हिज़्बुल्लाह का फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन तैनाती: संदर्भ और महत्व
2024 की शुरुआत में, लेबनानी शियाई सशस्त्र समूह हिज़्बुल्लाह ने इज़राइल के खिलाफ फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन तैनात करना शुरू किया, जो यूक्रेन युद्ध के अनुभव से परिपक्व हुए हैं। ये ड्रोन 10 किलोमीटर से अधिक दूरी पर न्यूनतम विलंब के साथ रीयल-टाइम उच्च-गुणवत्ता वाली वीडियो संचारित करते हैं, जिससे सटीक निगरानी और निशाना लगाने में मदद मिलती है। यह हिज़्बुल्लाह की असममित युद्ध कौशल में एक बड़ी छलांग है, जो इज़राइल की पारंपरिक वायु रक्षा प्रणालियों जैसे कि आयरन डोम को चुनौती देती है। 2023 में आयरन डोम ने 2,500 से अधिक प्रोजेक्टाइल्स को रोकने में सफलता पाई, लेकिन कम रडार क्रॉस सेक्शन वाले फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन के खिलाफ यह संघर्ष कर रही है। यह तकनीकी नवाचार गैर-राज्यीय समूहों द्वारा राज्यस्तरीय युद्धों में विकसित तकनीकों को अपनाने और सैन्य असमताओं को पूरा करने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: रक्षा और सुरक्षा – असममित युद्ध, सैन्य तकनीकी उन्नति
- GS पेपर 2: अंतरराष्ट्रीय संबंध – प्रॉक्सी युद्ध, हथियार नियंत्रण संधियाँ
- निबंध: उभरती सैन्य तकनीकों का क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रभाव
फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन की तकनीकी विशेषताएं
फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन पारंपरिक UAVs से अलग होते हैं क्योंकि ये कमांड और कंट्रोल के लिए तांबे के बजाय फाइबर-ऑप्टिक केबल से जुड़े होते हैं, जो सुरक्षित और कम विलंब वाला डेटा ट्रांसमिशन सुनिश्चित करता है और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के प्रति प्रतिरोधी होता है। इससे हिज़्बुल्लाह को गुप्त निगरानी और सटीक हमले करने में मदद मिलती है, बिना पकड़े जाने के खतरे के। इन ड्रोन का कम रडार सिग्नेचर और सीमित इलेक्ट्रॉनिक उत्सर्जन इज़राइल की रडार आधारित वायु रक्षा प्रणालियों के लिए इन्हें पकड़ना मुश्किल बना देता है। यूक्रेन संघर्ष ने ड्रोन युद्ध में तेजी से नवाचार को बढ़ावा दिया है, जहां 2023 तक 1,000 से अधिक टैक्टिकल ड्रोन तैनात किए गए, जिनमें से कई वाणिज्यिक घटकों का उपयोग कर फाइबर-ऑप्टिक नियंत्रण के लिए अनुकूलित किए गए थे, और हिज़्बुल्लाह ने इसी मॉडल को अपनाया है।
- 10 किमी से अधिक दूरी पर लगभग शून्य विलंब के साथ रीयल-टाइम HD वीडियो ट्रांसमिशन (The Hindu, 2024)
- कम रडार क्रॉस सेक्शन (RCS) और कम इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर
- फाइबर-ऑप्टिक केबल के कारण इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के प्रति प्रतिरोधी
- इज़राइल के उच्च तकनीक ड्रोन सिस्टम की तुलना में किफायती
आर्थिक पहलू: ड्रोन युद्ध में लागत की असममता
वैश्विक सैन्य ड्रोन बाजार 2023 में 22.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था, और 2030 तक 12.5% की वार्षिक वृद्धि दर की भविष्यवाणी की गई है (SIPRI)। इज़राइल का 2024 का रक्षा बजट लगभग 25 बिलियन अमेरिकी डॉलर है, जिसमें काउंटर-ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण धनराशि आवंटित है। हिज़्बुल्लाह के फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन, जो यूक्रेन में परिष्कृत कम लागत वाली वाणिज्यिक तकनीक का उपयोग करते हैं, युद्ध में आर्थिक असममता का उदाहरण हैं। गैर-राज्यीय समूह महंगे राज्यीय रक्षा ढांचे को चुनौती देने वाली संचालन क्षमताएं हासिल कर लेते हैं, जिससे रणनीति और संसाधन आवंटन में बदलाव आता है।
- वैश्विक ड्रोन बाजार: 22.3 बिलियन USD (2023), CAGR 12.5% (SIPRI)
- इज़राइल का रक्षा बजट: लगभग 25 बिलियन USD (2024), काउंटर-ड्रोन तकनीक पर ध्यान
- हिज़्बुल्लाह के ड्रोन: कम लागत, उच्च प्रभाव वाले असममित हथियार
- वैश्विक काउंटर-ड्रोन बाजार 2027 तक 4.5 बिलियन USD तक पहुंचने का अनुमान (MarketsandMarkets)
ड्रोन युद्ध से जुड़े कानूनी और संवैधानिक ढांचे
भारत के संवैधानिक प्रावधान सीधे हिज़्बुल्लाह या इज़राइल पर लागू नहीं होते, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे प्रासंगिक हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर (1945) के अनुच्छेद 2(4) में संप्रभु राज्यों के खिलाफ बल प्रयोग पर प्रतिबंध है, जो सीमा पार ड्रोन हमलों के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण है। आर्म्स ट्रेड ट्रिटी (ATT) 2013 पारंपरिक हथियारों, जिनमें ड्रोन भी शामिल हैं, के हस्तांतरण को नियंत्रित करती है ताकि अवैध प्रसार रोका जा सके। भारत की डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर (DPP) 2020 स्वदेशी और विदेशी रक्षा तकनीकों की खरीद को नियंत्रित करती है, जिसमें काउंटर-ड्रोन सिस्टम भी शामिल हैं, जो भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की रणनीतिक प्राथमिकता को दर्शाता है।
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर अनुच्छेद 2(4): बल प्रयोग पर प्रतिबंध
- आर्म्स ट्रेड ट्रिटी (2013): पारंपरिक हथियारों के हस्तांतरण का नियमन
- भारत की DPP 2020: रक्षा खरीद के लिए ढांचा, काउंटर-ड्रोन तकनीक सहित
प्रमुख संस्थाएं और उनकी भूमिका
इज़राइल डिफेंस फोर्सेस (IDF) हिज़्बुल्लाह के ड्रोन खतरे का मुकाबला करने के लिए जिम्मेदार हैं, जो आयरन डोम और ड्रोन डोम जैसे सिस्टम का उपयोग करते हैं। हालांकि, फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन का कम रडार सिग्नेचर इन्हें पकड़ना और रोकना कठिन बना देता है। हिज़्बुल्लाह एक गैर-राज्यीय समूह के रूप में प्रॉक्सी युद्धों में परिष्कृत असममित रणनीतियों का उपयोग करता है। SIPRI वैश्विक हथियार प्रवृत्तियों और ड्रोन प्रसार पर महत्वपूर्ण डेटा प्रदान करता है। भारत का DRDO और भारतीय वायु सेना (IAF) स्वदेशी काउंटर-ड्रोन तकनीकों के विकास में सक्रिय हैं और 2023-24 में इस दिशा में 3,500 करोड़ रुपये का निवेश कर रहे हैं।
- IDF: काउंटर-ड्रोन संचालन, वायु रक्षा
- हिज़्बुल्लाह: गैर-राज्यीय असममित युद्ध समूह
- SIPRI: वैश्विक हथियार और ड्रोन डेटा एवं विश्लेषण
- DRDO और IAF: स्वदेशी काउंटर-ड्रोन विकास और रणनीतिक तैयारी
तुलनात्मक विश्लेषण: इज़राइल बनाम हिज़्बुल्लाह ड्रोन क्षमताएं
| पहलू | इज़राइल | हिज़्बुल्लाह |
|---|---|---|
| ड्रोन प्रकार | उच्च तकनीक UAVs, लंबी दूरी, महंगे | फाइबर-ऑप्टिक टेथर्ड ड्रोन, कम लागत, कम RCS |
| नियंत्रण और संचार | रेडियो फ्रीक्वेंसी, सैटेलाइट लिंक | फाइबर-ऑप्टिक टेथर, जैमिंग प्रतिरोधी |
| पता लगाना और रोकथाम | उन्नत रडार, आयरन डोम, ड्रोन डोम | कम रडार सिग्नेचर, पकड़ना मुश्किल |
| संचालन उपयोग | पारंपरिक और असममित युद्ध | असममित युद्ध, प्रॉक्सी युद्ध अनुकूलन |
| लागत | उच्च बजट, महंगे सिस्टम | कम लागत, वाणिज्यिक घटकों से बने |
नीति में कमियां और रणनीतिक चुनौतियां
मौजूदा वायु रक्षा ढांचे में बैलिस्टिक और पारंपरिक हवाई खतरों को प्राथमिकता दी गई है, जबकि फाइबर-ऑप्टिक और कम RCS वाले ड्रोन की पहचान के लिए समेकन नहीं है। इससे हिज़्बुल्लाह जैसे समूहों द्वारा तैनात नए असममित ड्रोन तकनीकों के प्रति कमजोरी पैदा होती है। इज़राइल को अपनी वायु रक्षा प्रणाली को मल्टी-सेंसर फ्यूजन तकनीकों जैसे इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल, इन्फ्रारेड और टेथर्ड ड्रोन डिटेक्शन शामिल करके पुनः समायोजित करना होगा। भारत के लिए भी इन तकनीकों को अपनाकर काउंटर-ड्रोन रणनीतियों को मजबूत करना जरूरी है क्योंकि उसके रणनीतिक माहौल में समान असममित खतरे मौजूद हैं।
- मौजूदा प्रणालियों में फाइबर-ऑप्टिक टेथर्ड ड्रोन की पहचान सीमित
- रडार-केंद्रित ढांचे से आगे मल्टी-सेंसर एकीकरण की जरूरत
- काउंटर-ड्रोन तकनीकों में स्वदेशी R&D का महत्व (DRDO के 3,500 करोड़ रुपये आवंटन)
- प्रॉक्सी युद्ध और हाइब्रिड खतरों से निपटने के लिए रणनीतिक पुनर्संतुलन
आगे का रास्ता: रणनीतिक और तकनीकी आवश्यकताएं
- कम RCS और टेथर्ड ड्रोन की पहचान के लिए मल्टी-स्पेक्ट्रल सेंसर क्षमताओं को बढ़ाना
- ड्रोन कमांड और कंट्रोल लिंक को निशाना बनाने वाली इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और साइबर काउंटरमेजर्स में निवेश
- उन्नत ड्रोन तकनीकों के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय हथियार नियंत्रण ढांचे को मजबूत करना
- यूक्रेन और इज़राइल के अनुभवों से सीख लेकर किफायती स्वदेशी काउंटर-ड्रोन सिस्टम का विकास बढ़ावा देना
- हाइब्रिड खतरों से मुकाबले के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच खुफिया साझेदारी और संयुक्त अभ्यास
हिज़्बुल्लाह के फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- वे रेडियो फ्रीक्वेंसी संचार लिंक का उपयोग करते हैं जो जैमिंग के प्रति संवेदनशील हैं।
- उनका रडार क्रॉस-सेक्शन कम होता है जिससे उन्हें पकड़ना मुश्किल होता है।
- वे एक टेथर्ड फाइबर-ऑप्टिक केबल के माध्यम से रीयल-टाइम वीडियो डेटा ट्रांसमिट करते हैं।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन रेडियो फ्रीक्वेंसी लिंक का उपयोग नहीं करते, बल्कि टेथर्ड फाइबर-ऑप्टिक केबल का उपयोग करते हैं, जो जैमिंग के प्रति प्रतिरोधी है। कथन 2 और 3 सही हैं क्योंकि ये ड्रोन कम रडार सिग्नेचर वाले होते हैं और फाइबर-ऑप्टिक टेथर के जरिए डेटा ट्रांसमिट करते हैं।
ड्रोन युद्ध से संबंधित अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचों के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर अनुच्छेद 2(4) संप्रभु राज्यों के खिलाफ बल प्रयोग पर प्रतिबंध लगाता है।
- आर्म्स ट्रेड ट्रिटी पारंपरिक हथियारों सहित ड्रोन के हस्तांतरण को नियंत्रित करती है।
- भारत की डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर 2020 केवल स्वदेशी रक्षा तकनीकों के उपयोग को अनिवार्य करती है।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर: (a)
कथन 3 गलत है क्योंकि भारत की DPP 2020 केवल स्वदेशी तकनीकों को अनिवार्य नहीं करती बल्कि स्वदेशी विकास को प्रोत्साहित करते हुए विदेशी खरीद को भी अनुमति देती है। कथन 1 और 2 सही हैं।
मुख्य प्रश्न
यूक्रेन संघर्ष के दौरान विकसित हिज़्बुल्लाह के फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन इज़राइल की पारंपरिक वायु रक्षा प्रणालियों को किस प्रकार चुनौती देते हैं, इसका विश्लेषण करें और भारत की रणनीतिक तैयारी पर इसके प्रभावों पर चर्चा करें। (250 शब्द)
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 (अंतरराष्ट्रीय संबंध और सुरक्षा)
- झारखंड दृष्टिकोण: झारखंड का बढ़ता औद्योगिक और आईटी क्षेत्र DRDO पहलों के तहत काउंटर-ड्रोन तकनीकों के स्वदेशी विकास में योगदान कर सकता है।
- मुख्य बिंदु: भारत की रणनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्थानीय उद्योग की मदद से किफायती काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित करने पर केंद्रित उत्तर तैयार करें, वैश्विक असममित युद्ध प्रवृत्तियों के संदर्भ में।
फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन क्या होते हैं और वे पारंपरिक UAVs से कैसे अलग हैं?
फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन कमांड और कंट्रोल के लिए टेथर्ड फाइबर-ऑप्टिक केबल का उपयोग करते हैं, जो सुरक्षित और कम विलंब वाला डेटा ट्रांसमिशन सुनिश्चित करता है और जैमिंग के प्रति प्रतिरोधी होता है। पारंपरिक UAVs रेडियो फ्रीक्वेंसी संचार पर निर्भर होते हैं, जबकि ये ड्रोन कम रडार सिग्नेचर वाले और पकड़ने में कठिन होते हैं।
यूक्रेन युद्ध ने ड्रोन युद्ध तकनीक को कैसे प्रभावित किया?
यूक्रेन संघर्ष ने ड्रोन युद्ध में तेजी से नवाचार को बढ़ावा दिया है, जहां 2023 तक 1,000 से अधिक टैक्टिकल ड्रोन तैनात किए गए। इसने वाणिज्यिक ड्रोन को फाइबर-ऑप्टिक नियंत्रण के लिए अनुकूलित करने को लोकप्रिय बनाया, जिससे किफायती और स्केलेबल ड्रोन संचालन संभव हुआ, जिसे हिज़्बुल्लाह जैसे समूहों ने अपनाया।
ड्रोन युद्ध में उपयोग और हस्तांतरण को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे क्या हैं?
संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) राज्यों के खिलाफ बल प्रयोग को रोकता है। आर्म्स ट्रेड ट्रिटी (2013) पारंपरिक हथियारों सहित ड्रोन के अवैध प्रसार को रोकने के लिए उनके हस्तांतरण को नियंत्रित करती है। भारत की डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर 2020 काउंटर-ड्रोन सिस्टम सहित रक्षा तकनीकों की खरीद को नियंत्रित करती है।
फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन इज़राइल की वायु रक्षा के लिए चुनौती क्यों हैं?
फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन का कम रडार क्रॉस सेक्शन होता है और ये टेथर्ड फाइबर-ऑप्टिक केबल के जरिए संचार करते हैं, जिससे ये इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के प्रति प्रतिरोधी होते हैं और आयरन डोम जैसे रडार आधारित सिस्टम के लिए पकड़ना मुश्किल हो जाता है, जिससे इन्हें रोकना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
भारत ने असममित ड्रोन खतरों का मुकाबला करने के लिए क्या कदम उठाए हैं?
भारत ने 2023-24 में DRDO के तहत स्वदेशी ड्रोन और काउंटर-ड्रोन विकास के लिए 3,500 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। भारतीय वायु सेना कम RCS और टेथर्ड ड्रोन खतरों से निपटने के लिए मल्टी-सेंसर डिटेक्शन और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को अपनाकर अपनी रणनीतियों को अनुकूलित कर रही है।