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माइक्रोप्लास्टिक्स, जो 5 मिमी से छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, चेन्नई के समुद्र तटों पर वैश्विक हॉटस्पॉट्स की तुलना में कम मात्रा में पाए जाने के बावजूद गंभीर पारिस्थितिक जोखिम पैदा करते हैं। इनकी विषाक्तता, प्रदूषक वाहक क्षमता और पर्यावरण में बने रहने की क्षमता समुद्री जीव विविधता और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं। भारत का पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम बड़े प्लास्टिक पर ध्यान देते हैं, लेकिन माइक्रोप्लास्टिक्स के लिए नीतिगत सुधार आवश्यक हैं।
परिचय: माइक्रोप्लास्टिक्स और उनका पर्यावरणीय संदर्भ
माइक्रोप्लास्टिक्स वे प्लास्टिक कण हैं जो 5 मिलीमीटर से छोटे होते हैं और कई बार नग्न आंखों से दिखाई नहीं देते। ये विश्व भर के समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों में व्यापक प्रदूषक के रूप में उभरे हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में वैश्विक स्तर पर लगभग 2.7 मिलियन टन माइक्रोप्लास्टिक्स पर्यावरण में प्रवेश कर चुके थे, जो 2040 तक दोगुने होने का अनुमान है। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) के 2025 के अध्ययन में पाया गया कि चेन्नई के समुद्र तटों पर माइक्रोप्लास्टिक्स की मात्रा दक्षिण-पूर्व एशिया और यूरोप के हॉटस्पॉट्स की तुलना में काफी कम है। इसके बावजूद, इन कणों की विषाक्तता और स्थायी प्रदूषक ले जाने की क्षमता के कारण पारिस्थितिक खतरे कम नहीं हैं।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – समुद्री प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण
- GS पेपर 1: भूगोल – तटीय पारिस्थितिक तंत्र और पर्यावरणीय चुनौतियां
- निबंध: पर्यावरण प्रदूषण और सतत विकास
माइक्रोप्लास्टिक्स की विशेषताएं और स्रोत
- परिभाषा: माइक्रोप्लास्टिक्स 5 मिमी से छोटे प्लास्टिक के टुकड़े, तंतु, मोती, गुठली, फिल्म या फोम होते हैं (NextIAS, 2025)।
- प्रकार: प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक्स वे होते हैं जो छोटे आकार में निर्मित होते हैं, जैसे कॉस्मेटिक्स में माइक्रोबीड्स, जो कुल माइक्रोप्लास्टिक्स का लगभग 10% हैं; द्वितीयक माइक्रोप्लास्टिक्स बड़े प्लास्टिक जैसे बोतल और थैलों के टूटने से बनते हैं (UNEP, 2023)।
- मुख्य स्रोत: सिंथेटिक वस्त्र समुद्री माइक्रोप्लास्टिक्स में लगभग 35% योगदान देते हैं, खासकर नायलॉन माइक्रोफाइबर के माध्यम से; मछली पकड़ने के उपकरण कम से कम 10% समुद्री कचरे के लिए जिम्मेदार हैं, जो सालाना 0.5 से 1 मिलियन टन तक छोड़ते हैं।
- पहचान में मुश्किल: कई माइक्रोप्लास्टिक्स 1 मिमी से भी छोटे और अदृश्य होते हैं, जिससे निगरानी और हटाने में कठिनाई होती है (NextIAS, 2025)।
माइक्रोप्लास्टिक्स के पारिस्थितिक और स्वास्थ्य जोखिम
- विषाक्तता: नायलॉन माइक्रोफाइबर, जो समुद्री माइक्रोप्लास्टिक्स का लगभग 35% हैं, उच्च विषाक्तता और स्थायित्व दिखाते हैं (Science Advances, 2024)।
- प्रदूषक वाहक: माइक्रोप्लास्टिक्स स्थायी कार्बनिक प्रदूषक (POPs) और भारी धातुओं को आस-पास के पानी से 105–106 गुना अधिक मात्रा में अवशोषित करते हैं, जिससे जैव संचयन का खतरा बढ़ता है (Environmental Science & Technology, 2023)।
- खाद्य श्रृंखला में स्थानांतरण: माइक्रोप्लास्टिक्स समुद्री खाद्य जाल में प्लैंकटन से मछली और फिर मनुष्यों तक पहुंचते हैं, जिससे विषाक्त पदार्थों का जैव वृद्धि होती है और स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।
- मानव स्वास्थ्य चिंताएं: हालिया सबूत बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक्स मानव ऊतकों में जमा हो सकते हैं, जिनके न्यूरोटॉक्सिक और अंतःस्रावी विकार उत्पन्न करने की संभावना है (NextIAS, 2025)।
भारत में कानूनी और संस्थागत ढांचा
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: धारा 3 के तहत केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाने का अधिकार है, जिसमें प्लास्टिक प्रदूषण नियंत्रण भी शामिल है।
- प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, 2016 (संशोधित 2018): प्लास्टिक कचरे के पृथक्करण, संग्रहण और पुनर्चक्रण को लागू करते हैं; लेकिन मुख्य रूप से बड़े प्लास्टिक पर ही ध्यान केंद्रित है।
- तटीय क्षेत्र विनियमन अधिसूचना (CRZ), 2019: तटीय प्रदूषण को नियंत्रित करती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से माइक्रोप्लास्टिक के निर्वहन को प्रभावित करती है।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT): पर्यावरणीय विवादों का निपटारा करता है, जिसमें प्लास्टिक प्रदूषण प्रबंधन और नियमों का पालन शामिल है।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार का निर्देश देता है, जो माइक्रोप्लास्टिक नियंत्रण के लिए आधार प्रदान करता है।
- प्रमुख संस्थान: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) प्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी करता है; पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) नीतियां बनाता है; NIO समुद्री माइक्रोप्लास्टिक्स पर शोध करता है; ICAR मत्स्य पालन पर प्रभावों का अध्ययन करता है।
माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के आर्थिक पहलू
- भारत का प्लास्टिक कचरा प्रबंधन बाजार 2023 में 1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था, जो 2030 तक 7.5% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ने का अनुमान है (FICCI, 2023)।
- समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से भारत के मत्स्य क्षेत्र को सालाना लगभग 0.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान होता है (विश्व बैंक, 2019)।
- सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन (प्लास्टिक कचरा प्रबंधन) के तहत 2023-24 में 300 करोड़ रुपये कचरा प्रबंधन अवसंरचना को मजबूत करने के लिए आवंटित किए हैं।
- वैश्विक स्तर पर, माइक्रोप्लास्टिक्स उपचार बाजार 2027 तक 1.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है (MarketsandMarkets)।
तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम यूरोपीय संघ की माइक्रोप्लास्टिक्स नीति
| पहलू | भारत | यूरोपीय संघ (EU) |
|---|---|---|
| नियामक फोकस | मुख्य रूप से मैक्रोप्लास्टिक कचरा प्रबंधन; माइक्रोप्लास्टिक्स के लिए सीमित नियम | जानबूझकर जोड़े गए माइक्रोप्लास्टिक्स (जैसे कॉस्मेटिक्स) पर स्पष्ट प्रतिबंध; वस्त्र माइक्रोफाइबर नियम |
| नीति उपकरण | प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, CRZ अधिसूचना, NGT के निर्णय | EU प्लास्टिक्स रणनीति (2018), माइक्रोप्लास्टिक्स रणनीति, अपशिष्ट जल उपचार मानक |
| प्रभाव | माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण पर कम ध्यान; वस्त्र और टायर से निकलने वाले स्रोतों का नियंत्रण नहीं | 2018 के आधार वर्ष की तुलना में 2023 तक अपशिष्ट जल में माइक्रोप्लास्टिक उत्सर्जन में 25% कमी (यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी, 2024) |
| प्रवर्तन | खंडित प्रवर्तन; CPCB और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड | EU स्तर पर समन्वित प्रवर्तन; सख्त अनुपालन और निगरानी |
भारत में नीतिगत कमियां और चुनौतियां
- सिंथेटिक वस्त्र और टायर के घिसाव जैसे माइक्रोप्लास्टिक स्रोतों पर नियामक ध्यान अपर्याप्त है, जो प्रदूषण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
- माइक्रोप्लास्टिक्स, खासकर 1 मिमी से छोटे कणों की निगरानी के लिए सीमित अवसंरचना।
- माइक्रोप्लास्टिक के खतरों के प्रति जनता और हितधारकों में जागरूकता कम है।
- केंद्र और राज्य एजेंसियों के बीच क्षेत्राधिकार के ओवरलैप के कारण प्रवर्तन में दिक्कतें।
- राष्ट्रीय स्तर पर माइक्रोप्लास्टिक के लिए कोई विशिष्ट मानक या सीमाएं नहीं हैं, विशेष रूप से अपशिष्ट जल और औद्योगिक उत्सर्जन में।
आगे का रास्ता: माइक्रोप्लास्टिक के पारिस्थितिक खतरों से निपटना
- प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमों का विस्तार कर माइक्रोप्लास्टिक स्रोतों को स्पष्ट रूप से शामिल करें, खासकर सिंथेटिक वस्त्र और टायर से निकलने वाले प्रदूषक।
- NIO और ICAR जैसे संस्थानों के माध्यम से निगरानी और शोध क्षमता मजबूत करें ताकि माइक्रोप्लास्टिक्स के वितरण और विषाक्तता पर विस्तृत आंकड़े मिल सकें।
- EU की तरह व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों में जानबूझकर जोड़े गए माइक्रोप्लास्टिक्स पर प्रतिबंध लागू करें और जैव-उपजाऊ विकल्पों के विकास को बढ़ावा दें।
- MoEFCC, CPCB, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और NGT के बीच समन्वय बढ़ाएं ताकि प्रवर्तन एकीकृत और प्रभावी हो।
- माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण और उसके स्वास्थ्य प्रभावों के प्रति जन जागरूकता अभियान चलाएं।
- अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों में माइक्रोप्लास्टिक्स को पकड़ने के लिए नवाचारी उपचार तकनीकों में निवेश करें।
माइक्रोप्लास्टिक्स के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक्स बड़े प्लास्टिक वस्तुओं के टूटने से बनते हैं।
- माइक्रोप्लास्टिक्स स्थायी कार्बनिक प्रदूषक और भारी धातुओं को आसपास के पानी की तुलना में बहुत अधिक सांद्रता में अवशोषित कर सकते हैं।
- हालिया अध्ययनों के अनुसार, चेन्नई के समुद्र तटों पर यूरोपीय समुद्र तटों की तुलना में माइक्रोप्लास्टिक्स की अधिकता है।
उपरोक्त में से कौन सा/से कथन सही हैं?
उत्तर: (a)
कथन 1 गलत है क्योंकि प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक्स निर्मित छोटे कण होते हैं, टूटने से नहीं बनते। कथन 2 सही है क्योंकि माइक्रोप्लास्टिक्स प्रदूषकों को उच्च सांद्रता में अवशोषित करते हैं। कथन 3 गलत है; चेन्नई के तटों पर माइक्रोप्लास्टिक्स की मात्रा यूरोपीय तटों से कम है (NIO, 2025)।
भारत के माइक्रोप्लास्टिक्स संबंधी कानूनी ढांचे के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
- प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, 2016, सिंथेटिक वस्त्रों से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक उत्सर्जन को स्पष्ट रूप से नियंत्रित करते हैं।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, केंद्र सरकार को प्लास्टिक प्रदूषण सहित पर्यावरण की रक्षा के लिए कदम उठाने का अधिकार देता है।
- तटीय क्षेत्र विनियमन अधिसूचना, 2019, तटीय प्रदूषण को नियंत्रित करती है लेकिन माइक्रोप्लास्टिक्स का विशेष उल्लेख नहीं करती।
उपरोक्त में से कौन सा/से कथन सही हैं?
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम सिंथेटिक वस्त्रों से माइक्रोप्लास्टिक उत्सर्जन को स्पष्ट रूप से नियंत्रित नहीं करते। कथन 2 सही है क्योंकि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत केंद्र सरकार को अधिकार प्राप्त है। कथन 3 सही है क्योंकि CRZ अधिसूचना तटीय प्रदूषण को नियंत्रित करती है लेकिन माइक्रोप्लास्टिक्स का विशेष उल्लेख नहीं है।
मुख्य प्रश्न
भारत में माइक्रोप्लास्टिक्स द्वारा समुद्री जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य को होने वाले पारिस्थितिक खतरों पर चर्चा करें। इन खतरों से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी और नीतिगत ढांचे की पर्याप्तता की समीक्षा करें और माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण प्रबंधन को मजबूत करने के उपाय सुझाएं। (250 शब्द)
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 3 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी, प्रदूषण और कचरा प्रबंधन
- झारखंड का दृष्टिकोण: भले ही यह राज्य समुद्री तट से दूर है, झारखंड के वस्त्र और प्लास्टिक निर्माण क्षेत्र नदियों के माध्यम से माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण में योगदान देते हैं, जो निचले इलाकों के पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित करता है।
- मुख्य बिंदु: औद्योगिक अपशिष्ट प्रबंधन, नदी प्रदूषण नियंत्रण, और राज्य स्तर पर प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमों के क्रियान्वयन पर जोर दें।
माइक्रोप्लास्टिक्स के मुख्य प्रकार और उनके स्रोत क्या हैं?
माइक्रोप्लास्टिक्स को प्राथमिक (निर्मित छोटे कण, जैसे कॉस्मेटिक्स में माइक्रोबीड्स) और द्वितीयक (बड़े प्लास्टिक के टूटने से बने) में बांटा जाता है। मुख्य स्रोत सिंथेटिक वस्त्र (35%), मछली पकड़ने के उपकरण (10%), और टायर घिसाव के कण हैं (UNEP, 2023)।
चेन्नई के समुद्र तटों पर कम माइक्रोप्लास्टिक्स होने के बावजूद पारिस्थितिक खतरा क्यों अधिक है?
चेन्नई के माइक्रोप्लास्टिक्स में नायलॉन माइक्रोफाइबर शामिल हैं, जो समुद्री माइक्रोप्लास्टिक्स का 35% हैं और अत्यंत विषैले तथा स्थायी होते हैं। ये स्थायी कार्बनिक प्रदूषक और भारी धातुओं को पानी की तुलना में 106 गुना अधिक अवशोषित करते हैं, जिससे जैव संचयन और खाद्य श्रृंखला में स्थानांतरण होता है (Science Advances, 2024)।
भारत में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कौन-कौन से कानूनी प्रावधान हैं?
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (धारा 3) केंद्र सरकार को पर्यावरण की रक्षा के लिए अधिकार देता है। प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियम, 2016 मुख्य रूप से मैक्रोप्लास्टिक्स पर केंद्रित हैं। CRZ अधिसूचना, 2019 तटीय प्रदूषण को नियंत्रित करती है। NGT संबंधित विवादों का निपटारा करता है।
यूरोपीय संघ की माइक्रोप्लास्टिक रणनीति भारत की तुलना में कैसे अलग है?
EU की माइक्रोप्लास्टिक रणनीति जानबूझकर जोड़े गए माइक्रोप्लास्टिक्स पर प्रतिबंध, कड़े वस्त्र माइक्रोफाइबर नियम, और अपशिष्ट जल उपचार मानक शामिल करती है, जिससे 2023 तक माइक्रोप्लास्टिक उत्सर्जन में 25% कमी आई है। भारत की नीतियां मुख्य रूप से मैक्रोप्लास्टिक पर केंद्रित हैं और माइक्रोप्लास्टिक के लिए सीमित उपाय हैं (यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी, 2024)।
माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का भारत पर आर्थिक प्रभाव क्या है?
समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण के कारण भारत के मत्स्य क्षेत्र को सालाना लगभग 0.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान होता है। प्लास्टिक कचरा प्रबंधन बाजार 2023 में 1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था, जिसमें 7.5% की वार्षिक वृद्धि दर अपेक्षित है। सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत 2023-24 में 300 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं (विश्व बैंक, 2019; FICCI, 2023)।
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