लद्दाख में प्रदर्शन रैलियां: कौन, क्या, कब, कहाँ
साल 2023 में लद्दाख में व्यापक प्रदर्शन हुए, जिनमें पूर्ण राज्यhood और भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत शामिल किए जाने की मांग जोरशोर से उठी। यह क्षेत्र, जिसमें बौद्ध बहुल लेह जिला और मुस्लिम बहुल कारगिल जिला शामिल हैं, 31 अक्टूबर 2019 से बिना विधान सभा के एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में संचालित हो रहा है। यह स्थिति अनुच्छेद 370 के निरस्त होने और जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के लागू होने के बाद बनी। प्रदर्शनकारी संवैधानिक स्वायत्तता बढ़ाने और सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं, क्योंकि मौजूदा केंद्र शासित प्रदेश की स्थिति अपर्याप्त मानी जा रही है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 2: भारतीय संविधान—केंद्र शासित प्रदेश, अनुच्छेद 370 निरस्तीकरण, छठी अनुसूची स्वायत्तता
- GS पेपर 1: भारतीय समाज—जनजातीय अधिकार और क्षेत्रीय स्वायत्तता
- निबंध: भारत में संघवाद और क्षेत्रीय स्वायत्तता
लद्दाख के संवैधानिक और कानूनी ढांचे की रूपरेखा
अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण से जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति समाप्त हो गई और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया: जम्मू और कश्मीर जिसमें विधान सभा है, और लद्दाख जिसमें नहीं। जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत लद्दाख का केंद्र शासित प्रदेश के रूप में प्रशासन गृह मंत्रालय (MHA) के सीधे नियंत्रण में है और इसमें निर्वाचित विधायी सत्ता नहीं है। लद्दाख की छठी अनुसूची (अनुच्छेद 244(2)) में शामिल किए जाने की मांग जनजातीय स्वायत्तता के संवैधानिक मान्यता के लिए है, जो स्वायत्त जिला परिषदों (ADC) के माध्यम से विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक शक्तियां प्रदान करती है, जो फिलहाल असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के जनजातीय इलाकों तक सीमित है।
- अनुच्छेद 370: जम्मू और कश्मीर को विशेष स्वायत्तता देता था; 2019 में संसद द्वारा निरस्त किया गया।
- जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019: दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए; लद्दाख में विधान सभा नहीं।
- अनुच्छेद 244(2) छठी अनुसूची: जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों के गठन का प्रावधान, जिनके पास विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक अधिकार होते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट के निर्णय: PDP बनाम भारत संघ (2019) ने अनुच्छेद 370 निरस्तीकरण और पुनर्गठन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
लद्दाख की आर्थिक स्थिति और चुनौतियां
लद्दाख भारत की कुल GDP में लगभग 0.1% का योगदान देता है (आर्थिक सर्वे 2023-24)। पर्यटन क्षेत्र इसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो महामारी से पहले लगभग 40% हिस्सेदारी रखता था और सालाना 3,50,000 से अधिक पर्यटक आते थे (लद्दाख पर्यटन विभाग, 2019)। क्षेत्र में बेरोजगारी दर लगभग 12% है (2011 की जनगणना के आधार पर अनुमानित), और स्थानीय लोग रोजगार आरक्षण की मांग कर रहे हैं ताकि आर्थिक पिछड़ेपन को कम किया जा सके। केंद्र सरकार के बजट आवंटन 2019 के बाद से हर साल 15% बढ़े हैं, जिनमें 2023 में लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (LAHDC) को 1,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, फिर भी बुनियादी ढांचे और रोजगार के अवसरों की कमी बनी हुई है।
- पर्यटन क्षेत्र महामारी से पहले 20,000 से अधिक लोगों को रोजगार देता था, जो क्षेत्रीय निर्भरता को दर्शाता है।
- 2023 में LAHDC के लिए 1,000 करोड़ रुपये का आवंटन स्थानीय विकास के लिए।
- बेरोजगारी दर 12%, स्थानीय लोगों के लिए 10-15% रोजगार आरक्षण की मांग।
- 2019 के बाद केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के तहत बुनियादी ढांचे के लिए बजट में सालाना 15% की वृद्धि।
लद्दाख के प्रमुख संस्थान और जनजातीय स्वायत्तता के मॉडल
लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (LAHDC) स्थानीय स्वशासन की संस्था है, जिसके पास सीमित प्रशासनिक अधिकार हैं, जबकि जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में पूर्ण विधायी सभा है। गृह मंत्रालय लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन को नियंत्रित करता है। छठी अनुसूची में शामिल होने की मांग पूर्वोत्तर भारत के स्वायत्त जिला परिषदों (ADC) के स्वायत्तता मॉडल को लागू करने की कोशिश है, जिनके पास जमीन, जंगल, पानी और परंपरागत कानूनों पर विधायी, न्यायिक और कार्यकारी अधिकार होते हैं। राज्य चुनाव आयोग स्थानीय चुनावों की देखरेख करता है, लेकिन लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिली है।
- LAHDC: सीमित प्रशासनिक अधिकार, कोई विधायी शक्ति नहीं।
- MHA: लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन पर सीधे नियंत्रण।
- छठी अनुसूची ADCs: जनजातीय क्षेत्रों में विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक स्वायत्तता।
- राज्य चुनाव आयोग: केंद्र शासित प्रदेशों में स्थानीय चुनाव कराता है।
जनसांख्यिकी और राजनीतिक विभाजन लद्दाख में
लद्दाख के दो जिले, लेह (बौद्ध बहुल) और कारगिल (मुस्लिम बहुल), की सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक आकांक्षाएं अलग हैं। प्रदर्शनकारी लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की मांग कर रहे हैं ताकि उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके। छठी अनुसूची में शामिल होने की मांग जनजातीय रीति-रिवाजों, भूमि अधिकारों और सामाजिक संरचनाओं की सुरक्षा के लिए भी है, जो वर्तमान केंद्र शासित प्रदेश शासन में कमजोर मानी जा रही हैं।
- लेह जिला: मुख्य रूप से बौद्ध आबादी।
- कारगिल जिला: मुख्य रूप से मुस्लिम आबादी।
- लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र बनाने की मांग।
- 10-15% जनजातीय समुदायों के लिए रोजगार आरक्षण की मांग।
तुलनात्मक अध्ययन: छठी अनुसूची बनाम नาวाजो नेशन शासन
| पहलू | छठी अनुसूची ADCs (भारत) | नावाजो नेशन (यूएसए) |
|---|---|---|
| कानूनी आधार | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 244(2) | Indian Reorganization Act, 1934 |
| क्षेत्रीय कवरेज | असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा के 10 जनजातीय क्षेत्र | एरिज़ोना, न्यू मैक्सिको, यूटाह में 27,000 वर्ग मील |
| जनसंख्या | आमतौर पर छोटे जनजातीय समूह | 3,00,000 से अधिक जनजातीय सदस्य |
| स्वायत्तता | राज्य ढांचे के भीतर विधायी, न्यायिक, प्रशासनिक अधिकार | संपूर्ण स्वायत्त जनजातीय सरकार, विधायी और न्यायिक शक्तियों के साथ |
| शासन मॉडल | सीमित कानून बनाने वाली ADC परिषदें | कराधान और कानून लागू करने सहित व्यापक स्वशासन |
लद्दाख की मौजूदा शासन व्यवस्था में मुख्य कमियां
लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश के रूप में बिना विधान सभा के होने से उसे सीधे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और विधायी स्वायत्तता नहीं मिलती, जो जम्मू और कश्मीर में है। छठी अनुसूची की अनुपस्थिति में जनजातीय समुदायों को संवैधानिक रूप से स्वशासन, न्यायिक अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण नहीं मिलता। यह कमी जातीय पहचान के संरक्षण और समान विकास में बाधा डालती है, जिससे राज्यhood और छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांगें बढ़ती हैं।
- लद्दाख में विधान सभा न होने से कानून बनाने की क्षमता सीमित।
- छठी अनुसूची के अभाव में जनजातीय स्वायत्तता और न्यायिक अधिकारों की कमी।
- केंद्रीय प्रशासन स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक जरूरतों को नजरअंदाज करता है।
- मांगें जातीय और जनजातीय हितों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा की आवश्यकता को दर्शाती हैं।
महत्व और आगे का रास्ता
- राज्यhood मिलने से लद्दाख को विधान सभा मिलेगी, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय शासन बेहतर होगा।
- छठी अनुसूची में शामिल करने से जनजातीय समुदायों को संवैधानिक रूप से विधायी और न्यायिक स्वायत्तता मिलेगी, जो सांस्कृतिक पहचान और संसाधन नियंत्रण की रक्षा करेगी।
- रोजगार आरक्षण और बुनियादी ढांचे की कमी को दूर करना आर्थिक पिछड़ेपन को कम करने के लिए जरूरी है।
- केंद्र और राज्य सरकारों को स्थानीय हितधारकों के साथ मिलकर लद्दाख की विशिष्ट जनसांख्यिकी और भू-राजनीतिक स्थिति के अनुरूप शासन ढांचा बनाना चाहिए।
- पूर्वोत्तर के ADC मॉडल और नावाजो नेशन के शासन से सीख लेकर लद्दाख के लिए उपयुक्त स्वायत्तता मॉडल तैयार किया जा सकता है।
भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- यह असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होती है।
- यह स्वायत्त जिला परिषदों के गठन का प्रावधान करती है जिनके पास विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक अधिकार होते हैं।
- यह वर्तमान में भारत के सभी केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू होती है।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि छठी अनुसूची विशेष रूप से असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के जनजातीय इलाकों पर लागू होती है। कथन 2 भी सही है क्योंकि यह स्वायत्त जिला परिषदों के गठन का प्रावधान करती है जिनके पास विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक अधिकार होते हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि छठी अनुसूची केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू नहीं होती।
लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश की स्थिति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- लद्दाख के पास जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत विधान सभा है।
- जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के पास विधान सभा है।
- लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के पास पूर्ण विधायी अधिकार हैं।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं?
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के पास विधान सभा नहीं है। कथन 2 सही है; जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के पास विधान सभा है। कथन 3 गलत है क्योंकि LAHDC के पास सीमित प्रशासनिक अधिकार हैं, पूर्ण विधायी नहीं।
मुख्य प्रश्न
लद्दाख के लोगों द्वारा राज्यhood और छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग के पीछे के संवैधानिक और सामाजिक-आर्थिक कारणों की जांच करें। इन मांगों को पूरा करने के क्षेत्रीय शासन और जातीय पहचान के संरक्षण पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा करें। (250 शब्द)
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 – भारतीय शासन और राजनीति
- झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में भी छठी अनुसूची के तहत जनजातीय क्षेत्र हैं, जो लद्दाख की मांगों को समझने में मदद करते हैं।
- मुख्य बिंदु: लद्दाख की स्वायत्तता की मांगों की तुलना झारखंड के जनजातीय शासन से कर संवैधानिक सुरक्षा और चुनौतियों को उजागर करें।
अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण का लद्दाख पर क्या प्रभाव पड़ा?
2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण से जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति खत्म हो गई और इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया। लद्दाख को बिना विधान सभा के केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, जिससे राज्यhood और संवैधानिक स्वायत्तता की मांगें तेज हुईं।
छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त जिला परिषदों के क्या अधिकार होते हैं?
स्वायत्त जिला परिषदों को भूमि, जंगल, पानी, कृषि, ग्राम परिषद, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामाजिक रीति-रिवाजों पर विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक अधिकार मिलते हैं, जिससे वे स्वशासन कर पाती हैं।
लद्दाखी लोग छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग क्यों करते हैं?
इसमें शामिल होने से जनजातीय समुदायों को संवैधानिक सुरक्षा मिलेगी, न्यायिक अधिकार और संसाधनों पर नियंत्रण मिलेगा, जिससे उनकी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहेगी और विकास में समानता आएगी, जो वर्तमान केंद्र शासित प्रदेश की स्थिति में नहीं है।
लद्दाख की आर्थिक स्थिति राज्यhood की मांग को कैसे प्रभावित करती है?
लद्दाख का GDP में कम योगदान (0.1%), उच्च बेरोजगारी (12%) और पर्यटन पर निर्भरता आर्थिक कमजोरियों को दर्शाती है। राज्यhood और स्वायत्तता को बेहतर स्थानीय शासन और आर्थिक अवसरों के लिए जरूरी माना जाता है।
नावाजो नेशन का शासन मॉडल छठी अनुसूची ADCs से कैसे अलग है?
नावाजो नेशन एक संप्रभु जनजातीय सरकार है जिसके पास व्यापक विधायी और न्यायिक शक्तियां हैं, जबकि छठी अनुसूची ADCs के पास सीमित स्वायत्तता होती है जो भारतीय राज्यों के ढांचे के भीतर होती है।