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Governance · Exam Notes

भारत में वित्तीय शासन के प्रहरी के रूप में संसदीय समितियाँ

भारत में संसदीय स्थायी समितियाँ, जो संविधान के अनुच्छेद 105 और 118 के तहत गठित होती हैं, बजट आवंटन और सरकारी खर्च की गहन जांच कर वित्तीय शासन में अहम भूमिका निभाती हैं। हालांकि इनमें क्षमता है, लेकिन प्रवर्तन शक्तियों के अभाव और रिपोर्टों में देरी जैसी चुनौतियाँ उनकी प्रभावशीलता को सीमित करती हैं। ब्रिटेन के पीएसी के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि संसदीय वित्तीय निगरानी को मजबूत करने के लिए सुधार आवश्यक हैं।
1 min read GS Paper II
Governance
Exam Notes
GS Paper II

Constitution, governance, social justice and institutional analysis

In brief

भारत में संसदीय स्थायी समितियाँ, जो संविधान के अनुच्छेद 105 और 118 के तहत गठित होती हैं, बजट आवंटन और सरकारी खर्च की गहन जांच कर वित्तीय शासन में अहम भूमिका निभाती हैं। हालांकि इनमें क्षमता है, लेकिन प्रवर्तन शक्तियों के अभाव और रिपोर्टों में देरी जैसी चुनौतियाँ उनकी प्रभावशीलता को सीमित करती हैं। ब्रिटेन के पीएसी के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि संसदीय वित्तीय निगरानी को मजबूत करने के लिए सुधार आवश्यक हैं।

परिचय: संसदीय समितियाँ और वित्तीय निगरानी

भारत में संसदीय स्थायी समितियाँ (PSCs) संविधान के अनुच्छेद 105 और 118 के तहत स्थायी रूप से गठित होती हैं। ये पूरे वर्ष काम करती हैं ताकि सरकार के कार्यों की, विशेषकर वित्तीय मामलों की, गहन जांच की जा सके, क्योंकि संसदीय सत्रों में समय सीमित होता है। प्रमुख वित्तीय समितियों में सार्वजनिक लेखा समिति (PAC), अनुमान समिति, और विभागीय स्थायी समितियाँ (DRSCs) शामिल हैं, जैसे कि वित्त पर संसदीय स्थायी समिति। ये समितियाँ बजट आवंटन, व्यय और नीतियों के क्रियान्वयन पर सूक्ष्म निगरानी कर वित्तीय शासन को सुदृढ़ बनाती हैं।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: भारतीय राजनीति और शासन — संसदीय समितियाँ, वित्तीय निगरानी
  • GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था — सार्वजनिक वित्त, बजटिंग, वित्तीय जवाबदेही
  • निबंध विषय: लोकतंत्र को मजबूत करने में संसदीय संस्थानों की भूमिका

संवैधानिक और कानूनी ढांचा जो संसदीय समितियों को नियंत्रित करता है

संविधान के अनुच्छेद 105 और 118 संसद और उसकी समितियों के अधिकार और विशेषाधिकार निर्धारित करते हैं, जो संसदीय स्थायी समितियों की संवैधानिक आधारशिला हैं। लोकसभा के नियमावली (2023) के नियम 331 से 337 तक विभागीय स्थायी समितियों के कामकाज को नियंत्रित करते हैं। सार्वजनिक लेखा समिति कंट्रोलर और ऑडिटर जनरल (कर्तव्य, अधिकार और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 के तहत गठित होती है, जबकि अनुमान समिति लोकसभा नियम 310 के तहत स्थापित होती है। वित्तीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 वित्तीय अनुशासन को महत्व देता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से संसदीय वित्तीय निगरानी की आवश्यकता को मजबूती देता है।

  • अनुच्छेद 105 और 118: संसदीय विशेषाधिकार और समिति अधिकारों का संवैधानिक प्रावधान
  • नियम 331-337 (लोकसभा नियम, 2023): विभागीय स्थायी समितियों का संचालन
  • सार्वजनिक लेखा समिति: CAG अधिनियम, 1971 के तहत व्यय की जांच के लिए गठित
  • अनुमान समिति: लोकसभा नियम 310 के तहत बजट अनुमान की समीक्षा के लिए गठित
  • FRBM अधिनियम, 2003: वित्तीय जिम्मेदारी पर जोर, निगरानी तंत्र को समर्थन

वित्तीय शासन में प्रमुख संसदीय समितियों के कार्य और भूमिका

PSCs वित्तीय विधेयकों, अनुदान मांगों और सरकारी खर्च की विस्तार से जांच कर पाते हैं। वित्त पर संसदीय स्थायी समिति वित्त से जुड़े मंत्रालयों जैसे योजना मंत्रालय और नीति आयोग के बजट और खर्च की समीक्षा करती है। PAC नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा तैयार सरकारी व्यय रिपोर्टों की जांच करता है, जिसमें अनुपालन और दक्षता पर ध्यान दिया जाता है। अनुमान समिति बजट अनुमानों का विश्लेषण कर अर्थव्यवस्था और दक्षता के उपाय सुझाती है।

  • वित्त पर संसदीय स्थायी समिति: वित्तीय विधेयक, बजट प्रस्ताव और वित्त मंत्रालयों के व्यय की समीक्षा
  • सार्वजनिक लेखा समिति (PAC): CAG रिपोर्ट के आधार पर ₹150 लाख करोड़ से अधिक वार्षिक सरकारी खर्च की जांच
  • अनुमान समिति: ₹40 लाख करोड़ से अधिक वार्षिक अनुदान मांगों की समीक्षा और बचत के सुझाव
  • कंट्रोलर और महालेखा परीक्षक (CAG): सरकारी खातों का ऑडिट कर PAC को रिपोर्ट प्रस्तुत करता है

प्रायोगिक साक्ष्य: वित्तीय निगरानी और धन के उपयोग

वित्त पर संसदीय स्थायी समिति की 2024 की रिपोर्ट में बताया गया कि योजना मंत्रालय और नीति आयोग ने वित्त वर्ष 24 और 25 में आवंटित धन का मात्र 36% से कम उपयोग किया, जो वित्तीय प्रबंधन की कमी को दर्शाता है। केंद्रीय बजट 2023-24 में नीति आयोग को ₹1,500 करोड़ और योजना मंत्रालय को ₹2,000 करोड़ आवंटित किए गए थे। आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार, धन के कुशल उपयोग में कमी से वार्षिक GDP वृद्धि में लगभग 0.5% की गिरावट हो सकती है, जो वित्तीय कुप्रबंधन की आर्थिक लागत को उजागर करता है।

  • योजना मंत्रालय और नीति आयोग का खर्च FY24 और FY25 में 36% से कम (वित्त पर संसदीय स्थायी समिति रिपोर्ट, 2024)
  • केंद्रीय बजट 2023-24: नीति आयोग को ₹1,500 करोड़; योजना मंत्रालय को ₹2,000 करोड़ आवंटन
  • सरकारी खर्च का ऑडिट CAG द्वारा ₹150 लाख करोड़ से अधिक वार्षिक (CAG वार्षिक रिपोर्ट, 2023)
  • अनुमान समिति ₹40 लाख करोड़ से अधिक की अनुदान मांगों की समीक्षा करती है (लोकसभा सचिवालय, 2023)
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24: धन के कुशल उपयोग की कमी से 0.5% वार्षिक GDP वृद्धि में कमी

तुलनात्मक दृष्टिकोण: ब्रिटेन की सार्वजनिक लेखा समिति और भारतीय PAC

ब्रिटेन की हाउस ऑफ कॉमन्स की सार्वजनिक लेखा समिति (PAC) सशक्त वित्तीय निगरानी का उदाहरण है। अधिकारियों को समन भेजने और विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित करने के अधिकार के साथ, ब्रिटेन के PAC ने पांच वर्षों में सार्वजनिक धन के उपयोग की दक्षता में 15% सुधार किया है (UK National Audit Office Report, 2022)। इसके विपरीत, भारतीय PAC के पास सीमित प्रवर्तन शक्तियाँ और रिपोर्टों में देरी होती है, जिससे कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने में उसकी क्षमता सीमित रहती है।

पहलूभारतयूनाइटेड किंगडम
कानूनी आधारसंविधान अनुच्छेद 105, 118; CAG अधिनियम 1971संसदीय स्थायी आदेश; राष्ट्रीय लेखा कार्यालय अधिनियम
समिति अधिकारसलाहकार; बाध्यकारी प्रवर्तन नहींअधिकार: अधिकारियों को समन, बाध्यकारी सिफारिशें
रिपोर्ट समयबद्धताअक्सर देरी; रिपोर्ट विलंबितरिपोर्ट त्वरित प्रकाशन; उच्च सार्वजनिक दृश्यता
धन उपयोग पर प्रभावसीमित सुधार; कम उपयोग जारीपांच वर्षों में 15% दक्षता सुधार

भारतीय संसदीय समितियों की प्रभावशीलता में बाधाएं

संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद, भारतीय संसदीय स्थायी समितियाँ कई संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक चुनौतियों का सामना करती हैं। रिपोर्टों में देरी उनकी प्रासंगिकता को कम कर देती है। प्रवर्तन शक्तियों के अभाव में कार्यपालिका अक्सर सिफारिशों की अनदेखी करती है। संसाधनों की कमी और अंशकालिक सदस्यता गहन जांच में बाधा डालती है। राजनीतिक पक्षपात कभी-कभी समितियों के गैरपक्षपाती कामकाज को प्रभावित करता है।

  • रिपोर्टों में देरी से निगरानी की प्रभावशीलता कम होती है
  • बाध्यकारी प्रवर्तन शक्तियों के अभाव में कार्यपालिका अनुपालन नहीं करती
  • संसाधन सीमित और अंशकालिक सदस्यता गहन समीक्षा में बाधा
  • राजनीतिक विचार कभी-कभी गैरपक्षपाती कामकाज को प्रभावित करते हैं

महत्व और आगे का रास्ता

संसदीय स्थायी समितियाँ वित्तीय शासन के लिए अनिवार्य हैं, जो संसदीय बहसों से परे साक्ष्य-आधारित गहन निगरानी प्रदान करती हैं। इन्हें मजबूत करने के लिए प्रवर्तन शक्तियों का कानूनी प्रावधान, रिपोर्टों का समय पर प्रस्तुतिकरण और सचिवालय समर्थन बढ़ाना आवश्यक है। ब्रिटेन के PAC मॉडल से प्रेरणा लेकर अधिकारियों को समन भेजने और रिपोर्ट सार्वजनिक करने के अधिकार अपनाने से जवाबदेही बढ़ेगी। सदस्यों के कौशल विकास और गैरपक्षपाती कामकाज को संस्थागत रूप देना भी इनके प्रभाव को बढ़ाएगा।

  • संसदीय समितियों को बाध्यकारी सिफारिशों के लिए कानूनी प्रवर्तन शक्तियाँ दें
  • समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत करना और सार्वजनिक उपलब्धता सुनिश्चित करें
  • गहन जांच के लिए सचिवालय समर्थन और संसाधन बढ़ाएं
  • पार्टीगत राजनीति से मुक्त कामकाज के लिए पार-पार्टी सहमति स्थापित करें
  • ब्रिटेन के PAC के सर्वोत्तम अभ्यास अपनाएं: समन अधिकार, सार्वजनिक सुनवाई, रिपोर्ट प्रसार

संसदीय स्थायी समितियों (PSCs) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. PSCs भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 और 118 के तहत गठित होती हैं।
  2. सार्वजनिक लेखा समिति वित्तीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 के तहत गठित होती है।
  3. अनुमान समिति वार्षिक ₹40 लाख करोड़ से अधिक अनुदान मांगों की समीक्षा करती है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 105 और 118 संसदीय विशेषाधिकार और समितियों का प्रावधान करते हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि PAC CAG अधिनियम, 1971 के तहत गठित होती है, न कि FRBM अधिनियम के तहत। कथन 3 सही है; अनुमान समिति ₹40 लाख करोड़ से अधिक अनुदान मांगों की समीक्षा करती है।

सार्वजनिक लेखा समिति (PAC) के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:

  1. PAC के पास कार्यपालिका पर अपनी सिफारिशें लागू करने के बाध्यकारी अधिकार हैं।
  2. PAC नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों के आधार पर सरकारी खर्च की जांच करता है।
  3. PAC एक विभागीय स्थायी समिति है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है; PAC की सिफारिशें सलाहकार होती हैं और बाध्यकारी नहीं। कथन 2 सही है; PAC CAG की रिपोर्टों के आधार पर खर्च की जांच करता है। कथन 3 गलत है; PAC एक वित्तीय समिति है, विभागीय स्थायी समिति नहीं।

मुख्य प्रश्न

भारत में संसदीय स्थायी समितियों की वित्तीय शासन के प्रहरी के रूप में भूमिका पर चर्चा करें। उनके सामने आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण करें और उनकी प्रभावशीलता बढ़ाने के उपाय सुझाएं। (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 — भारतीय राजनीति और शासन; पेपर 3 — अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक वित्त
  • झारखंड दृष्टिकोण: राज्य स्तरीय समितियाँ केंद्रीय PSCs की तरह झारखंड राज्य योजना बोर्ड और नीति आयोग से जुड़ी योजनाओं के तहत धन उपयोग की निगरानी करती हैं
  • मुख्य बिंदु: केंद्र और राज्य स्तर पर वित्तीय निगरानी को मजबूत करने से झारखंड के विकास परियोजनाओं में धन उपयोग बेहतर होगा
भारत में संसदीय स्थायी समितियों का संवैधानिक आधार क्या है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 और 118 संसद और उसकी समितियों के अधिकार और विशेषाधिकार प्रदान करते हैं, जिनमें संसदीय स्थायी समितियाँ भी शामिल हैं।

सार्वजनिक लेखा समिति का गठन किस अधिनियम के तहत होता है?

सार्वजनिक लेखा समिति कंट्रोलर और महालेखा परीक्षक (कर्तव्य, अधिकार और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 के तहत गठित होती है।

अनुमान समिति वित्तीय शासन में कैसे योगदान देती है?

अनुमान समिति मंत्रालयों द्वारा प्रस्तुत बजट अनुमानों की जांच करती है, बचत के सुझाव देती है और आवंटित धन के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करती है, जो वार्षिक ₹40 लाख करोड़ से अधिक की अनुदान मांगों की समीक्षा करती है।

भारत में संसदीय स्थायी समितियों के मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?

मुख्य चुनौतियों में रिपोर्ट प्रस्तुत करने में देरी, कार्यपालिका पर बाध्यकारी प्रवर्तन शक्तियों का अभाव, संसाधनों की कमी, अंशकालिक सदस्यता और कभी-कभी राजनीतिक पक्षपात शामिल हैं।

ब्रिटेन की सार्वजनिक लेखा समिति भारतीय PAC से कैसे भिन्न है?

ब्रिटेन की PAC के पास अधिकारियों को समन भेजने और सिफारिशों को लागू करने के बाध्यकारी अधिकार हैं, जिससे पांच वर्षों में धन उपयोग दक्षता में 15% सुधार हुआ है, जबकि भारतीय PAC के पास ऐसी बाध्यकारी शक्तियाँ नहीं हैं।

Sources and further reading

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