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दिल्ली हाई कोर्ट में सख्त रीकसाल टेस्ट लागू न करने की विफलता: न्यायिक निष्पक्षता और जवाबदेही पर प्रभाव

दिल्ली हाई कोर्ट में रीकसाल की पृष्ठभूमि और संदर्भ

दिल्ली हाई कोर्ट (DHC) दिल्ली और केंद्र शासित प्रदेशों में नागरिक और आपराधिक मामलों की सुनवाई करता है। 2023 में, DHC की रीकसाल याचिकाओं के निपटान को लेकर आलोचना हुई, जहां केवल 12 में से 3 याचिकाएं मंजूर हुईं, जैसा कि DHC रजिस्ट्री के आंकड़ों से पता चलता है। यह मुद्दा तब सुर्खियों में आया जब पक्षकारों ने न्यायिक पक्षपात का आरोप लगाया, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और न्यायिक निष्पक्षता में जनता के विश्वास पर सवाल उठे।

मुद्दा इस बात का है कि कोर्ट ने स्पष्ट और सुसंगत रीकसाल टेस्ट लागू नहीं किया, जो अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 50 (न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण) के तहत संवैधानिक जिम्मेदारी को कमजोर करता है। यह कमी न्यायिक जवाबदेही और न्याय प्रणाली में निष्पक्षता की धारणा को प्रभावित करती है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: न्यायपालिका – न्यायिक स्वतंत्रता, जवाबदेही और रीकसाल के सिद्धांत
  • GS पेपर 2: संवैधानिक प्रावधान – अनुच्छेद 14 और 50
  • GS पेपर 3: न्यायिक देरी के आर्थिक प्रभाव और व्यापार सुगमता
  • निबंध: न्याय सुधार और भारत में कानून का शासन मजबूत करना

भारतीय न्यायपालिका में रीकसाल के कानूनी ढांचे

रीकसाल के लिए मुख्य कानूनी प्रावधान सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के Order 1 Rule 7 में है, जो पक्षकार को पक्षपात या हितों के आधार पर न्यायाधीश को हटाने का अनुरोध करने की अनुमति देता है। हालांकि, इस प्रावधान में विस्तृत मानदंड नहीं हैं, जिससे फैसले मनमाने और असंगत होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट Advocates-on-Record Association बनाम भारत संघ (1993) 4 SCC 441 ने न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने पर जोर दिया और निष्पक्षता को संवैधानिक अनिवार्यता माना। S.P. Gupta बनाम भारत संघ (1981) 2 SCC 87 ने न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता को प्राकृतिक न्याय के आधार स्तंभ के रूप में स्थापित किया।

2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा के फैसले में तीन-स्तरीय रीकसाल टेस्ट दिया: (1) पक्षपात की उचित आशंका, (2) हितों का टकराव, और (3) न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखना। इसके बावजूद, दिल्ली हाई कोर्ट ने इन मानदंडों को अपनी प्रक्रिया में शामिल नहीं किया है।

दिल्ली हाई कोर्ट के रीकसाल दृष्टिकोण में संस्थागत और प्रक्रियात्मक खामियां

दिल्ली हाई कोर्ट नियम, 2018 में न्यायिक आचरण और रीकसाल का अध्याय है, लेकिन रीकसाल निर्णयों के लिए स्पष्ट और संहिताबद्ध दिशानिर्देश नहीं हैं। इस कमी के कारण फैसले मनमाने और पारदर्शिता के बिना होते हैं, जिससे पक्षकारों का विश्वास कम होता है।

भारतीय विधि आयोग की 277वीं रिपोर्ट (2018) ने पारदर्शिता और एकरूपता बढ़ाने के लिए संहिताबद्ध रीकसाल दिशानिर्देशों की सिफारिश की थी। मगर ये सुझाव लागू नहीं हुए हैं, जिससे न्यायिक जवाबदेही के महत्वपूर्ण तंत्र कमजोर हैं।

इसके अलावा, प्रस्तावित Judicial Standards and Accountability Authority (JSAA) अभी तक कार्यरत नहीं है, जो रीकसाल और न्यायिक आचरण की निगरानी कर सकता था।

न्यायिक देरी और पक्षपात की धारणा के आर्थिक परिणाम

दिल्ली हाई कोर्ट जैसी अदालतों में न्यायिक देरी और पक्षपात की धारणा व्यावसायिक विवाद निपटान को प्रभावित करती है, जो भारत के आर्थिक माहौल पर असर डालती है। दिल्ली हाई कोर्ट वार्षिक रिपोर्ट 2022 के अनुसार, लंबित मामले 1.5 लाख से अधिक हैं और औसत निपटान समय 3 साल से ऊपर है।

  • भारत ने वर्ल्ड बैंक के Doing Business Report 2020 में 63वां स्थान प्राप्त किया, जहां न्यायिक देरी को बड़ी बाधा बताया गया।
  • नीति आयोग (2022) के अनुसार, देरी से होने वाला आर्थिक नुकसान जीडीपी का 0.5-1% वार्षिक है।
  • निष्पक्ष और कुशल न्यायपालिका सीधे विदेशी निवेश (FDI) को बढ़ावा देती है, जो FY 2022-23 में $83.57 बिलियन रहा (Department for Promotion of Industry and Internal Trade)।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम यूनाइटेड किंगडम में न्यायिक रीकसाल

पहलू भारत (दिल्ली हाई कोर्ट) यूनाइटेड किंगडम
रीकसाल दिशानिर्देश गैर-संहिताबद्ध; Order 1 Rule 7 CPC के तहत मनमाने निर्णय; कोई एकरूप टेस्ट नहीं Judicial Code of Conduct (2013) के तहत स्पष्ट मानदंड और पारदर्शी प्रक्रिया
न्यायपालिका में जनता का भरोसा 68% पक्षकारों ने पक्षपात की चिंता जताई (Vidhi Centre, 2021) 40% अधिक सार्वजनिक विश्वास स्कोर (UK Ministry of Justice 2022)
संस्थागत निगरानी JSAA प्रस्तावित लेकिन सक्रिय नहीं स्वतंत्र Judicial Conduct Investigations Office सक्रिय
कानून के शासन पर प्रभाव World Justice Project Rule of Law Index 2023 में 79वां स्थान विश्व स्तर पर शीर्ष 20 में शामिल

महत्व और आगे का रास्ता

  • दिल्ली हाई कोर्ट नियमों में सुप्रीम कोर्ट के तीन-स्तरीय मानदंडों के आधार पर एक समान रीकसाल टेस्ट को संहिताबद्ध करें ताकि निर्णय सुसंगत हों।
  • Judicial Standards and Accountability Authority को सक्रिय करें ताकि रीकसाल फैसलों में पारदर्शिता और संस्थागत निगरानी हो सके।
  • न्यायाधीशों के लिए हितों के संभावित टकराव की अनिवार्य घोषणा के नियम लागू करें ताकि पक्षपात की आशंका को रोका जा सके।
  • न्यायिक नैतिकता और रीकसाल सिद्धांतों पर न्यायाधीशों के प्रशिक्षण को बढ़ावा दें, जो अनुच्छेद 14 और 50 की संवैधानिक जिम्मेदारियों के अनुरूप हो।
  • मामलों के समय पर निपटान के लिए तकनीक का उपयोग बढ़ाएं, ताकि लंबित मामलों को कम किया जा सके और न्यायपालिका में जनता का विश्वास बहाल हो।

भारत में न्यायिक रीकसाल के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. सिविल प्रक्रिया संहिता के Order 1 Rule 7 में रीकसाल के लिए तीन-स्तरीय टेस्ट स्पष्ट रूप से परिभाषित है।
  2. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में रीकसाल के लिए पक्षपात की उचित आशंका को मुख्य कारक माना।
  3. विधि आयोग की 277वीं रिपोर्ट में संहिताबद्ध रीकसाल दिशानिर्देशों की सिफारिश की गई।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि Order 1 Rule 7 CPC में तीन-स्तरीय टेस्ट परिभाषित नहीं है; यह केवल पक्षपात या हित के आधार पर रीकसाल की अनुमति देता है। कथन 2 सही है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में पक्षपात की उचित आशंका को महत्वपूर्ण माना। कथन 3 भी सही है क्योंकि विधि आयोग की 277वीं रिपोर्ट ने संहिताबद्ध दिशानिर्देशों की सिफारिश की।

भारत में न्यायिक जवाबदेही तंत्र के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. Judicial Standards and Accountability Authority (JSAA) पूरी तरह सक्रिय है और रीकसाल याचिकाओं की निगरानी करती है।
  2. दिल्ली हाई कोर्ट नियम, 2018 में रीकसाल के विस्तृत संहिताबद्ध नियम शामिल हैं।
  3. सुप्रीम कोर्ट Advocates-on-Record Association केस ने न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने पर जोर दिया।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) और (c) केवल
  • (c) केवल
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

कथन 1 गलत है क्योंकि JSAA प्रस्तावित है लेकिन सक्रिय नहीं है। कथन 2 गलत है क्योंकि दिल्ली हाई कोर्ट नियमों में विस्तृत संहिताबद्ध रीकसाल नियम नहीं हैं। कथन 3 सही है; इस केस ने न्यायिक स्वतंत्रता पर जोर दिया।

मुख्य प्रश्न

दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा मजबूत रीकसाल टेस्ट लागू न करने के न्यायिक निष्पक्षता और जनता के विश्वास पर प्रभावों पर चर्चा करें। संवैधानिक प्रावधानों और आर्थिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इस समस्या के समाधान के लिए संस्थागत सुधार सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – शासन और संविधान (न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही)
  • झारखंड का संदर्भ: झारखंड हाई कोर्ट को भी न्यायिक देरी और रीकसाल याचिकाओं में समान चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे पक्षकारों का भरोसा और प्रशासनिक दक्षता प्रभावित होती है।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड में न्यायिक विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए संहिताबद्ध रीकसाल मानदंड और संस्थागत सुधारों की जरूरत पर जोर दें, जो राष्ट्रीय मुद्दों का एक सूक्ष्म रूप है।
भारत में न्यायिक रीकसाल का संवैधानिक आधार क्या है?

न्यायिक रीकसाल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है, विशेषकर अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) जो निष्पक्षता सुनिश्चित करता है, और अनुच्छेद 50 जो न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने का निर्देश देता है ताकि स्वतंत्रता बनी रहे।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक रीकसाल के लिए कौन सा टेस्ट दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने तीन-स्तरीय टेस्ट दिया: (1) पक्षपात की उचित आशंका, (2) हितों का टकराव, और (3) न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखना।

न्यायिक देरी भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती है?

न्यायिक देरी से वार्षिक जीडीपी का 0.5-1% तक आर्थिक नुकसान होता है (नीति आयोग, 2022), क्योंकि विवादों का समाधान धीमा होता है, जिससे व्यापार सुगमता और विदेशी निवेश प्रभावित होता है।

विधि आयोग की 277वीं रिपोर्ट में रीकसाल के लिए क्या सिफारिशें हैं?

रिपोर्ट में न्यायिक आचरण को मानकीकृत करने, मनमानी कम करने और जवाबदेही बढ़ाने के लिए संहिताबद्ध, पारदर्शी रीकसाल दिशानिर्देश बनाने की सिफारिश की गई है।

यूनाइटेड किंगडम का न्यायिक रीकसाल सिस्टम भारत से कैसे अलग है?

यूके में Judicial Code of Conduct (2013) के तहत स्पष्ट रीकसाल मानदंड और स्वतंत्र निगरानी तंत्र है, जिससे भारत की मनमानी और गैर-संहिताबद्ध प्रक्रिया की तुलना में अधिक सार्वजनिक विश्वास मिलता है।

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