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पूर्वोत्तर भारत में शांति प्रयासों की पृष्ठभूमि और संदर्भ

पूर्वोत्तर भारत में, खासकर नागालैंड, मणिपुर और असम में सशस्त्र विद्रोह सात दशकों से जारी है, जिसमें कई जातीय समूह और हथियारबंद संगठन शामिल हैं। 1997 से भारत सरकार और National Socialist Council of Nagaland (NSCN-IM) के बीच 20 से अधिक दौर की शांति वार्ताएं हो चुकी हैं (MHA Annual Report 2023)। 2015 में नागा शांति समझौता फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसका उद्देश्य राजनीतिक समाधान देना था, लेकिन नौ साल बाद भी अंतिम समझौता नहीं हुआ है (Indian Express, 2024)। क्षेत्र के 10 जिलों में Armed Forces (Special Powers) Act, 1958 (AFSPA) लागू है (MHA Notification 2023), जो सुरक्षा चुनौतियों को दर्शाता है।

UPSC Relevance

  • GS Paper 2: Governance – आंतरिक सुरक्षा, स्वायत्तता के संवैधानिक प्रावधान, संघर्ष समाधान के तरीके
  • GS Paper 3: पूर्वोत्तर भारत में सुरक्षा चुनौतियां
  • निबंध: विद्रोह प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापना और राजनीतिक एकीकरण की चुनौतियां

शांति और सुरक्षा के लिए संवैधानिक एवं कानूनी ढांचा

पूर्वोत्तर की स्वायत्तता और सुरक्षा के लिए कई संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं। Article 356 के तहत असाधारण परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है, जो अक्सर विद्रोह के दौरान लागू होता है। Sixth Schedule जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों की व्यवस्था करता है, लेकिन यह सभी विद्रोही मांगों को पूरा करने में सक्षम नहीं है। AFSPA के Sections 3 और 4 सशस्त्र बलों को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष अधिकार देते हैं, जिसमें बिना अनुमति गिरफ्तारी और बल प्रयोग शामिल है। इस कानून को Naga People's Movement of Human Rights v. Union of India (1997) और Manipur AFSPA case (2021) में चुनौती दी गई, जहां सुप्रीम कोर्ट ने इसकी संवैधानिकता को बरकरार रखा लेकिन सावधानी बरतने को कहा।

  • नागा शांति समझौता (2015) नागा राष्ट्रवादी मांगों और भारतीय संप्रभुता के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास है, लेकिन क्षेत्रीय और प्रशासनिक मुद्दों पर स्पष्टता नहीं है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाया है, पर राजनीतिक विवादों का समाधान नहीं किया।
  • नागालैंड, मणिपुर और असम की राज्य सरकारें केंद्र के निर्देश लागू करती हैं, लेकिन अधिकार क्षेत्र के टकराव और विद्रोहियों के प्रभाव के कारण सीमित हैं।

संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में आर्थिक प्रभाव और विकास की चुनौतियां

विद्रोह ने क्षेत्र पर भारी आर्थिक बोझ डाला है। गृह मंत्रालय ने 2023-24 में पूर्वोत्तर के आंतरिक सुरक्षा और शांति स्थापना के लिए लगभग ₹2,500 करोड़ आवंटित किए (Union Budget 2023-24)। इसके बावजूद विद्रोह से जुड़ी आर्थिक हानि सालाना ₹10,000 करोड़ से अधिक है (Institute for Conflict Management, 2022)। प्रभावित जिलों में साक्षरता और प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 15-20% कम है (NITI Aayog SDG India Index 2023), बेरोजगारी 12.5% है जबकि राष्ट्रीय दर 7.2% है (Labour Bureau 2023)।

  • पिछले पांच वर्षों में पूर्वोत्तर में विकास व्यय 18% बढ़ा है, लेकिन यह कुल केंद्रीय व्यय का केवल 3% है (Union Budget 2023-24)।
  • आर्थिक ठहराव विद्रोहियों की भर्ती को बढ़ावा देता है और शांति प्रयासों को कमजोर करता है।
  • विभाजित शासन और सुरक्षा चिंताएं निजी निवेश और बुनियादी ढांचे के विकास में बाधा हैं।

शांति प्रक्रिया में संस्थागत भूमिकाएं और सीमाएं

गृह मंत्रालय (MHA) शांति वार्ता और सुरक्षा प्रबंधन का नेतृत्व करता है, लेकिन राजनीतिक संवेदनशीलताओं और क्षेत्रीय विविधता की वजह से सीमित है। राष्ट्रीय संस्था फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (NITI Aayog) नीति सुझाव और विकास सूचकांक प्रदान करता है, पर लागू करने की शक्ति नहीं रखता। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) आतंकवाद से जुड़े मामलों को संभालती है, जो विद्रोही समूहों के साथ भरोसे को जटिल बनाती है। सशस्त्र बल AFSPA लागू करते हैं और सशस्त्र संघर्षों का मुकाबला करते हैं, जो कभी-कभी स्थानीय नाराजगी बढ़ाते हैं।

  • राज्य सरकारों को राजनीतिक समाधान के लिए सीमित स्वायत्तता मिली है क्योंकि Article 356 और सुरक्षा कानून के तहत केंद्रीय नियंत्रण रहता है।
  • विद्रोही समूह बिखरे हुए हैं और अलग-अलग एजेंडे रखते हैं, जिससे एकजुट वार्ता मंच बनाना मुश्किल होता है।
  • NSCN-IM के साथ कई दौर की वार्ताएं हुई हैं, लेकिन ये संस्थागत और हितधारक जटिलताओं के कारण अंतिम समझौता नहीं कर सकीं।

तुलनात्मक अध्ययन: उत्तरी आयरलैंड का गुड फ्राइडे समझौता बनाम पूर्वोत्तर भारत की शांति प्रक्रिया

मामलागुड फ्राइडे समझौता (उत्तरी आयरलैंड, 1998)पूर्वोत्तर भारत की शांति प्रक्रिया
राजनीतिक ढांचाबहु-पक्षीय समझौता, सत्ता साझेदारी और विकेंद्रीकृत सरकारविद्रोहियों की बिखरी मांगें, राजनीतिक एकता का अभाव
हथियार छोड़नापारमिलिटरी समूहों का औपचारिक हथियार समर्पणआंशिक संघर्ष विराम, व्यापक हथियार समर्पण नहीं
हिंसा में कमी5 वर्षों में 90% कमी (UK Home Office Report 2003)7 वर्षों में 35% कमी, लेकिन कम तीव्रता वाला संघर्ष जारी
कानूनी और संवैधानिक समावेशनUK कानून के तहत संशोधन और नए संस्थानमौजूदा संवैधानिक प्रावधानों (Article 371, Sixth Schedule) पर निर्भर, सीमित बदलाव
आर्थिक विकासपुनर्निर्माण के लिए भारी निवेश और EU समर्थनसीमित केंद्रीय व्यय के साथ क्रमिक विकास (3% कुल व्यय)

व्यापक शांति समझौते के लिए संरचनात्मक बाधाएं

विद्रोहियों की मांगों को संवैधानिक स्वायत्तता प्रावधानों के साथ जोड़ने वाला एक एकीकृत राजनीतिक ढांचा न होना सबसे बड़ी कमी है। विभिन्न विद्रोही समूहों के क्षेत्रीय और जातीय दावों के कारण वार्ताएं बिखर जाती हैं। Sixth Schedule और Article 371 जैसे शासन ढांचे संप्रभुता या क्षेत्रीय पुनर्गठन की मांगों को पूरा नहीं कर पाते। AFSPA का लगातार लागू रहना स्थानीय लोगों और विद्रोहियों के बीच अविश्वास को बढ़ाता है।

  • केंद्र, राज्य सरकारों और विद्रोही समूहों के बीच गहरा अविश्वास विश्वास निर्माण में बाधा है।
  • नागा शांति समझौते के कानूनी अस्पष्टताएं व्यापक समझौते को रोकती हैं।
  • आर्थिक पिछड़ापन और बेरोजगारी विद्रोही भर्ती और स्थानीय नाराजगी को बढ़ावा देते हैं।

आगे का रास्ता: संघर्ष समाधान के व्यावहारिक उपाय

  • सभी विद्रोही समूहों की मांगों को संवैधानिक स्वायत्तता में समाहित करने वाला समावेशी राजनीतिक ढांचा बनाना, संभवत: Sixth Schedule के प्रावधानों को बढ़ाकर या नए कानून बनाकर।
  • विकास प्रोत्साहनों और राजनीतिक संवाद के साथ चरणबद्ध, सत्यापित हथियार समर्पण कर भरोसा बनाना।
  • संघर्ष प्रभावित जिलों में रोजगार सृजन और बुनियादी ढांचे पर केंद्रित लक्षित आर्थिक निवेश बढ़ाना।
  • AFSPA के लागू करने की समीक्षा और न्यायिक निगरानी बढ़ाकर मानवाधिकार चिंताओं को कम करना।
  • MHA, राज्य सरकारों और विकास एजेंसियों के बीच संस्थागत समन्वय मजबूत कर नीति संगति सुनिश्चित करना।

प्रश्न अभ्यास

📝 प्रारंभिक अभ्यास
1958 के Armed Forces (Special Powers) Act, AFSPA के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. AFSPA सशस्त्र बलों को बिना वारंट गिरफ्तारी और बल प्रयोग का अधिकार देता है।
  2. AFSPA केवल नागालैंड और मणिपुर राज्यों में लागू है।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने AFSPA को सभी फैसलों में असंवैधानिक घोषित किया है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 1 और 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि AFSPA सशस्त्र बलों को बिना वारंट गिरफ्तारी और बल प्रयोग जैसे विशेष अधिकार देता है। कथन 2 गलत है क्योंकि AFSPA असम, नागालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी लागू है। कथन 3 गलत है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने AFSPA की संवैधानिकता को बरकरार रखा है लेकिन इसके सावधानीपूर्वक उपयोग की बात कही है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
2015 के नागा शांति समझौता फ्रेमवर्क एग्रीमेंट के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. यह फ्रेमवर्क एग्रीमेंट नागा क्षेत्रीय विवादों को पूरी तरह सुलझा चुका है।
  2. यह सभी पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतिम समझौता है।
  3. समझौता राजनीतिक समाधान प्रदान करने का प्रयास है, लेकिन कई वर्षों बाद भी अंतिम रूप में हस्ताक्षरित नहीं हुआ।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2 और 3
  • cकेवल 3
  • d1, 2 और 3
उत्तर: (c)
कथन 3 सही है; 2015 में हस्ताक्षरित फ्रेमवर्क एग्रीमेंट अंतिम कानूनी समझौता नहीं है और नौ साल बाद भी इसे अंतिम रूप नहीं दिया गया है। कथन 1 गलत है क्योंकि क्षेत्रीय विवाद अभी भी बने हुए हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि यह केवल फ्रेमवर्क एग्रीमेंट है, अंतिम समझौता नहीं।

मुख्य प्रश्न

पूर्वोत्तर भारत के विद्रोह संदर्भ में व्यापक शांति समझौते और रणनीतिक राजनीतिक समाधान क्यों संभव नहीं हो पा रहे? संवैधानिक, आर्थिक और संस्थागत चुनौतियों की आलोचनात्मक समीक्षा करें। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – शासन और आंतरिक सुरक्षा
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में वामपंथी उग्रवाद की चुनौतियां हैं; पूर्वोत्तर के विद्रोह प्रबंधन से शांति स्थापना के लिए सीख ली जा सकती है।
  • मुख्य बिंदु: स्वायत्तता के संवैधानिक प्रावधान, AFSPA जैसे सुरक्षा कानून और संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में आर्थिक विकास की तुलना करके उत्तर तैयार करें।
पूर्वोत्तर विद्रोह के संदर्भ में Article 371 का महत्व क्या है?

Article 371 कुछ पूर्वोत्तर राज्यों को सांस्कृतिक और प्रशासनिक मामलों में विशेष स्वायत्तता देता है। हालांकि, यह विद्रोहियों की संप्रभुता या क्षेत्रीय पुनर्गठन की मांगों को पूरी तरह नहीं पूरा करता, इसलिए इसका समाधान में सीमित प्रभाव है।

AFSPA विवादास्पद क्यों रहा है?

AFSPA सशस्त्र बलों को बिना वारंट गिरफ्तारी और घातक बल प्रयोग के व्यापक अधिकार देता है, जिससे मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी संवैधानिकता मानते हुए सावधानी बरतने को कहा है, लेकिन इसके प्रभाव के कारण समीक्षा की मांग जारी है।

नागा शांति समझौते को अंतिम रूप देने में मुख्य बाधाएं क्या हैं?

बाधाओं में अनसुलझे क्षेत्रीय दावे, विद्रोही गुटों के बीच असहमति, संवैधानिक सीमाएं और केंद्र तथा विद्रोहियों के बीच अविश्वास शामिल हैं। इन जटिलताओं के कारण फ्रेमवर्क एग्रीमेंट अंतिम समझौते के रूप में नहीं बन पाया है।

आर्थिक पिछड़ापन पूर्वोत्तर के विद्रोह को कैसे प्रभावित करता है?

कम साक्षरता, आय और उच्च बेरोजगारी के कारण नाराजगी बढ़ती है, जो विद्रोहियों की भर्ती को बढ़ावा देती है। केंद्रीय व्यय बढ़ने के बावजूद विकास संघर्ष के मूल कारणों को दूर करने में अपर्याप्त है।

पूर्वोत्तर भारत को गुड फ्राइडे समझौते से क्या सीख मिल सकती है?

गुड फ्राइडे समझौते ने राजनीतिक विकेंद्रीकरण, हथियार समर्पण और समावेशी वार्ता के माध्यम से हिंसा कम की। यह पूर्वोत्तर की शांति प्रक्रिया में एकजुट राजनीतिक ढांचे और विश्वसनीय हथियार समर्पण की आवश्यकता को दर्शाता है।

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