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परिचय: रॉकेट पुनः प्रवेश और वायुमंडलीय रसायन विज्ञान में बदलाव

हाल ही में Geophysical Research Letters (2024) में प्रकाशित एक शोध में बताया गया है कि Falcon 9 रॉकेट के पुनः प्रवेश के कारण मेसोस्फीयर और लोअर थर्मोस्फीयर (MLT) क्षेत्र में लिथियम परमाणुओं की मात्रा दस गुना बढ़ गई है। रॉकेट और उपग्रह, जो मुख्यत: एल्यूमिनियम मिश्र धातु और लिथियम-आयन बैटरियों से बने होते हैं, पुनः प्रवेश के दौरान अपने धातु प्रदूषकों को छोड़ते हैं क्योंकि ये सामग्री जलकर वाष्पित हो जाती हैं। यह प्रक्रिया ऊपरी वायुमंडल की रासायनिक संरचना को गहरा प्रभावित करती है, जो पहले शुद्ध मानी जाती थी। इससे पर्यावरणीय चिंताएं बढ़ रही हैं, जबकि मौजूदा कानूनी और नियामक ढांचे इन मुद्दों को ठीक से संबोधित नहीं कर पा रहे हैं।

वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, जिसका मूल्य 2021 में लगभग 469 अरब अमेरिकी डॉलर था (Bryce Space and Technology), 2010 से 2020 के बीच रॉकेट लॉन्च में 60% की वृद्धि देखी गई है (Space Foundation Report, 2021), जिससे वायुमंडलीय प्रदूषण का स्तर बढ़ा है। यह नया प्रदूषण स्रोत तत्काल नीति ध्यान देने का विषय है क्योंकि इसका प्रभाव वायुमंडलीय संरचना, जलवायु और अंतरिक्ष स्थिरता पर पड़ सकता है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: विज्ञान और तकनीक – पर्यावरण प्रदूषण, अंतरिक्ष तकनीक और उसके पारिस्थितिक प्रभाव
  • GS पेपर 3: पर्यावरण – वायु प्रदूषण, अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कानून
  • निबंध: अंतरिक्ष गतिविधियों से उभरती पर्यावरणीय चुनौतियां

रॉकेट पुनः प्रवेश से वायुमंडलीय प्रदूषण के कारण

रॉकेट और उपग्रहों में एल्यूमिनियम मिश्र धातु और लिथियम-आयन बैटरियां होती हैं। पुनः प्रवेश के दौरान, वायुगतिकीय गर्मी के कारण ये सामग्री जलकर धातु परमाणु और यौगिकों को सीधे MLT क्षेत्र (लगभग 50-110 किमी ऊंचाई) में छोड़ती हैं। ये धातुएं इस वायुमंडलीय परत में प्राकृतिक रूप से कम पाई जाती हैं, जहां प्राकृतिक स्रोत जैसे कॉस्मिक डस्ट रोजाना लगभग 80 ग्राम लिथियम ही प्रदान करते हैं (Journal of Atmospheric Chemistry, 2024)।

  • धातु प्रदूषक में लिथियम, एल्यूमिनियम और अन्य मिश्र धातु तत्व शामिल हैं।
  • ये धातुएं रासायनिक प्रतिक्रियाओं को उत्प्रेरित कर ओजोन अणुओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
  • धातु कण विकिरण संतुलन को बदलते हैं, जिससे गर्मी का संचय और जलवायु प्रभावित हो सकती है।
  • अंतरिक्ष मलबा, जो 18,000 मील प्रति घंटे की गति से चलता है (NASA Orbital Debris Program Office), पुनः प्रवेश के दौरान टकराव के जोखिम बढ़ाता है और प्रदूषकों के फैलाव को बढ़ाता है।

पर्यावरणीय और जलवायु संबंधी चिंताएं

ऊपरी वायुमंडल में कृत्रिम धातुओं का प्रवेश प्राकृतिक रासायनिक चक्रों को बाधित करता है। लिथियम और एल्यूमिनियम कण ओजोन परत को कमजोर कर सकते हैं, जो पृथ्वी को हानिकारक पराबैंगनी विकिरण से बचाती है। ओजोन की मात्रा में बदलाव सतह पर UV स्तर और जलवायु प्रणालियों को प्रभावित करता है।

  • केस्लर सिंड्रोम: अंतरिक्ष मलबे के टकराव की एक श्रृंखला मलबे की मात्रा को तेजी से बढ़ाती है, जिससे पुनः प्रवेश की घटनाएं और प्रदूषण जारी होता है (NASA Technical Report, 2023)।
  • धातु प्रदूषण मेसोस्फीयर के विकिरण गुणों को बदलता है, जो वायुमंडलीय तापमान प्रोफाइल और जलवायु परिवर्तन में योगदान कर सकता है।
  • वायुमंडलीय धातु की बढ़ी हुई मात्रा आयनोस्फीयर की चालकता को प्रभावित कर सकती है, जिससे रेडियो संचार और उपग्रह संचालन पर असर पड़ता है।

कानूनी और नियामक ढांचे: राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कमियां

भारत का Environment (Protection) Act, 1986 के सेक्शन 3 के तहत केंद्र सरकार पर्यावरण प्रदूषण, जिसमें वायुमंडलीय प्रदूषण भी शामिल है, के खिलाफ कदम उठा सकती है। लेकिन Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981 मुख्य रूप से जमीन पर वायु गुणवत्ता पर केंद्रित है और ऊपरी वायुमंडलीय प्रदूषण के लिए प्रावधान नहीं रखता।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, Outer Space Treaty, 1967 शांति पूर्ण अंतरिक्ष उपयोग का निर्देश देता है, लेकिन रॉकेट पुनः प्रवेश से होने वाले वायुमंडलीय प्रदूषण को नियंत्रित नहीं करता। इसी तरह, Space Liability Convention, 1972 अंतरिक्ष वस्तुओं से होने वाले नुकसान को संबोधित करता है, लेकिन पुनः प्रवेश के दौरान रासायनिक प्रदूषण पर नहीं। भारत के पास फिलहाल अंतरिक्ष गतिविधियों से वायुमंडलीय प्रदूषण को नियंत्रित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं है।

  • सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) ज़मीन पर वायु गुणवत्ता की निगरानी करता है, लेकिन मेसोस्फीयर प्रदूषण के लिए इसका कोई अधिकार नहीं है।
  • संयुक्त राष्ट्र के Outer Space Affairs कार्यालय (UNOOSA) अंतरिक्ष कानून देखता है, लेकिन वायुमंडलीय रासायनिक प्रदूषण पर लागू नियम नहीं रखता।
  • यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA) ने कड़ा मलबा नियंत्रण नियम अपनाए हैं, लेकिन पुनः प्रवेश से रासायनिक उत्सर्जन को सीधे नियंत्रित नहीं करती।

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA)

पहलूभारत (ISRO & CPCB)ESA (यूरोपीय स्पेस एजेंसी)
वायुमंडलीय प्रदूषण के लिए नियामक ढांचारॉकेट पुनः प्रवेश से ऊपरी वायुमंडलीय रासायनिक प्रदूषण के लिए कोई विशिष्ट कानून नहींमलबा नियंत्रण नियम लागू करता है, जिसमें अनिवार्य डि-ऑर्बिटिंग और सामग्री प्रतिबंध शामिल हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से प्रदूषण कम करते हैं
अंतरिक्ष मलबा प्रबंधनकक्षा मलबे पर ध्यान केंद्रित, रासायनिक प्रदूषण पर व्यापक नीति नहींमलबा निगरानी कार्यालय सक्रिय; पांच वर्षों में मलबा उत्पादन में 15% कमी (ESA रिपोर्ट, 2023)
पर्यावरण निगरानीCPCB ज़मीन स्तर की वायु गुणवत्ता की निगरानी करता है; ऊपरी वायुमंडल की निगरानी नहींअंतरिक्ष गतिविधियों के कारण वायुमंडलीय रसायन में बदलाव पर समर्पित शोध
अंतरराष्ट्रीय संधि अनुपालनOuter Space Treaty और Space Liability Convention के हस्ताक्षरकर्ता; वायुमंडलीय प्रदूषण के लिए घरेलू कानून नहींअंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष पर्यावरण शासन में सक्रिय; कड़े नियमों का समर्थन करता है

रॉकेट पुनः प्रवेश प्रदूषण के आर्थिक प्रभाव

वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के तेजी से विस्तार के कारण रॉकेट लॉन्च की संख्या बढ़ रही है, जिससे वायुमंडलीय उत्सर्जन में वृद्धि हो रही है। ऊपरी वायुमंडलीय प्रदूषण को कम करने की लागत अभी तक मापी नहीं गई है, लेकिन संभावित आर्थिक प्रभावों में शामिल हैं:

  • प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों की आवश्यकता के कारण मिशन लागत में वृद्धि।
  • अंतरिक्ष मलबा टकराव से उपग्रह विफलता और सेवा में बाधाएं, जिनका वार्षिक नुकसान अरबों डॉलर में आंका गया है (NASA अनुमान)।
  • जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभाव, जो कृषि और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर आर्थिक बोझ बढ़ाते हैं।

नीति और शासन की चुनौतियां

वर्तमान अंतरिक्ष शासन में कक्षा मलबा प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि रॉकेट पुनः प्रवेश से होने वाले वायुमंडलीय रासायनिक प्रदूषण के लिए कोई ठोस नियम नहीं हैं। अंतरिक्ष एजेंसियों (ISRO, NASA, ESA) और पर्यावरण नियामकों (CPCB) के बीच समन्वय सीमित है।

  • रॉकेट लॉन्च और पुनः प्रवेश के लिए कोई विशिष्ट उत्सर्जन मानक नहीं।
  • मेसोस्फीयर रसायन में बदलाव की निगरानी के लिए सीमित अवसंरचना।
  • अंतरराष्ट्रीय संधियों में पुनः प्रवेश के दौरान रासायनिक प्रदूषण के लिए लागू नियमों की कमी।

आगे का रास्ता: रॉकेट पुनः प्रवेश से वायुमंडलीय प्रदूषण का समाधान

  • Environment (Protection) Act के तहत राष्ट्रीय कानून बनाएं जो अंतरिक्ष गतिविधियों से ऊपरी वायुमंडलीय प्रदूषण को नियंत्रित करे।
  • ISRO, CPCB और पर्यावरण मंत्रालय के बीच समन्वित नियामक ढांचा तैयार करें जिसमें अंतरिक्ष मलबा और वायुमंडलीय प्रदूषण दोनों का प्रबंधन हो।
  • MLT क्षेत्र के प्रदूषकों पर केंद्रित वायुमंडलीय निगरानी क्षमताओं को बढ़ाएं।
  • ESA के सर्वोत्तम अंतरराष्ट्रीय अभ्यास अपनाएं, जैसे अनिवार्य डि-ऑर्बिटिंग और पर्यावरण के अनुकूल रॉकेट सामग्री का उपयोग।
  • Outer Space Treaty के प्रावधानों को अपडेट करने के लिए अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में सक्रिय भागीदारी करें ताकि वायुमंडलीय रासायनिक प्रदूषण को शामिल किया जा सके।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
रॉकेट पुनः प्रवेश से वायुमंडलीय प्रदूषण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. रॉकेट पुनः प्रवेश मेसोस्फीयर और लोअर थर्मोस्फीयर में लिथियम जैसी धातुएं छोड़ता है।
  2. Outer Space Treaty, 1967, अंतरिक्ष गतिविधियों से होने वाले वायुमंडलीय प्रदूषण को स्पष्ट रूप से नियंत्रित करता है।
  3. प्राकृतिक अंतरिक्ष धूल रॉकेट पुनः प्रवेश की तुलना में रोजाना अधिक लिथियम वायुमंडल में पहुंचाती है।
  • aकेवल 1
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि रॉकेट पुनः प्रवेश मेसोस्फीयर-थर्मोस्फीयर क्षेत्र में लिथियम जैसी धातुएं छोड़ता है (Geophysical Research Letters, 2024)। कथन 2 गलत है क्योंकि Outer Space Treaty पुनः प्रवेश से वायुमंडलीय प्रदूषण को नियंत्रित नहीं करता। कथन 3 भी गलत है; प्राकृतिक अंतरिक्ष धूल रोजाना लगभग 80 ग्राम लिथियम प्रदान करती है, जो रॉकेट पुनः प्रवेश की तुलना में कम है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
केस्लर सिंड्रोम के संबंध में निम्नलिखित पर विचार करें:
  1. यह अंतरिक्ष मलबे के टकरावों की एक श्रृंखला की भविष्यवाणी करता है, जो मलबे की मात्रा को तेजी से बढ़ाता है।
  2. यह सीधे निचले वायुमंडल में रासायनिक प्रदूषण का कारण बनता है।
  3. यह दशकों तक निचली पृथ्वी कक्षा को अनुपयोगी बना सकता है।
  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 1 और 3
  • cकेवल 2 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (b)
कथन 1 और 3 सही हैं (NASA Technical Report, 2023)। कथन 2 गलत है क्योंकि केस्लर सिंड्रोम भौतिक मलबे के टकराव से संबंधित है, न कि सीधे रासायनिक प्रदूषण से।

मेन प्रश्न

रॉकेट पुनः प्रवेश के ऊपरी वायुमंडल पर पर्यावरणीय प्रभावों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें और वर्तमान राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय नियामक ढांचे की इन चुनौतियों से निपटने की क्षमता का मूल्यांकन करें। अंतरिक्ष गतिविधियों से होने वाले वायुमंडलीय प्रदूषण को कम करने के उपाय सुझाएं। (250 शब्द)

झारखंड एवं JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 3 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी, विज्ञान और तकनीक
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में एयरोस्पेस अनुसंधान एवं विकास संस्थान और निर्माण इकाइयां हैं, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में योगदान देती हैं; रॉकेट लॉन्च और मलबा पुनः प्रवेश के पर्यावरणीय प्रभाव क्षेत्रीय वायु गुणवत्ता और जलवायु पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं।
  • मेन पॉइंटर: भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं, पर्यावरण कानूनों और राज्य स्तर पर निगरानी व नीति समन्वय की आवश्यकता को उजागर करते हुए उत्तर तैयार करें।
रॉकेट पुनः प्रवेश वायुमंडलीय प्रदूषण में कैसे योगदान देता है?

रॉकेट पुनः प्रवेश के दौरान वायुगतिकीय गर्मी से एल्यूमिनियम मिश्र धातु और लिथियम जैसे धातु तत्व मेसोस्फीयर और लोअर थर्मोस्फीयर में छोड़ दिए जाते हैं। ये धातुएं वायुमंडलीय रसायन को बदलती हैं, जिससे ओजोन कमजोर हो सकता है और जलवायु प्रभावित होती है।

केस्लर सिंड्रोम क्या है और इसका अंतरिक्ष प्रदूषण से क्या संबंध है?

केस्लर सिंड्रोम वह स्थिति है जिसमें अंतरिक्ष मलबे के टकरावों से मलबे की मात्रा तेजी से बढ़ जाती है, जिससे टकराव जोखिम और पुनः प्रवेश की घटनाएं बढ़ती हैं। यह वायुमंडलीय प्रदूषण को बढ़ाता है और उपग्रह संचालन को खतरे में डालता है।

क्या Outer Space Treaty रॉकेट पुनः प्रवेश से होने वाले वायुमंडलीय प्रदूषण को नियंत्रित करता है?

नहीं। Outer Space Treaty (1967) अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग का निर्देश देता है, लेकिन रॉकेट पुनः प्रवेश से वायुमंडलीय रासायनिक प्रदूषण को नियंत्रित करने वाले प्रावधान इसमें नहीं हैं।

रॉकेट पुनः प्रवेश के दौरान कौन-कौन सी मुख्य धातुएं उत्सर्जित होती हैं?

मुख्य धातुएं एल्यूमिनियम मिश्र धातु और लिथियम होती हैं, जो लिथियम-आयन बैटरियों से आती हैं और ऊपरी वायुमंडलीय रासायनिक प्रदूषण में योगदान करती हैं।

भारत वर्तमान में अंतरिक्ष गतिविधियों से वायुमंडलीय प्रदूषण को कैसे नियंत्रित करता है?

भारत के मौजूदा कानून जैसे Environment (Protection) Act, 1986 और Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981 रॉकेट पुनः प्रवेश से ऊपरी वायुमंडलीय प्रदूषण को विशेष रूप से नियंत्रित नहीं करते। इस विषय पर कोई समर्पित अंतरिक्ष कानून अभी तक नहीं बना है।

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