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छोटानागपुर पठार: आदिवासियों के प्रारंभिक निवास

छोटानागपुर में प्रारंभिक जनजातीय बस्तियों की नृजातीय-ऐतिहासिक गतिशीलता: सामाजिक-राजनीतिक विकास और संसाधन अंतर-निर्भरता का परीक्षण

छोटानागपुर पठार एक विशिष्ट नृजातीय-भौगोलिक इकाई है, जिसकी पहचान इसकी जटिल स्थलाकृति, समृद्ध खनिज संसाधनों और स्वदेशी बस्तियों के गहरे इतिहास से होती है। यह क्षेत्र स्वदेशी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं की नृजातीय-ऐतिहासिक यात्रा का अध्ययन करने के लिए एक अनूठा दृष्टिकोण प्रदान करता है, जिसमें भू-पारिस्थितिक निर्धारकों, प्रवासन पैटर्न और विकसित होती संसाधन-प्रबंधन रणनीतियों के अंतर्संबंध पर जोर दिया गया है। यहां की प्रारंभिक जनजातीय बस्तियां स्थिर नहीं थीं, बल्कि अनुकूलन, समेकन और विशिष्ट पारंपरिक शासन संरचनाओं के क्रमिक उद्भव की गतिशील प्रक्रियाओं का प्रतिनिधित्व करती थीं, जो इंडो-गंगा के मैदानी इलाकों में विकसित हो रही बड़ी राज्य संरचनाओं से काफी हद तक स्वतंत्र थीं। यहां का वैचारिक ढाँचा महत्वपूर्ण बाहरी राजनीतिक-आर्थिक हस्तक्षेपों से पहले इन स्वशासी जनजातीय राजव्यवस्थाओं और उनकी विशिष्ट सामुदायिक संसाधन प्रबंधन प्रणालियों (जैसे, Khuntkatti) के विकास को समझने पर केंद्रित है। छोटानागपुर में प्रारंभिक बस्तियों का अध्ययन आधुनिक झारखंड के स्थायी सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। यह जनजातीय पहचान की लचीलेपन, भूमि के साथ उनके जटिल संबंध और भूमि अधिकारों, स्वायत्तता तथा सांस्कृतिक संरक्षण से संबंधित कई समकालीन मुद्दों के लिए ऐतिहासिक मिसालों को रेखांकित करता है। यह ऐतिहासिक समझ जनजातीय कल्याण और एकीकरण से संबंधित नीति-निर्माण और न्यायिक घोषणाओं के लिए आधारभूत है, जो स्वदेशी और मुख्यधारा की सामाजिक संगठन के बीच गहरे संरचनात्मक अंतरों को उजागर करती है, जिनके कारण अक्सर संघर्ष हुए हैं।

UPSC और JPSC प्रासंगिकता का स्नैपशॉट

  • GS-I (UPSC Civil Services): भारतीय विरासत और संस्कृति (भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएं, जनजातीय समुदाय, प्रागैतिहासिक शैल कला/स्थल), भारत का इतिहास (प्रागैतिहासिक से प्रारंभिक ऐतिहासिक काल, प्रवासन पैटर्न), भूगोल (भारत का भौतिक भूगोल, संसाधनों का वितरण, मानव भूगोल)।
  • JPSC Paper-III (झारखंड का इतिहास, संस्कृति और विरासत): झारखंड का प्रागितिहास, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास, जनजातीय आंदोलन, झारखंड में भूमि सुधार, पारंपरिक शासन प्रणालियाँ।
  • JPSC Paper-IV (भारतीय अर्थव्यवस्था, झारखंड अर्थव्यवस्था और सतत विकास): भूमि उपयोग पैटर्न, वन अधिकार, स्वदेशी संसाधन प्रबंधन।
  • Essay (UPSC और JPSC): जनजातीय अधिकारों, सतत विकास, सांस्कृतिक संरक्षण, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, ऐतिहासिक अन्याय से संबंधित विषय।

प्रारंभिक बस्तियों का संस्थागत और सामाजिक-राजनीतिक ढाँचा

छोटानागपुर में प्रारंभिक जनजातीय समाजों ने शासन, संसाधन आवंटन और संघर्ष समाधान के लिए परिष्कृत, यद्यपि गैर-राज्य, संस्थागत ढाँचे विकसित किए। ये प्रणालियाँ उनकी सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं से आंतरिक रूप से जुड़ी हुई थीं, जो मुख्य रूप से स्थानांतरण कृषि (कुरुवा), स्थायी कृषि और वन-आधारित आजीविका के इर्द-गिर्द घूमती थीं। केंद्रीकृत राजशाही प्रणालियों के विपरीत, ये संरचनाएँ काफी हद तक विकेंद्रीकृत और लोकतांत्रिक थीं, जो पारंपरिक कानूनों और सामूहिक निर्णय लेने पर आधारित थीं, जो सामुदायिक भूमि कार्यकाल और पारंपरिक न्याय प्रणालियों के प्रति गहरी निष्ठा को दर्शाती थीं। पुरातात्विक व्याख्याएँ और नृजातीय-ऐतिहासिक विवरण इन प्रारंभिक संस्थागत व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।

  • प्रारंभिक प्रवासन लहरें:
    • प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉइड: इन्हें सबसे प्रारंभिक निवासी माना जाता है, जिनका प्रतिनिधित्व मुंडा, संथाल, हो, खड़िया, बिरहोर जैसे भाषाई समूह करते हैं। उनका आगमन प्रारंभिक पाषाण उपकरण संस्कृतियों से जुड़ा है।
    • द्रविड़: बाद की लहरें, जिनमें उरांव (कुरुख भाषी) जैसे समूह शामिल थे, जो दक्कन के पठार से आए थे, और नई कृषि पद्धतियों तथा सामाजिक संरचनाओं का परिचय दिया।
    • आर्य प्रभाव: सीमित प्रत्यक्ष बसावट, लेकिन सांस्कृतिक और भाषाई आदान-प्रदान परिधि पर हुआ, मुख्य रूप से इतिहास में बाद में।
  • पारंपरिक शासन का उद्भव:
    • मुंडा प्रणाली (मुंडा-मानकी-पाहन): Khuntkatti भूमि कार्यकाल प्रणाली में निहित, जहाँ भूमि को Khuntkattidars (मूल भूमि साफ करने वालों के वंशज) द्वारा साफ और बसाया गया था। मुंडा ग्राम प्रधान था, मानकी कई गाँवों (Parha) के समूह का मुखिया था, और पाहन धार्मिक प्रमुख था।
    • उरांव प्रणाली (Parha Panchayat): मुंडा प्रणाली के समान, लेकिन भिन्नताओं के साथ। Parha गाँवों का एक संघ था, जिसमें प्रत्येक का अपना Mahto (ग्राम प्रधान) और Pahan होता था। Parha Raja ग्राम प्रधानों की परिषद की अध्यक्षता करता था।
    • हो प्रणाली (मुंडा-मानकी): मजबूत सामुदायिक स्वामित्व और स्वशासन, जिसमें मानकी कई गाँवों के समूह में एक केंद्रीय व्यक्ति होता था, जो निर्णय लेने की प्रक्रिया की अध्यक्षता करता था।
  • भूमि कार्यकाल प्रणालियाँ:
    • Khuntkatti प्रणाली: सबसे महत्वपूर्ण स्वदेशी भूमि कार्यकाल, जो मुंडा और हो जनजातियों में प्रचलित थी। भूमि को Khuntkattidars द्वारा साफ किया जाता था और व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि विस्तृत परिवार द्वारा सामूहिक रूप से धारित किया जाता था। यह प्रणाली उनके अस्तित्व की आर्थिक और सामाजिक रीढ़ थी।
    • भुइंहरी भूमि: उरांव और मुंडा जनजातियों के लिए विशिष्ट, ये भूमियाँ भी मूल बसने वालों या उनके वंशजों द्वारा सामूहिक रूप से स्वामित्व में थीं।
  • संसाधन प्रबंधन:
    • वन-आधारित आजीविका: भोजन, औषधि, निर्माण सामग्री और आध्यात्मिक प्रथाओं के लिए वनों पर गहरी निर्भरता। पारंपरिक कानून वन उपयोग और संरक्षण को विनियमित करते थे।
    • स्थानांतरण कृषि (कुरुवा): वन-आच्छादित ऊपरी इलाकों में प्रारंभिक कृषि पद्धति, जो धीरे-धीरे अधिक उपजाऊ नदी घाटियों में स्थायी कृषि को रास्ता दे रही थी।
    • जल प्रबंधन: स्वदेशी सिंचाई तकनीकें और सामान्य जल स्रोतों (जैसे, तालाब, कुएँ) का प्रबंधन।

छोटानागपुर की प्रारंभिक बस्तियों में प्रमुख मुद्दे और विकासवादी मार्ग

जनजातीय बस्तियों का प्रारंभिक काल ऊबड़-खाबड़ पठारी वातावरण के प्रति निरंतर अनुकूलन और स्थिर सामाजिक-आर्थिक प्रणालियों के क्रमिक विकास से चिह्नित था। ये विकास अक्सर आंतरिक गतिशीलता और बाहरी समूहों के साथ प्रारंभिक बातचीत से प्रभावित होते थे, जिससे छोटानागपुर के स्वदेशी समाजों का अनूठा चरित्र आकार लेता था।

I. सामाजिक-पारिस्थितिक अनुकूलन और जनसांख्यिकीय बदलाव

  • भौगोलिक नियतिवाद: छोटानागपुर का पहाड़ी और वन-आच्छादित भूभाग ऐतिहासिक रूप से एक प्राकृतिक बाधा के रूप में कार्य करता था, जो मैदानी राज्यों से बड़े पैमाने पर घुसपैठ को रोककर जनजातीय स्वायत्तता को बनाए रखता था। इसने अद्वितीय सांस्कृतिक रूपों को पनपने दिया।
  • निर्वाह विकास: खानाबदोश शिकार-संग्रह (जैसे, बिरहोर) से स्थानांतरण कृषि, और अंततः स्थायी कृषि की ओर संक्रमण, जिसने जनसंख्या घनत्व और बसावट पैटर्न को प्रभावित किया। बरकागाँव और इस्को (हजारीबाग जिला) जैसे स्थलों से पुरातात्विक निष्कर्ष प्रारंभिक मानव उपस्थिति और अनुकूलन का संकेत देते हैं।
  • जनसंख्या समेकन: मुंडा और उरांव जैसे प्रवासी समूहों ने बसने के बाद, वन साफ करके और ग्राम समूह स्थापित करके अपनी उपस्थिति को मजबूत किया, जिससे उनकी पारंपरिक भूमि प्रणालियों की नींव पड़ी।

II. पूर्व-राज्य राजव्यवस्थाओं का गठन और अंतर-जनजातीय गतिशीलता

  • परहा/पीर प्रणाली का उद्भव: गाँवों के ये संघ (जैसे, मुंडाओं, उरांवों के बीच) विकेंद्रीकृत शासन का एक उन्नत रूप थे, जो विवाद समाधान, सामूहिक रक्षा और संसाधन साझाकरण के लिए तंत्र प्रदान करते थे।
  • मुंडा साम्राज्य (नागवंशी राजवंश): यद्यपि इसे अक्सर ‘राज्य’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, प्रारंभिक नागवंशी शासन, विशेष रूप से फणी मुकुट राय के अधीन, संभवतः जनजातीय सरदारों का एक संघ था, जिसने शुरू में Khuntkatti प्रणाली को बनाए रखा। नागवंशी शासकों ने, जो परंपरा के अनुसार स्वयं मुंडा मूल के थे, धीरे-धीरे एक केंद्रीकृत राज्य संरचना के तत्वों को अपनाया, फिर भी उनकी शक्ति जनजातीय सरदारों के समर्थन पर काफी हद तक निर्भर थी।
  • प्रारंभिक अंतर-जनजातीय संबंध: यद्यपि काफी हद तक आत्मनिर्भर थे, विभिन्न जनजातीय समूहों के बीच बातचीत और कभी-कभी संघर्ष होते थे, अक्सर संसाधन पहुंच या क्षेत्र को लेकर, जिससे जटिल गठबंधन और प्रतिद्वंद्विताएँ पैदा होती थीं।

III. प्रारंभिक बाहरी संपर्क और सांस्कृतिक समन्वय

  • सीमित लेकिन महत्वपूर्ण संपर्क: बाहरी साम्राज्यों के पूर्ण पैमाने पर प्रवेश से पहले, प्रारंभिक बस्तियों का व्यापारियों, तपस्वी समूहों और पड़ोसी राज्यों से कभी-कभार आने वाले हमलावर दलों के साथ छिटपुट संपर्क था।
  • सांस्कृतिक आदान-प्रदान: लौह प्रौद्योगिकी, कृषि उपकरणों और कुछ धार्मिक प्रथाओं (जैसे, वैष्णववाद, शैववाद का प्रभाव) को जनजातीय विश्वास प्रणालियों में अपनाना, जिससे समन्वयवादी परंपराएँ विकसित हुईं। यह एक क्रमिक प्रक्रिया थी, न कि अचानक आत्मसात।
  • केंद्रीकरण का प्रतिरोध: जनजातीय राजव्यवस्थाओं की विकेंद्रीकृत प्रकृति और पारंपरिक कानून पर उनकी निर्भरता ने विस्तृत हो रहे मैदानी साम्राज्यों के प्रशासनिक मॉडल के लिए एक चुनौती पेश की, जिससे बाद के प्रतिरोध आंदोलनों के लिए एक मिसाल कायम हुई।

तुलनात्मक विश्लेषण: प्रारंभिक जनजातीय राजव्यवस्थाएँ बनाम प्रारंभिक राज्य संरचनाएँ

छोटानागपुर में प्रारंभिक जनजातीय बस्तियों को समझना, गंगा के मैदानों में समकालीन राज्य संरचनाओं के साथ उनके सामाजिक-राजनीतिक विकास की तुलना करके बेहतर होता है। यह पारिस्थितिक रूप से विशिष्ट क्षेत्रों में स्वदेशी समाजों की विशिष्ट यात्रा को उजागर करता है।

विशेषता प्रारंभिक जनजातीय राजव्यवस्थाएँ (छोटानागपुर पठार) प्रारंभिक राज्य संरचनाएँ (जैसे, मगध, कोशल – गंगा के मैदान)
सामाजिक-राजनीतिक संरचना विकेंद्रीकृत ‘परहा’/’पीर’ प्रणालियाँ; स्वायत्त ग्राम समूह; पारंपरिक कानून और आम सहमति पर आधारित शासन। केंद्रीकृत राजशाही; पदानुक्रमित प्रशासनिक संरचनाएँ; संहिताबद्ध कानून (धर्मशास्त्र)।
भूमि कार्यकाल प्रणाली सामुदायिक स्वामित्व (Khuntkatti, भुइंहरी); भूमि कुलों/विस्तृत परिवारों द्वारा धारित; वंश और भूमि के बीच मजबूत संबंध। व्यक्तिगत/राज्य स्वामित्व; प्राथमिक आय के रूप में भू-राजस्व; अधिकारियों/मंदिरों को भूमि अनुदान।
आर्थिक आधार निर्वाह कृषि (स्थानांतरण और स्थायी), वन उत्पाद, शिकार; आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्थाएँ। अधिशेष कृषि (गहन खेती), व्यापार, शिल्प विशेषज्ञता; कराधान और श्रद्धांजलि संग्रह।
शहरीकरण और अवसंरचना मुख्यतः ग्रामीण; स्थानांतरण कृषि के लिए अस्थायी बस्तियाँ; न्यूनतम शहरी केंद्र। किलेबंद शहरों का उद्भव (जैसे, पाटलिपुत्र, श्रावस्ती); विस्तृत सार्वजनिक कार्य (सिंचाई, सड़कें)।
कानूनी और न्याय प्रणाली ग्राम परिषदों (मुंडा, महतो) द्वारा लागू पारंपरिक कानून; सुलह और समुदाय-आधारित न्याय। औपचारिक अदालतें, न्यायिक पदानुक्रम; सामाजिक स्तरीकरण पर आधारित दंड; लिखित कानूनी संहिताएँ।
बाहरी प्रभाव और विस्तार भूगोल के कारण सापेक्ष अलगाव; क्रमिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान; आंतरिक समेकन पर केंद्रित। आक्रामक क्षेत्रीय विस्तार; अन्य राज्यों के साथ राजनयिक संबंध; साम्राज्यों का गठन।

आलोचनात्मक मूल्यांकन: इतिहासलेखन संबंधी अंतराल और बहसें

छोटानागपुर में प्रारंभिक जनजातीय बस्तियों का अध्ययन इतिहासलेखन संबंधी चुनौतियों से भरा है, मुख्य रूप से इन अवधियों से स्वदेशी लिखित अभिलेखों की अनुपस्थिति के कारण। पुनर्निर्माण काफी हद तक पुरातात्विक साक्ष्य, भाषाई विश्लेषण, मौखिक परंपराओं और बाद के औपनिवेशिक नृवंशविज्ञान पर निर्भर करता है, जिनमें से प्रत्येक की अपनी सीमाएँ और पूर्वाग्रह हैं।

  • औपनिवेशिक आख्यानों पर निर्भरता: दर्ज इतिहास का अधिकांश भाग, विशेष रूप से मुंडा-मानकी प्रणाली जैसी विशिष्ट शासन संरचनाओं के संबंध में, ब्रिटिश प्रशासकों (जैसे, Dalton, Risley) द्वारा प्रलेखित किया गया था, जिन्होंने अक्सर जनजातीय प्रणालियों की व्याख्या औपनिवेशिक दृष्टिकोण से की, कभी-कभी जटिल स्वदेशी संरचनाओं को सरल या गलत तरीके से प्रस्तुत किया। ये विवरण अक्सर ‘आदिम’ समाजों की धारणा और प्रशासनिक नियंत्रण के लिए उन्हें वर्गीकृत करने की आवश्यकता से प्रेरित थे, न कि उनकी आंतरिक तर्कसंगतता की गहरी समझ से।
  • काल निर्धारण और कालक्रम: प्रवासन लहरों और सामाजिक-राजनीतिक प्रणालियों के विकास (जैसे सामुदायिक शासन से प्रारंभिक नागवंशी साम्राज्य में संक्रमण) के लिए सटीक कालक्रम स्थापित करना एक चुनौती बना हुआ है। पुरातात्विक व्याख्याएँ, यद्यपि भौतिक साक्ष्य प्रदान करती हैं, अक्सर सामाजिक-राजनीतिक बदलावों को पूरी तरह से विस्तृत करने के लिए पर्याप्त सूक्ष्मता का अभाव रखती हैं। उदाहरण के लिए, Khuntkatti प्रणाली के प्रारंभ का सटीक समय और प्रकृति बहस का विषय है, कुछ का तर्क है कि यह एक स्थिर संस्था होने के बजाय सदियों से विकसित हुई।
  • मौखिक परंपराएँ बनाम ऐतिहासिक ‘तथ्य’: सांस्कृतिक स्मृति को समझने के लिए अमूल्य होते हुए भी, मौखिक परंपराएँ (जैसे, मुंडा और नागवंशी शासकों के उत्पत्ति मिथक) अक्सर प्रतीकात्मक होती हैं और ऐतिहासिक स्रोतों के रूप में उपयोग किए जाने पर सावधानीपूर्वक व्याख्या की आवश्यकता होती है, क्योंकि वे मिथक को ऐतिहासिक घटनाओं के साथ मिला सकते हैं। कार्य इन आख्यानों के भीतर ऐतिहासिक सार को पहचानना है।
  • ”अलगाव” की भ्रांति: छोटानागपुर के पूरी तरह से अलग-थलग होने का विचार तेजी से चुनौती का सामना कर रहा है। यद्यपि भौगोलिक रूप से विशिष्ट, साक्ष्य बताते हैं कि आसपास की मैदानी संस्कृतियों और व्यापार नेटवर्क के साथ निरंतर, यद्यपि कम तीव्रता वाले, संपर्क पहले की तुलना में बहुत पहले से मौजूद थे, जो “वन दुर्ग” के आख्यान की तुलना में अधिक पारगम्य सांस्कृतिक सीमा का संकेत देते हैं। यह जनजातीय समाजों के अपरिवर्तनीय होने के सरल दृष्टिकोण को चुनौती देता है।

प्रारंभिक जनजातीय संरचनाओं का संरचित मूल्यांकन

छोटानागपुर में प्रारंभिक जनजातीय बस्तियों की समझ अनुकूली मानव संगठन और विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक संस्थाओं के उद्भव में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।

  1. इतिहासलेखन संबंधी व्याख्या और कार्यप्रणाली संबंधी चुनौतियाँ: इस प्रारंभिक इतिहास का निर्माण एक जटिल कार्य है, जो प्रत्यक्ष ऐतिहासिक अभिलेखों की कमी को दूर करने के लिए अंतःविषय दृष्टिकोणों पर निर्भर करता है। बहसें कार्यप्रणाली की कठोरता, स्रोत आलोचना (विशेषकर औपनिवेशिक विवरणों की), और पुरातात्विक, भाषाई तथा नृवंशविज्ञान संबंधी डेटा के सावधानीपूर्वक एकीकरण पर केंद्रित हैं।
  2. संसाधन प्रबंधन और संघर्ष समाधान में पारंपरिक शासन की प्रभावशीलता: ‘परहा’ और ‘Khuntkatti’ प्रणालियाँ अत्यधिक प्रभावी, विकेंद्रीकृत शासन मॉडल का उदाहरण हैं। इन संरचनाओं ने न्यायसंगत संसाधन वितरण को सुगम बनाया, सामाजिक सामंजस्य बनाए रखा, और सहभागी तंत्रों के माध्यम से विवादों को सुलझाया, जिससे बाहरी व्यवधानों से सदियों पहले मानव समुदायों और उनके पर्यावरण के बीच एक स्थायी संबंध प्रदर्शित हुआ।
  3. जनजातीय पहचान और भूमि संबंधों पर सामाजिक-पारिस्थितिक अनुकूलन का स्थायी प्रभाव: इन प्रारंभिक बस्तियों में भूमि, वन और पारंपरिक कानूनों के साथ घनिष्ठ संबंध आज भी जनजातीय पहचान को परिभाषित करता है और भूमि अधिकारों तथा स्वायत्तता के लिए उनके संघर्षों को सूचित करता है। सामुदायिक स्वामित्व और स्वशासन की ऐतिहासिक स्मृति समकालीन जनजातीय आंदोलनों और PESA तथा FRA जैसे कानूनों के तहत मान्यता व संरक्षण के उनके दावों के लिए एक शक्तिशाली ढाँचा प्रदान करती है।
छोटानागपुर में प्रारंभिक जनजातीय भूमि कार्यकाल की प्राथमिक विशेषता क्या थी?

प्राथमिक विशेषता सामुदायिक स्वामित्व थी, जिसका उदाहरण Khuntkatti और भुइंहरी जैसी प्रणालियाँ हैं, जहाँ भूमि व्यक्तियों या राज्य के बजाय कुलों या विस्तृत परिवारों द्वारा धारित की जाती थी जो मूल भूमि साफ करने वाले थे।

छोटानागपुर में प्रारंभिक जनजातीय बस्तियों को भूगोल ने कैसे प्रभावित किया?

पहाड़ी, वन-आच्छादित भूभाग ने बाहरी साम्राज्यों से प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान की, जिससे जनजातीय समुदायों को विस्तारित अवधियों तक अपेक्षाकृत स्वायत्त रूप से विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं और सांस्कृतिक पहचानों को विकसित करने और बनाए रखने की अनुमति मिली।

छोटानागपुर में सबसे प्रारंभिक प्रवासन लहरों से कौन से जनजातीय समूह जुड़े हैं?

प्रोटो-ऑस्ट्रोलॉइड समूह, जिनमें मुंडा, संथाल, हो और खड़िया के पूर्वज शामिल हैं, को आमतौर पर सबसे प्रारंभिक निवासियों में से माना जाता है, जिनके बाद में उरांव जैसे द्रविड़ भाषी समूह आए।

प्रारंभिक जनजातीय शासन में “परहा” या “पीर” प्रणाली का क्या महत्व था?

”परहा” या ”पीर” प्रणाली गाँवों के एक संघ का प्रतिनिधित्व करती थी, जो एक विकेंद्रीकृत, लोकतांत्रिक शासन संरचना का निर्माण करती थी। इसने मुंडा और उरांव जैसे समूहों के बीच अंतर-ग्राम विवाद समाधान, सामूहिक रक्षा और सामूहिक संसाधन प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण तंत्र के रूप में कार्य किया।

इतिहासकार छोटानागपुर की प्रारंभिक बस्तियों के इतिहास का पुनर्निर्माण कैसे करते हैं?

इतिहासकार एक बहु-विषयक दृष्टिकोण पर निर्भर करते हैं, जिसमें पुरातात्विक निष्कर्षों (जैसे, उपकरण, मिट्टी के बर्तन), जनजातीय भाषाओं के भाषाई विश्लेषण, आलोचनात्मक रूप से व्याख्या की गई मौखिक परंपराओं और बाद के औपनिवेशिक नृवंशविज्ञान संबंधी विवरणों को एकीकृत करके इन गैर-साक्षर समाजों के इतिहास को एक साथ जोड़ा जाता है।

अभ्यास प्रश्न

Q1. Prelims MCQ (अवधारणात्मक समझ) छोटानागपुर में प्रारंभिक नागवंशी साम्राज्य का कौन सा कथन गंगा के मैदानों में समकालीन साम्राज्यों की तुलना में अद्वितीय पहलू का सबसे अच्छा वर्णन करता है?

  • (a) यह मुख्य रूप से मगध के समान एक अत्यधिक केंद्रीकृत, राजस्व-संचालित राजशाही थी।
  • (b) यह जनजातीय सरदारों के एक संघ के रूप में शुरू हुआ, जिसने बड़े पैमाने पर स्वदेशी सामुदायिक भूमि प्रणालियों को बनाए रखा।
  • (c) इसकी स्थापना एक आक्रमणकारी आर्य राजवंश द्वारा की गई थी जिसने मुंडा प्रणाली को पूरी तरह से बदल दिया।
  • (d) इसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से बड़े पैमाने के व्यापार और शहरी केंद्रों पर आधारित थी, जिसमें निर्वाह कृषि का अभाव था।

उत्तर: (b)

(a) गलत। प्रारंभिक नागवंशी शासन अधिक विकेंद्रीकृत था और जनजातीय भूमि कार्यकाल का सम्मान करता था।
(b) सही। पारंपरिक विवरण और ऐतिहासिक व्याख्याएँ बताती हैं कि प्रारंभिक नागवंशी शासकों ने, यद्यपि ‘शाही’ उपाधि अपनाई, एक ऐसे ढाँचे के भीतर कार्य किया जो मौजूदा मुंडा (Khuntkatti) प्रणाली का सम्मान करता था और जनजातीय सरदारों के समर्थन पर निर्भर था।
(c) गलत। नागवंशी राजवंश पारंपरिक रूप से अपनी उत्पत्ति मुंडा वंश से बताता है, और इसने शुरू में स्वदेशी प्रणाली को पूरी तरह से प्रतिस्थापित नहीं किया।
(d) गलत। अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि-आधारित और वन-आधारित रही, जिसमें न्यूनतम शहरी केंद्र थे।

Q2. Prelims MCQ (ऐतिहासिक विकास) छोटानागपुर में प्रारंभिक जनजातीय बस्तियों के सामाजिक-आर्थिक विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. प्राथमिक बदलाव खानाबदोश शिकार-संग्रह से सीधे गहन नकदी-फसल कृषि की ओर था।
  2. “Khuntkatti” प्रणाली ने व्यक्तिगत भूमि स्वामित्व और बाजार-उन्मुख उत्पादन को सुगम बनाया।
  3. क्षेत्र की स्थलाकृति ने एक महत्वपूर्ण अवधि के लिए बाहरी राज्य संरचनाओं से जनजातीय स्वायत्तता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 3
  • (c) केवल 1 और 2
  • (d) केवल 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1: गलत। प्राथमिक बदलाव खानाबदोश शिकार-संग्रह से स्थानांतरण कृषि की ओर था, फिर धीरे-धीरे स्थायी निर्वाह कृषि की ओर, न कि सीधे गहन नकदी-फसल कृषि की ओर।
कथन 2: गलत। “Khuntkatti” प्रणाली परिवारों/कुलों द्वारा सामुदायिक भूमि स्वामित्व पर आधारित थी, न कि व्यक्तिगत स्वामित्व पर, और यह मुख्य रूप से निर्वाह कृषि का समर्थन करती थी।
कथन 3: सही। छोटानागपुर का पहाड़ी और वन-आच्छादित भूभाग वास्तव में एक प्राकृतिक बाधा के रूप में कार्य करता था, जो बड़े पैमाने पर घुसपैठ को रोकता था और जनजातीय स्वायत्तता को बनाए रखने में मदद करता था।

Q3. Mains प्रश्न (250 शब्द) “छोटानागपुर में प्रारंभिक जनजातीय बस्तियाँ सामाजिक-राजनीतिक संगठन का एक विशिष्ट मॉडल प्रस्तुत करती हैं, जिसकी विशेषता स्वशासन और सामुदायिक संसाधन प्रबंधन है, जो गंगा के मैदानों में समकालीन राज्य संरचनाओं के विपरीत है।” इस कथन का समालोचनात्मक मूल्यांकन करें, इन प्रारंभिक जनजातीय राजव्यवस्थाओं की प्रमुख विशेषताओं और उनके ऐतिहासिक प्रक्षेपवक्र के पुनर्निर्माण में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करें।

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