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भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य: दोषपूर्ण नीतियों और कमजोर प्रशिक्षण के कारण संकट में

1 min read General Studies

भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली: दोषपूर्ण नीतियाँ, कमजोर प्रशिक्षण, और संरचनात्मक समस्याएँ

भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में fault lines शासन में पुरानी बीमारियों का प्रतिबिंब हैं: विखंडित नीति निर्माण, कमजोर पेशेवर प्रशिक्षण, और प्रणालीगत धन की कमी। जबकि आयुष्मान भारत और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसे प्रोजेक्ट समान स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच का वादा करते हैं, ये टूटे हुए ढाँचों के भीतर काम करते हैं जो रोगियों और पेशेवरों दोनों को विफल करते हैं। नीति की समग्रता और कार्यबल की क्षमता का यह द्वंद्व स्वास्थ्य असमानताओं को हल करने के बजाय बढ़ाने का जोखिम उठाता है।

संस्थागत परिदृश्य: संघीय ढांचा और नीति का विखंडन

भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य शासन एक ओवरलैपिंग अधिकार क्षेत्र का पैचवर्क है। स्वास्थ्य, जो 7वें अनुसूची की राज्य सूची के तहत परिभाषित है, राज्य सरकारों पर प्राथमिक जिम्मेदारी डालता है। हालाँकि, दवा नियमन, प्रदूषण, परिवार नियोजन, और खाद्य सुरक्षा जैसे मामले राज्य और समवर्ती सूचियों के बीच फैले हुए हैं—एक ऐसा ढांचा जो नीति क्रियान्वयन को जटिल बनाता है।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) राष्ट्रीय कार्यक्रमों जैसे NHM की देखरेख करता है, फिर भी स्थानीय निकायों और असंबंधित मंत्रालयों के साथ समन्वय की कमी कार्यान्वयन को कमजोर करती है। एक स्पष्ट उदाहरण अंतर-विभागीय असंगति है: भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) तंबाकू-रोग रोकथाम का नेतृत्व करता है जबकि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) कृषि विकास योजनाओं के तहत तंबाकू खेती को बढ़ावा देता है।

इस संस्थागत असंगतता में केंद्रीकरण के दोषपूर्ण प्रयास भी शामिल हैं। आयुष्मान भारत, जो विश्व में सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य कवरेज योजना का दावा करता है, अक्सर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा वितरण की अनदेखी करते हुए माध्यमिक और तृतीयक देखभाल में संसाधनों को चैनलाइज करने के लिए आलोचना का सामना करता है।

नीति की कमी: संकट के केंद्र में निवेश और प्रशिक्षण

सरकारों ने स्वास्थ्य के लिए बजट आवंटन बढ़ाने का समर्थन किया है, फिर भी वादे अक्सर आवश्यकता के स्तर को पूरा नहीं करते। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2017) ने 2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को GDP के 2.5% तक बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया। 2023 तक, भारत 1.5% पर संघर्ष कर रहा है, जो ब्राजील जैसे साथियों से कम है, जो स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने GDP का 4% से अधिक खर्च करता है। पुरानी अवसंरचना और मानव संसाधनों की कमी बनी हुई है, विशेष रूप से जनजातीय क्षेत्रों में, जहाँ NHM के कौशल संवर्धन लक्ष्यों का 25% से कम पूरा हुआ है।

प्रशिक्षण की दक्षता एक और पहेली प्रस्तुत करती है। चिकित्सा पेशेवर सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यबल में हावी हैं, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा ने सामाजिक विज्ञान, पर्यावरण स्वास्थ्य, और नीति निर्माण के व्यापक आयामों को एकीकृत करने में विफलता दिखाई है। भारत के MPH कार्यक्रम मानकीकृत पाठ्यक्रमों की कमी से ग्रस्त हैं, जो यूनाइटेड किंगडम में देखी गई कठोरता के विपरीत है, जहाँ सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा NHS क्षेत्रीय निकायों के साथ साझेदारी के माध्यम से अनुभवात्मक प्रशिक्षण को शामिल करती है।

साक्ष्य के साथ तर्क: डेटा संरचनात्मक दरारों का खुलासा करता है

NSSO की 2023 की रिपोर्ट में स्वास्थ्य सेवा पहुंच में चौंकाने वाली असमानताओं का खुलासा होता है—केवल 32% ग्रामीण Haushalte नियमित रूप से सरकारी सुविधाओं का उपयोग करते हैं, खराब सुविधाओं के कारण महंगे निजी क्लीनिकों को प्राथमिकता देते हैं। साथ ही, NHM के तहत भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों को पूरा करने वाले HWCs की संख्या 12% से कम है, हालाँकि ये निवारक देखभाल के लिए महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में कार्य करते हैं।

रोग निगरानी में, भारत की स्थिति खराब है। हालाँकि विजन 2035 भविष्यवाणी विश्लेषण और वास्तविक समय निगरानी का समर्थन करता है, इसकी निर्भरता कम संसाधन वाले ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं पर प्रारंभिक महामारी प्रवृत्तियों को चूकने का जोखिम उठाती है। इसके अलावा, तकनीकी अवसंरचना असमान बनी हुई है, केवल 39% जिला स्वास्थ्य कार्यालय डिजिटल निगरानी के लिए सुसज्जित हैं—यह एक गंभीर सीमा है जो COVID-19 के दौरान उजागर हुई।

विश्व बैंक ने अपनी 2022 की रिपोर्ट में देखा कि भारत के विखंडित वितरण तंत्र ने टीकाकरण कवरेज को कम कर दिया—यह एक बिंदु है जिसे WHO के अनुमान से पुष्टि मिली है, जो दिखाता है कि भारत DPT-3 कवरेज में बांग्लादेश से पीछे है। ये चूक सीधे तौर पर धन की कमी और गलत प्राथमिकताओं का परिणाम हैं।

विपरीत तर्क: “संसाधन समस्या” का बचाव और वैश्विक प्रतिबंध

भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे के समर्थक तर्क करते हैं कि इसकी विफलताएँ संरचनात्मक कमजोरी के बजाय अपर्याप्त वित्तीय संसाधनों से उत्पन्न होती हैं। उच्च-आय वाले देशों के साथ तुलना वित्तीय अंतर को उजागर करती है; उदाहरण के लिए, नॉर्वे का स्वास्थ्य व्यय 10% GDP है, जो भारत के मामूली आवंटन से कहीं अधिक है। वे तर्क करते हैं कि व्यय स्तरों को वैश्विक मानकों के साथ संरेखित करने से अवसंरचना की कमी को काफी हद तक हल किया जा सकता है।

हालांकि, यह इस बिंदु को नजरअंदाज करता है कि केवल वित्तीय निवेश खराब अंतर-विभागीय समन्वय या प्रशिक्षण की कमी को ठीक नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, आयुष्मान भारत का वित्तपोषण तृतीयक बीमारियों के लिए दावों को बढ़ाता है लेकिन समग्र रोग रोकथाम रणनीतियों के लिए बहुत कम करता है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में आवंटन, नीति सुधार के बिना, अक्सर वित्तीय बर्बादी का परिणाम होता है, जैसा कि श्रीलंका के विफल प्रयास में देखा गया है, जिसने परिवार स्वास्थ्य कार्यक्रमों को एकीकृत किए बिना मुफ्त प्राथमिक सेवाओं को बढ़ाने का प्रयास किया।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण: जर्मनी का एकीकृत स्वास्थ्य प्रणाली

जो भारत “सहकारी संघवाद” कहता है, जर्मनी इसे एकीकृत वैधानिक स्वास्थ्य बीमा प्रणाली के माध्यम से संचालित करता है। केंद्रीय सरकार और Länder के बीच समन्वय यह सुनिश्चित करता है कि बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल नीतियाँ समान रूप से लागू की जाती हैं, जबकि राज्य सरकारों को क्षेत्रीय अनुकूलन के लिए पर्याप्त लचीलापन मिलता है। उल्लेखनीय है कि जर्मनी नैदानिक स्वास्थ्य देखभाल और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन में दोहरी प्रशिक्षण पटरियों की अनिवार्यता करता है, जो भारत की चिकित्सा-केंद्रित प्रशिक्षण संरचना के विपरीत एक समग्र दृष्टिकोण सुनिश्चित करता है।

जर्मनी की Krankenkassen स्वतंत्र क्षेत्रीय समितियों को भी शामिल करती है, जो केंद्रीय नीति की अखंडता से समझौता किए बिना विकेंद्रीकृत निगरानी की अनुमति देती है। यह संतुलन भारत की विखंडित शासन की तुलना में संरचनात्मक डिजाइन की श्रेष्ठता को उजागर करता है—एक ऐसा मॉडल जिसे अपनाना चाहिए।

मूल्यांकन: संरचनात्मक तनावों का सामना करना और आवश्यक सुधार

भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली संरचनात्मक और वैचारिक बीमारियों से ग्रस्त है। नीति की धाराओं को एकीकृत करने के लिए एक पुनर्विचार की आवश्यकता है। पहले, समर्पित अंतर-विभागीय स्वास्थ्य-क्रिया परिषदों के तहत जिम्मेदारियों को संकेंद्रित करें। दूसरे, प्रशिक्षण प्रोटोकॉल को विविध बनाएं ताकि पर्यावरण और व्यवहार विज्ञान को शामिल किया जा सके। सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी और निवेश में अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाने में और देरी नहीं होनी चाहिए।

वास्तविकता प्राथमिकताओं में यथार्थवाद की मांग करती है: 2027 तक GDP के 2.0% तक बजट आवंटन में वृद्धि, जबकि यह मामूली है, HWCs को स्थायी रूप से अपग्रेड कर सकता है, साथ ही MPH पाठ्यक्रम मानकीकरण सुनिश्चित कर सकता है। जर्मनी के उदाहरण के रूप में सामुदायिक-संबंधित शासन, जवाबदेही के अंतर को और पाट सकता है।

प्रारंभिक MCQs

  • प्रश्न 1: 7वीं अनुसूची के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य मुख्य रूप से किस सूची में आता है?
    A. संघ सूची
    B. समवर्ती सूची
    C. राज्य सूची
    D. अवशिष्ट सूची
    सही उत्तर: C
  • प्रश्न 2: भारत के स्वास्थ्य प्रणाली के तहत कौन सा कार्यक्रम स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों (HWCs) के माध्यम से निवारक स्वास्थ्य देखभाल पर जोर देता है?
    A. विजन 2035
    B. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन
    C. आयुष्मान भारत
    D. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017
    सही उत्तर: B

मुख्य प्रश्न

गंभीरता से मूल्यांकन करें: किस हद तक संरचनात्मक अक्षमताएँ और अपर्याप्त कार्यबल प्रशिक्षण भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य शासन में चुनौतियों को बढ़ाते हैं? इन प्रणालीगत अंतरालों को स्थायी रूप से संबोधित करने के लिए संस्थागत और नीति सुधारों का सुझाव दें। (250 शब्द)

UPSC के लिए अभ्यास प्रश्न

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (2017) के बारे में निम्नलिखित बयानों पर विचार करें:

  1. बयान 1: नीति का उद्देश्य 2025 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को GDP के 2.5% तक बढ़ाना है।
  2. बयान 2: नीति ने ग्रामीण स्वास्थ्य अवसंरचना के लिए अपने लक्ष्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया है।
  3. बयान 3: नीति ढाँचे विभिन्न स्वास्थ्य मंत्रालयों के बीच संस्थागत समन्वय को प्राथमिकता देते हैं।

उपरोक्त में से कौन सा/से बयान सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

निम्नलिखित में से कौन सा बयान आयुष्मान भारत के भारत में स्वास्थ्य सेवा वितरण पर प्रभाव को सही ढंग से वर्णित करता है?

  1. बयान 1: यह स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों के माध्यम से प्राथमिक देखभाल को मजबूत करने पर व्यापक रूप से ध्यान केंद्रित करता है।
  2. बयान 2: योजना मुख्य रूप से माध्यमिक और तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल के लिए संसाधनों को आवंटित करती है।
  3. बयान 3: इसे基层 स्तर पर निवारक देखभाल सेवाओं को बढ़ाने के लिए प्रशंसा मिली है।

उपरोक्त में से कौन सा/से बयान सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 3
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1
  • (d) केवल 2

उत्तर: (d)

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ मुख्य अभ्यास प्रश्न
भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों की प्रभावशीलता को आकार देने में वित्तपोषण और कार्यबल प्रशिक्षण की भूमिका का गंभीरता से परीक्षण करें। (250 शब्द)
250 शब्द15 अंक

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में मुख्य संरचनात्मक समस्याएँ क्या हैं?

भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली विखंडित नीति निर्माण, कमजोर पेशेवर प्रशिक्षण, और महत्वपूर्ण प्रणालीगत धन की कमी जैसी संरचनात्मक समस्याओं से भरा हुआ है। वर्तमान स्वास्थ्य पहलों को अक्सर अंतर-विभागीय संघर्षों और सुसंगत क्रियान्वयन की कमी से कमजोर किया जाता है, जो प्रभावी स्वास्थ्य सेवा वितरण को प्रभावित करता है।

संघीय ढाँचे भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य शासन को कैसे प्रभावित करते हैं?

संघीय ढाँचा भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य शासन को जटिल बनाता है क्योंकि यह स्वास्थ्य नीति में ओवरलैपिंग अधिकार क्षेत्र उत्पन्न करता है। जबकि राज्यों की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है, विभिन्न स्वास्थ्य निर्धारक राज्य और समवर्ती सूचियों के बीच फैले होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप केंद्रीय सरकार से नीति कार्यान्वयन में विखंडन होता है।

वर्तमान में सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों का प्रशिक्षण किन तरीकों से अपर्याप्त है?

भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों के प्रशिक्षण की आलोचना की गई है क्योंकि यह व्यापक सामाजिक विज्ञान और पर्यावरण स्वास्थ्य अवधारणाओं के एकीकरण में कमी से ग्रस्त है। चिकित्सा प्रशिक्षण हावी है, जिसके परिणामस्वरूप ऐसे पेशेवर तैयार होते हैं जो जटिल स्वास्थ्य चुनौतियों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने में असमर्थ होते हैं।

भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को किन वित्तीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

भारत स्वास्थ्य व्यय में महत्वपूर्ण अंतर से जूझ रहा है, जो वर्तमान में GDP का 1.5% है, जो कई विकसित देशों से कम है। यह धन की कमी अपर्याप्त अवसंरचना, कार्यबल की कमी, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, और कौशल संवर्धन के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लक्ष्यों को पूरा करने में विफलता में योगदान करती है।

हालिया रिपोर्टों के अनुसार, ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवा पहुंच में असमानताएँ कैसे प्रकट होती हैं?

हालिया NSSO रिपोर्टों में संकेत मिलता है कि केवल 32% ग्रामीण Haushalte नियमित रूप से सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग करते हैं, खराब सुविधाओं के कारण महंगे निजी विकल्पों को प्राथमिकता देते हैं। इसके अलावा, 12% से कम स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र प्रभावी निवारक देखभाल के लिए आवश्यक मानकों को पूरा करते हैं, जो स्वास्थ्य विषमताओं को बढ़ाते हैं।

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