय बजट 2023-24 में ₹1,200 करोड़ तक पहुंच गया।
  • राजनीतिक अस्थिरता दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों को जटिल बनाती है और निवेशकों का भरोसा कम करती है।

दलबदल विरोधी कानून लागू करने वाले प्रमुख संस्थान

राज्यसभा अध्यक्ष दसवें अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं का निपटारा करते हैं। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) चुनावी निष्पक्षता की निगरानी करता है लेकिन दलबदल मामलों का निर्णय नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करता है और दलबदल से जुड़े विवादों का निपटारा करता है। संसदीय आचार समिति सांसदों के आचरण पर नजर रखती है, जिसमें दलबदल से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं। संसदीय कार्य मंत्रालय विधायी कार्यों और दलबदल विरोधी सुधारों का समन्वय करता है।

  • 1985 से अब तक 150 से अधिक अयोग्यता याचिकाएं दायर हो चुकी हैं, जिनका औसत निपटान समय छह महीने है (PRS Legislative Research, 2023)।
  • 2019 में एक लोकसभा कार्यकाल में 11 सांसद दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित हुए, जो अब तक का उच्चतम आंकड़ा है (भारत निर्वाचन आयोग)।

तुलनात्मक दृष्टिकोण: भारत बनाम यूनाइटेड किंगडम

पहलूभारतयूनाइटेड किंगडम
कानूनी आधारसंविधान में कोडित (दसवें अनुसूची)अनौपचारिक रीतियां और पार्टी व्हिप्स
अयोग्यता प्रक्रियास्पीकर/अध्यक्ष द्वारा औपचारिक अयोग्यताकोई औपचारिक अयोग्यता नहीं; पार्टी अनुशासन आंतरिक रूप से लागू
प्रभावशीलताकानूनी ढांचे में देरी और पक्षपात की समस्याएंपार्टी अनुशासन अधिक, औपचारिक दलबदल कम
राजनीतिक स्थिरतादलबदल से सरकार अस्थिर होती हैमजबूत पार्टी एकता से दलबदल कम होता है

दलबदल विरोधी कानून के क्रियान्वयन में मुख्य कमजोरियां

स्पीकर/अध्यक्ष के विवेकाधिकार से फैसलों में लंबे समय तक देरी होती है और पक्षपात के आरोप लगते हैं, जो कानून की प्रभावशीलता को कमजोर करते हैं। दलबदल करने वाले सदस्य प्रक्रियागत खामियों का फायदा उठाकर याचिकाओं में देरी करते हैं या न्यायिक हस्तक्षेप का सहारा लेते हैं। स्वतंत्र निर्णय लेने वाली संस्था के अभाव में क्रियान्वयन कमजोर होता है और राजनीतिक दुरुपयोग की संभावना बढ़ती है।

  • निर्णय लेने में औसतन छह महीने की देरी होती है, जिसके दौरान दलबदल करने वाले संसद की कार्यवाही प्रभावित करते रहते हैं।
  • पक्षपात के आरोप दलबदल विरोधी व्यवस्था में जनता का विश्वास कम करते हैं।
  • न्यायिक हस्तक्षेप ने स्पीकर/अध्यक्ष के अधिकारों को मान्यता दी है, लेकिन प्रक्रियागत सुरक्षा उपाय सुझाए हैं ताकि मनमानी कम हो सके।

महत्व और आगे का रास्ता

  • दसवें अनुसूची के प्रावधानों को कड़ाई से और समय पर लागू करना संसद की गरिमा बनाए रखने और अवसरवादी दलबदल को रोकने के लिए जरूरी है।
  • संस्थागत सुधारों में अयोग्यता याचिकाओं के लिए स्वतंत्र न्यायाधिकरण की स्थापना शामिल हो सकती है, जिससे पक्षपात और देरी कम हो।
  • पारदर्शिता बढ़ाना और प्रक्रियागत समयसीमा निर्धारित करना दलबदल विरोधी व्यवस्था को मजबूत करेगा।
  • राजनीतिक दलों को आंतरिक अनुशासन सख्त करना होगा ताकि दलबदल कम हो और स्थिर शासन सुनिश्चित हो।
  • जनता की जागरूकता और मीडिया की निगरानी से दलबदल करने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के लिए दबाव बढ़ेगा।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत के संविधान के दसवें अनुसूची के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह 52वें संशोधन अधिनियम, 1985 के द्वारा राजनीतिक दलबदल रोकने के लिए जोड़ा गया था।
  2. स्पीकर या अध्यक्ष के पास अयोग्यता याचिकाओं का निर्णय करने का विवेकाधिकार होता है।
  3. भारत निर्वाचन आयोग दसवें अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं का निर्णय करता है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि 52वें संशोधन अधिनियम, 1985 ने दसवें अनुसूची को जोड़ा। कथन 2 भी सही है क्योंकि स्पीकर/अध्यक्ष के पास अयोग्यता के फैसले का विवेकाधिकार होता है। कथन 3 गलत है; चुनाव आयोग अयोग्यता याचिकाओं का निर्णय नहीं करता।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत में राजनीतिक दलबदल के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. दलबदल के कारण तत्काल अयोग्यता Representation of the People Act, 1951 के तहत होती है।
  2. अयोग्यता निर्णय में देरी राजनीतिक अस्थिरता को जन्म देती है।
  3. भारत का भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (CPI) में निम्न स्थान आंशिक रूप से राजनीतिक दलबदल के कारण है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि दलबदल के लिए अयोग्यता दसवें अनुसूची के तहत होती है, न कि Representation of the People Act के तहत। कथन 2 और 3 सही हैं क्योंकि निर्णय में देरी से अस्थिरता बढ़ती है और भारत का CPI में निम्न स्थान आंशिक रूप से शासन की चुनौतियों से जुड़ा है।

मुख्य प्रश्न

भारत में राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में दसवें अनुसूची के तहत दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें। इसके क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करें और सुधार के लिए संस्थागत सुझाव प्रस्तुत करें।

झारखंड और JPSC से प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – भारतीय राजनीति और शासन; दलबदल विरोधी कानून और राज्य राजनीति पर प्रभाव
  • झारखंड संदर्भ: झारखंड में बार-बार राजनीतिक दलबदल से सरकार की स्थिरता प्रभावित हुई है, जिससे दलबदल विरोधी प्रावधान राज्य विधानमंडल की राजनीति में अत्यंत प्रासंगिक हो गए हैं।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड की गठबंधन राजनीति में दलबदल विरोधी कानून की भूमिका और समय पर निर्णय के महत्व को उजागर करते हुए उत्तर तैयार करें।
भारत में दलबदल विरोधी कानून का संवैधानिक आधार क्या है?

दलबदल विरोधी कानून संविधान के अनुच्छेद 102(2) और 191(2) पर आधारित है और इसे 52वें संशोधन अधिनियम, 1985 के जरिए संविधान में दसवें अनुसूची के रूप में जोड़ा गया था।

दसवें अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं का निर्णय कौन करता है?

लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के अध्यक्ष अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में दसवें अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं का निर्णय करते हैं।

दसवें अनुसूची के तहत अयोग्यता के मुख्य कारण क्या हैं?

यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी के निर्देशों के खिलाफ मतदान करता है/मतदान से परहेज करता है बिना पूर्व अनुमति के, तो उसे अयोग्य घोषित किया जाता है।

राजनीतिक दलबदल का आर्थिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है?

दलबदल से सरकार की स्थिरता प्रभावित होती है, जिससे नीति में निरंतरता टूटती है और निवेशकों का भरोसा कम होता है, जिससे GDP वृद्धि धीमी होती है और FDI प्रवाह घटता है।

दलबदल विरोधी कानून के क्रियान्वयन में क्या चुनौतियां हैं?

स्पीकर/अध्यक्ष द्वारा विवेकाधिकार के कारण निर्णय में देरी, पक्षपात के आरोप, प्रक्रियागत कमियां जिन्हें दलबदल करने वाले सदस्यों द्वारा भुनाया जाता है, और स्वतंत्र निर्णय लेने वाली संस्था का अभाव मुख्य चुनौतियां हैं।

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