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2085 तक भारत में चरम जलवायु घटनाओं का स्थलीय जीवों के आवासों पर प्रभाव

2085 तक चरम जलवायु घटनाओं का जीव आवासों पर संभावित प्रभाव

2024 में Indian Express में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 2085 तक विश्वभर में स्थलीय जीवों के लगभग 36% आवास चरम जलवायु घटनाओं से प्रभावित हो सकते हैं। यह अनुमान मौजूदा जलवायु परिवर्तन और आवास की संवेदनशीलता पर आधारित है, जिसमें भारत अपनी विविध पारिस्थितिक प्रणालियों के कारण एक संवेदनशील क्षेत्र के रूप में उभरता है। Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) AR6 के आंकड़े बताते हैं कि 2023 तक वैश्विक तापमान औद्योगिक युग से 1.16 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, जिससे हीटवेव, सूखा और बाढ़ जैसी चरम घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ी है। India Meteorological Department (IMD) के अनुसार 2000 से 2020 के बीच हीटवेव की घटनाएं 60% बढ़ी हैं, जो कई प्रजातियों के आवासों की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा हैं।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण
  • GS पेपर 1: भूगोल – जलवायु का जैव विविधता पर प्रभाव
  • निबंध: जलवायु परिवर्तन और उसका वन्यजीवन तथा अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

भारत में आवास संरक्षण के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा

भारतीय संविधानपर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत केंद्र सरकार को धारा 3 और 5 के अंतर्गत पर्यावरणीय खतरों से निपटने के लिए अधिकार प्राप्त हैं, जिनमें चरम जलवायु घटनाएं भी शामिल हैं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 धारा 2 (परिभाषाएं) और 38 (निर्धारित क्षेत्रों का संरक्षण) के माध्यम से आवास संरक्षण सुनिश्चित करता है। राष्ट्रीय जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 36 और 37 जैव विविधता संरक्षण और सतत उपयोग पर केंद्रित हैं। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा 2 और 3 वन भूमि के अवैध परिवर्तन को रोकती है, जो आवासों की कनेक्टिविटी के लिए आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले जैसे M.C. Mehta v. Union of India (1987) ने पर्यावरण संरक्षण में न्यायपालिका की भूमिका को मजबूत किया है।

चरम घटनाओं से आवास क्षति के आर्थिक परिणाम

जलवायु कारणों से आवासों का क्षरण न केवल जैव विविधता के लिए खतरा है, बल्कि आर्थिक स्थिरता के लिए भी गंभीर चुनौती है। विश्व बैंक (2021) के अनुसार, 2050 तक आवास क्षति से वैश्विक आर्थिक नुकसान 1.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था में जैव विविधता पर निर्भर क्षेत्र जैसे कृषि और पर्यटन GDP का 17% से अधिक योगदान देते हैं (आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24)। TERI रिपोर्ट (2022) के अनुसार पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का वार्षिक मूल्य लगभग 61,500 अरब रुपये है, जो आवास विखंडन से खतरे में हैं। राष्ट्रीय अनुकूलन कोष (NAFCC) के तहत सरकार द्वारा लगभग 600 करोड़ रुपये वार्षिक आवंटित किए जाते हैं, जो जलवायु अनुकूलन के प्रयासों को दर्शाता है, लेकिन अनुमानित प्रभावों के मुकाबले यह धनराशि पर्याप्त नहीं है।

आवास प्रभावों की निगरानी और कम करने में संस्थागत भूमिकाएं

  • पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC): पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े नीतियां बनाना और कानून लागू करना।
  • भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD): चरम मौसम घटनाओं की पूर्व सूचना और डेटा प्रदान करना।
  • भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI): जीव विविधता और आवास की स्थिति पर अनुसंधान।
  • राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL): वन्यजीव संरक्षण और आवास प्रबंधन पर सलाह देना।
  • IPCC: वैश्विक जलवायु प्रभावों का वैज्ञानिक मूल्यांकन।
  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP): अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण शासन और रिपोर्टिंग में सहयोग।

आवास संवेदनशीलता और जोखिम में प्रजातियों के आंकड़े

  • 2085 तक 36% स्थलीय जीव आवास चरम घटनाओं से प्रभावित होने का अनुमान (Indian Express, 2024)।
  • भारत में वन आवरण कुल भौगोलिक क्षेत्र का 21.71% है (Forest Survey of India, 2023)।
  • भारत की 70% से अधिक संकटग्रस्त प्रजातियां विशिष्ट आवासों पर निर्भर हैं (ZSI रिपोर्ट, 2023)।
  • 2050 तक बंगाल टाइगर के उपयुक्त आवास में 30% की कमी हो सकती है (WWF India, 2023)।
  • 2000 से 2020 के बीच भारत में चरम हीटवेव की आवृत्ति 60% बढ़ी है (IMD रिपोर्ट, 2022)।

भारत और कोस्टा रिका: जलवायु अनुकूलन व जैव विविधता संरक्षण की तुलना

पहलू भारत कोस्टा रिका
वन आवरण में बदलाव (1997-2022) हल्की बढ़ोतरी; 2023 में 21.71% वन आवरण PES योजनाओं के कारण 52% वृद्धि (विश्व बैंक, 2023)
नीति समन्वय जलवायु अनुकूलन और जैव विविधता संरक्षण के बीच सीमित समन्वय PES और कानूनी ढांचे के जरिए मजबूत समन्वय
आर्थिक प्रोत्साहन NAFCC के तहत 600 करोड़ रुपये वार्षिक; आवास संरक्षण के लिए सीमित प्रोत्साहन वन संरक्षण और आवास लचीलापन के लिए प्रभावी PES योजनाएं
आवास कनेक्टिविटी कोरिडोर और प्रवासन मार्गों पर अपर्याप्त ध्यान प्रजाति प्रवासन को बढ़ावा देने वाले सक्रिय पुनर्स्थापन और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट

भारत की जलवायु और जैव विविधता नीतियों में प्रमुख अंतर

भारत में मौजूदा नीतियां जलवायु अनुकूलन और जैव विविधता संरक्षण के बीच समन्वय में कमजोर हैं, खासकर आवास कनेक्टिविटी और प्रजाति प्रवासन मार्गों को लेकर। यह कमी चरम जलवायु घटनाओं के खिलाफ लचीलापन कम करती है क्योंकि विखंडित आवास प्रजातियों के स्थानांतरण को सीमित करते हैं। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत प्रवर्तन चुनौतियां और वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत वन भूमि के परिवर्तन में देरी आवास संवेदनशीलता को और बढ़ाती हैं। स्थानीय समुदायों को संरक्षण में शामिल करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन भी अपर्याप्त हैं, जिससे NAFCC जैसी योजनाओं की प्रभावशीलता कम हो रही है।

महत्व और आगे की राह

  • जलवायु अनुकूलन और जैव विविधता संरक्षण नीतियों के बीच समन्वय बढ़ाएं, विशेषकर आवास कनेक्टिविटी और प्रवासन मार्गों पर जोर दें।
  • NAFCC जैसे कार्यक्रमों के लिए धन बढ़ाएं और उन्हें लक्षित आवास पुनर्स्थापन और प्रजाति प्रवासन सुविधा तक विस्तारित करें।
  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम और वन संरक्षण अधिनियम जैसे कानूनों का कड़ाई से पालन कर आवास विखंडन रोकें।
  • कोस्टा रिका के PES मॉडल जैसे आर्थिक प्रोत्साहन अपनाएं ताकि स्थानीय हितधारक संरक्षण में सक्रिय हों।
  • MoEFCC, IMD, ZSI और NBWL जैसी संस्थाओं की क्षमता का इस्तेमाल कर निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करें।

चरम जलवायु घटनाओं के जीव आवासों पर प्रभाव से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. 2085 तक विश्वभर में स्थलीय जीव आवासों के एक तिहाई से अधिक प्रभावित होने की संभावना है।
  2. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में विशेष रूप से आवास कनेक्टिविटी कॉरिडोर के प्रावधान हैं।
  3. भारत में 2000 के बाद से जलवायु नीतियों के कारण चरम हीटवेव की आवृत्ति कम हुई है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है जैसा कि 2024 के Indian Express अध्ययन में बताया गया है। कथन 2 गलत है क्योंकि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में आवास कनेक्टिविटी कॉरिडोर के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। कथन 3 गलत है; IMD के आंकड़े बताते हैं कि 2000 से 2020 के बीच हीटवेव की आवृत्ति 60% बढ़ी है।

भारत के पर्यावरण संरक्षण के कानूनी ढांचे के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण संरक्षण और सुधार का निर्देश देता है।
  2. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 केंद्र सरकार को पर्यावरणीय खतरों से निपटने का अधिकार देता है।
  3. वन संरक्षण अधिनियम, 1980 विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि के असीमित परिवर्तन की अनुमति देता है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 48A पर्यावरण संरक्षण का निर्देश देता है। कथन 2 भी सही है क्योंकि EPA 1986 केंद्र को कार्रवाई का अधिकार देता है। कथन 3 गलत है; वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन भूमि के परिवर्तन को सख्ती से नियंत्रित करता है।

मुख्य प्रश्न

भारत में चरम जलवायु घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति स्थलीय जीव आवासों के लिए किस प्रकार खतरा है? वर्तमान कानूनी और नीतिगत ढांचे इन चुनौतियों से निपटने में कितने सक्षम हैं? आवास की लचीलापन और जलवायु अनुकूलन को बेहतर बनाने के उपाय सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – पर्यावरण और पारिस्थितिकी; पेपर 3 – राज्य विशिष्ट विकास मुद्दे
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड का वन आवरण लगभग 29.7% है (Forest Survey of India, 2023), जो सूखा और बाढ़ जैसी चरम जलवायु घटनाओं से आवासीय विखंडन के लिए संवेदनशील बनाता है, जिनकी आवृत्ति बढ़ रही है।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड की जीविका वन पारिस्थितिक तंत्रों पर निर्भर है, आवास क्षति का आदिवासी जैव विविधता पर प्रभाव, और राज्य स्तर पर जलवायु अनुकूलन व जैव विविधता संरक्षण के समन्वय की आवश्यकता पर उत्तर तैयार करें।
पर्यावरण संरक्षण में अनुच्छेद 48A का क्या महत्व है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण संरक्षण और सुधार के साथ-साथ वन और वन्यजीवों की रक्षा का निर्देश देता है, जो पर्यावरणीय कानूनों और नीतियों के लिए संवैधानिक आधार प्रदान करता है।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 आवास संरक्षण में कैसे योगदान देता है?

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 जीव प्रजातियों और उनके आवासों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है, जिसमें संरक्षित क्षेत्र स्थापित करना और शिकार पर नियंत्रण शामिल है, लेकिन आवास कनेक्टिविटी कॉरिडोर के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं।

राष्ट्रीय अनुकूलन कोष (NAFCC) की भूमिका क्या है?

NAFCC जलवायु लचीलापन बढ़ाने वाली परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करता है, जिसमें कृषि और वानिकी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अनुकूलन उपाय शामिल हैं, और राज्यों को लगभग 600 करोड़ रुपये वार्षिक आवंटन करता है।

वन्यजीव संरक्षण में आवास कनेक्टिविटी क्यों महत्वपूर्ण है?

आवास कनेक्टिविटी प्रजातियों को प्रवास, संसाधन खोजने और आनुवंशिक विविधता बनाए रखने की सुविधा देती है, जो चरम जलवायु घटनाओं और मानव गतिविधियों से होने वाले आवास विखंडन के खिलाफ लचीलापन के लिए जरूरी है।

कोस्टा रिका ने जलवायु अनुकूलन और जैव विविधता संरक्षण को कैसे सफलतापूर्वक जोड़ा?

कोस्टा रिका ने Payment for Ecosystem Services (PES) योजनाओं को लागू किया, जो वन संरक्षण के लिए आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान करती हैं, जिससे 1997 से 2022 के बीच वन आवरण में 52% की वृद्धि हुई और आवास लचीलापन बेहतर हुआ (विश्व बैंक, 2023)।