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भारत के कथित गोल्डीलॉक्स आर्थिक दौर (2015-2019) की संरचनात्मक कमजोरियां

2015 से 2019 के बीच का समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गोल्डीलॉक्स दौर माना जाता था, जब GDP की वृद्धि मध्यम रही, मुद्रास्फीति नियंत्रण में रही और वित्तीय संकेतक अपेक्षाकृत स्थिर थे। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मुद्रास्फीति को 4% ± 2% के लक्ष्य दायरे में बनाए रखा, जबकि वित्तीय घाटा लगभग 3.5% GDP के आस-पास रहा, जैसा कि Fiscal Responsibility and Budget Management Act, 2003 (FRBM Act) में तय था। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे निवेश, बैंकिंग और श्रम बाजारों में गहरी संरचनात्मक कमजोरियां और बाहरी झटके छिपे थे, जिन्होंने 2019-20 में GDP वृद्धि को 4% तक गिरा दिया और बेरोजगारी बढ़ाई। यह दौर मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता की धारणा को चुनौती देता है और दिखाता है कि अर्थव्यवस्था उतनी संतुलित और मजबूत नहीं थी जितनी समझी गई थी।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था — मैक्रोइकॉनॉमिक संकेतक, वित्तीय नीति, मॉनिटरी पॉलिसी, संरचनात्मक सुधार
  • GS पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था — बैंकिंग क्षेत्र सुधार, Insolvency and Bankruptcy Code, GST लागू करना
  • निबंध: भारत में सतत आर्थिक विकास की चुनौतियां

गोल्डीलॉक्स दौर के दौरान मैक्रोइकॉनॉमिक संकेतक

आर्थिक सर्वे 2020-21 के अनुसार, 2015-2019 के बीच भारत की GDP वृद्धि औसतन 6-7% रही, जिसमें 2016-17 में 7.2% की चरम वृद्धि दर्ज हुई, लेकिन 2019-20 में यह तेज़ी से घटकर 4% रह गई। मुद्रास्फीति RBI के लक्ष्य दायरे में 3% से 4% के बीच रही, जो कि 1934 के RBI अधिनियम की धारा 17 और 18 के तहत प्रभावी मौद्रिक नीति का परिणाम था। वित्तीय घाटा औसतन GDP का 3.4% था, लेकिन 2018-19 में यह FRBM अधिनियम की 3% सीमा को पार कर गया, जो वित्तीय अनुशासन में गिरावट दर्शाता है। इन स्थिर दिखने वाले संकेतकों के बावजूद, निजी निवेश की वृद्धि 2016-17 में 8.5% से घटकर 2018-19 में 2.5% रह गई, जबकि 2019 में क्रेडिट वृद्धि 6.5% तक सीमित हो गई, जो तरलता के सख्त होने और निवेशकों की सतर्कता को दर्शाता है।

  • GDP वृद्धि: 7.2% (2016-17) → 4% (2019-20) (आर्थिक सर्वे 2020-21)
  • मुद्रास्फीति: 3-4% (2015-2019) RBI के 4% ± 2% लक्ष्य के भीतर (RBI मौद्रिक नीति रिपोर्ट)
  • वित्तीय घाटा: ~3.4% GDP का, 2018-19 में 3% सीमा पार (केंद्र सरकार बजट दस्तावेज)
  • निजी निवेश वृद्धि: 8.5% (2016-17) → 2.5% (2018-19) (आर्थिक सर्वे 2020)
  • क्रेडिट वृद्धि: 6.5% (2019) (RBI वार्षिक रिपोर्ट 2019-20)

आर्थिक सतह के नीचे छिपी संरचनात्मक कमजोरियां

गोल्डीलॉक्स दौर ने महत्वपूर्ण संरचनात्मक कमजोरियों को छुपा रखा था। अर्थव्यवस्था की खपत-आधारित वृद्धि ने निजी निवेश की कमी को पूरा नहीं किया, जो निवेश माहौल की खराबी, श्रम बाजार की कठोरताओं और बैंकिंग क्षेत्र के तनाव से प्रभावित था। कॉर्पोरेट दिवालियापन से निपटने के लिए 2016 में Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) लागू किया गया, लेकिन इसके क्रियान्वयन में देरी और सीमित समाधान दरें रही, जिससे क्रेडिट रिकवरी और निवेशकों का विश्वास कमजोर हुआ। इसके अलावा, 2017 में लागू GST ने अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को एकीकृत किया, लेकिन शुरुआत में कर संग्रह और अनुपालन में व्यवधान आया, जिससे राज्यों की राजस्व स्थिति और संघीय वित्तीय संतुलन प्रभावित हुआ।

  • खपत-आधारित वृद्धि ने कमजोर निवेश और क्रेडिट मांग को छुपाया
  • बैंकिंग क्षेत्र के तनाव और NPA ने RBI की मौद्रिक नीति के बावजूद क्रेडिट प्रवाह को सीमित किया
  • IBC के क्रियान्वयन में देरी से कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान बाधित हुआ (धारा 7-10)
  • GST के लागू होने से प्रारंभिक अनुपालन और राजस्व चुनौतियां आईं (धारा 9 और 10)
  • श्रम बाजार की कठोरताओं ने रोजगार सृजन को सीमित किया

बाहरी झटकों और उनका प्रभाव

वैश्विक स्तर पर व्यापार तनाव, धीमी वैश्विक मांग और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भारत की कमजोरियों को और बढ़ा दिया। 2019 में निर्यात लगभग USD 320 बिलियन पर स्थिर रहा, जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा की कमी और बाहरी मांग की मंदी को दर्शाता है (वाणिज्य मंत्रालय)। केंद्र सरकार का वित्तीय स्थान बढ़ती सब्सिडी और सामाजिक खर्च के कारण सीमित रहा, जिससे आर्थिक मंदी के दौरान प्रोत्साहन देने की क्षमता कम हुई। RBI की मौद्रिक नीति सहायक थी, लेकिन मुद्रास्फीति नियंत्रण और मुद्रा स्थिरता की चिंता के चलते पूरी तरह मंदी को रोकने में असमर्थ रही।

  • 2019 में निर्यात USD 320 बिलियन पर स्थिर (वाणिज्य मंत्रालय)
  • वैश्विक व्यापार तनाव ने निर्यात वृद्धि की संभावनाएं कम कीं
  • तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने आयात बिल और मुद्रास्फीति दबाव बढ़ाए
  • वित्तीय सीमाओं ने सरकार की प्रोत्साहन क्षमता को बाधित किया
  • RBI की मुद्रास्फीति लक्ष्य नीति ने कठोर मौद्रिक राहत को सीमित किया

संस्थागत भूमिकाएं और कानूनी ढांचे

वित्त मंत्रालय ने FRBM Act के तहत वित्तीय नीति का प्रबंधन किया, जिसका लक्ष्य GDP का 3% वित्तीय घाटा था, लेकिन व्यवहार में इससे अधिक छूट दी गई। RBI ने अपने अधिनियम की धारा 17 और 18 के तहत मूल्य स्थिरता और तरलता बनाए रखी, लेकिन बैंकिंग क्षेत्र की कमजोरियों के कारण चुनौतियां आईं। 2016 का IBC कॉर्पोरेट दिवालियापन प्रक्रिया को तेज करने के लिए था, लेकिन National Company Law Tribunals (NCLTs) में बोतलनैक के कारण समाधान धीमा रहा। GST Network (GSTN) ने कर संग्रह और अनुपालन को आसान बनाया, लेकिन प्रारंभिक समस्याओं ने राज्यों को मिलने वाली राजस्व राशि को प्रभावित किया, जिससे वित्तीय संघवाद जटिल हुआ।

  • FRBM Act की धारा 3 और 4: वित्तीय घाटा लक्ष्य और अनुपालन में लचीलापन
  • RBI अधिनियम की धारा 17 और 18: मौद्रिक नीति और मुद्रास्फीति नियंत्रण
  • IBC की धारा 7-10: कॉर्पोरेट दिवालियापन प्रक्रिया और लेनदार अधिकार
  • GST अधिनियम की धारा 9 और 10: कर लगाना और वितरण प्रणाली
  • केंद्र, RBI और राज्यों के बीच संस्थागत समन्वय की कमी ने नीति प्रभावशीलता को प्रभावित किया

तुलनात्मक दृष्टिकोण: भारत बनाम चीन (2015-2019)

संकेतक भारत (2015-2019) चीन (2015-2019)
GDP वृद्धि दर औसतन 6-7%; 2019-20 में घटकर 4% लगभग 6% स्थिर वृद्धि
मुद्रास्फीति दर 3-4%, RBI लक्ष्य के भीतर 2-3%, PBOC की मौद्रिक नीति द्वारा नियंत्रित
वित्तीय घाटा लगभग 3.4% GDP; 3% सीमा पार लगभग 3% GDP; आक्रामक वित्तीय प्रोत्साहन
निर्यात वृद्धि USD 320 बिलियन पर स्थिर 7% वार्षिक वृद्धि, आधारभूत संरचना निवेश से प्रेरित
मौद्रिक नीति RBI मुद्रास्फीति लक्ष्य के साथ सतर्क राहत पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना सहायक, क्रेडिट वृद्धि को बढ़ावा

महत्व और आगे का रास्ता

गोल्डीलॉक्स कथा ने 2019-20 की मंदी में सामने आई गंभीर आर्थिक चुनौतियों को छुपा दिया। नीति निर्माताओं को केवल मैक्रो स्थिरता पर भरोसा करने के बजाय निवेश माहौल, श्रम बाजार सुधार और बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति जैसी संरचनात्मक समस्याओं को दूर करना होगा। दिवालियापन समाधान प्रक्रिया को मजबूत करना और GST अनुपालन सुधारना निवेशकों का विश्वास और वित्तीय स्वास्थ्य बहाल करने के लिए जरूरी है। निजी निवेश और रोजगार सृजन को पुनर्जीवित करने के लिए संतुलित वित्तीय प्रोत्साहन के साथ लचीली मौद्रिक नीति अपनाना आवश्यक है।

  • श्रम कानूनों और व्यवसाय करने की सुगमता में संरचनात्मक सुधार प्राथमिकता दें
  • NCLTs की क्षमता और कार्यक्षमता बढ़ाकर दिवालियापन समाधान तेज करें
  • GST प्रशासन और केंद्र-राज्य समन्वय बेहतर कर स्थिर राजस्व सुनिश्चित करें
  • मंदी के दौरान प्रत्यावर्ती वित्तीय उपायों के लिए लचीली वित्तीय नीति अपनाएं
  • बैंकिंग क्षेत्र को पुनर्पूंजीकरण और परिसंपत्ति गुणवत्ता सुधार के माध्यम से मजबूत करें

भारत के कथित गोल्डीलॉक्स दौर (2015-2019) के दौरान आर्थिक प्रदर्शन के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. GDP वृद्धि इस अवधि में लगातार 7% से ऊपर रही।
  2. मुद्रास्फीति RBI के 4% ± 2% के लक्ष्य दायरे में बनी रही।
  3. वित्तीय घाटा हमेशा FRBM Act द्वारा निर्धारित 3% सीमा से नीचे रहा।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि 2019-20 में GDP वृद्धि घटकर 4% रह गई। कथन 2 सही है क्योंकि मुद्रास्फीति RBI के लक्ष्य दायरे में थी। कथन 3 गलत है क्योंकि 2018-19 में वित्तीय घाटा 3% सीमा पार कर गया था।

Insolvency and Bankruptcy Code (IBC), 2016 के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:

  1. IBC का उद्देश्य कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान को 180 दिनों के भीतर पूरा करना है।
  2. IBC के प्रावधान अधिनियम की धारा 7-10 के तहत आते हैं।
  3. IBC ने बैंकिंग क्षेत्र के सभी तनावग्रस्त परिसंपत्तियों का पूर्ण समाधान कर दिया है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है; IBC 180 दिन के भीतर समाधान का प्रावधान करता है। कथन 2 सही है; धारा 7-10 दिवालियापन प्रक्रिया को नियंत्रित करती हैं। कथन 3 गलत है; कई तनावग्रस्त परिसंपत्तियां प्रक्रियात्मक देरी के कारण अभी भी अनसुलझी हैं।

मेन प्रश्न

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए 2015-2019 के दौर को अक्सर ‘गोल्डीलॉक्स दौर’ कहा जाता है, फिर भी यह अवधि स्थायी आर्थिक मजबूती में क्यों विफल रही, इसका आलोचनात्मक विश्लेषण करें। इस संदर्भ में संरचनात्मक कमजोरियों और बाहरी झटकों की भूमिका पर चर्चा करें।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (अर्थव्यवस्था और विकास), राज्य के आर्थिक संकेतक और रोजगार रुझानों पर केंद्रित
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड का औद्योगिक क्षेत्र और खनन-आधारित अर्थव्यवस्था 2018-19 में बढ़ती बेरोजगारी और निवेश ठहराव के साथ राष्ट्रीय मंदी को दर्शाती है
  • मेन पॉइंटर: राष्ट्रीय संरचनात्मक सुधारों (जैसे GST और IBC) को झारखंड के वित्तीय स्वास्थ्य और रोजगार पर प्रभाव से जोड़कर उत्तर तैयार करें
आर्थिक दृष्टि से ‘गोल्डीलॉक्स दौर’ क्या होता है?

‘गोल्डीलॉक्स दौर’ उस आर्थिक समय को कहते हैं जब GDP वृद्धि मध्यम लेकिन स्थिर होती है, मुद्रास्फीति लक्ष्य दायरे में नियंत्रित रहती है और वित्तीय घाटा स्थिर रहता है, जो संतुलित मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिति को दर्शाता है।

स्थिर मुद्रास्फीति के बावजूद 2019-20 में भारत की GDP वृद्धि क्यों धीमी हुई?

मंदी की वजह संरचनात्मक कमजोरियां थीं जैसे निजी निवेश में कमी, बैंकिंग क्षेत्र का तनाव, श्रम बाजार की कठोरताएं और वैश्विक व्यापार तनाव, जिन्हें केवल मौद्रिक नीति से पूरा नहीं किया जा सकता था।

IBC ने इस अवधि में अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव डाला?

IBC ने तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के समाधान को तेज करने का प्रयास किया, लेकिन इसके क्रियान्वयन में देरी और NCLT की सीमित क्षमता के कारण NPA की रिकवरी धीमी रही और क्रेडिट वृद्धि बाधित हुई।

2017-2019 में GST लागू करने का आर्थिक परिदृश्य पर क्या असर पड़ा?

GST ने अप्रत्यक्ष करों को एकीकृत किया, लेकिन शुरुआत में अनुपालन में दिक्कतें और राजस्व में कमी आई, जिससे राज्यों की वित्तीय स्थिति प्रभावित हुई और आर्थिक गतिविधि थोड़ी धीमी हुई।

2015-2019 के दौरान भारत के आर्थिक प्रदर्शन की तुलना चीन से कैसे की जा सकती है?

चीन ने लगभग 6% की स्थिर GDP वृद्धि बनाए रखी, आक्रामक वित्तीय प्रोत्साहन और सहायक मौद्रिक नीति के साथ, जिससे निर्यात 7% वार्षिक बढ़ा, जबकि भारत में निर्यात स्थिर रहा और वित्तीय जगह सीमित थी, जिससे मंदी आई।

आधिकारिक स्रोत और आगे पढ़ाई