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Governance · Exam Notes

भारत की ₹20,000 करोड़ की कार्बन क्रेडिट योजना: औद्योगिक CCUS क्रियान्वयन में चुनौतियां और अस्पष्टताएं

भारत की ₹20,000 करोड़ की कार्बन क्रेडिट योजना का लक्ष्य CCUS तकनीकों के जरिए पांच प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करना है, जो देश के औद्योगिक CO2 उत्सर्जन का लगभग 60% हिस्सा हैं। हालांकि, कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट से जुड़ी अस्पष्टताओं और मजबूत MRV फ्रेमवर्क के अभाव के कारण इस योजना की प्रभावशीलता और बाजार विश्वास पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
1 min read GS Paper II
Governance
Exam Notes
GS Paper II

Constitution, governance, social justice and institutional analysis

In brief

भारत की ₹20,000 करोड़ की कार्बन क्रेडिट योजना का लक्ष्य CCUS तकनीकों के जरिए पांच प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करना है, जो देश के औद्योगिक CO2 उत्सर्जन का लगभग 60% हिस्सा हैं। हालांकि, कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट से जुड़ी अस्पष्टताओं और मजबूत MRV फ्रेमवर्क के अभाव के कारण इस योजना की प्रभावशीलता और बाजार विश्वास पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

परिचय: भारत की कार्बन क्रेडिट पहल और उसका संदर्भ

संघीय बजट 2026-27 में भारत सरकार ने अगले पांच वर्षों में कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) पर केंद्रित कार्बन क्रेडिट योजना के लिए ₹20,000 करोड़ आवंटित किए हैं। यह योजना बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन जैसे पांच बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में डिकार्बोनाइजेशन पर ध्यान केंद्रित करती है, जो भारत के औद्योगिक CO2 उत्सर्जन का लगभग 60% हिस्सा हैं (MoEFCC, 2023)। यह पहल पेरिस समझौते (2015) के तहत भारत की 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन की प्रतिबद्धता के अनुरूप है। हालांकि, कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट से जुड़ी अस्पष्टताओं के कारण योजना की स्पष्टता और प्रभावशीलता पर संदेह बना हुआ है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – कार्बन क्रेडिट तंत्र, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण, जलवायु परिवर्तन से निपटना।
  • GS पेपर 3: आर्थिक विकास – जलवायु वित्त के लिए संघीय बजट आवंटन।
  • GS पेपर 2: अंतरराष्ट्रीय संबंध – UNFCCC और पेरिस समझौते के तहत भारत की प्रतिबद्धताएं।
  • निबंध: जलवायु परिवर्तन और भारत का सतत विकास मार्ग।

कार्बन क्रेडिट के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा

भारत में कार्बन क्रेडिट योजनाओं को सीधे नियंत्रित करने वाले संवैधानिक प्रावधान नहीं हैं। फिर भी, यह योजना संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) और पेरिस समझौते (2015) के तहत भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है। घरेलू स्तर पर, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (धारा 3) केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार देता है, जो CCUS नियमावली के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है। इसके अलावा, ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 ऊर्जा दक्षता और उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकों को बढ़ावा देने में सहायक है, जिसमें CCUS भी शामिल है।

  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986: केंद्र सरकार को पर्यावरणीय खतरों और उत्सर्जन को नियंत्रित करने का अधिकार।
  • ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001: ऊर्जा दक्षता मानकों और उत्सर्जन कटौती प्रोत्साहनों का ढांचा।
  • पेरिस समझौता: भारत की उत्सर्जन तीव्रता कम करने और 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य प्राप्ति की प्रतिबद्धता।

कार्बन क्रेडिट योजना के आर्थिक पहलू

₹20,000 करोड़ का बजट आवंटन CCUS के लिए अगले पांच वर्षों में उच्च उत्सर्जन वाले औद्योगिक क्षेत्रों को डिकार्बोनाइज करने की रणनीतिक पहल है। ये क्षेत्र—बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन—भारत के औद्योगिक CO2 उत्सर्जन का लगभग 60% हिस्सा हैं (MoEFCC, 2023)। वैश्विक स्तर पर, कार्बन क्रेडिट बाजार का मूल्य 2023 में USD 851 मिलियन था और यह 2030 तक 20% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ने का अनुमान है (MarketsandMarkets, 2024)। भारत को 2030 तक नेट-जीरो लक्ष्य पूरा करने के लिए CCUS अवसंरचना में USD 10 बिलियन से अधिक निवेश की आवश्यकता होगी (NITI Aayog, 2023)।

  • बजट आवंटन: ₹20,000 करोड़ अगले 5 वर्षों के लिए (संघीय बजट 2026-27)।
  • लक्षित क्षेत्र: बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी, रसायन।
  • औद्योगिक उत्सर्जन हिस्सा: कुल CO2 उत्सर्जन का लगभग 60%।
  • वैश्विक बाजार आकार: 2023 में USD 851 मिलियन, 2030 तक 20% CAGR।
  • निवेश आवश्यकता: 2030 तक CCUS अवसंरचना के लिए USD 10 बिलियन।

मुख्य संस्थागत हितधारक और उनकी भूमिका

कार्बन क्रेडिट और CCUS पहलों के समन्वय के लिए कई केंद्रीय संस्थान जिम्मेदार हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) नीति निर्माण और क्रियान्वयन की निगरानी करता है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय रिफाइनरी क्षेत्रों में CCUS के कार्यान्वयन में मदद करता है। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) ऊर्जा दक्षता और उत्सर्जन कटौती की निगरानी करता है। नीति आयोग जलवायु पहलों के लिए रणनीतिक योजना और समन्वय करता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) नियामक अनुपालन लागू करता है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) स्वच्छ तकनीकों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है।

  • MoEFCC: नीति और नियामक निगरानी।
  • पेट्रोलियम मंत्रालय: रिफाइनरी क्षेत्र में CCUS को बढ़ावा।
  • BEE: ऊर्जा दक्षता और उत्सर्जन निगरानी।
  • नीति आयोग: जलवायु नीति समन्वय।
  • CPCB: पर्यावरणीय नियमन और निगरानी।
  • ISA: अंतरराष्ट्रीय तकनीकी सहयोग।

कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) की तकनीकी जानकारी

CCUS तकनीकें औद्योगिक स्रोतों से CO2 उत्सर्जन को पकड़ती हैं, उसे परिवहन करती हैं और या तो औद्योगिक प्रक्रियाओं में उपयोग करती हैं या भूमिगत संग्रहण के लिए भेजती हैं ताकि वायुमंडल में उत्सर्जन रोका जा सके। यह तकनीक उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है जहां उत्सर्जन को सीधे खत्म करना मुश्किल होता है। प्रक्रिया में तीन चरण शामिल हैं: कैप्चर (पावर प्लांट या फैक्ट्री में), परिवहन (पाइपलाइन आदि के जरिए), और उपयोग/भंडारण (जैसे बेहतर तेल पुनर्प्राप्ति या भूवैज्ञानिक भंडारण)।

  • कैप्चर: औद्योगिक उत्सर्जन से CO2 को अलग करना।
  • परिवहन: कैप्चर किए गए CO2 को उपयोग या भंडारण स्थल तक ले जाना।
  • उपयोग: CO2 का औद्योगिक उपयोग (जैसे रसायन, ईंधन)।
  • भंडारण: CO2 को गहरी भूवैज्ञानिक संरचनाओं में इंजेक्ट करना।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत की कार्बन क्रेडिट योजना और यूरोपीय संघ की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (EU ETS)

पहलूभारत की कार्बन क्रेडिट योजनायूरोपीय संघ की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (EU ETS)
शुरुआत का वर्ष2026 (बजट घोषणा)2005
बाजार आकारशुरुआती चरण, ₹20,000 करोड़ का बजट आवंटनविश्व का सबसे बड़ा कार्बन बाजार, EU उत्सर्जन का 45% शामिल
क्षेत्रीय दायरापांच औद्योगिक क्षेत्रों में CCUS पर केंद्रितव्यापक क्षेत्रीय कवरेज, जिसमें बिजली, उद्योग, विमानन शामिल
नियामक स्पष्टताअस्पष्ट संचार, कृषि कार्बन क्रेडिट से ओवरलैपमजबूत MRV और अनुपालन के साथ स्पष्ट नियामक ढांचा
उत्सर्जन कटौतीलक्षित लेकिन प्रमाणित नहीं2005 से कवर किए गए क्षेत्रों में 35% कटौती (यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी)
बाजार तंत्रCCUS परियोजनाओं से जुड़े कार्बन क्रेडिटकैप-एंड-ट्रेड प्रणाली, नीलामी और ट्रेडिंग के साथ

भारत की कार्बन क्रेडिट योजना में प्रमुख कमियां और चुनौतियां

भारत की कार्बन क्रेडिट योजना में औद्योगिक CCUS आधारित क्रेडिट और कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट के बीच स्पष्ट विभाजन का अभाव है। यह अस्पष्टता हितधारकों के बीच भ्रम पैदा करती है और बाजार विश्वास को कमजोर करती है। इसके अलावा, मजबूत Monitoring, Reporting, and Verification (MRV) फ्रेमवर्क के अभाव से कार्बन क्रेडिट की विश्वसनीयता प्रभावित होती है और उत्सर्जन कटौती की पारदर्शिता में बाधा आती है। ये कमियां नीति की प्रभावशीलता को कम कर सकती हैं और निवेशकों की रुचि घटा सकती हैं।

  • नीति अस्पष्टता: औद्योगिक और कृषि कार्बन क्रेडिट तंत्र का ओवरलैप।
  • MRV फ्रेमवर्क: मानकीकृत और पारदर्शी निगरानी और सत्यापन का अभाव।
  • हितधारक भ्रम: पात्रता और क्रेडिट जारी करने के मानदंड अस्पष्ट।
  • बाजार विश्वास: कमजोर नियामक स्पष्टता से प्रभावित।

महत्त्व और आगे का रास्ता

भारत की ₹20,000 करोड़ की कार्बन क्रेडिट योजना औद्योगिक डिकार्बोनाइजेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है। हालांकि, नीति की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए सरकार को औद्योगिक CCUS क्रेडिट और कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट को स्पष्ट रूप से अलग करना होगा। एक पारदर्शी और मजबूत MRV प्रणाली स्थापित करना विश्वसनीयता बढ़ाने और निवेश आकर्षित करने के लिए जरूरी है। साथ ही, EU ETS के अनुभव से सीखते हुए भारत को स्पष्ट नियामक ढांचा, बाजार आधारित तंत्र और अनुपालन व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। मंत्रालयों के बीच समन्वय और संचार को मजबूत करना हितधारक भ्रम से बचने और अधिकतम प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक होगा।

  • औद्योगिक CCUS और कृषि कार्बन क्रेडिट योजनाओं को स्पष्ट रूप से अलग करें।
  • कार्बन क्रेडिट सत्यापन के लिए मजबूत MRV फ्रेमवर्क विकसित और लागू करें।
  • नियामक स्पष्टता बढ़ाकर निवेशक और हितधारक विश्वास बनाएं।
  • स्पष्ट अनुपालन और प्रवर्तन प्रोटोकॉल के साथ बाजार आधारित तंत्र अपनाएं।
  • MoEFCC, पेट्रोलियम मंत्रालय, BEE और CPCB के बीच अंतःमंत्रालय समन्वय मजबूत करें।

भारत की कार्बन क्रेडिट योजना के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. ₹20,000 करोड़ का आवंटन केवल कृषि आधारित कार्बन क्रेडिट उत्पादन के लिए है।
  2. CCUS तकनीकें CO2 उत्सर्जन को पकड़ती हैं और उसे उपयोग या भूमिगत भंडारण के लिए भेजती हैं।
  3. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, CCUS पहलों के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है।

इनमें से कौन सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि ₹20,000 करोड़ का आवंटन मुख्य रूप से औद्योगिक CCUS के लिए है, न कि कृषि आधारित क्रेडिट के लिए। कथन 2 और 3 सही हैं क्योंकि CCUS में CO2 को पकड़ना और उपयोग या भंडारण करना शामिल है, और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, सरकार को ऐसे पर्यावरणीय उपाय लागू करने का अधिकार देता है।

कार्बन क्रेडिट योजनाओं में Monitoring, Reporting, and Verification (MRV) के बारे में विचार करें:

  1. MRV फ्रेमवर्क कार्बन क्रेडिट की पारदर्शिता और विश्वसनीयता के लिए आवश्यक हैं।
  2. भारत के पास वर्तमान में CCUS कार्बन क्रेडिट के लिए पूर्ण रूप से कार्यशील MRV प्रणाली है।
  3. MRV के अभाव में हितधारक भ्रम और बाजार विश्वास में कमी हो सकती है।

इनमें से कौन सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 3
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 1 और 2
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि MRV पारदर्शिता सुनिश्चित करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि भारत के पास अभी CCUS क्रेडिट के लिए मजबूत MRV प्रणाली नहीं है। कथन 3 सही है क्योंकि MRV के अभाव में बाजार विश्वास प्रभावित होता है।

मेन्स प्रश्न

भारत की ₹20,000 करोड़ की CCUS आधारित कार्बन क्रेडिट योजना के सामने आने वाली चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें। औद्योगिक और कृषि कार्बन क्रेडिट योजनाओं के बीच अस्पष्टता नीति क्रियान्वयन को कैसे प्रभावित करती है? भारत के कार्बन क्रेडिट ढांचे की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए क्या उपाय सुझाए जा सकते हैं?

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: GS पेपर 3 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण।
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड के इस्पात और बिजली क्षेत्र औद्योगिक उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत हैं, जिससे CCUS पहलें राज्य स्तर पर प्रदूषण नियंत्रण और जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • मेन्स पॉइंटर: झारखंड के औद्योगिक प्रोफाइल, CCUS अपनाने की संभावना और राष्ट्रीय कार्बन क्रेडिट योजनाओं में भूमिका को उजागर करते हुए उत्तर तैयार करें।
कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) क्या है?

CCUS एक तकनीक है जो औद्योगिक स्रोतों से CO2 उत्सर्जन को पकड़ती है, उसे परिवहन करती है और या तो औद्योगिक प्रक्रियाओं में उपयोग करती है या भूमिगत संग्रहण के लिए भेजती है ताकि वायुमंडल में उत्सर्जन को रोका जा सके।

भारत की ₹20,000 करोड़ की कार्बन क्रेडिट योजना किन क्षेत्रों को लक्षित करती है?

यह योजना पांच औद्योगिक क्षेत्रों को लक्षित करती है: बिजली, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन, जो भारत के औद्योगिक CO2 उत्सर्जन का लगभग 60% हिस्सा हैं।

क्या भारत के पास कार्बन क्रेडिट के लिए कोई कानूनी ढांचा है?

भारत में सीधे संवैधानिक प्रावधान नहीं हैं, लेकिन पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 पर्यावरणीय नियम और उत्सर्जन कटौती तकनीकों के लिए कानूनी अधिकार प्रदान करते हैं, जिनमें CCUS शामिल है।

भारत की कार्बन क्रेडिट योजना की मुख्य चुनौतियां क्या हैं?

मुख्य चुनौतियों में नीति अस्पष्टता, औद्योगिक और कृषि कार्बन क्रेडिट के बीच ओवरलैप, मजबूत MRV फ्रेमवर्क का अभाव और हितधारक भ्रम शामिल हैं, जो बाजार विश्वास को कमजोर कर रहे हैं।

EU उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (EU ETS) की तुलना में भारत की कार्बन क्रेडिट योजना कैसी है?

EU ETS, जो 2005 में शुरू हुई, एक परिपक्व कैप-एंड-ट्रेड प्रणाली है जिसमें स्पष्ट नियामक ढांचा और MRV तंत्र हैं, जिसने कवर किए गए क्षेत्रों में 35% उत्सर्जन कटौती की है। भारत की योजना अभी प्रारंभिक चरण में है, जिसमें नीति अस्पष्टता और मजबूत MRV तंत्र की कमी है।

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