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सेना ने ड्रोन के इस्तेमाल को बढ़ाया

सेना ने भू-राजनीतिक तनाव के बीच ड्रोन की भर्ती बढ़ाई

19 सितंबर 2025 को, सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने घोषणा की कि भारतीय सेना की प्रत्येक इन्फैंट्री बटालियन को एक समर्पित ड्रोन प्लाटून से लैस किया जाएगा, जो युद्धक्षेत्र संचालन में एक महत्वाकांक्षी बदलाव का संकेत है। इस योजना में लगभग 1,000 विभिन्न आकार के ड्रोन, 600 उन्नत सिमुलेटरों को प्रशिक्षित करने के लिए, और भारतीय सैन्य अकादमी तथा अधिकारियों की प्रशिक्षण अकादमी जैसे 19 से अधिक संस्थागत प्रशिक्षण केंद्रों का समावेश है, ताकि मानवरहित हवाई वाहन (UAV) संचालन को मानक सैन्य पाठ्यक्रमों में शामिल किया जा सके। यह कदम भारत की रक्षा अवसंरचना में ड्रोन को सामरिक और रणनीतिक स्तर पर समाहित करने की दिशा में एक निर्णायक बदलाव को दर्शाता है।

अतीत की प्रथाओं से अलग: बल संरचना में मौलिक बदलाव

ऐतिहासिक रूप से, भारत के रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र में ड्रोन को विशेष भूमिकाओं में सीमित रखा गया है—जैसे कि नियंत्रण रेखा (LoC) पर निगरानी या आंतरिक सुरक्षा संकट के दौरान भीड़ की निगरानी के लिए कभी-कभार तैनाती। भारतीय सेना की घोषणा एक बदलाव को दर्शाती है। ड्रोन के बटालियन स्तर पर परिचालन की स्थापना करके, सेना न केवल UAV को एक मूल युद्ध उपकरण के रूप में सामान्य बनाती है, बल्कि बटालियन संरचनाओं को भी फिर से परिभाषित करती है जो ऐतिहासिक रूप से मानवयुक्त युद्ध के चारों ओर केंद्रित रही हैं। इन्फैंट्री बटालियन की ड्रोन प्लाटून एक संगठनात्मक पुनर्विचार का प्रतिनिधित्व करती है जहां तकनीकी प्रणालियाँ मानव-केंद्रित लड़ाई के तरीकों को बदलने लगती हैं।

इस परिवर्तन को अलग बनाता है इसका पैमाना। ड्रोन संचालन के लिए प्रशिक्षण अब विशेष इकाइयों तक सीमित नहीं रहेगा; बल्कि, UAV दक्षता 2027 तक सभी सैनिकों तक पहुँचने की योजना है। इसे पहले के ड्रोन तैनातियों के साथ तुलना करें, जैसे ऑपरेशन सिंदूर, जो विदेशी प्रणाली पर काफी निर्भर था, और इसका महत्व स्पष्ट हो जाता है। यह निर्णय तत्कालता को दर्शाता है: भारत के प्रतिकूल, विशेष रूप से पाकिस्तान, ने 2023 के बाद से सीमा पार ड्रोन घुसपैठ को बढ़ा दिया है, जिससे तात्कालिक उपायों के अलावा व्यवस्थित विरोधी-ड्रोन प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता है।

विस्तार के पीछे संस्थागत ढांचा

इस बदलाव के पीछे की संरचनात्मक गतिशीलता व्यापक संस्थागत प्रक्रियाओं में संशोधनों पर निर्भर करती है। सेना की योजना 19 प्रशिक्षण केंद्रों में UAV प्रशिक्षण को शामिल करना लॉजिस्टिक और प्रक्रियात्मक बाधाओं को संबोधित करती है। इन्फैंट्री स्कूल और OTA जैसी प्रमुख संस्थाएँ सिमुलेटरों और फील्ड ऑपरेशनों को पूर्व-आयोगन और सेवा में प्रशिक्षण मॉड्यूल में समाहित करेंगी।

खरीद के पक्ष में, डिफेंस एक्विजिशन प्रोसिजर (DAP) 2020 के तहत रक्षा अधिग्रहण नीतियों का उपयोग “आपातकालीन शक्तियों की खरीद” के लिए किया गया है, जिससे ₹4,200 करोड़ के ड्रोन और सिमुलेटरों के लिए त्वरित मंजूरी मिल सके। यह बढ़ावा ‘मेक इन इंडिया’ के व्यापक आदेशों के साथ भी मेल खाता है, जो स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है, जिसमें निगरानी और सामरिक मॉडल के लिए घरेलू कंपनियों जैसे IdeaForge और RattanIndia को शामिल किया गया है।

अधिग्रहण के साथ-साथ, सेना का संचालनात्मक अंग नए सटीकता आर्टिलरी बैटरी तैनात करेगा जो काउंटर-ड्रोन सिस्टम से सुसज्जित होंगी। ये प्रणाली साइबर कमजोरियों से निपटने के लिए गतिशील एन्क्रिप्शन प्रोटोकॉल को शामिल करने की अपेक्षा की जाती हैं, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 4(1) के तहत रक्षा प्रणालियों के लिए बाहरी हस्तक्षेप का प्रतिरोध करने में सक्षम हैं। ऐसे उपाय ड्रोन प्लेटफार्मों और पारंपरिक रक्षा प्रणालियों के बीच इंटरऑपरेबिलिटी मानकों के उभरते केंद्रीयता को उजागर करते हैं।

कार्यान्वयन के बारे में डेटा क्या कहता है

UAV अधिग्रहण और काउंटर-ड्रोन सिस्टम के लिए ₹4,200 करोड़ का बजट सेना की तत्काल प्राथमिकताओं को रेखांकित करता है, लेकिन जमीनी हकीकतें आशावाद को संतुलित करती हैं। पहले, आपातकालीन खरीद के बावजूद, इकाई स्तर पर भर्ती और सक्रिय क्षेत्र संदर्भों में वास्तविक तैनाती के बीच एक बड़ा अंतर है। केवल 40% खरीदे गए ड्रोन छोटे अन्वेषण इकाइयों में पूर्ण परिचालन प्रमाणन प्राप्त कर पाए हैं, जो रखरखाव कार्यक्रमों में व्यवधान के कारण है।

दूसरे, सीमा पार घुसपैठ 2023 के बाद UAV निगरानी प्रणालियों को बढ़ाने के बावजूद समान रूप से कम नहीं हुई हैं। सीमा सुरक्षा बल (BSF) के डेटा से पता चलता है कि 2025 के पहले छह महीनों में पंजाब और जम्मू सीमाओं पर 130 ड्रोन क्रॉसिंग के प्रयास हुए। जबकि UAV पहचान प्रणालियों ने 85% घुसपैठ को निष्क्रिय करने का दावा किया है, ऐसी प्रणालियाँ चयनित इकाइयों में ही केंद्रित हैं—राजस्थान और गुजरात सीमाओं पर जहाँ एकीकरण धीमा है, वहां खाली स्थान छोड़ती हैं।

अंत में, प्रशिक्षण के परिणाम अस्पष्ट बने हुए हैं। नए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की प्रारंभिक समीक्षा दिखाती है कि इस वर्ष OTA चेन्नई में परीक्षणों के दौरान केवल 12% अधिकारियों और सैनिकों ने उन्नत सामरिक UAV संचालन पर सिमुलेशन पास किया। यह अगले 2 वर्षों में ड्रोन साक्षरता का तेजी से विस्तार करने की चुनौती को उजागर करता है।

असुविधाजनक प्रश्न: सामरिक बनाम रणनीतिक जोखिम

भारत के ड्रोन विस्तार के बारे में चर्चा अक्सर संचालनात्मक सिद्धांतों में महत्वपूर्ण कमजोरियों को नजरअंदाज करती है। पहले, सेना की बढ़ती निर्भरता मानवरहित प्लेटफार्मों पर साइबर समझौता के जोखिम को प्रस्तुत करती है। जबकि आपातकालीन खरीद मात्रा को संबोधित करती है, कई अंतरराष्ट्रीय विक्रेताओं से आयातित सामरिक UAV में एक समान एन्क्रिप्शन मानकों की कमी है, जो संयुक्त संचालन के दौरान साइबर सुरक्षा में संभावित कमजोर बिंदु बनाती है।

दूसरे, ऐसी तकनीकों के प्रति अनियंत्रित उत्साह अधिक निर्भरता का खतरा पैदा करता है। आधुनिक युद्ध में संतुलित एकीकरण की आवश्यकता होती है; फिर भी, उच्च ऊंचाई वाले युद्ध के संदर्भों में—जैसे कि सियाचिन—चरम मौसम अक्सर UAV को अक्षम कर सकता है, जो पारंपरिक बलों पर निर्भर बैकअप रणनीतियों की आवश्यकता को उजागर करता है।

यहाँ विडंबना यह है कि जबकि सेना 2027 तक सर्वव्यापी ड्रोन दक्षता के लिए एक समय सीमा का दावा करती है, समानांतर प्रणालियों के लिए वित्त पोषण सुनिश्चित करने के बारे में कोई विशेष उल्लेख नहीं किया गया है। इसके अलावा, भारतीय क्षेत्र में निगरानी संचालन के आसपास नैतिक चिंताएँ अनुत्तरित बनी हुई हैं। उदाहरण के लिए, क्या ड्रोन युद्ध क्षेत्रों के लिए विशेष उपकरण होंगे या प्रदर्शनों के दौरान नागरिक सभाओं के खिलाफ नियमित रूप से तैनात किए जाएंगे?

दक्षिण कोरिया का UAV एकीकरण: एक तुलनात्मक दृष्टिकोण

भारत की योजनाएँ दक्षिण कोरिया के UAV सुधारों के समान हैं, जब सियोल ने 2018 में उत्तर कोरिया की बढ़ती provocations का सामना करते हुए निगरानी और युद्ध ड्रोन संचालन को अपने अग्रिम इन्फैंट्री के 95% से अधिक तक विस्तारित किया। दक्षिण कोरिया ने एक साथ अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाया और स्वदेशी काउंटर-ड्रोन सिस्टम विकसित किए, जो 92% पहचान सटीकता प्रदान करते हैं—जो भारत में आयातित प्रणालियों के अनुकूलन की सीमाओं के विपरीत है।

जबकि दक्षिण कोरिया ने ड्रोन संचालन के लिए पूरी ब्रीगेड स्थापित की, भारत का बटालियन-प्लाटून मॉडल परिचालन जिम्मेदारियों को टुकड़ों में बांटता है। जोखिम स्पष्ट है: विकेंद्रीकृत तैनाती बड़े सीमा पार अभियानों में स्केलेबिलिटी को प्रतिबंधित करती है जबकि सामरिक निगरानी को जटिल बनाती है।

परीक्षा एकीकरण

  • प्रारंभिक MCQ 1: भारत की रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020 के तहत कौन सा प्रावधान रक्षा बलों के लिए आपातकालीन खरीद की सुविधा प्रदान करता है?
    A. अध capítulo V खरीद समयसीमा पर
    B. अध capítulo VI सीधे खरीद पर
    C. आपातकालीन खरीद शक्तियाँ
    D. वार्षिक खरीद समीक्षा सीमा

    सही उत्तर: C
  • प्रारंभिक MCQ 2: दक्षिण कोरिया ने सबसे पहले एकीकृत निगरानी और युद्ध संचालन के लिए विशेष रूप से ड्रोन ब्रीगेड कब पेश किए?
    A. 2015
    B. 2017
    C. 2018
    D. 2020

    सही उत्तर: C

मुख्य प्रश्न: “भारतीय सेना के ड्रोन पर विस्तारित ध्यान ने सीमा रक्षा में परिचालन अंतर को किस हद तक संबोधित किया है, और 2027 तक इसके लक्ष्यों को साकार करने में कौन सी संस्थागत चुनौतियाँ बनी हुई हैं?”