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Governance · Exam Notes

2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनःवितरण: संवैधानिक और राजनीतिक पहलू

संविधान (131वें संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक के माध्यम से 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनःवितरण का प्रस्ताव है, जिसमें सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने का लक्ष्य है, जो 1971 के बाद हुए जनसांख्यिकीय बदलावों को प्रतिबिंबित करता है। यह कदम राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असमानताओं को दूर करने की कोशिश है, लेकिन इससे संघीय संतुलन, राज्यों के भीतर परिसीमन और संसदीय खर्च में वृद्धि जैसे मुद्दे भी सामने आते हैं।
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Governance
Exam Notes
GS Paper II

Constitution, governance, social justice and institutional analysis

In brief

संविधान (131वें संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक के माध्यम से 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनःवितरण का प्रस्ताव है, जिसमें सीटों की संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने का लक्ष्य है, जो 1971 के बाद हुए जनसांख्यिकीय बदलावों को प्रतिबिंबित करता है। यह कदम राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असमानताओं को दूर करने की कोशिश है, लेकिन इससे संघीय संतुलन, राज्यों के भीतर परिसीमन और संसदीय खर्च में वृद्धि जैसे मुद्दे भी सामने आते हैं।

परिचय: संवैधानिक ढांचा और वर्तमान स्थिति

लोकसभा, जो भारत की संसद का निचला सदन है, वर्तमान में 543 निर्वाचित सदस्यों की प्रभावी संख्या के साथ कार्यरत है, जबकि संविधान के अनुच्छेद 81 के अनुसार इसकी अधिकतम सीटें 550 हैं (राज्यों के लिए 530 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 20)। सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर किया गया है, जो 42वें, 84वें और 95वें संवैधानिक संशोधन अधिनियमों के तहत 2026 के बाद की पहली जनगणना तक जारी रहेगा। यह स्थिरीकरण जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया था, लेकिन 2011 की जनगणना में आए जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असंतुलन पैदा हो गया है।

  • संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2023 इस स्थिरीकरण को हटाकर लोकसभा की अधिकतम सीटें 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव करता है।
  • परिसीमन विधेयक परिसीमन आयोग को 2011 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं फिर से निर्धारित करने और सीटों का पुनःआवंटन करने का अधिकार देने का प्रयास करता है।

सीट पुनःवितरण से जुड़ी कानूनी व्यवस्थाएं

अनुच्छेद 81 लोकसभा की संरचना और राज्यों में सीटों के आवंटन को नियंत्रित करता है। 1976 में लागू 42वें संशोधन अधिनियम ने राज्यों के बीच सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगाई, जिसे बाद में 84वें और 95वें संशोधनों के तहत 2026 के बाद तक बढ़ाया गया। परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत परिसीमन आयोग का गठन होता है, जिसके आदेश प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 29A के तहत कानूनी मान्यता प्राप्त हैं।

  • प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन इस स्थिरीकरण को हटाकर 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनःआवंटन संभव बनाएगा।
  • परिसीमन आयोग को राज्यों के बीच सीटों के आवंटन और राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनःनिर्धारित करने का निर्देश दिया जाएगा।

पुनःवितरण के जनसांख्यिकीय और राजनीतिक प्रभाव

2011 की जनगणना में भारत की जनसंख्या लगभग 1.21 अरब दर्ज की गई, जो 1971 के बाद हुए महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय बदलावों को दर्शाती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र जैसे अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्य अतिरिक्त लोकसभा सीटें हासिल कर सकते हैं, जबकि कम वृद्धि वाले राज्यों का सापेक्ष प्रतिनिधित्व घट सकता है।

  • लोकसभा की सीटों को 850 तक बढ़ाना वर्तमान जनसांख्यिकीय स्थिति के अनुरूप बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेगा।
  • इस पुनःआवंटन से राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति का संतुलन बदलेगा, जो संघीय ढांचे और संसाधन वितरण पर असर डाल सकता है।
  • हालांकि, 2001 की जनगणना पर आधारित राज्यों के भीतर परिसीमन पर रोक बनी रहेगी, जिससे राज्यों के अंदर मतदाता प्रतिनिधित्व में असमानता जारी रह सकती है।

आर्थिक लागत और बजटीय प्रभाव

लोकसभा की सीटों में 300 की वृद्धि से वित्तीय प्रभाव काफी होगा। एक सांसद का वार्षिक वेतन और भत्ते लगभग ₹1.2 करोड़ हैं (PRS Legislative Research, 2023), जिससे अतिरिक्त 300 सांसदों के लिए लगभग ₹360 करोड़ वार्षिक खर्च बढ़ेगा।

  • प्रशासनिक और व्यवस्थापकीय खर्चों में भी वृद्धि होगी, जिससे संसदीय व्यय बढ़ेगा।
  • जनसंख्या वाले राज्यों को राजनीतिक सशक्तिकरण मिलने से केंद्रीय निधि वितरण और क्षेत्रीय विकास योजनाओं पर प्रभाव पड़ सकता है।

पुनःवितरण में प्रमुख संस्थानों की भूमिका

  • परिसीमन आयोग: जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने और सीटों का पुनःआवंटन करने वाला संवैधानिक निकाय।
  • चुनाव आयोग: परिसीमन आदेशों के पालन को सुनिश्चित करता है और नए सीट आवंटन के तहत चुनावों का संचालन करता है।
  • कानून और न्याय मंत्रालय: संवैधानिक संशोधन विधेयकों और पुनःवितरण से जुड़े कानूनी ढांचे का मसौदा तैयार करता है।
  • गृह मंत्रालय: जनगणना डेटा का संरक्षण करता है और परिसीमन के लिए आवश्यक जनसांख्यिकीय जानकारी प्रदान करता है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत और अमेरिका का सीट आवंटन

विशेषताभारतसंयुक्त राज्य अमेरिका
सीट आवंटन का आधारदशवार्षिक जनगणना (वर्तमान में 2011 की जनगणना प्रस्तावित)हर 10 साल बाद दशवार्षिक जनगणना
निचले सदन की कुल सीटें550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव1911 से स्थिर 435 सीटें
सीट पुनःवितरण की आवृत्ति1971 की जनगणना से स्थिर, 2026 के बाद पुनः शुरू होने की संभावनाहर 10 साल बाद पुनःआवंटन
प्रतिनिधित्व पर प्रभावजनसंख्या वृद्धि के अनुरूप समानुपातिक प्रतिनिधित्वस्थिर सीटें असमान प्रतिनिधित्व पैदा कर सकती हैं
विधायी कार्यक्षमतासीटों में वृद्धि से चुनौतियां संभवस्थिर सीट संख्या से प्रबंधन आसान

महत्वपूर्ण चुनौतियां और समस्याएं

  • सीट पुनःवितरण से तेज़ी से बढ़ रहे राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी, जिससे संघीय तनाव बढ़ सकते हैं और राजनीतिक असमानता हो सकती है।
  • राज्यों के भीतर परिसीमन पर 2001 की जनगणना आधारित स्थिरीकरण से मतदाता असमानता बनी रह सकती है।
  • लोकसभा के आकार में वृद्धि से संसदीय कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और प्रशासनिक खर्च बढ़ सकते हैं।

महत्व और आगे का रास्ता

  • 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनःवितरण जरूरी है ताकि जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के अनुसार राजनीतिक प्रतिनिधित्व न्यायसंगत बने।
  • राज्यों के भीतर समान मतदाता प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए व्यापक परिसीमन आवश्यक है।
  • संस्थागत तंत्र को मजबूत कर संसदीय आकार बढ़ने के बावजूद दक्षता बनाए रखनी होगी।
  • संघीय संतुलन बनाए रखने के लिए संवाद और संवैधानिक सुरक्षा उपाय जरूरी हैं ताकि क्षेत्रीय असमानताओं को कम किया जा सके।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: राजनीति और शासन – संसद से जुड़े संवैधानिक प्रावधान, संघवाद और चुनाव सुधार।
  • निबंध: राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संघवाद और भारत में जनसांख्यिकीय बदलावों से जुड़े मुद्दे।

लोकसभा सीट आवंटन पर स्थिरीकरण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. अंतर-राज्य सीट आवंटन पर स्थिरीकरण 1971 की जनगणना पर आधारित है।
  2. यह स्थिरीकरण 2026 के बाद की पहली जनगणना तक प्रभावी रहेगा।
  3. स्थिरीकरण अंतर-राज्य सीट आवंटन और राज्य के भीतर निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन दोनों पर लागू है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि स्थिरीकरण 1971 की जनगणना पर आधारित है। कथन 2 भी सही है क्योंकि यह स्थिरीकरण 2026 के बाद की पहली जनगणना तक लागू रहेगा। कथन 3 गलत है क्योंकि राज्यों के भीतर परिसीमन पर स्थिरीकरण 2001 की जनगणना पर आधारित है, न कि 1971 की।

परिसीमन आयोग के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. यह परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत गठित होता है।
  2. इसके आदेशों को प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत कानूनी मान्यता प्राप्त है।
  3. यह भारत में जनगणना कराने के लिए जिम्मेदार है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (a)

कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि जनगणना गृह मंत्रालय द्वारा कराई जाती है, न कि परिसीमन आयोग द्वारा।

मुख्य प्रश्न

2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनःवितरण के संवैधानिक और राजनीतिक प्रभावों पर चर्चा करें। प्रस्तावित सीटों की वृद्धि भारत में संघीय संतुलन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कैसे प्रभावित करती है?

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – भारतीय राजनीति और शासन
  • झारखंड दृष्टिकोण: झारखंड की जनसंख्या वृद्धि और जनसांख्यिकीय बदलाव परिसीमन के बाद उसकी लोकसभा सीटों पर असर डाल सकते हैं।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड के वर्तमान प्रतिनिधित्व, पुनःवितरण के बाद संभावित बदलाव और क्षेत्रीय राजनीतिक प्रभाव पर जवाब तैयार करें।
लोकसभा की कुल सीटों पर वर्तमान संवैधानिक सीमा क्या है?

संविधान के अनुच्छेद 81(1) के अनुसार लोकसभा की अधिकतम सीटें 550 हैं, जिनमें से 530 राज्यों और 20 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए आरक्षित हैं।

लोकसभा सीट आवंटन पर स्थिरीकरण क्यों लागू किया गया था?

1976 के 42वें संशोधन द्वारा लागू स्थिरीकरण का उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करना था ताकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अतिरिक्त सीटें न मिलें।

अंतर-राज्य सीट आवंटन और राज्य के भीतर परिसीमन के लिए वर्तमान में कौन-सी जनगणना का उपयोग होता है?

अंतर-राज्य सीट आवंटन 1971 की जनगणना पर स्थिर है, जबकि राज्य के भीतर परिसीमन 2001 की जनगणना पर स्थिर है।

सीट पुनःवितरण प्रक्रिया में परिसीमन आयोग की भूमिका क्या है?

परिसीमन आयोग नवीनतम जनगणना डेटा के आधार पर संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करता है और राज्यों के बीच सीटों का पुनःआवंटन करता है, जिसके आदेश कानून के समान होते हैं।

लोकसभा सीटों की वृद्धि से संसदीय बजट पर क्या प्रभाव पड़ता है?

एक सांसद का वार्षिक वेतन और भत्ते लगभग ₹1.2 करोड़ हैं; 300 सीटों की वृद्धि से संसदीय व्यय में लगभग ₹360 करोड़ की वार्षिक वृद्धि होगी।

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