अपडेट

ब्रिक्स-मेना प्रतिनिधियों ने पश्चिम एशिया में युद्ध को लेकर जताई चिंता

अक्टूबर 2023 में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के ब्रिक्स समूह के साथ ही मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका (मेना) क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की। यह संयुक्त कूटनीतिक बयान नई दिल्ली में आयोजित एक बहुपक्षीय बैठक के दौरान जारी किया गया, जिसमें वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और भू-राजनीतिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण इस क्षेत्र में शांति स्थापना और स्थिरता की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया गया। इस संयुक्त आवाज़ से उभरती शक्तियों और क्षेत्रीय गठबंधनों की पारंपरिक पश्चिमी नेतृत्व वाली प्रणालियों से परे अंतरराष्ट्रीय संकटों को सुलझाने में बढ़ती भूमिका उजागर होती है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: अंतरराष्ट्रीय संबंध – भारत की विदेश नीति, बहुपक्षीय कूटनीति, पश्चिम एशिया संघर्ष
  • GS पेपर 3: आर्थिक विकास – ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक तेल बाजार, भू-राजनीतिक तनावों का प्रभाव
  • निबंध: वैश्विक शांति स्थापना और ऊर्जा कूटनीति में भारत की भूमिका

भारत की कूटनीतिक भागीदारी का कानूनी और संवैधानिक ढांचा

भारत की विदेश नीति एक संवैधानिक ढांचे के तहत संचालित होती है, जो सीधे विदेश संबंधों का विस्तार नहीं करता, लेकिन अनुच्छेद 253 के तहत अंतरराष्ट्रीय संधियों को लागू करने के लिए विधायी अधिकार प्रदान करता है। विधि मंत्रालय 1948 के विदेश मंत्रालय अधिनियम के अंतर्गत काम करता है, जबकि कूटनीतिक आचरण भारतीय विदेश सेवा (आचरण) नियम, 1961 द्वारा नियंत्रित होता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, संयुक्त राष्ट्र चार्टर (1945) का अध्याय VI शांतिपूर्ण विवाद समाधान के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है, जो पश्चिम एशिया के बहुपक्षीय संघर्ष प्रबंधन प्रयासों के लिए प्रासंगिक है।

  • अनुच्छेद 253 संसद को संधि कार्यान्वयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, जिससे भारत अंतरराष्ट्रीय शांति समझौतों का पालन कर सकता है।
  • विदेश मंत्रालय अधिनियम, 1948 भारत की कूटनीतिक व्यवस्था को संस्थागत करता है, जो विदेश नीति के समन्वित जवाबदेही को सक्षम बनाता है।
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर अध्याय VI शांतिपूर्ण वार्ता और मध्यस्थता का निर्देश देता है, जो भारत की बहुपक्षीय कूटनीति के मार्गदर्शक हैं।

आर्थिक हित: वैश्विक और भारतीय ऊर्जा सुरक्षा में पश्चिम एशिया की भूमिका

पश्चिम एशिया विश्व के लगभग 30% कच्चे तेल निर्यात का स्रोत है, जैसा कि ओपेक वार्षिक सांख्यिकीय बुलेटिन 2023 में दिखाया गया है। भारत की निर्भरता खास है, क्योंकि इसके 85% कच्चे तेल का आयात इसी क्षेत्र से होता है, मुख्यतः सऊदी अरब और यूएई से, जो भारत के कुल तेल आयात का 40% से अधिक हिस्सा हैं (भारतीय पेट्रोलियम मंत्रालय, 2023)। 2020 के खाड़ी तनावों जैसे ऐतिहासिक व्यवधानों ने ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 20% की बढ़ोतरी की थी (IEA रिपोर्ट, 2021), जो पश्चिम एशिया की अस्थिरता का वैश्विक मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास पर सीधा असर दिखाता है। ब्रिक्स देश विश्व जीडीपी का 42% हिस्सा रखते हैं (विश्व बैंक, 2023), जबकि मेना देशों के पास विश्व के प्रमाणित तेल भंडार का 60% हिस्सा है (बीपी सांख्यिकीय समीक्षा, 2023), जो क्षेत्रीय स्थिरता में आर्थिक हितों की गहरी अंतर्निहितता दर्शाता है।

  • भारत का मेना देशों के साथ व्यापार 2023 में लगभग 150 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया (वाणिज्य मंत्रालय, भारत), जो आर्थिक समन्वय को दर्शाता है।
  • पश्चिम एशिया में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भारत और अन्य ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति दबाव पैदा किया है।
  • ऊर्जा सुरक्षा भारत की दीर्घकालिक आर्थिक योजना और विदेश नीति के लिए रणनीतिक प्राथमिकता बनी हुई है।

ब्रिक्स-मेना कूटनीतिक भागीदारी के प्रमुख संस्थागत खिलाड़ी

ब्रिक्स समूह, जो पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है, आर्थिक सहयोग और राजनीतिक समन्वय पर केंद्रित है। मेना क्षेत्र, जिसमें सऊदी अरब, यूएई, मिस्र, अल्जीरिया जैसे 20 से अधिक देश शामिल हैं, ऊर्जा निर्यात और क्षेत्रीय भू-राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है। भारत का विदेश मंत्रालय (MEA) कूटनीतिक पहलों का नेतृत्व करता है, जो अक्सर संयुक्त राष्ट्र (UN) और ऊर्जा केंद्रित संगठनों जैसे ओपेक और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के साथ समन्वय करता है।

  • ब्रिक्स उभरती शक्तियों के बीच वैश्विक शासन और आर्थिक स्थिरता पर संवाद को बढ़ावा देता है।
  • मेना देश ऊर्जा आपूर्ति और पश्चिम एशिया शांति प्रयासों में महत्वपूर्ण क्षेत्रीय हितधारक हैं।
  • MEA भारत की कूटनीतिक पहुंच और बहुपक्षीय वार्ताओं का प्रबंधन करता है।
  • संयुक्त राष्ट्र संघर्ष समाधान और शांति स्थापना के लिए मंच प्रदान करता है।
  • ओपेक तेल उत्पादन को नियंत्रित करता है, जिससे वैश्विक आपूर्ति और कीमतों पर असर पड़ता है।
  • IEA विश्वभर में ऊर्जा सुरक्षा और बाजार स्थिरता की निगरानी करता है।

तुलनात्मक विश्लेषण: पश्चिम एशिया में बहुपक्षीय कूटनीति बनाम एकतरफा सैन्य हस्तक्षेप

ब्रिक्स-मेना दृष्टिकोण बहुपक्षीय संवाद और कूटनीतिक भागीदारी पर जोर देता है ताकि पश्चिम एशियाई संघर्षों का समाधान निकाला जा सके, जो अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन के एकतरफा सैन्य हस्तक्षेपों से अलग है। 2003 में अमेरिका के इराक पर आक्रमण ने तेल उत्पादन में 50% गिरावट और लंबे समय तक अस्थिरता पैदा की, जिससे वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव हुआ (EIA, 2004)। इसके विपरीत, 2015 के ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) जैसे बहुपक्षीय ढांचे ने तनावों को अस्थायी रूप से कम किया और तेल बाजार स्थिर किए, जो सहयोगी कूटनीति की प्रभावशीलता को दर्शाता है।

पहलूब्रिक्स-मेना दृष्टिकोणअमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन
भागीदारी का स्वरूपबहुपक्षीय कूटनीति और संवादएकतरफा सैन्य हस्तक्षेप
तेल उत्पादन पर प्रभाववार्ता के माध्यम से स्थिरीकरण (जैसे JCPOA)उत्पादन में गिरावट और व्यवधान (जैसे 2003 इराक आक्रमण)
क्षेत्रीय स्थिरताशांतिपूर्ण संघर्ष समाधान पर ध्यानलंबे समय तक अस्थिरता और विद्रोह
वैश्विक आर्थिक प्रभावकीमतों के उतार-चढ़ाव में कमीतेल कीमतों में तेज उछाल

नीति में कमी: ब्रिक्स-मेना सहयोग में संस्थागत संघर्ष समाधान तंत्र का अभाव

साझा चिंताओं के बावजूद, ब्रिक्स-मेना के पास संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद या नाटो जैसे गठबंधनों के समान त्वरित संघर्ष समाधान के लिए कोई औपचारिक संस्थागत तंत्र नहीं है। यह उनकी संकट प्रतिक्रिया क्षमता को सीमित करता है और पश्चिम एशिया में स्थिरीकरण के लिए उनकी भूमिका कमजोर करता है। ऐसे तंत्र स्थापित करने से उनकी कूटनीतिक प्रभावशीलता और क्षेत्रीय संघर्ष प्रबंधन में क्षमता बढ़ सकती है।

  • ब्रिक्स-मेना शांति स्थापना या मध्यस्थता के लिए स्थायी निकाय का अभाव।
  • संयुक्त कूटनीतिक या आर्थिक प्रतिबंधों के लिए सीमित समन्वय प्रोटोकॉल।
  • ब्रिक्स और मेना के विविध भू-राजनीतिक हितों के बीच तालमेल बनाने में चुनौतियां।

महत्व और आगे का रास्ता

ब्रिक्स और मेना प्रतिनिधियों की संयुक्त चिंता पश्चिम एशिया में समावेशी, बहुपक्षीय कूटनीति की ओर एक बदलाव का संकेत है। भारत के लिए यह ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के रणनीतिक हितों के अनुरूप है। ब्रिक्स-मेना ढांचे के भीतर संस्थागत सहयोग को मजबूत करना, कूटनीतिक आधारभूत संरचना में निवेश करना और उभरती व क्षेत्रीय शक्तियों के बीच भारत की अनोखी भूमिका का लाभ उठाना आवश्यक होगा। इससे पश्चिम एशियाई संघर्षों से आर्थिक झटकों को कम किया जा सकेगा और वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन में योगदान मिलेगा।

  • स्पष्ट निर्देशों के साथ ब्रिक्स-मेना संघर्ष समाधान तंत्र को संस्थागत बनाना।
  • ऊर्जा कूटनीति को बढ़ावा देना ताकि आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा हो और बाजार स्थिर रहें।
  • भारत की कूटनीतिक पूंजी का उपयोग कर विवादित पक्षों के बीच मध्यस्थता करना।
  • संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ समन्वय कर व्यापक शांति प्रयास करना।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
पश्चिम एशिया में ब्रिक्स और मेना सहयोग के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. ब्रिक्स मध्य पूर्व और अफ्रीका के देशों का क्षेत्रीय गठबंधन है।
  2. मेना में मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका के देश शामिल हैं।
  3. ब्रिक्स-मेना सहयोग के पास संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसा औपचारिक संघर्ष समाधान तंत्र मौजूद है।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 2
  • bकेवल 2
  • cकेवल 2 और 3
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि ब्रिक्स ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का आर्थिक समूह है, क्षेत्रीय गठबंधन नहीं। कथन 2 सही है क्योंकि मेना में मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका के देश शामिल हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि ब्रिक्स-मेना सहयोग के पास संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसा औपचारिक संघर्ष समाधान तंत्र नहीं है।
📝 प्रारंभिक अभ्यास
भारत के कच्चे तेल आयात के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
  1. भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 85% आयात पश्चिम एशियाई देशों से करता है।
  2. सऊदी अरब और यूएई मिलकर भारत के कच्चे तेल आयात का 20% से कम हिस्सा देते हैं।
  3. पश्चिम एशिया में व्यवधानों के कारण वैश्विक तेल कीमतों में भारी वृद्धि हुई है।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • aकेवल 1 और 3
  • bकेवल 2
  • cकेवल 1 और 2
  • d1, 2 और 3 सभी
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है, जैसा कि भारतीय पेट्रोलियम मंत्रालय (2023) के आंकड़े दिखाते हैं। कथन 2 गलत है; सऊदी अरब और यूएई मिलकर भारत के कच्चे तेल आयात का 40% से अधिक हिस्सा देते हैं। कथन 3 सही है, क्योंकि IEA की रिपोर्टों में पश्चिम एशियाई संघर्षों के दौरान तेल कीमतों में वृद्धि दर्ज की गई है।

मेन्स प्रश्न

पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर ब्रिक्स-मेना प्रतिनिधियों की संयुक्त चिंता के महत्व का मूल्यांकन करें, विशेषकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और बहुपक्षीय कूटनीति के संदर्भ में। इस संदर्भ में भारत की विदेश नीति के लिए उत्पन्न चुनौतियों और अवसरों पर चर्चा करें।

झारखंड एवं JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: GS पेपर 2 – अंतरराष्ट्रीय संबंध और भारत की विदेश नीति
  • झारखंड का नजरिया: झारखंड का औद्योगिक क्षेत्र स्थिर ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर है, इसलिए भारत की पश्चिम एशिया कूटनीति राज्य की आर्थिक वृद्धि से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी है।
  • मेन्स के लिए सुझाव: उत्तरों में भारत की रणनीतिक ऊर्जा आवश्यकताओं, बहुपक्षीय कूटनीति की भूमिका और झारखंड के औद्योगिक विकास पर संभावित प्रभावों को उजागर करें।
ब्रिक्स समूह क्या है और इसका पश्चिम एशिया से क्या संबंध है?

ब्रिक्स ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का आर्थिक समूह है, जो विश्व GDP का 40% से अधिक हिस्सा रखता है। यह कोई क्षेत्रीय समूह नहीं है, लेकिन अपने सदस्यों के रणनीतिक और आर्थिक हितों के कारण पश्चिम एशिया के संघर्षों को सुलझाने में बहुपक्षीय कूटनीति करता है।

पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

पश्चिम एशिया भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 85% हिस्सा प्रदान करता है, जिसमें सऊदी अरब और यूएई का योगदान 40% से अधिक है। इस क्षेत्र की अस्थिरता सीधे भारत की ऊर्जा कीमतों और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करती है।

भारत की विदेश नीति को कौन से कानूनी प्रावधान नियंत्रित करते हैं?

भारत की विदेश नीति को संवैधानिक रूप से अनुच्छेद 253 नियंत्रित करता है, जो संधि कार्यान्वयन का अधिकार देता है। MEA 1948 के विदेश मंत्रालय अधिनियम के तहत संचालित होता है, और कूटनीतिक आचरण भारतीय विदेश सेवा (आचरण) नियम, 1961 के अधीन है।

ब्रिक्स-मेना दृष्टिकोण और अमेरिकी नेतृत्व वाले हस्तक्षेप में क्या फर्क है?

ब्रिक्स-मेना बहुपक्षीय संवाद और शांतिपूर्ण समाधान पर जोर देता है, जबकि अमेरिकी नेतृत्व वाले हस्तक्षेप अक्सर एकतरफा सैन्य कार्रवाई पर आधारित रहे हैं, जिससे लंबी अवधि की अस्थिरता और आर्थिक व्यवधान हुए हैं।

पश्चिम एशिया में ब्रिक्स-मेना सहयोग में मुख्य नीति कमी क्या है?

ब्रिक्स-मेना में कोई संस्थागत संघर्ष समाधान तंत्र नहीं है, जो उनकी संकट प्रतिक्रिया क्षमता को सीमित करता है, जबकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे संस्थान इस तरह के त्वरित और समन्वित प्रयासों में सक्षम हैं।

हमारे कोर्स

72+ बैच

हमारे कोर्स
Contact Us