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सुप्रीम कोर्ट ने CEC और EC नियुक्ति कानून पर संसद में हुई बहस पर उठाए सवाल

अप्रैल 2024 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और कार्य व्यवहार) अधिनियम, 1991 पर संसद में हुई बहस की पर्याप्तता को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए। यह अधिनियम मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति का प्रावधान करता है। तीन न्यायाधीशों की पीठ ने यह पूछा कि क्या इस कानून को बनाने से पहले संसद में ‘उचित बहस’ हुई थी, जिससे पारदर्शिता और संवैधानिक प्रक्रिया की चिंता सामने आई। यह जांच न्यायपालिका की उस भूमिका को दर्शाती है जो संवैधानिक पदाधिकारियों की नियुक्ति में लोकतांत्रिक जवाबदेही सुनिश्चित करती है।

UPSC Relevance

  • GS Paper 2: भारतीय संविधान—संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्तियां, संसदीय प्रक्रियाएं, शासन में न्यायपालिका की भूमिका
  • GS Paper 1: भारतीय राजनीति—लोकतांत्रिक संस्थान और चुनावी प्रक्रिया
  • निबंध: भारत में संस्थागत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही

नियुक्ति का संवैधानिक और कानूनी ढांचा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार दिया गया है। हालांकि, संविधान में CEC और ECs की नियुक्ति की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से नहीं बताई गई है। इस कमी को चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और कार्य व्यवहार) अधिनियम, 1991 ने पूरा किया है, जिसके तहत राष्ट्रपति की नियुक्ति होती है, जो मंत्रिपरिषद की सलाह पर आधारित होती है।

सुप्रीम कोर्ट की हाल की टिप्पणियां अनुच्छेद 122 का हवाला देती हैं, जो संसद को अपनी कार्यवाही के नियम बनाने का अधिकार देता है, और सवाल उठाती हैं कि क्या इस अधिनियम के लिए विधायी प्रक्रिया में संसद की पर्याप्त जांच हुई। 2002 के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स जैसे फैसलों ने संवैधानिक निकायों की नियुक्तियों में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जोर दिया है। इसी तरह, 1994 के एस. आर. बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले ने लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संघवाद को रेखांकित किया, जो संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़े हैं।

नियुक्ति पारदर्शिता के परिचालन और आर्थिक प्रभाव

नियुक्ति की प्रक्रिया यद्यपि औपचारिक है, लेकिन इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत की राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक माहौल पर पड़ता है। चुनाव आयोग का वित्तीय बजट 2023-24 के लिए लगभग ₹1,200 करोड़ था (संघीय बजट 2023-24, वित्त मंत्रालय), जो इसके व्यापक परिचालन दायित्वों को दर्शाता है। आयोग देश के 1.7 मिलियन से अधिक मतदान केंद्रों पर चुनाव प्रक्रिया का संचालन करता है (ECI वार्षिक रिपोर्ट 2023), जो लोकतांत्रिक वैधता सुनिश्चित करता है।

राजनीतिक स्थिरता, जो विश्वसनीय चुनावों से बनती है, का संबंध भारत की GDP वृद्धि दर 7.1% (आर्थिक सर्वेक्षण 2024) और 2022-23 में $83.57 बिलियन के FDI निवेश से है (उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग)। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता में कमी निवेशकों के विश्वास और आर्थिक पूर्वानुमान को कमजोर कर सकती है।

संस्थागत भूमिकाएं और जवाबदेही के उपाय

चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिसका काम स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना है। सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक आदेशों और संस्थागत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। संसद नियुक्ति और सेवा की शर्तों के लिए कानून बनाती है, जबकि कानून और न्याय मंत्रालय विधायी मसौदे तैयार करता है।

1991 के अधिनियम के तहत वर्तमान नियुक्ति प्रणाली में कार्यपालिका राष्ट्रपति को उम्मीदवारों की सिफारिश करती है, जिसमें संसद की अनिवार्य सलाह या पारदर्शिता नहीं होती। यह न्यायपालिका के द्वारा मांगे गए प्रक्रियात्मक उचितता और लोकतांत्रिक जवाबदेही से मेल नहीं खाता।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत और यूनाइटेड किंगडम की नियुक्ति प्रक्रियाएं

पहलू भारत यूनाइटेड किंगडम
नियुक्ति प्राधिकारी राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर (कार्यपालिका) हाउस ऑफ कॉमन्स के स्पीकर की समिति, संसदीय समिति की जांच के साथ
संसदीय निगरानी न्यूनतम; अनिवार्य संसदीय बहस या समिति जांच नहीं बहु-चरणीय प्रक्रिया, सार्वजनिक परामर्श और द्विदलीय संसदीय निगरानी
पारदर्शिता अस्पष्ट; सार्वजनिक परामर्श या विस्तृत संसदीय बहस दर्ज नहीं पारदर्शी प्रक्रिया, प्रकाशित मानदंड और सार्वजनिक सुझाव
संस्थागत स्वतंत्रता कार्यपालिका प्रभुत्व के कारण सवाल उठते हैं संसदीय और सार्वजनिक जांच के कारण बेहतर

भारत की नियुक्ति प्रणाली में प्रमुख कमजोरियां

  • CEC और ECs के लिए पारदर्शी, सलाहकार और बहु-हितधारक नियुक्ति प्रक्रिया का अभाव।
  • 1991 अधिनियम या बाद की नियुक्तियों पर अनिवार्य संसदीय बहस या समिति जांच नहीं।
  • कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति से राजनीतिकरण की आशंका, जिससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
  • चयन प्रक्रिया में विपक्ष या नागरिक समाज की औपचारिक भागीदारी और सार्वजनिक जवाबदेही का अभाव।

महत्व और आगे का रास्ता

  • पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया स्थापित करने के लिए संसदीय समिति की भागीदारी जरूरी है, जिससे लोकतांत्रिक वैधता बढ़ेगी।
  • सार्वजनिक परामर्श या द्विदलीय सहमति के तंत्र से राजनीतिकरण के जोखिम कम होंगे।
  • नियुक्ति प्रक्रियाओं की समय-समय पर न्यायिक समीक्षा संवैधानिक सिद्धांतों के पालन को सुनिश्चित करेगी।
  • चुनाव आयोग की स्वायत्तता मजबूत करना राजनीतिक स्थिरता और निवेशकों के विश्वास के लिए आवश्यक है।

भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. भारतीय संविधान में CEC और ECs की नियुक्ति की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से बताई गई है।
  2. चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और कार्य व्यवहार) अधिनियम, 1991 नियुक्ति प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।
  3. राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर CEC और ECs की नियुक्ति करते हैं।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 324 नियुक्ति प्रक्रिया स्पष्ट नहीं करता। कथन 2 सही है क्योंकि 1991 का अधिनियम सेवा की शर्तों और नियुक्ति को नियंत्रित करता है। कथन 3 सही है क्योंकि नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद की सलाह पर की जाती है।

चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और कार्य व्यवहार) अधिनियम, 1991 से संबंधित संसदीय प्रक्रिया के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. अनुच्छेद 122 संसद को अपनी कार्यवाही के नियम बनाने का अधिकार देता है।
  2. 1991 के अधिनियम को बनाने से पहले संसदीय समिति ने इसका विस्तार से परीक्षण किया था।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने 1991 अधिनियम पर संसदीय बहस की पर्याप्तता पर सवाल उठाए हैं।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 122 संसदीय प्रक्रिया से जुड़ा है। कथन 2 गलत है; अभिलेख बताते हैं कि 1991 अधिनियम पर बहस न्यूनतम थी। कथन 3 सही है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस पर सवाल उठाए हैं।

मुख्य प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट के हालिया विचारों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून पर संसदीय बहस की पर्याप्तता पर सवाल उठाए गए हैं। भारत में लोकतांत्रिक जवाबदेही और संस्थागत स्वतंत्रता के लिए इसके निहितार्थ पर चर्चा करें।

झारखंड और JPSC की प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (शासन और राजनीति) – संवैधानिक निकाय और उनकी नियुक्ति प्रक्रियाएं
  • झारखंड का दृष्टिकोण: चुनाव आयोग की राज्य विधानसभा चुनाव कराने में भूमिका झारखंड की राजनीतिक स्थिरता और शासन को प्रभावित करती है।
  • मुख्य बिंदु: संवैधानिक निकायों की पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया की महत्ता, जो झारखंड के चुनावी इतिहास के संदर्भ में निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग के संबंध में क्या प्रावधान करता है?

अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार देता है, जिससे यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाला संवैधानिक प्राधिकरण बनता है।

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कौन करता है?

राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह पर CEC और ECs की नियुक्ति करते हैं, जो चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और कार्य व्यवहार) अधिनियम, 1991 द्वारा नियंत्रित है।

सुप्रीम कोर्ट की 1991 अधिनियम को लेकर क्या चिंता थी?

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या 1991 अधिनियम को लागू करने से पहले संसद में ‘उचित बहस’ हुई थी, जिससे पारदर्शिता और संसदीय प्रक्रिया के पालन को लेकर सवाल उठे।

भारत और यूनाइटेड किंगडम के चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में क्या अंतर है?

यूके की प्रक्रिया पारदर्शी, बहु-चरणीय और संसदीय समिति जांच तथा सार्वजनिक परामर्श पर आधारित है, जबकि भारत में कार्यपालिका द्वारा संचालित अस्पष्ट नियुक्ति प्रणाली है।

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के आर्थिक प्रभाव क्या हैं?

संस्थागत स्वतंत्रता विश्वसनीय चुनाव सुनिश्चित करती है, जो राजनीतिक स्थिरता, निवेशकों के विश्वास और सतत आर्थिक विकास का आधार है, जैसा कि भारत की GDP वृद्धि और FDI प्रवाह में देखा जाता है।

आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ाई के लिए