Announcements
UPSC Foundation 2026 Prime Batch - Admissions Open JPSC 14th CCE Complete Course 2025 - Enroll Now Mains Answer Writing Programme - Limited Seats Daily Current Affairs - Free Access UPSC Prelims Test Series 2026 - 5000+ MCQs
+91 91025 57680
learnpro Civil Services
LearnPro Menu
Home Current Affairs All Articles
UPSC
UPSC NOTES
STATE PSC
OPTIONAL SUBJECTS
CURRENT AFFAIRS
DAILY EDITORIAL
COURSES
DOWNLOAD NOTES
PYQ Papers Mains Answer Writing WhatsApp Counselling Call +91 91025 57680 Online Courses

Post

धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप पर सुप्रीम कोर्ट की राय: संवैधानिक और सामाजिक-आर्थिक पहलू

धार्मिक प्रथाओं से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

साल 2024 में भारत का सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि धार्मिक प्रथाओं से जुड़ी याचिकाओं को स्वीकार करना सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक शासन के लिए गहरा असर रखता है। सर्वोच्च न्यायालय ने उन मामलों में न्यायिक अतिक्रमण के जोखिमों पर प्रकाश डाला जहाँ बिना स्पष्ट कानूनी ढांचे या सामाजिक-सांस्कृतिक समझ के संवेदनशील धार्मिक मुद्दों पर फैसला किया जाता है। यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब धार्मिक रीति-रिवाजों और पूजा स्थलों से जुड़ी 200 से अधिक याचिकाएं उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं (The Hindu, 2024)।

कोर्ट की यह सतर्कता अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संवैधानिक संतुलन को दर्शाती है, जो धर्म की स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार सुनिश्चित करते हुए सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की सुरक्षा भी करते हैं। सबरीमाला समीक्षा याचिका (2019) और शाह बानो मामला (1985) जैसे ऐतिहासिक फैसले न्यायपालिका की उस कोशिश को दिखाते हैं जिसमें धार्मिक स्वायत्तता और संवैधानिक नैतिकता के बीच सामंजस्य बनाया गया।

UPSC से संबंधित विषय

  • GS पेपर 2: भारतीय संविधान—मूलभूत अधिकार (अनुच्छेद 25, 26), न्यायपालिका और शासन में उसकी भूमिका
  • GS पेपर 1: समाज—धार्मिक प्रथाएं और सामाजिक सद्भाव
  • निबंध: भारत में धर्मनिरपेक्षता और न्यायिक सक्रियता

धार्मिक प्रथाओं पर संवैधानिक और कानूनी ढांचा

अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को धर्म की स्वतंत्रता, अपनी मान्यताओं को स्वतंत्र रूप से मानने, अभ्यास करने और प्रचारित करने का अधिकार देता है, लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। अनुच्छेद 26 हर धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन, पूजा स्थलों का रखरखाव और धर्मार्थ संस्थाओं का संचालन करने का अधिकार देता है।

प्लेसेस ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) एक्ट, 1991 (धारा 3) धार्मिक स्थलों की स्थिति को 15 अगस्त 1947 के अनुसार बनाए रखने का प्रावधान करता है ताकि सांप्रदायिक तनाव न बढ़े। यह कानून धार्मिक स्थलों की स्थिति में बदलाव की मांग करने वाली मुकदमों के खिलाफ एक मजबूत क़ानूनी ढाल का काम करता है।

न्यायिक फैसले धार्मिक मामलों की जटिलता को दर्शाते हैं। सबरीमाला मामला (2018-2019) में 5:4 के मत विभाजन के साथ सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक नैतिकता को धार्मिक रीति-रिवाजों से ऊपर रखा और मासिक धर्म वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी। वहीं, शाह बानो फैसला (1985) ने मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद भरण-पोषण का अधिकार दिया, जिसके बाद मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 के जरिए विधायी हस्तक्षेप हुआ।

धार्मिक प्रथाओं और मुकदमों का आर्थिक प्रभाव

धार्मिक पर्यटन भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग ₹1.2 लाख करोड़ का योगदान देता है (पर्यटन मंत्रालय, 2023), जो घरेलू पर्यटन का करीब 15% है। तीर्थस्थल स्थानीय रोजगार और व्यापार के बड़े स्रोत होते हैं, इसलिए धार्मिक स्थलों पर विवाद आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होते हैं।

  • सरकार ने 2023-24 के बजट में धार्मिक स्थलों के आधारभूत विकास के लिए PRASAD योजना के तहत ₹5,000 करोड़ आवंटित किए हैं।
  • धार्मिक स्थलों से जुड़ी मुकदमों या अशांति से तीर्थयात्रियों की संख्या कम हो सकती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार 2022 में धार्मिक विवादों से जुड़े सांप्रदायिक घटनाओं में 2021 की तुलना में 8% की वृद्धि हुई, जो सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता का संकेत है।

धार्मिक प्रथाओं के न्यायिक निर्णय और प्रबंधन में मुख्य संस्थान

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया धार्मिक प्रथाओं से जुड़े संवैधानिक विवादों का अंतिम निर्णयकर्ता है। इसे अक्सर व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

  • अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए नीतियां और कल्याण योजनाएं बनाता है, जो सामाजिक-वैधानिक पहलुओं को प्रभावित करती हैं।
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) संरक्षित धार्मिक स्मारकों की देखरेख करता है और ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों के संरक्षण में भूमिका निभाता है।
  • राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों और शिकायतों की निगरानी करता है और न्यायिक तथा कार्यकारी शाखाओं से संपर्क में रहता है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत और अमेरिका में धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप

संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान का फर्स्ट अमेंडमेंट धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन वहां के न्यायालय आमतौर पर आंतरिक धार्मिक सिद्धांतों में दखलअंदाजी से बचते हैं और न्यायिक संयम पर जोर देते हैं।

1993 के Employment Division v. Smith मामले में यह निर्णय लिया गया कि न्यायिक हस्तक्षेप केवल तब होगा जब राज्य के कानून तटस्थ और सामान्य रूप से लागू हों, जिससे धार्मिक सिद्धांतों में उलझाव से बचा जा सके।

पहलू भारत संयुक्त राज्य अमेरिका
संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 25 और 26 — धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों का प्रबंधन फर्स्ट अमेंडमेंट — धार्मिक स्वतंत्रता, धर्म की स्थापना निषेध
न्यायिक दृष्टिकोण धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक नैतिकता के बीच सक्रिय संतुलन (जैसे सबरीमाला) न्यायिक संयम; केवल तटस्थ कानूनों का उल्लंघन होने पर हस्तक्षेप (Employment Division v. Smith)
कानूनी ढांचा प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 — धार्मिक स्थलों की स्थिति को बरकरार रखता है कोई समकक्ष कानून नहीं; संवैधानिक व्याख्या पर निर्भर
सामाजिक प्रभाव मुकदमे अक्सर सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिकरण को बढ़ावा देते हैं धार्मिक मामलों में न्यायिक संयम से सामाजिक संघर्ष कम होता है

महत्वपूर्ण कमी: व्यापक कानूनी ढांचे का अभाव

भारत में धार्मिक प्रथाओं से जुड़े विवादों में न्यायपालिका की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित करने वाला कोई विशेष कानून नहीं है। इस कमी के कारण फैसलों में असंगति, राजनीतिकरण और सामाजिक असंतोष पैदा होता है।

धार्मिक मामलों पर अन्य धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रों की तरह स्पष्ट दिशानिर्देश न होने के कारण, भारतीय अदालतें हर मामले को अलग-अलग देखती हैं और अक्सर संवैधानिक नैतिकता का सहारा लेती हैं, जो एक व्यक्तिगत और विवादास्पद मानक है। इससे न्यायिक निर्णय प्रक्रिया जटिल होती है और धार्मिक स्वायत्तता पर विवाद बढ़ते हैं।

महत्व और आगे की राह

  • धार्मिक प्रथाओं से जुड़े विवादों में न्यायिक क्षेत्राधिकार स्पष्ट करने वाला व्यापक कानूनी ढांचा बनाना चाहिए, जिससे मनमानी कम हो।
  • न्यायपालिका, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, ASI और NCM के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना आवश्यक है ताकि धार्मिक मामलों को संवेदनशीलता से संभाला जा सके।
  • न्यायिक अधिकारियों के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता प्रशिक्षण बढ़ाना चाहिए ताकि संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन बना रहे।
  • सामाजिक तनाव कम करने के लिए समुदाय आधारित संवाद के माध्यम को मजबूत करना चाहिए ताकि विवाद अदालत के बाहर सुलझ सकें।
  • प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना चाहिए ताकि धार्मिक स्थलों की स्थिति में बदलाव रोका जा सके।

प्लेसेस ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) एक्ट, 1991 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. यह सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने पर 1947 के बाद धार्मिक स्थलों की स्थिति बदलने की अनुमति देता है।
  2. इसका उद्देश्य 15 अगस्त 1947 को धार्मिक स्थलों का धार्मिक स्वरूप बनाए रखना है।
  3. यह धार्मिक स्थलों को अन्य धर्मों में परिवर्तित करने से रोकता है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि यह एक्ट 1947 के बाद धार्मिक स्थलों की स्थिति में बदलाव को अदालत की मंजूरी से भी रोकता है। कथन 2 और 3 सही हैं क्योंकि यह कानून स्थिति को बनाए रखता है और धार्मिक स्थलों के धर्म परिवर्तन पर रोक लगाता है।

भारत में धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. सुप्रीम कोर्ट ने समुदाय की स्वायत्तता का सम्मान करते हुए धार्मिक रीति-रिवाजों पर लगातार निर्णय लेने से परहेज किया है।
  2. सबरीमाला फैसले में संवैधानिक नैतिकता और धार्मिक रीति-रिवाजों पर 5:4 बहुमत से फैसला हुआ था।
  3. शाह बानो मामले में मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विधायी कार्रवाई हुई।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप किया है, खासकर सबरीमाला मामले में। कथन 2 और 3 सही हैं, जो सबरीमाला के 5:4 मत विभाजन और शाह बानो के बाद हुई विधायी प्रतिक्रिया को दर्शाते हैं।

मुख्य प्रश्न

भारत में धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप के प्रभावों का अनुच्छेद 25 और 26 तथा सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों के संदर्भ में आलोचनात्मक विश्लेषण करें। व्यापक कानूनी ढांचे के अभाव से उत्पन्न चुनौतियों पर चर्चा करें और संवैधानिक अधिकारों के साथ सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के उपाय सुझाएं।

झारखंड एवं JPSC से संबंधित

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (भारतीय संविधान और शासन), पेपर 4 (नैतिकता और सामाजिक मुद्दे)
  • झारखंड का परिप्रेक्ष्य: झारखंड में वैद्यानाथ धाम जैसे विविध धार्मिक समुदाय और तीर्थस्थल हैं, जो धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक फैसलों को स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण बनाते हैं।
  • मेन पॉइंटर: झारखंड में धार्मिक सद्भाव पर न्यायिक फैसलों के प्रभाव को उजागर करते हुए स्थानीय सांप्रदायिक घटनाओं और धार्मिक मामलों के प्रबंधन में राज्य संस्थानों की भूमिका का उल्लेख करें।
भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को कौन से संवैधानिक प्रावधान सुरक्षित करते हैं?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं। अनुच्छेद 25 सभी को धर्म की स्वतंत्रता, अपनी मान्यताओं को मानने, अभ्यास करने और प्रचारित करने का अधिकार देता है, बशर्ते सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य का उल्लंघन न हो। अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है।

प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 का महत्व क्या है?

प्लेसेस ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) एक्ट, 1991 धार्मिक स्थलों की धार्मिक पहचान को 15 अगस्त 1947 के अनुसार बनाए रखता है, जिससे धार्मिक स्थलों के धर्म परिवर्तन या स्थिति में बदलाव को रोककर सांप्रदायिक तनाव कम किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में क्या निर्णय दिया?

सबरीमाला मामले (2018-2019) में 5:4 के मत विभाजन से सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक नैतिकता को धार्मिक रीति-रिवाजों से ऊपर रखा और मासिक धर्म वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी, जिससे लैंगिक समानता को प्राथमिकता मिली।

धार्मिक विवादों का भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है?

धार्मिक विवाद तीर्थयात्रा पर्यटन को प्रभावित कर सकते हैं, जो लगभग ₹1.2 लाख करोड़ का योगदान देता है और घरेलू पर्यटन का 15% हिस्सा है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और व्यापार प्रभावित होते हैं।

अमेरिका में धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप का क्या तरीका है?

अमेरिका में न्यायालय धार्मिक मामलों में संयम बरतते हैं और केवल तब हस्तक्षेप करते हैं जब राज्य के तटस्थ और सामान्य रूप से लागू कानूनों का उल्लंघन होता है, जैसा कि Employment Division v. Smith (1993) मामले में स्थापित है, जिससे धार्मिक विवादों से जुड़ी सामाजिक असंतुलन कम होती है।

Call WhatsApp Join Batch Download Syllabus