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Governance · Exam Notes

RBI का संशोधित ढांचा: ऊपरी स्तर की NBFCs की पहचान और प्रणालीगत जोखिम नियंत्रण में सरलता

अप्रैल 2024 में RBI ने ऊपरी स्तर की NBFCs की पहचान का तरीका बदलकर जटिल दोहरे मानदंड की जगह ₹1,00,000 करोड़ की एकल संपत्ति सीमा निर्धारित की। यह सुधार पारदर्शिता बढ़ाता है, नियमों को आसान बनाता है और भारत के NBFC क्षेत्र में समय पर प्रणालीगत जोखिम प्रबंधन सुनिश्चित करता है।
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Governance
Exam Notes
GS Paper II

Constitution, governance, social justice and institutional analysis

In brief

अप्रैल 2024 में RBI ने ऊपरी स्तर की NBFCs की पहचान का तरीका बदलकर जटिल दोहरे मानदंड की जगह ₹1,00,000 करोड़ की एकल संपत्ति सीमा निर्धारित की। यह सुधार पारदर्शिता बढ़ाता है, नियमों को आसान बनाता है और भारत के NBFC क्षेत्र में समय पर प्रणालीगत जोखिम प्रबंधन सुनिश्चित करता है।

RBI के संशोधित NBFC-UL पहचान ढांचे का परिचय

अप्रैल 2024 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ऊपरी स्तर की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC-ULs) की पहचान के लिए दिशा-निर्देशों में संशोधन का मसौदा जारी किया। इस संशोधन में पहले इस्तेमाल होने वाली दोहरी विधि—जो शीर्ष दस NBFCs की संपत्ति के आधार पर और एक पैरामीट्रिक स्कोरिंग प्रणाली पर निर्भर थी—की जगह एक सरल, संपत्ति-आधारित मानदंड को अपनाया गया है। इसका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना, नियामक अनुपालन को सरल बनाना और प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण NBFCs की समय पर पहचान सुनिश्चित करना है।

NBFC-UL वे संस्थान हैं जिनका आकार, जटिलता और वित्तीय क्षेत्र से जुड़ाव प्रणालीगत जोखिम पैदा करता है। मार्च 2023 तक, NBFC क्षेत्र की कुल संपत्ति लगभग ₹39.6 लाख करोड़ थी, जो कुल वित्तीय क्षेत्र की संपत्ति का लगभग 18% है (RBI वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट, जून 2023)। शीर्ष 10 NBFCs के पास आधे से अधिक संपत्ति होने से जोखिम की एकाग्रता स्पष्ट होती है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था – वित्तीय क्षेत्र सुधार, बैंकिंग और NBFC विनियमन
  • निबंध: भारत में वित्तीय स्थिरता और प्रणालीगत जोखिम
  • प्रारंभिक परीक्षा: NBFC के लिए नियामक ढांचे, SBR ढांचा, RBI की पर्यवेक्षी भूमिका

कानूनी और नियामक आधार

RBI को NBFCs को नियंत्रित करने का अधिकार भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45-I और 45-IA से प्राप्त है। स्केल बेस्ड रेगुलेशन (SBR) फ्रेमवर्क, 2021 ने NBFCs को प्रणालीगत महत्व के आधार पर बेस, मिडिल और अपर लेयर में वर्गीकृत करते हुए एक स्तरित नियामक दृष्टिकोण पेश किया।

पहले NBFC-UL की पहचान के लिए दोहरी विधि अपनाई जाती थी, जिसमें शामिल थे:

  • संपत्ति के आधार पर शीर्ष 10 NBFCs की रैंकिंग
  • छह पैरामीटर जैसे संपत्ति आकार, जटिलता, जुड़ाव आदि पर आधारित पैरामीट्रिक स्कोरिंग, जिसमें क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों (CRAs) की भूमिका भी थी

इस दोहरे दृष्टिकोण की पारदर्शिता की कमी, विषयात्मकता और नियामक कार्रवाई में देरी के लिए आलोचना हुई है (RBI परामर्श पत्र, 2024)।

संशोधित पहचान ढांचे की मुख्य विशेषताएं

  • एकल संपत्ति सीमा: जिन NBFCs की संपत्ति ₹1,00,000 करोड़ या उससे अधिक होगी, उन्हें NBFC-UL के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा। इस सीमा की समीक्षा हर पांच साल में की जाएगी ताकि क्षेत्रीय बदलावों को समायोजित किया जा सके।
  • सरकारी NBFCs का समावेश: पहले बेस या मिडिल लेयर में आने वाली राज्य-स्वामित्व वाली NBFCs जैसे NABARD, Exim Bank, SIDBI अब संपत्ति के आधार पर अपर लेयर में शामिल होंगी।
  • राज्य सरकार की गारंटी: NBFC-UL अपनी गतिविधियों के समर्थन में राज्य सरकार की गारंटी का उपयोग कर सकेंगी, जिससे ये संस्थान प्रणालीगत जोखिम के लिहाज से बेहतर तरीके से जुड़ेंगे।
  • बेहतर पूर्वानुमान और पारदर्शिता: संपत्ति-आधारित मानदंड पैरामीट्रिक स्कोरिंग की विषयात्मकता को खत्म करता है, जिससे नियामक अपेक्षाएं स्पष्ट होती हैं और पहचान तेज होती है।

आर्थिक महत्व और प्रणालीगत जोखिम के प्रभाव

NBFC क्षेत्र की तेज़ी से बढ़ती क्रेडिट ग्रोथ—FY23 में 13.5% वार्षिक (RBI वार्षिक रिपोर्ट, 2023)—ने इसके प्रणालीगत प्रभाव को बढ़ाया है। NBFCs MSME और रिटेल सेक्टर को महत्वपूर्ण क्रेडिट प्रदान करती हैं, जो भारत की FY23 में 7.2% GDP वृद्धि दर के लिए जरूरी हैं (आर्थिक सर्वेक्षण 2023)।

बड़े NBFCs से उत्पन्न प्रणालीगत जोखिम क्रेडिट प्रवाह को बाधित कर सकते हैं, जिससे आर्थिक स्थिरता प्रभावित होती है। बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस, टाटा कैपिटल, आदित्य बिड़ला फाइनेंस और LIC हाउसिंग फाइनेंस जैसे प्रमुख NBFCs क्षेत्र की संपत्ति का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करते हैं, इसलिए उनकी समय पर निगरानी आवश्यक है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम चीन के NBFC नियामक ढांचे

पहलूभारत (RBI संशोधित ढांचा)चीन (पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना)
पहचान मानदंडएकल संपत्ति सीमा (≥ ₹1,00,000 करोड़)संपत्ति आकार और लीवरेज अनुपात पर आधारित एकल मीट्रिक
नियामक दृष्टिकोणस्केल बेस्ड रेगुलेशन, पांच साल में समीक्षाजोखिम आधारित पूंजी आवश्यकताओं के साथ सतत निगरानी
पारदर्शितापैरामीट्रिक स्कोरिंग की विषयात्मकता हटाकर बेहतर पारदर्शितास्पष्ट मात्रात्मक सीमाओं के साथ उच्च पारदर्शिता
प्रणालीगत जोखिम परिणामपहचान में देरी और नियामक अर्बिट्रेज में कमी की उम्मीदNBFC डिफॉल्ट में 3 वर्षों में 20% की गिरावट (2021-24)

नए ढांचे द्वारा संबोधित महत्वपूर्ण कमियां

  • पहले की दोहरी विधि में पैरामीट्रिक स्कोरिंग विषयात्मक थी, जिससे प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण NBFCs की पहचान में देरी होती थी।
  • जटिलता के कारण नियामक कार्रवाई में विलंब होता था, जिससे RBI की समय पर सुधारात्मक कार्रवाई की क्षमता कम हो जाती थी।
  • स्पष्ट मानदंड न होने के कारण नियामक अर्बिट्रेज के अवसर पैदा होते थे, जो प्रणालीगत जोखिम नियंत्रण को कमजोर करते थे।
  • नया संपत्ति-आधारित मानदंड पूर्वानुमान बढ़ाता है, अनुपालन बोझ कम करता है और अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप है।

महत्व और आगे का रास्ता

  • संशोधित ढांचा RBI की पर्यवेक्षी क्षमता को मजबूत करता है, जिससे प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण NBFCs की तेज पहचान और नियंत्रण संभव होता है।
  • संपत्ति सीमा की समय-समय पर समीक्षा क्षेत्र की वृद्धि और संरचनात्मक बदलावों के अनुसार ढांचे को अनुकूल बनाएगी।
  • सरकारी NBFCs को ऊपरी स्तर में शामिल करने से उनके प्रणालीगत प्रभाव को स्वीकार किया गया है और नियामक मानकों में समानता आई है।
  • आगे के सुधारों में लीवरेज और जुड़ाव जैसे मापदंडों को पहचान की जगह पर्यवेक्षण में शामिल करना शामिल हो सकता है, जिससे सरलता और जोखिम संवेदनशीलता का संतुलन बना रहे।
  • Financial Stability and Development Council (FSDC) के साथ बेहतर समन्वय से वित्तीय क्षेत्र में प्रणालीगत जोखिम की निगरानी और मजबूत होगी।

RBI के संशोधित ढांचे के तहत NBFC-UL की पहचान से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. ₹1,00,000 करोड़ से अधिक संपत्ति वाली NBFCs को स्वचालित रूप से NBFC-UL के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।
  2. जटिलता और जुड़ाव पर आधारित पैरामीट्रिक स्कोरिंग विधि प्राथमिक मानदंड बनी रहेगी।
  3. राज्य-स्वामित्व वाली NBFCs जैसे NABARD अब आकार के आधार पर ऊपरी स्तर में शामिल होंगी।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 3
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 1
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि संशोधित ढांचा ₹1,00,000 करोड़ की एकल संपत्ति सीमा को अपनाता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि NABARD जैसे सरकारी NBFCs को आकार के आधार पर ऊपरी स्तर में शामिल किया गया है। कथन 2 गलत है क्योंकि पैरामीट्रिक स्कोरिंग को हटाया गया है।

NBFCs के लिए Scale Based Regulation (SBR) Framework के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:

  1. SBR NBFCs को प्रणालीगत महत्व के आधार पर बेस, मिडिल और अपर लेयर में वर्गीकृत करता है।
  2. मूल SBR फ्रेमवर्क में NBFC-UL की पहचान केवल संपत्ति आकार पर निर्भर थी।
  3. संशोधित RBI ढांचा NBFC-UL पहचान के लिए दोहरी विधि को समाप्त करता है।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 3
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 2
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि SBR NBFCs को तीन स्तरों में वर्गीकृत करता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि संशोधित ढांचा दोहरी विधि को हटाता है। कथन 2 गलत है क्योंकि मूल फ्रेमवर्क में संपत्ति आकार और पैरामीट्रिक स्कोरिंग दोनों शामिल थे।

मेन प्रश्न

RBI के संशोधित ढांचे के तहत ऊपरी स्तर की NBFCs की पहचान के तर्क और प्रभावों का समालोचनात्मक विश्लेषण करें। यह सुधार पुराने दोहरे मानदंड की सीमाओं को कैसे दूर करता है, और भारत के वित्तीय क्षेत्र में प्रणालीगत जोखिम प्रबंधन पर इसका क्या असर हो सकता है? (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय संस्थान
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में कई NBFCs MSME और रिटेल क्रेडिट बाजारों में सक्रिय हैं; बेहतर NBFC नियमावली से राज्य में क्रेडिट की उपलब्धता और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा।
  • मेन पॉइंटर: चर्चा करें कि NBFCs के प्रणालीगत जोखिम नियंत्रण से क्षेत्रीय क्रेडिट प्रवाह, MSME वित्तपोषण और झारखंड के आर्थिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ता है।
RBI के संशोधित ढांचे के तहत NBFC-UL की पहचान का मुख्य मानदंड क्या है?

₹1,00,000 करोड़ या उससे अधिक संपत्ति वाली NBFCs को ऊपरी स्तर की NBFCs के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

NBFC-UL पहचान के लिए पहले की दोहरी विधि की आलोचना क्यों हुई?

इस विधि की जटिलता, पारदर्शिता की कमी, पैरामीट्रिक स्कोरिंग में विषयात्मकता और नियामक कार्रवाई में देरी के कारण आलोचना हुई।

कौन-कौन सी सरकारी NBFCs अब ऊपरी स्तर में शामिल हैं?

NABARD, Exim Bank, और SIDBI जैसी राज्य-स्वामित्व वाली NBFCs अब संपत्ति के आधार पर ऊपरी स्तर में आती हैं।

संशोधित ढांचा प्रणालीगत जोखिम प्रबंधन को कैसे बेहतर बनाता है?

स्पष्ट संपत्ति सीमा के कारण तेज पहचान, नियामक अर्बिट्रेज में कमी और पारदर्शिता में वृद्धि होती है, जिससे प्रणालीगत जोखिम नियंत्रण बेहतर होता है।

NBFC-UL वर्गीकरण के लिए संपत्ति सीमा कितनी बार समीक्षा की जाएगी?

इस सीमा की समीक्षा हर पांच साल में की जाएगी ताकि NBFC क्षेत्र में बदलावों को शामिल किया जा सके।

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