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रॉकेट पुनः प्रवेश और वायुमंडलीय प्रदूषण तथा अंतरिक्ष स्थिरता पर प्रभाव

परिचय: रॉकेट पुनः प्रवेश और ऊपरी वायुमंडलीय प्रदूषण

हाल ही में Geophysical Research Letters (2024) में प्रकाशित एक अध्ययन में पता चला है कि स्पेसएक्स के फाल्कन 9 जैसे रॉकेट के पुनः प्रवेश से मेसोस्फियर और लोअर थर्मोस्फियर (MLT क्षेत्र) में लिथियम परमाणुओं की मात्रा दस गुना बढ़ जाती है। यह वृद्धि मुख्य रूप से रॉकेट में लगे लिथियम-आयन बैटरियों और एल्युमिनियम मिश्र धातुओं के जलने और वाष्पित होने के कारण होती है। प्राकृतिक स्रोतों से प्रतिदिन लगभग 80 ग्राम लिथियम ऊपरी वायुमंडल में पहुंचता है (NASA के आंकड़े), लेकिन रॉकेट मलबे से मानवजनित धातुओं का स्तर वायुमंडलीय रसायन को बदलकर पर्यावरण और संचालन संबंधी जोखिम बढ़ा रहा है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: पर्यावरण (वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन), विज्ञान और प्रौद्योगिकी (अंतरिक्ष तकनीक, सैटेलाइट अनुप्रयोग)
  • निबंध: अंतरिक्ष गतिविधियों का पर्यावरणीय प्रभाव और सतत अंतरिक्ष शासन
  • प्रारंभिक परीक्षा: अंतरिक्ष मलबा, वायुमंडलीय प्रदूषण की परिभाषाएं, स्पेस लायबिलिटी कन्वेंशन

रॉकेट पुनः प्रवेश से वायुमंडलीय प्रदूषण: रासायनिक और भौतिक प्रक्रियाएं

रॉकेट के घटकों में लिथियम, एल्युमिनियम और अन्य मिश्र धातुएं होती हैं। पुनः प्रवेश के दौरान तीव्र गर्मी इन पदार्थों को जलाकर वाष्पित कर देती है, जिससे धातु के परमाणु और कण MLT क्षेत्र (लगभग 50-110 कि.मी. ऊंचाई) में पहुंचते हैं। ये धातुएं वायुमंडलीय तत्वों के साथ प्रतिक्रिया करके रासायनिक प्रक्रियाओं में बदलाव लाती हैं और ओजोन परत को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

  • कृत्रिम धातु का उत्सर्जन: पुनः प्रवेश के दौरान लिथियम के परमाणु प्राकृतिक स्तर से दस गुना अधिक निकलते हैं, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है।
  • ओजोन परत का खतरा: धातु कण ऐसे रासायनिक अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं जो ओजोन अणुओं को तोड़ते हैं, जिससे पराबैंगनी किरणों से सुरक्षा कम हो जाती है।
  • जलवायु प्रभाव: धातु के एयरोसोल वायुमंडलीय ताप अवशोषण और परिसंचरण पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं।

अंतरिक्ष मलबा और वायुमंडलीय प्रदूषण में उसकी भूमिका

अंतरिक्ष मलबा निष्क्रिय सैटेलाइट, उपयोग किए गए रॉकेट चरण और टकराव या टूट-फूट से बने टुकड़ों का समूह होता है। NASA के ऑर्बिटल डेब्री प्रोग्राम ऑफिस के अनुसार, 10 सेमी से बड़े 34,000 से अधिक मलबे पृथ्वी की कक्षा में हैं, जो 18,000 मील प्रति घंटे (29,000 किमी/घंटा) की गति से चलते हैं। ये उच्च गति वाले मलबे टकराव के कारण और अधिक मलबा उत्पन्न करते हैं, जो प्रदूषण और संचालन संबंधी खतरे बढ़ाते हैं।

  • केसलर सिंड्रोम: मलबे के टकराव का एक चेन रिएक्शन जो निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) को दशकों तक अनुपयोगी बना सकता है।
  • पुनः प्रवेश प्रदूषण: वायुमंडल में लौटते मलबे के जलने से धातु निकलती हैं, जो प्रदूषण बढ़ाती हैं।
  • संचालन संबंधी खतरे: मलबे की बढ़ती मात्रा सैटेलाइट रखरखाव और बीमा लागत बढ़ाती है, जिससे संचार, नेविगेशन, कृषि, रक्षा और वित्तीय सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

रॉकेट पुनः प्रवेश प्रदूषण से संबंधित कानूनी और नीतिगत ढांचा

भारत में वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (Section 3 केंद्रीय सरकार को पर्यावरण संरक्षण का अधिकार देता है) और वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (वायु प्रदूषक की परिभाषा) लागू हैं। अंतरिक्ष गतिविधि अधिनियम, 1972 अंतरिक्ष गतिविधियों को नियंत्रित करता है, लेकिन मलबा प्रबंधन और वायुमंडलीय प्रदूषण पर स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, बाहरी अंतरिक्ष संधि, 1967 पर्यावरणीय दिशानिर्देश देती है, जबकि स्पेस लायबिलिटी कन्वेंशन, 1972 क्षति दायित्व से संबंधित है, प्रदूषण को सीधे नियंत्रित नहीं करता।

  • भारत में फिलहाल रॉकेट पुनः प्रवेश से वायुमंडलीय प्रदूषण के लिए कोई विशेष कानून नहीं है।
  • संयुक्त राष्ट्र के COPUOS अंतरराष्ट्रीय नीतिगत ढांचे विकसित कर रहा है।
  • नीतिगत कमी के कारण भारत को पर्यावरणीय और संचालन संबंधी जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।

रॉकेट पुनः प्रवेश प्रदूषण के आर्थिक पहलू

वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 2021 में लगभग 469 अरब डॉलर थी, जो 6.7% वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रही है (Bryce Space and Technology Report, 2022)। भारत का ISRO का बजट 2023-24 में 13,949 करोड़ रुपये (~1.8 अरब डॉलर) था। रॉकेट पुनः प्रवेश और मलबे से होने वाला वायुमंडलीय प्रदूषण सैटेलाइट जोखिम बढ़ाता है, जिससे रखरखाव और बीमा लागत में वृद्धि होती है और महत्वपूर्ण सेवाओं में बाधा आ सकती है।

  • संचार, GPS, मौसम पूर्वानुमान जैसी सैटेलाइट आधारित सेवाओं में व्यवधान से कृषि, रक्षा, वित्त और आपदा प्रबंधन प्रभावित हो सकते हैं।
  • मलबे से संबंधित घटनाओं में वृद्धि से सैटेलाइट डाउनटाइम और प्रतिस्थापन लागत के कारण आर्थिक नुकसान हो सकता है।
  • अंतरिक्ष गतिविधियों की दीर्घकालिक स्थिरता अंतरिक्ष-आधारित क्षेत्रों में आर्थिक विकास के लिए जरूरी है।

अंतरिक्ष मलबा और वायुमंडलीय प्रदूषण प्रबंधन में संस्थागत भूमिका

मुख्य संस्थान हैं:

  • NASA: अंतरिक्ष मलबा गतिशीलता और वायुमंडलीय रसायन पर शोध।
  • ISRO: भारत के अंतरिक्ष मिशन और निष्क्रिय मलबा नियंत्रण; सक्रिय मलबा हटाने की नीति नहीं।
  • CPCB: वायु प्रदूषण निगरानी, अंतरिक्ष गतिविधियों से उभरते प्रदूषकों पर ध्यान।
  • UN COPUOS: शांतिपूर्ण और सतत अंतरिक्ष उपयोग पर अंतरराष्ट्रीय नीति समन्वय।
  • ESA: ClearSpace-1 मिशन (2025) जैसी सक्रिय मलबा हटाने की पहल।

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी मलबा प्रबंधन में

पहलू यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) भारत (ISRO)
सक्रिय मलबा हटाना ClearSpace-1 मिशन (2025) से निष्क्रिय सैटेलाइट पकड़कर कक्षा से बाहर करना कोई विशेष सक्रिय मलबा हटाने की नीति नहीं; निष्क्रिय नियंत्रण पर निर्भर
वायुमंडलीय प्रदूषण नियंत्रण शोध आधारित, मलबा हटाने रणनीतियों के साथ समन्वित रॉकेट पुनः प्रवेश से प्रदूषण पर स्पष्ट नियामक ढांचा नहीं
अंतरराष्ट्रीय सहयोग NASA-ESA संयुक्त अध्ययन में भागीदारी UN COPUOS में भागीदारी लेकिन नीति कार्यान्वयन सीमित
बजट और संसाधन मलबा हटाने तकनीक विकास के लिए निधि आवंटित मिशन प्रक्षेपण और सैटेलाइट विकास पर बजट केंद्रित

भारत के लिए नीतिगत खामियां और जोखिम

  • रॉकेट पुनः प्रवेश से वायुमंडलीय प्रदूषण पर स्पष्ट कानूनी प्रावधानों का अभाव पर्यावरणीय जोखिम बढ़ाता है।
  • सक्रिय मलबा हटाने के उपायों के न होने से टकराव और प्रदूषण की संभावना बढ़ती है।
  • सैटेलाइट सेवा में व्यवधान से आर्थिक नुकसान और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
  • बाहरी अंतरिक्ष संधि और उभरते अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत नीतिगत समन्वय आवश्यक है।

आगे का रास्ता: रॉकेट पुनः प्रवेश से वायुमंडलीय प्रदूषण का समाधान

  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और अंतरिक्ष गतिविधि अधिनियम के तहत विशेष नियम बनाएं जो पुनः प्रवेश प्रदूषण को नियंत्रित करें।
  • ESA के ClearSpace-1 मिशन से सीख लेकर सक्रिय मलबा हटाने की क्षमता विकसित करें।
  • ISRO और NASA के सहयोग से CPCB के माध्यम से ऊपरी वायुमंडल में धातु की निगरानी बढ़ाएं।
  • UN COPUOS के जरिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत कर बाध्यकारी नियम बनाएं।
  • रॉकेट प्रणोदकों और सामग्री में बदलाव के लिए शोध में निवेश करें ताकि पुनः प्रवेश के दौरान हानिकारक उत्सर्जन कम हों।

रॉकेट पुनः प्रवेश से वायुमंडलीय प्रदूषण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. प्राकृतिक अंतरिक्ष धूल रॉकेट पुनः प्रवेश से अधिक लिथियम ऊपरी वायुमंडल में पहुंचाती है।
  2. रॉकेट पुनः प्रवेश से निकलने वाली कृत्रिम धातुएं ओजोन परत को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
  3. स्पेस लायबिलिटी कन्वेंशन, 1972, अंतरिक्ष गतिविधियों से होने वाले वायुमंडलीय प्रदूषण को सीधे नियंत्रित करता है।

इनमें से कौन सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) केवल 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि प्राकृतिक अंतरिक्ष धूल से प्रतिदिन लगभग 80 ग्राम लिथियम पहुंचता है, जो रॉकेट पुनः प्रवेश से निकलने वाले स्तर से कम है। कथन 2 सही है क्योंकि कृत्रिम धातुएं ओजोन के क्षरण को बढ़ावा देती हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि स्पेस लायबिलिटी कन्वेंशन क्षति दायित्व से संबंधित है, प्रदूषण नियंत्रण से नहीं।

अंतरिक्ष मलबा और उसके प्रभाव के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. अंतरिक्ष मलबा 18,000 मील प्रति घंटे की गति से चलता है, जिससे टकराव का खतरा बढ़ता है।
  2. केसलर सिंड्रोम प्राकृतिक अंतरिक्ष धूल के वायुमंडल में जमाव को दर्शाता है।
  3. भारत के पास निम्न पृथ्वी कक्षा में सक्रिय मलबा हटाने का मिशन है।

इनमें से कौन सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 1 और 3
  • (c) केवल 2
  • (d) केवल 1 और 2

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि अंतरिक्ष मलबा अत्यंत उच्च गति से चलता है और टकराव का खतरा बढ़ाता है। कथन 2 गलत है; केसलर सिंड्रोम मलबे के टकराव से उत्पन्न मलबे के तेजी से बढ़ने की स्थिति है, प्राकृतिक धूल का जमाव नहीं। कथन 3 गलत है क्योंकि भारत के पास सक्रिय मलबा हटाने का मिशन नहीं है और वह निष्क्रिय नियंत्रण पर निर्भर है।

मुख्य प्रश्न

रॉकेट पुनः प्रवेश से होने वाले वायुमंडलीय प्रदूषण के पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभावों पर चर्चा करें। भारत को इन चुनौतियों से निपटने के लिए किन नीतिगत उपायों को अपनाना चाहिए ताकि अंतरराष्ट्रीय श्रेष्ठ प्रथाओं के अनुरूप काम किया जा सके? (250 शब्द)

झारखंड एवं JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 3 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड के बढ़ते आईटी और संचार क्षेत्र सैटेलाइट सेवाओं पर निर्भर हैं, जो अंतरिक्ष मलबे से प्रभावित हो सकते हैं।
  • मुख्य बिंदु: राज्य स्तर पर अंतरिक्ष पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति जागरूकता और राष्ट्रीय नीतिगत ढांचे के साथ समन्वय आवश्यक है।
रॉकेट पुनः प्रवेश के दौरान ऊपरी वायुमंडल में लिथियम परमाणुओं की वृद्धि का कारण क्या है?

रॉकेट पुनः प्रवेश के दौरान लिथियम-आयन बैटरियों और एल्युमिनियम मिश्र धातुओं के जलने से धातु वाष्पित होकर मेसोस्फियर और लोअर थर्मोस्फियर में लिथियम परमाणुओं की मात्रा प्राकृतिक स्तर से दस गुना अधिक हो जाती है (Geophysical Research Letters, 2024)।

अंतरिक्ष मलबा वायुमंडलीय प्रदूषण में कैसे योगदान देता है?

वायुमंडल में लौटते अंतरिक्ष मलबे के जलने से धातु कण निकलते हैं, जो कृत्रिम धातुओं के रूप में ऊपरी वायुमंडल में पहुंचकर रासायनिक संरचना बदलते हैं, जिससे ओजोन और जलवायु प्रणाली प्रभावित हो सकती है।

केसलर सिंड्रोम क्या है और इसका महत्व क्या है?

केसलर सिंड्रोम एक स्थिति है जहां अंतरिक्ष मलबे के टकराव की श्रृंखला तेजी से बढ़ती है, जिससे मलबे की संख्या इतनी बढ़ जाती है कि निम्न पृथ्वी कक्षा दशकों तक उपयोग के लिए अनुपयुक्त हो सकती है, जो सैटेलाइट संचालन और अंतरिक्ष स्थिरता के लिए खतरा है (NASA और ESA के अध्ययन)।

क्या भारत के पास सक्रिय अंतरिक्ष मलबा हटाने की नीति है?

वर्तमान में भारत के पास सक्रिय मलबा हटाने की कोई विशेष नीति नहीं है और वह मुख्यतः निष्क्रिय नियंत्रण उपायों पर निर्भर है, जबकि ESA जैसी एजेंसियां ClearSpace-1 (2025) जैसी सक्रिय मिशन योजना बना रही हैं।

अंतरिक्ष गतिविधियों के पर्यावरणीय पहलुओं को नियंत्रित करने वाले अंतरराष्ट्रीय संधि कौन-कौन सी हैं?

बाहरी अंतरिक्ष संधि, 1967 व्यापक पर्यावरणीय दिशानिर्देश प्रदान करती है, जबकि स्पेस लायबिलिटी कन्वेंशन, 1972 अंतरिक्ष वस्तुओं से होने वाले नुकसान के लिए दायित्व निर्धारित करता है। हालांकि, कोई भी संधि रॉकेट पुनः प्रवेश से होने वाले वायुमंडलीय प्रदूषण को सीधे नियंत्रित नहीं करती।