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भारत-मिस्र द्विपक्षीय रक्षा सहयोग: रणनीतिक साझेदारी और उभरती चुनौतियां

भारत-मिस्र रक्षा सहयोग का सिंहावलोकन

भारत और मिस्र ने 2022 में रक्षा सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) और 2023 में रणनीतिक साझेदारी समझौता के माध्यम से अपने रक्षा संबंधों को औपचारिक रूप दिया है। 2024 में काहिरा में आयोजित 11वीं भारत-मिस्र संयुक्त रक्षा समिति (JDC) की बैठक ने इस ढांचे को और मजबूत किया। ये समझौते संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण, तकनीकी साझेदारी और रणनीतिक संवाद को बढ़ावा देते हैं, जो इंडो-पैसिफिक और मध्य पूर्वी मार्गों में क्षेत्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए दक्षिण-दक्षिण सहयोग को दर्शाते हैं।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: अंतरराष्ट्रीय संबंध – भारत का पश्चिम एशिया और अफ्रीका के साथ द्विपक्षीय रक्षा कूटनीति।
  • GS पेपर 3: सुरक्षा – रक्षा सहयोग, रक्षा निर्यात और रणनीतिक साझेदारियां।
  • निबंध: भारतीय महासागर क्षेत्र में भारत की बदलती भूमिका एक नेट सुरक्षा प्रदाता के रूप में।

भारत-मिस्र रक्षा संबंधों का ऐतिहासिक संदर्भ और विकास

भारत और मिस्र के संबंध प्राचीन काल से हैं, जब सिंधु घाटी और नील सभ्यताओं के बीच लाल सागर के मार्गों से व्यापार होता था। ग्रीक-रोमन और इस्लामी नेटवर्क के जरिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी जारी रहा। स्वतंत्रता के बाद, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासर के नेतृत्व में यह रिश्ता मजबूत हुआ, जो गैर-संरेखित आंदोलन (NAM) के संस्थापक सदस्य थे। 1956 के सुएज संकट के दौरान भारत ने मिस्र का समर्थन कर उपनिवेशवाद के खिलाफ एकजुटता दिखाई। हालांकि, शीत युद्ध की राजनीति के कारण रक्षा सहयोग में कुछ ठहराव आया, जो 1990 के दशक में भारत की आर्थिक उदारीकरण और रणनीतिक विस्तार के साथ फिर से सक्रिय हुआ।

  • मुख्य मील के पत्थर:
    • सुएज संकट (1956) में मिस्र की संप्रभुता के समर्थन।
    • 1990 के बाद आर्थिक सुधारों के साथ रक्षा संबंधों का पुनः सक्रिय होना।
    • हाल ही में 2022 में MoU और 2023 में रणनीतिक साझेदारी समझौते का औपचारिक रूप देना।

संस्थागत ढांचा और प्रमुख भूमिका निभाने वाले

यह द्विपक्षीय रक्षा सहयोग मुख्य रूप से भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय और मिस्र के रक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित है। संयुक्त रक्षा समिति (JDC) हर साल बैठक कर सहयोग की समीक्षा और योजना बनाती है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) तकनीकी सहयोग और अनुसंधान में मदद करता है, जबकि भारतीय और मिस्री नौसेनाएं समुद्री सुरक्षा बढ़ाने के लिए संयुक्त अभ्यास करती हैं। विदेश मंत्रालय (MEA) इन प्रयासों में राजनयिक भूमिका निभाता है।

  • JDC की वार्षिक बैठकें संवाद और समन्वय का मंच प्रदान करती हैं (11वीं बैठक काहिरा, 2024)।
  • DRDO तकनीकी साझेदारी और संयुक्त अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करता है।
  • नौसैनिक अभ्यास लाल सागर और भारतीय महासागर में समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर केंद्रित हैं।
  • MEA रक्षा सहयोग को व्यापक रणनीतिक और कूटनीतिक लक्ष्यों के अनुरूप बनाता है।

रक्षा सहयोग के आर्थिक पहलू

भारत का 2023-24 का रक्षा बजट लगभग ₹5.94 लाख करोड़ है, जो रक्षा निर्यात और संयुक्त उद्यमों को बढ़ावा देता है। भारत और मिस्र के बीच 2022 में द्विपक्षीय व्यापार $8.9 बिलियन तक पहुंच गया, जिसमें पेट्रोलियम, उर्वरक, वस्त्र, दवाइयां और आईटी जैसे क्षेत्र शामिल हैं। रक्षा सहयोग तकनीकी हस्तांतरण और संयुक्त अभ्यास के जरिए क्षमता निर्माण में योगदान देता है, और रक्षा निर्माण तथा सेवाओं में विस्तार की संभावनाएं मौजूद हैं।

  • डिफेंस प्रोडक्शन पॉलिसी 2020 के तहत भारत के रक्षा निर्यात में वृद्धि हुई है, जिसे 2023-24 के बजट से समर्थन मिला है।
  • मिस्र का सुएज नहर के पास रणनीतिक स्थान भारत के व्यापार और सुरक्षा दृष्टिकोण में इसकी अहमियत बढ़ाता है।
  • संयुक्त प्रशिक्षण और तकनीकी साझेदारी से परिचालन क्षमता और स्वदेशी कौशल में सुधार होता है।
  • रक्षा औद्योगिक सहयोग को बढ़ाने की संभावनाएं अभी कम उपयोग की गई हैं।

भारत-यूएई रक्षा सहयोग से तुलना

पहलू भारत-मिस्र रक्षा सहयोग भारत-यूएई रक्षा सहयोग
रणनीतिक समझौता रक्षा सहयोग MoU (2022), रणनीतिक साझेदारी (2023) व्यापक रक्षा समझौता (2022)
तकनीकी हस्तांतरण सीमित, कोई समर्पित व्यवस्था नहीं समझौते के तहत उन्नत तकनीकी हस्तांतरण संभव
संयुक्त रक्षा उत्पादन अनुपस्थित, कोई औपचारिक ढांचा नहीं सक्रिय संयुक्त निर्माण पहलें चल रही हैं
रक्षा व्यापार वृद्धि मध्यम, व्यापार पर अप्रत्यक्ष प्रभाव 2022-23 में रक्षा व्यापार में 30% वृद्धि
समुद्री सहयोग लाल सागर और भारतीय महासागर में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास अरब सागर में समुद्री सुरक्षा और संयुक्त अभ्यास का विस्तार

भारत-मिस्र रक्षा सहयोग में अहम कमियां

रणनीतिक समझौतों के बावजूद, इस सहयोग में समर्पित संयुक्त रक्षा उत्पादन ढांचे और औपचारिक तकनीकी हस्तांतरण व्यवस्था का अभाव है। इससे दीर्घकालिक क्षमता निर्माण और स्वदेशी रक्षा निर्माण सहयोग की संभावनाएं सीमित रह जाती हैं। औद्योगिक संबंधों के अभाव में द्विपक्षीय रक्षा व्यापार और नवाचार की सीमा प्रभावित होती है।

  • कोई औपचारिक संयुक्त रक्षा निर्माण या सह-विकास समझौते नहीं हैं।
  • तकनीकी साझेदारी केवल प्रशिक्षण और अभ्यास तक सीमित है, औद्योगिक सहयोग तक नहीं।
  • मिस्र के रणनीतिक स्थान और भारत की रक्षा उद्योग क्षमता का पूरा लाभ नहीं उठाया गया।
  • रणनीतिक साझेदारी के उद्देश्यों को क्रियान्वित करने के लिए मजबूत संस्थागत तंत्र की जरूरत है।

महत्व और आगे का रास्ता

भारत-मिस्र रक्षा सहयोग इंडो-पैसिफिक और मध्य पूर्वी मार्गों में भारत की रणनीतिक पहुंच को मजबूत करता है और क्षेत्रीय स्थिरता एवं सुरक्षा में योगदान देता है। सुएज नहर पर मिस्र का नियंत्रण भारत के व्यापार मार्गों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए समुद्री सहयोग आवश्यक है। लाभों को अधिकतम करने के लिए दोनों देशों को संयुक्त रक्षा उत्पादन ढांचा स्थापित करना चाहिए, तकनीकी हस्तांतरण प्रक्रियाओं को बढ़ाना चाहिए और औद्योगिक सहयोग को गहरा करना चाहिए। यह भारत के वैश्विक रक्षा निर्यातक बनने और भारतीय महासागर क्षेत्र में नेट सुरक्षा प्रदाता की भूमिका के लक्ष्य से मेल खाएगा।

  • संयुक्त रक्षा उत्पादन और सह-विकास परियोजनाओं को संस्थागत बनाएं।
  • प्रशिक्षण से आगे जाकर अनुसंधान, विकास और निर्माण में तकनीकी हस्तांतरण बढ़ाएं।
  • मिस्र के भौगोलिक महत्व का उपयोग समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए करें।
  • रक्षा सहयोग को व्यापक आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों के साथ जोड़कर समग्र साझेदारी बनाएं।

भारत-मिस्र रक्षा सहयोग के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. भारत और मिस्र के बीच रणनीतिक साझेदारी समझौता 2023 में हुआ था।
  2. भारत-मिस्र रक्षा सहयोग में समर्पित संयुक्त रक्षा उत्पादन ढांचा शामिल है।
  3. मिस्र 2023 में भारत के गणतंत्र दिवस का मुख्य अतिथि था।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (c)

कथन 1 सही है क्योंकि रणनीतिक साझेदारी समझौता 2023 में हुआ था। कथन 2 गलत है क्योंकि कोई समर्पित संयुक्त रक्षा उत्पादन ढांचा नहीं है। कथन 3 सही है; मिस्र 2023 में भारत के गणतंत्र दिवस का मुख्य अतिथि था।

पश्चिम एशियाई देशों के साथ भारत के रक्षा सहयोग के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. भारत-यूएई रक्षा सहयोग में उन्नत तकनीकी हस्तांतरण और संयुक्त निर्माण शामिल हैं।
  2. भारत-मिस्र रक्षा सहयोग के कारण एक वर्ष में रक्षा व्यापार में 30% वृद्धि हुई।
  3. भारत का रक्षा मंत्रालय मिस्र के साथ द्विपक्षीय रक्षा सहयोग की देखरेख करता है।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 3
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 2
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि भारत-यूएई सहयोग में उन्नत तकनीकी हस्तांतरण शामिल है। कथन 2 गलत है; 30% वृद्धि भारत-यूएई रक्षा व्यापार में हुई है, भारत-मिस्र में नहीं। कथन 3 सही है; भारत का रक्षा मंत्रालय मिस्र के साथ रक्षा सहयोग देखता है।

मुख्य प्रश्न

भारत-मिस्र द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के विकास और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए इसके महत्व पर चर्चा करें। इस साझेदारी में कौन-कौन सी प्रमुख कमियां हैं और इन्हें दूर करके पारस्परिक रणनीतिक उद्देश्यों को कैसे मजबूत किया जा सकता है? (250 शब्द)

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – अंतरराष्ट्रीय संबंध और सुरक्षा
  • झारखंड पहलू: झारखंड के रक्षा निर्माण इकाइयों को भारत-मिस्र रक्षा औद्योगिक सहयोग के विस्तार से लाभ मिल सकता है।
  • मुख्य बिंदु: भारत की रणनीतिक साझेदारियों को स्थानीय रक्षा उद्योग विकास और रोजगार के अवसरों से जोड़कर उत्तर तैयार करें।
भारत और मिस्र के बीच रणनीतिक साझेदारी समझौता क्या है?

2023 में हस्ताक्षरित यह समझौता भारत और मिस्र के बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग को औपचारिक करता है, जिससे संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण और रणनीतिक संवाद एक संस्थागत ढांचे के तहत संभव होते हैं।

संयुक्त रक्षा समिति (JDC) की भूमिका क्या है?

JDC एक द्विपक्षीय मंच है जो हर साल रक्षा सहयोग की समीक्षा, संयुक्त गतिविधियों की योजना और नीतिगत समन्वय करता है।

मिस्र का स्थान भारत के रणनीतिक हितों के लिए कितना महत्वपूर्ण है?

मिस्र सुएज नहर का नियंत्रण करता है, जो भारत के यूरोप और अफ्रीका के साथ व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, इसलिए समुद्री सुरक्षा सहयोग अत्यंत आवश्यक है।

भारत-मिस्र रक्षा सहयोग में मुख्य कमियां क्या हैं?

समर्पित संयुक्त रक्षा उत्पादन ढांचे और तकनीकी हस्तांतरण व्यवस्था के अभाव के कारण गहरा औद्योगिक सहयोग और क्षमता निर्माण सीमित है।

भारत का रक्षा बजट द्विपक्षीय सहयोग को कैसे समर्थन देता है?

2023-24 के ₹5.94 लाख करोड़ के रक्षा बजट से रक्षा निर्यात, तकनीकी साझेदारी और संयुक्त उद्यमों को बढ़ावा मिलता है, जो मिस्र के साथ सहयोग की नींव है।