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Governance · Exam Notes

भारत में लाइट पॉल्यूशन: रात में कृत्रिम रोशनी के पर्यावरण, स्वास्थ्य और नीति संबंधी चुनौतियाँ

रात में कृत्रिम रोशनी (ALAN) 2014 से 2022 के बीच विश्व स्तर पर 16% बढ़ी है, जिसका मुख्य कारण तेज़ शहरीकरण और अनियंत्रित लाइटिंग है। भारत में इस लाइट पॉल्यूशन के कारण पर्यावरण, स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभाव बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके लिए कोई विशेष कानून नहीं है। इस बढ़ते मानवीय प्रदूषक को कम करने के लिए समेकित नीति सुधार और ऊर्जा-कुशल तकनीकों की जरूरत है।
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Governance
Exam Notes
GS Paper II

Constitution, governance, social justice and institutional analysis

In brief

रात में कृत्रिम रोशनी (ALAN) 2014 से 2022 के बीच विश्व स्तर पर 16% बढ़ी है, जिसका मुख्य कारण तेज़ शहरीकरण और अनियंत्रित लाइटिंग है। भारत में इस लाइट पॉल्यूशन के कारण पर्यावरण, स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभाव बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके लिए कोई विशेष कानून नहीं है। इस बढ़ते मानवीय प्रदूषक को कम करने के लिए समेकित नीति सुधार और ऊर्जा-कुशल तकनीकों की जरूरत है।

लाइट पॉल्यूशन का परिचय और वैश्विक बढ़ोतरी

रात में कृत्रिम रोशनी (ALAN) से तात्पर्य मानव निर्मित प्रकाश से है जो प्राकृतिक रात के अंधकार को प्रभावित करता है। 2014 से 2022 के बीच वैश्विक ALAN में 16% की वृद्धि हुई है, जिसमें सबसे ज्यादा बढ़ोतरी सब-सहारा अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों जैसे भारत और चीन में देखी गई है (Nature, 2023)। आज विश्व की 80% से अधिक आबादी ऐसी जगह रहती है जहाँ आकाश प्रदूषित है, और पृथ्वी के लगभग 23% स्थलीय क्षेत्र में आकाश की चमक (skyglow) पाई जाती है (Falchi et al., 2016)। यह अनियंत्रित विस्तार मुख्यतः तेज शहरीकरण और बाहरी प्रकाश के बिना नियमों के कारण हो रहा है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – प्रदूषण, शहरी पर्यावरणीय चुनौतियाँ और स्वास्थ्य प्रभाव
  • GS पेपर 2: राजनीति और शासन – पर्यावरण कानून और संस्थान
  • निबंध: मानवजनित पर्यावरण प्रदूषण और सतत शहरी विकास

लाइट पॉल्यूशन की परिभाषा और पहलू

लाइट पॉल्यूशन से आशय अत्यधिक, गलत दिशा में या असहज करने वाली कृत्रिम रोशनी से है जो प्राकृतिक अंधकार को बाधित करती है। इसे चार प्रकारों में बांटा जाता है: आकाश की चमक (skyglow), तेज रोशनी से दृष्टि में असुविधा (glare), अनचाही रोशनी का पड़ोसी क्षेत्र में फैलना (light trespass), और लाइट का अत्यधिक समूह (clutter)। ALAN को अब एक मानवीय प्रदूषक के रूप में माना जा रहा है जिसके पारिस्थितिक, शारीरिक और सामाजिक प्रभाव होते हैं।

  • विश्व की 80% से अधिक आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहाँ प्रकाश प्रदूषण है, जिससे उनकी जैविक घड़ी प्रभावित होती है।
  • पृथ्वी के लगभग 23% स्थलीय क्षेत्र में आकाश की चमक के कारण तारों की दृश्यता कम हो रही है और प्राकृतिक रात के वातावरण में बदलाव आ रहा है (Falchi et al., 2016)।

भारत में लाइट पॉल्यूशन के कारण

भारत में तेज शहरीकरण और आर्थिक विकास ने बाहरी प्रकाश की मांग को बढ़ा दिया है। 2023 तक विश्व की लगभग 55% आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है, जो 2050 तक 68% तक पहुंचने का अनुमान है (UN DESA, 2022), और इसमें भारत का योगदान खासा है।

  • तेज शहरीकरण: बढ़ते शहरों में सड़क प्रकाश, वाणिज्यिक रोशनी और आवासीय बाहरी प्रकाश की मांग बढ़ रही है।
  • अनियंत्रित प्रकाश: खराब डिजाइन और बिना ढके हुए स्ट्रीटलाइट, बिलबोर्ड और भवनों की रोशनी से 30–50% प्रकाश बर्बाद होता है (International Dark-Sky Association, 2023)।
  • वाहनों के हेडलाइट: भारत में 30 करोड़ से अधिक पंजीकृत वाहन शहरी रात के प्रकाश में काफी योगदान देते हैं।
  • 24×7 अर्थव्यवस्था: रात की शिफ्ट में काम करने वाले उद्योग जैसे IT, स्वास्थ्य सेवा, विनिर्माण निरंतर रोशनी की मांग बनाए रखते हैं।

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रभाव

लाइट पॉल्यूशन पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य को प्राकृतिक प्रकाश-अंधकार चक्र में बाधा डालकर प्रभावित करता है।

  • मानव स्वास्थ्य: ALAN मेलाटोनिन स्राव को दबाता है, जिससे नींद की समस्याएं, जैविक घड़ी का बिगड़ना, मोटापा, अवसाद और कुछ कैंसर का खतरा बढ़ता है (WHO, 2022)।
  • पारिस्थितिक प्रभाव: यह रात के जानवरों के व्यवहार, प्रवास और प्रजनन को प्रभावित करता है, जिससे जैव विविधता पर खतरा बढ़ता है।
  • ऊर्जा की बर्बादी: गैर-कुशल प्रकाश व्यवस्था शहरी बिजली खपत का लगभग 30% हिस्सा है, जिससे कार्बन उत्सर्जन और आर्थिक नुकसान बढ़ता है।

लाइट पॉल्यूशन का आर्थिक पहलू

वैश्विक बाहरी प्रकाश बाजार का मूल्य 2022 में 15 अरब डॉलर था, जो 8.5% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है (MarketsandMarkets, 2023)। भारत शहरी प्रकाश पर सालाना 10,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है (Ministry of Power, 2023), और ऊर्जा-कुशल तकनीकों से लागत में बचत की बड़ी संभावना है।

  • गैर-कुशल प्रकाश व्यवस्था से ऊर्जा की बर्बादी शहरी बिजली खपत को 30% तक बढ़ा देती है, जिससे आर्थिक और पर्यावरणीय लागत बढ़ती है।
  • LED और स्मार्ट लाइटिंग अपनाने से ऊर्जा लागत में 20–30% तक कमी आ सकती है।
  • ALAN से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का आर्थिक बोझ भारत में ठीक से आंका नहीं गया है, लेकिन विश्व स्तर पर यह अरबों में है।

भारत में कानूनी और संस्थागत ढांचा

भारत में लाइट पॉल्यूशन को विशेष रूप से नियंत्रित करने वाला कोई समर्पित राष्ट्रीय कानून नहीं है, जिससे शासन व्यवस्था टुकड़ों में बंटी हुई है।

  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 48A पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार का निर्देश देता है।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986: धारा 3 केंद्र सरकार को पर्यावरण प्रदूषकों को नियंत्रित करने का अधिकार देती है, जिसमें प्रकाश प्रदूषण भी शामिल है।
  • वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981: मुख्यतः वायु प्रदूषण पर केंद्रित, लेकिन न्यायालयों ने इसे व्यापक रूप से पर्यावरणीय प्रदूषकों के लिए लागू माना है।
  • राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण अधिनियम, 2010: पर्यावरणीय विवादों के निपटारे के लिए न्यायिक व्यवस्था प्रदान करता है, जिसमें प्रकाश प्रदूषण के मामले भी आते हैं।
  • ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001: ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) ऊर्जा-कुशल प्रकाश व्यवस्था मानकों और लेबलिंग को बढ़ावा देता है।
  • नगर पालिका प्रकाश नियम: राज्यों में भिन्न-भिन्न, अक्सर बाहरी प्रकाश डिजाइन और समय निर्धारण के लिए प्रभावी मानक नहीं होते।

लाइट पॉल्यूशन से निपटने वाली प्रमुख संस्थाएँ

  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB): पर्यावरणीय प्रदूषण मापदंडों की निगरानी करता है, जिसमें प्रकाश प्रदूषण भी शामिल है।
  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC): पर्यावरण संरक्षण के लिए नीतियाँ और दिशानिर्देश बनाता है।
  • ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE): ऊर्जा-कुशल प्रकाश मानक लागू करता है और LED अपनाने को प्रोत्साहित करता है।
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO): रात के समय प्रकाश उत्सर्जन की निगरानी के लिए उपग्रह डेटा प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT): प्रदूषण से संबंधित पर्यावरणीय शिकायतों का निपटारा करता है।
  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP): लाइट पॉल्यूशन के प्रति वैश्विक जागरूकता और निवारक रणनीतियाँ बढ़ावा देता है।

भारत और दक्षिण कोरिया की तुलना

पहलूभारतदक्षिण कोरिया
कानूनलाइट पॉल्यूशन पर कोई समर्पित राष्ट्रीय कानून नहीं; नियम अधूरे2018 से प्रमुख शहरों में ‘डार्क स्काई ऑर्डिनेंस’ लागू
नियामक उपायऊर्जा संरक्षण अधिनियम के तहत दिशानिर्देश; कमजोर प्रवर्तनआवश्यक शील्डेड लाइटिंग और वाणिज्यिक प्रकाश प्रतिबंध
परिणामALAN बढ़ रहा है, आकाश की चमक में कोई कमी नहीं3 वर्षों में शहरी आकाश चमक में 25% कमी (उपग्रह डेटा)
निगरानीउपग्रह डेटा का उपयोग लेकिन नीति में सीमित कार्रवाईनिगरानी, प्रवर्तन और जनजागरूकता का समन्वय

भारत के दृष्टिकोण में प्रमुख कमियाँ

  • विशेष राष्ट्रीय ढांचे का अभाव जिम्मेदार एजेंसियों की स्पष्टता नहीं देता।
  • प्रकाश डिजाइन, तीव्रता और समय निर्धारण के लिए निगरानी और लागू मानक कमजोर हैं।
  • जनजागरूकता कम है और ऊर्जा-कुशल प्रकाश अपनाने के लिए प्रोत्साहन नहीं हैं।
  • शहरी शासन बिखरा हुआ है और ऊर्जा व पर्यावरण नीतियों का समन्वय नहीं है।

आगे का रास्ता: नीति और नियामक सुधार

  • लाइट पॉल्यूशन को विशेष रूप से संबोधित करने वाला व्यापक राष्ट्रीय कानून बनाएं, जिसमें स्पष्ट मानक और प्रवर्तन तंत्र हों।
  • शहरी क्षेत्रों में शील्डेड, नीचे की ओर निर्देशित प्रकाश उपकरणों और वाणिज्यिक प्रकाश के लिए कर्फ्यू अनिवार्य करें।
  • CPCB की पर्यावरण निगरानी में उपग्रह और ग्राउंड डेटा के माध्यम से लाइट पॉल्यूशन को शामिल करें।
  • ऊर्जा-कुशल तकनीकों (LED, स्मार्ट नियंत्रण) को सब्सिडी और सार्वजनिक-निजी भागीदारी से बढ़ावा दें।
  • ALAN के स्वास्थ्य और पारिस्थितिक प्रभावों पर जनजागरूकता बढ़ाएं और शहरी नियोजन में इसे शामिल करें।
  • MoEFCC, BEE, स्थानीय निकायों और परिवहन प्राधिकरणों के बीच समन्वय बढ़ाएं ताकि ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरणीय लक्ष्य मेल खाते रहें।

लाइट पॉल्यूशन के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. लाइट पॉल्यूशन मुख्यतः कृत्रिम प्रकाश स्रोतों से होने वाला वायु प्रदूषण है।
  2. बिना ढके हुए स्ट्रीटलाइट आकाश की चमक और प्रकाश की बर्बादी में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
  3. भारत में लाइट पॉल्यूशन को विशेष रूप से नियंत्रित करने वाला राष्ट्रीय कानून मौजूद है।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि लाइट पॉल्यूशन वायु प्रदूषण नहीं बल्कि अत्यधिक या गलत दिशा में प्रकाश को कहते हैं। कथन 2 सही है क्योंकि बिना ढके स्ट्रीटलाइट आकाश की चमक और प्रकाश की बर्बादी का मुख्य कारण हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि भारत में लाइट पॉल्यूशन के लिए कोई समर्पित राष्ट्रीय कानून नहीं है।

लाइट पॉल्यूशन के आर्थिक प्रभाव के संबंध में निम्नलिखित पर विचार करें:

  1. गैर-कुशल प्रकाश व्यवस्था से ऊर्जा की बर्बादी शहरी बिजली खपत का लगभग 30% हिस्सा है।
  2. LED प्रकाश अपनाने से ऊर्जा लागत में 30% तक कमी आ सकती है।
  3. भारत की वार्षिक शहरी प्रकाश व्यवस्था पर खर्च 10,000 करोड़ रुपये से अधिक है।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 3
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 2
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (d)

सभी कथन सही हैं, जो Ministry of Power और International Dark-Sky Association के आंकड़ों पर आधारित हैं।

मुख्य प्रश्न

भारत में रात के समय कृत्रिम प्रकाश (ALAN) के पर्यावरणीय, स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभावों पर चर्चा करें। मौजूदा कानूनी और संस्थागत ढांचे का मूल्यांकन करें और लाइट पॉल्यूशन को प्रभावी ढंग से कम करने के उपाय सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 3 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी, शहरी प्रदूषण
  • झारखंड का दृष्टिकोण: रांची और जमशेदपुर में तेज शहरीकरण के कारण बाहरी प्रकाश की मांग बढ़ी है, जिससे ऊर्जा की बर्बादी और स्थानीय जैव विविधता पर प्रभाव की चिंता बढ़ी है।
  • मुख्य बिंदु: राज्य स्तर पर शहरी विकास, ऊर्जा खपत के पैटर्न और राष्ट्रीय नीतियों के अनुरूप राज्य-विशिष्ट नियमों की जरूरत पर जोर दें।
लाइट पॉल्यूशन के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?

लाइट पॉल्यूशन को आकाश की चमक (skyglow), तेज रोशनी से असुविधा (glare), अनचाही रोशनी का पड़ोसी क्षेत्र में फैलना (light trespass), और प्रकाश का अत्यधिक समूह (clutter) में बांटा जाता है।

भारत में कौन सा कानून सरकार को लाइट पॉल्यूशन नियंत्रित करने का अधिकार देता है?

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए उपाय करने का अधिकार देती है, जिसमें लाइट पॉल्यूशन भी शामिल है।

लाइट पॉल्यूशन मानव स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है?

ALAN मेलाटोनिन उत्पादन को दबाता है, जिससे जैविक घड़ी प्रभावित होती है, नींद की समस्याएं होती हैं, और अवसाद, मोटापा तथा कुछ कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

ISRO लाइट पॉल्यूशन प्रबंधन में क्या भूमिका निभाता है?

ISRO उपग्रह डेटा प्रदान करता है जो रात के समय प्रकाश उत्सर्जन की निगरानी में मदद करता है, जिससे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर लाइट पॉल्यूशन का आकलन और प्रबंधन संभव होता है।

भारत में लाइट पॉल्यूशन के लिए समर्पित कानून क्यों नहीं है?

इसका कारण सीमित जागरूकता, जिम्मेदारियों का बिखराव और शहरी विकास की प्राथमिकताओं में प्रतिस्पर्धा है, जिससे इसे व्यापक पर्यावरण और ऊर्जा कानूनों के तहत ही संबोधित किया जाता है।

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