Announcements
UPSC Foundation 2026 Prime Batch - Admissions Open JPSC 14th CCE Complete Course 2025 - Enroll Now Mains Practice Questions Programme - Limited Seats Daily Current Affairs - Free Access UPSC Prelims Test Series 2026 - 5000+ MCQs
+91 91025 57680
learnpro Civil Services
LearnPro Menu

Governance · Exam Notes

सुप्रीम कोर्ट का वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश पर रुख: लैंगिक समानता और कार्यस्थल नीति पर असर

साल 2024 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य बनाने पर सावधानी जताई है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसा कानून महिलाओं के प्रति लैंगिक रूढ़ियों को मजबूत कर सकता है और कार्यस्थल पर भेदभाव को बढ़ावा दे सकता है। ओडिशा, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था है, जिसे कोर्ट ने महिलाओं के करियर विकास और संवैधानिक समानता के संरक्षण के लिए बेहतर विकल्प माना है।
1 min read GS Paper II
Governance
Exam Notes
GS Paper II

Constitution, governance, social justice and institutional analysis

In brief

साल 2024 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य बनाने पर सावधानी जताई है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसा कानून महिलाओं के प्रति लैंगिक रूढ़ियों को मजबूत कर सकता है और कार्यस्थल पर भेदभाव को बढ़ावा दे सकता है। ओडिशा, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था है, जिसे कोर्ट ने महिलाओं के करियर विकास और संवैधानिक समानता के संरक्षण के लिए बेहतर विकल्प माना है।

परिप्रेक्ष्य और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

साल 2024 में भारत का सुप्रीम कोर्ट वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य बनाने पर सतर्कता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का कानून महिलाओं को कमजोर दिखाने वाले रूढ़िवाद को बढ़ावा दे सकता है, जिससे उनके करियर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कानूनी अनिवार्यता और नियोक्ता की स्वैच्छिक नीतियों में फर्क किया और स्वैच्छिक नीतियों को बेहतर माना। ओडिशा, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में शैक्षणिक संस्थानों में सालाना 60 दिन तक का स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश दिया जाता है, जिसे कोर्ट ने एक मॉडल के रूप में स्वीकार किया।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 1: सामाजिक मुद्दे – लैंगिक समानता, महिलाओं के अधिकार
  • GS पेपर 2: राजनीति – मौलिक अधिकार (Article 14, 15), न्यायिक व्याख्या
  • GS पेपर 4: नैतिकता – कार्यस्थल समानता, भेदभाव निषेध
  • निबंध: लिंग-संवेदनशील श्रम नीतियाँ और संवैधानिक सुरक्षा

कानूनी और संवैधानिक ढांचा

Article 14 कानून के समक्ष समानता और समान सुरक्षा की गारंटी देता है, जबकि Article 15(1) लिंग के आधार पर भेदभाव को रोकता है। मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (2017 में संशोधित) मातृत्व अवकाश बढ़ाता है, पर मासिक धर्म अवकाश को शामिल नहीं करता। विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) और नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ (2018) जैसे फैसले कार्यस्थल समानता और भेदभाव निषेध को मजबूत करते हैं। लेकिन भारत में मासिक धर्म अवकाश के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं है, यह केवल राज्यों की स्वैच्छिक नीतियों और न्यायालय की सतर्कता के माध्यम से पूरा होता है।

आर्थिक प्रभाव और श्रम बाजार की हकीकत

भारत में महिला श्रम भागीदारी दर 23.3% (PLFS 2021-22, MOSPI) पर बनी हुई है, जो संरचनात्मक बाधाओं को दर्शाती है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, मासिक धर्म से संबंधित अनुपस्थिति के कारण वैश्विक उत्पादकता में 2-7% तक की गिरावट होती है (ILO रिपोर्ट, 2018)। ओडिशा, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में विश्वविद्यालयों में मासिक धर्म अवकाश दिया जाता है, लेकिन इसका व्यापक आर्थिक लागत-लाभ विश्लेषण उपलब्ध नहीं है। बढ़े हुए मानव संसाधन खर्च और कार्यस्थल में भेदभाव की आशंका नियोक्ताओं को महिलाओं को रोजगार देने या पदोन्नति देने से रोक सकती है।

मासिक धर्म अवकाश: परिभाषा और वैश्विक प्रथाएँ

मासिक धर्म अवकाश वह अवकाश है जो महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान दर्द जैसे डिसमेनोरिया और एंडोमेट्रियोसिस के लक्षणों से निपटने के लिए दिया जाता है। जापान का लेबर स्टैंडर्ड्स एक्ट (Article 68) 1947 से बिना वेतन का मासिक धर्म अवकाश प्रदान करता है, लेकिन सामाजिक कलंक के कारण इसका उपयोग कम होता है, जो दर्शाता है कि केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं।

पहलूभारत (राज्य नीतियाँ)जापानसुप्रीम कोर्ट की स्थिति
कानूनी स्थितिओडिशा, कर्नाटक, केरल विश्वविद्यालयों में स्वैच्छिक नीतियाँ1947 से कानूनी बिना वेतन मासिक धर्म अवकाशकानूनी अनिवार्यता से सावधानी; स्वैच्छिक पहलों का समर्थन
अवकाश अवधिछात्राओं के लिए सालाना 60 दिन तककोई निश्चित सीमा नहीं; आवश्यकता अनुसार अवकाशकोई निश्चित अवधि अनिवार्य नहीं
कार्यस्थल प्रभावसीमित आंकड़े; भेदभाव की आशंकाकलंक के कारण कम उपयोगरूढ़ियों और भेदभाव के खतरे
आर्थिक प्रभावअमूल्यांकित; महिला श्रम भागीदारी 23.3%अमूल्यांकित; सांस्कृतिक कलंक उपयोग को सीमित करता हैउत्पादकता हानि बनाम करियर नुकसान का संतुलन

गहन विश्लेषण: वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश के अनिवार्य होने के खतरे

मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य करने से महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान कम सक्षम दिखाने वाली लैंगिक रूढ़ियां संस्थागत हो सकती हैं, जो मानसिक अवरोध और कार्यस्थल भेदभाव को जन्म दे सकती हैं। इससे महिलाओं के करियर विकास और समान व्यवहार पर नकारात्मक असर पड़ता है, जो Article 14 और 15(1) के सिद्धांतों के विपरीत है। सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले ने इस तनाव को रेखांकित किया और कहा कि ऐसे कानून बिना मजबूत भेदभाव निषेध व्यवस्था के उल्टा असर कर सकते हैं।

  • स्वैच्छिक नीतियाँ नियोक्ताओं में सहानुभूति बढ़ाती हैं बिना कानूनी दबाव के।
  • कानूनी अनिवार्यता से मानव संसाधन लागत बढ़ सकती है, जिससे महिलाओं के खिलाफ भेदभाव हो सकता है।
  • मजबूत कार्यस्थल भेदभाव रोकने वाले नियमों की कमी जोखिम बढ़ाती है।
  • मासिक धर्म अवकाश को मातृत्व लाभ के साथ जोड़ना लैंगिक समानता की बहस को गड़बड़ कर सकता है।

आगे की राह: नीति और समानता का संतुलन

  • स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश नीतियों को बढ़ावा दें और कलंक कम करने के लिए जागरूकता अभियान चलाएं।
  • Article 14 और 15 के तहत भेदभाव निषेध कानूनों को सख्ती से लागू करें ताकि महिलाओं के अधिकार सुरक्षित हों।
  • मासिक स्वास्थ्य शिक्षा और कार्यस्थल सुविधाओं को शामिल करें ताकि महिलाओं का अलगाव न हो।
  • आर्थिक प्रभावों पर शोध कर साक्ष्य आधारित नीतियाँ बनाएं।
  • अवकाश नीतियों से परे लचीले कार्य व्यवस्था और लिंग-संवेदनशील सुधारों को प्रोत्साहित करें।

वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. भारत का मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 महिलाओं के लिए वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश अनिवार्य करता है।
  2. जापान अपनी लेबर स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत 1947 से बिना वेतन मासिक धर्म अवकाश देता है।
  3. भारत का सुप्रीम कोर्ट लैंगिक समानता बढ़ाने के लिए वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य करने का समर्थन करता है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि मातृत्व लाभ अधिनियम मासिक धर्म अवकाश शामिल नहीं करता। कथन 2 सही है; जापान का लेबर स्टैंडर्ड्स एक्ट बिना वेतन मासिक धर्म अवकाश देता है। कथन 3 गलत है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य मासिक धर्म अवकाश पर चेतावनी दी है।

कार्यस्थल भेदभाव और मासिक धर्म अवकाश के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. अनिवार्य मासिक धर्म अवकाश महिलाओं की कमजोर छवि को मजबूत कर सकता है।
  2. स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश नीतियाँ कानूनी अनिवार्यता की तुलना में कम भेदभाव पैदा करती हैं।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश को Article 15(1) के तहत मौलिक अधिकार माना है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि अनिवार्य अवकाश रूढ़ियों को बढ़ावा दे सकता है। कथन 2 सही है; स्वैच्छिक नीतियाँ भेदभाव का खतरा कम करती हैं। कथन 3 गलत है; सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश को मौलिक अधिकार नहीं माना है।

मेनस प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट के वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश पर रुख का विश्लेषण करें और इसका भारत में लैंगिक समानता व कार्यस्थल भेदभाव पर प्रभाव बताएं। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 1 – सामाजिक मुद्दे, लैंगिक समानता
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में महिला श्रम भागीदारी राष्ट्रीय औसत से कम है; जागरूकता और स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश नीतियाँ महिलाओं के कार्यस्थल समावेशन को बेहतर कर सकती हैं।
  • मेनस पॉइंटर: कानूनी अनिवार्यता और स्वैच्छिक नीतियों के बीच संतुलन, झारखंड की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के संदर्भ में, और भेदभाव निषेध प्रवर्तन की आवश्यकता पर जोर।
क्या मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 मासिक धर्म अवकाश को कवर करता है?

नहीं। मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961, 2017 के संशोधन के बाद भी, मातृत्व अवकाश तक सीमित है और मासिक धर्म अवकाश शामिल नहीं करता।

भारत में महिला श्रम भागीदारी दर क्या है?

मंत्रालय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे 2021-22 के अनुसार, भारत में महिला श्रम भागीदारी दर 23.3% है।

कौन से भारतीय राज्य स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश नीतियाँ लागू कर चुके हैं?

ओडिशा, कर्नाटक और केरल ने राज्य संचालित विश्वविद्यालयों और संस्थानों में महिला छात्रों के लिए सालाना 60 दिन तक का स्वैच्छिक मासिक धर्म अवकाश लागू किया है।

सुप्रीम कोर्ट की अनिवार्य वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश को लेकर क्या चिंताएँ हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अनिवार्य वेतनयुक्त मासिक धर्म अवकाश महिलाओं के प्रति मानसिक बाधा पैदा कर सकता है, कमजोर छवि को बढ़ावा दे सकता है और कार्यस्थल भेदभाव को जन्म दे सकता है, जिससे महिलाओं के करियर अवसरों को नुकसान हो सकता है।

जापान की मासिक धर्म अवकाश नीति भारत से कैसे अलग है?

जापान का लेबर स्टैंडर्ड्स एक्ट (Article 68) 1947 से बिना वेतन मासिक धर्म अवकाश प्रदान करता है, लेकिन सामाजिक कलंक के कारण इसका उपयोग कम होता है। भारत में कोई कानूनी मासिक धर्म अवकाश नहीं है, पर कुछ राज्यों में स्वैच्छिक नीतियाँ हैं; दोनों ही संदर्भों में केवल कानूनी प्रावधान प्रभावी उपयोग या लैंगिक समानता की गारंटी नहीं देते।

Sources and further reading

Academic supportNeed guidance for this examination?

Speak to LearnPro about the relevant course, notes, test series or answer-writing programme.

Ask LearnPro
Continue preparation

Read, revise and practise this subject

LearnPro Editorial Team

LearnPro prepares civil-services notes in simple language with syllabus relevance, factual review and links to primary references where available. Academic direction is provided by Rajan Kumar, Director, LearnPro Civil Services. For changing examination dates and vacancies, the official commission notification always prevails.