झारखंड में हाथी गलियारों का परिचय और पारिस्थितिक महत्व
झारखंड में करीब 1,500 से 1,700 एशियाई हाथी पाए जाते हैं, जो भारत की कुल आबादी का लगभग 10% है (Project Elephant Report, 2023)। हाथी गलियारे वे संकरे वन क्षेत्र होते हैं जो हाथियों को मौसमी प्रवासन और आनुवंशिक आदान-प्रदान के लिए जोड़ते हैं। झारखंड में पांच आधिकारिक हाथी गलियारों को मान्यता मिली है, जिनमें दलमा और पलामू प्रमुख हैं, जो राज्य के वन क्षेत्रों को आपस में और आसपास के इलाकों से जोड़ते हैं (MoEFCC, 2022)। ये गलियारे हाथियों की आवाजाही बनाए रखने और खनन, अवसंरचना तथा कृषि विस्तार से होने वाले आवासीय विखंडन को कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
- दलमा गलियारा दलमा वन्यजीव अभयारण्य को पश्चिम बंगाल और ओडिशा के आस-पास के जंगलों से जोड़ता है।
- पलामू गलियारा पलामू टाइगर रिजर्व को झारखंड के बेटला नेशनल पार्क और झारखंड-ओडिशा सीमा के जंगलों से जोड़ता है।
- अन्य गलियारे लातेहार, गुमला और सिमडेगा जिलों के हिस्सों में फैले हैं।
- खनन और अवसंरचना परियोजनाओं के कारण पिछले दशक में हाथी गलियारों का विखंडन 15% बढ़ा है (WII Corridor Mapping, 2023)।
झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष: प्रवृत्तियाँ और आर्थिक प्रभाव
झारखंड में 2018 से 2022 के बीच मानव-हाथी संघर्ष के मामले 25% बढ़े हैं (राज्य वन विभाग वार्षिक रिपोर्ट, 2022)। सालाना 1,200 हेक्टेयर से अधिक फसल प्रभावित होती है, जिससे करीब 15 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होता है (झारखंड कृषि विभाग, 2022)। इस संघर्ष में मानव जीवन, पशुधन और संपत्ति का नुकसान होता है, जो कृषि और वन संसाधनों पर निर्भर ग्रामीण समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को और खराब करता है।
- हाथी के नुकसान के लिए किसानों को 2022 में 2.5 करोड़ रुपये मुआवजा दिया गया (झारखंड वन विभाग)।
- हाथी आवासों से जुड़ा इकोटूरिज्म लगभग 12 करोड़ रुपये वार्षिक आय उत्पन्न करता है, जो गलियारों के संरक्षण को बढ़ावा देता है।
- स्थानीय समुदायों को फसल और संपत्ति के नुकसान का अधिक झेलना पड़ता है, जबकि वैकल्पिक आजीविका के अवसर सीमित हैं।
झारखंड में हाथी गलियारों के संरक्षण के लिए कानूनी और नीतिगत ढांचा
झारखंड में हाथी गलियारों का संरक्षण केंद्र और राज्य स्तर पर कई कानूनों के तहत किया जाता है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (धारा 2, 9, 39) संरक्षित प्रजातियों और अभयारण्यों को परिभाषित करता है और आवास संरक्षण अनिवार्य करता है। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (धारा 2) गैर-वन उपयोग के लिए वन भूमि के परिवर्तन को नियंत्रित करता है, जो गलियारों की सुरक्षा के लिए जरूरी है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (धारा 3) केंद्र सरकार को पर्यावरण सुरक्षा लागू करने का अधिकार देता है।
- अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार) अधिनियम, 2006 (धारा 3-5) समुदाय के वन अधिकारों को मान्यता देता है, जिससे जनजातीय संरक्षण में भागीदारी संभव होती है।
- झारखंड वन अधिनियम, 1973 केंद्र सरकार के कानूनों के साथ राज्य-विशिष्ट वन प्रबंधन प्रावधान जोड़ता है।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले जैसे T.N. Godavarman Thirumulpad v. Union of India (1996) ने गलियारों को वन पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा मानकर संरक्षण का कानूनी आधार मजबूत किया है।
गलियारा प्रबंधन और संघर्ष नियंत्रण में संस्थागत भूमिका
झारखंड वन विभाग वन और वन्यजीव संरक्षण, जिसमें हाथी गलियारे भी शामिल हैं, के लिए मुख्य एजेंसी है। केंद्रीय सरकार का प्रोजेक्ट एलीफेंट (MoEFCC) वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करता है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) वैज्ञानिक शोध और गलियारा मैपिंग करता है, जबकि झारखंड स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड (JSBB) जैव विविधता संरक्षण का समन्वय करता है। स्थानीय पंचायतें और वन अधिकार समितियां समुदाय आधारित संघर्ष नियंत्रण में सक्रिय होती हैं।
- वन, खनन और अवसंरचना विभागों के बीच समन्वय की कमी से गलियारों का अवैध रूप से विखंडन बढ़ रहा है।
- वन अधिकार अधिनियम के बावजूद समुदाय की भागीदारी जागरूकता और संसाधन की कमी के कारण सीमित है।
- प्रोजेक्ट एलीफेंट क्षति रोकथाम, पूर्व चेतावनी प्रणाली और मुआवजा योजनाएं चलाता है।
झारखंड और श्रीलंका में हाथी गलियारों के संरक्षण की तुलना
| मापदंड | झारखंड | श्रीलंका |
|---|---|---|
| हाथी की संख्या | 1,500-1,700 एशियाई हाथी (भारत की आबादी का 10%) | लगभग 7,000 हाथी (दक्षिण एशिया में सबसे बड़ी आबादी) |
| गलियारों की मान्यता | 5 आधिकारिक गलियारे (दलमा, पलामू आदि) | कई समुदाय-प्रबंधित गलियारे जो राष्ट्रीय उद्यानों से जुड़े हैं |
| मानव-हाथी संघर्ष का रुझान | 2018-2022 में 25% वृद्धि | 2016-2021 में 40% कमी |
| समुदाय की भागीदारी | सीमित, संस्थागत कमियों और जागरूकता की कमी | परंपरागत ज्ञान और सरकारी नीति का मजबूत समावेश |
| नीति का क्रियान्वयन | विभागीय समन्वय कमजोर; खनन और अवसंरचना दबाव | मजबूत कानूनी ढांचा, सक्रिय निगरानी और समुदाय द्वारा क्रियान्वयन |
झारखंड के हाथी गलियारों के प्रबंधन में प्रमुख कमियां
झारखंड में वन, खनन और अवसंरचना विभागों के बीच समन्वय की कमी गलियारों के विखंडन को बढ़ा रही है, जो पिछले दस वर्षों में 15% तक पहुंच चुका है (WII Corridor Mapping, 2023)। वन अधिकार अधिनियम के बावजूद समुदाय की भागीदारी कम है क्योंकि जागरूकता और क्षमता निर्माण की कमी है। मुआवजा व्यवस्था आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए अपर्याप्त है, और इकोटूरिज्म की संभावनाएं भी पूरी तरह विकसित नहीं हुई हैं।
- नीति का जमीन स्तर पर क्रियान्वयन कमजोर है, वन भूमि के अवैध उपयोग के मामले आम हैं।
- खनन और अवसंरचना परियोजनाएं अक्सर गलियारों के क्षेत्रों में बिना पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के शुरू हो जाती हैं।
- हाथी की आवाजाही और संघर्ष के हॉटस्पॉट का वास्तविक समय में निगरानी का अभाव है।
आगे का रास्ता: झारखंड में हाथी गलियारों के संरक्षण को मजबूत बनाना
- वन, खनन, अवसंरचना और जनजातीय कल्याण विभागों को शामिल करते हुए एक समर्पित हाथी गलियारा प्रबंधन प्राधिकरण बनाकर विभागीय समन्वय बढ़ाना।
- वन अधिकार अधिनियम के तहत समुदाय के वन अधिकारों का उपयोग कर स्थानीय हितधारकों को निगरानी और संघर्ष नियंत्रण में सशक्त बनाना।
- WII और प्रोजेक्ट एलीफेंट के सहयोग से टेलीमेट्री और GIS मैपिंग द्वारा वैज्ञानिक शोध और वास्तविक समय निगरानी का विस्तार।
- मुआवजा योजनाओं में सुधार और इकोटूरिज्म तथा सतत कृषि से जुड़ी वैकल्पिक आजीविका कार्यक्रमों का विकास।
- गलियारों से गुजरने वाली परियोजनाओं के लिए कड़े पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और वन भूमि परिवर्तन नियमों का सख्ती से पालन।
- श्रीलंका के मॉडल को अपनाते हुए परंपरागत ज्ञान को सरकारी नीतियों के साथ जोड़कर मानव-हाथी संघर्ष को कम करना।
JPSC परीक्षा से संबंध
- पेपर II: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – मानव-वन्यजीव संघर्ष, वन्यजीव संरक्षण कानून
- पेपर III: झारखंड से जुड़े मुद्दे – वन प्रबंधन, जनजातीय अधिकार, वन्यजीव संरक्षण
- पूर्व प्रश्न: 21 झारखंड में हाथी गलियारों के प्रबंधन की चुनौतियों पर चर्चा (JPSC 2021)
- मानव-हाथी संघर्ष में समुदाय की भागीदारी का मूल्यांकन (JPSC 2019)
झारखंड में हाथी गलियारों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- दलमा और पलामू झारखंड के आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त हाथी गलियारों में शामिल हैं।
- झारखंड में हाथी गलियारों का विखंडन पिछले दशक में कम हुआ है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में हाथी गलियारों के संरक्षण का स्पष्ट प्रावधान है।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि दलमा और पलामू मान्यता प्राप्त गलियारे हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि विखंडन में 15% वृद्धि हुई है। कथन 3 गलत है; वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में आवास संरक्षण तो है लेकिन गलियारों के संरक्षण का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष (HEC) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- 2018 से 2022 के बीच HEC की घटनाएं 25% बढ़ी हैं।
- हाथी से हुए नुकसान के लिए किसानों को 2022 में 10 करोड़ रुपये से अधिक मुआवजा मिला।
- हाथी आवास से जुड़ा इकोटूरिज्म झारखंड की अर्थव्यवस्था में योगदान देता है।
इनमें से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर: (c)
कथन 1 सही है (राज्य वन विभाग के अनुसार)। कथन 2 गलत है; मुआवजा 2.5 करोड़ रुपये था। कथन 3 सही है; इकोटूरिज्म से लगभग 12 करोड़ रुपये वार्षिक आय होती है।
मुख्य प्रश्न
झारखंड में हाथी गलियारों के प्रबंधन में कानूनी ढांचे, समुदाय की भागीदारी और विभागीय समन्वय की चुनौतियों और अवसरों का मूल्यांकन करें। मानव-हाथी संघर्ष को प्रभावी ढंग से कम करने के उपाय सुझाएं।
झारखंड और JPSC से संबंध
- JPSC पेपर: पेपर II (पर्यावरण), पेपर III (राज्य-विशिष्ट मुद्दे)
- झारखंड का महत्व: भारत की एशियाई हाथी आबादी का 10% हिस्सा; 5 आधिकारिक गलियारे; बढ़ता मानव-हाथी संघर्ष जो जनजातीय और ग्रामीण आजीविका को प्रभावित करता है।
- मुख्य बिंदु: राज्य-विशिष्ट आंकड़े, वन अधिकार अधिनियम जैसे कानूनी प्रावधान, और झारखंड के सामाजिक-आर्थिक संदर्भ में संस्थागत चुनौतियां।
हाथी गलियारे क्या होते हैं और झारखंड में इनका महत्व क्यों है?
हाथी गलियारे संकरे वन क्षेत्र होते हैं जो बड़े आवासों को जोड़ते हैं ताकि हाथी आसानी से आवागमन कर सकें और आनुवंशिक विविधता बनी रहे। झारखंड में ये गलियारे खनन और अवसंरचना से होने वाले आवासीय विखंडन को रोकते हैं, जिससे मानव-हाथी संघर्ष कम होता है और जैव विविधता बनी रहती है (Project Elephant Report, 2023)।
झारखंड में हाथी गलियारों के संरक्षण के लिए कौन-कौन से कानून लागू हैं?
मुख्य कानूनों में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972; वन संरक्षण अधिनियम, 1980; पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986; और अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन अधिकार अधिनियम, 2006 शामिल हैं। झारखंड वन अधिनियम, 1973 राज्य-विशिष्ट प्रावधान जोड़ता है।
झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष क्यों बढ़ रहा है?
मुख्य कारण हैं खनन, अवसंरचना परियोजनाओं और कृषि विस्तार से आवासीय विखंडन, जिससे हाथी मानव बस्तियों की ओर आते हैं। इसके चलते 2018 से 2022 के बीच संघर्ष की घटनाएं 25% बढ़ी हैं (राज्य वन विभाग, 2022)।
हाथी गलियारा प्रबंधन में समुदाय की भागीदारी कैसे प्रभाव डालती है?
वन अधिकार अधिनियम के तहत समुदाय के वनवासियों को गलियारों की निगरानी और संघर्ष नियंत्रण में शामिल किया जाता है। लेकिन झारखंड में जागरूकता और संस्थागत समर्थन की कमी के कारण भागीदारी सीमित है, जिससे संरक्षण प्रयास कम प्रभावी होते हैं।
झारखंड को श्रीलंका के हाथी गलियारा प्रबंधन से क्या सीख मिल सकती है?
श्रीलंका ने पारंपरिक ज्ञान को सरकारी नीतियों के साथ जोड़कर पांच वर्षों में मानव-हाथी संघर्ष में 40% कमी लाई है। झारखंड भी इसी मॉडल को अपनाकर समुदाय को सशक्त बना सकता है और कानूनी क्रियान्वयन को मजबूत कर सकता है (Department of Wildlife Conservation, Sri Lanka, 2021)।