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झारखंड में वनों की कटाई और आदिवासी विस्थापन: कानूनी, आर्थिक और पर्यावरणीय पहलू

परिचय: झारखंड में वनों की कटाई और आदिवासी विस्थापन

2000 में बिहार से अलग होकर बना झारखंड प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य है, जहां 2021 की Forest Survey of India (FSI) रिपोर्ट के अनुसार कुल भौगोलिक क्षेत्र का 27.8% हिस्सा वन क्षेत्र में शामिल है। यहां की 26.2% आबादी अनुसूचित जनजाति (Census 2011) की है, जो मुख्य रूप से वन पर निर्भर है और अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है। 2015 के बाद से तेज हुई खनन और औद्योगिक गतिविधियों ने वनों की कटाई को बढ़ावा दिया है, जिससे 1.5 लाख से अधिक आदिवासी विस्थापित हुए हैं (Jharkhand State Livelihood Promotion Society (JSLPS), 2023)। यह स्थिति न केवल पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करती है, बल्कि आदिवासियों के कल्याण और आजीविका को भी कमजोर बनाती है, जबकि संविधान और वन संरक्षण कानूनों के तहत सुरक्षा मौजूद है।

JPSC परीक्षा प्रासंगिकता

  • Paper 2 (Governance, पर्यावरण और आदिवासी कल्याण) से संबंधित
  • अनुसूचित क्षेत्र के लिए संवैधानिक प्रावधान और Forest Rights Act के क्रियान्वयन पर ध्यान
  • झारखंड में खनन से हुए विस्थापन के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण
  • पूर्व के JPSC प्रश्न (2021, 2023) में खनन के प्रभाव और वन क्षेत्र में बदलाव पर चर्चा

झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों और वनों के लिए संवैधानिक एवं कानूनी ढांचा

झारखंड संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जो Article 244(2) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों को विशेष सुरक्षा प्रदान करता है, ताकि आदिवासी स्वायत्तता और भूमि अधिकार सुरक्षित रह सकें। Forest Rights Act, 2006 (FRA) के तहत Sections 3(1)(m) और 4 में व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता दी गई है, जो ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का प्रयास है। FRA को Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Rules, 2008 के माध्यम से लागू किया जाता है।

खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए वन भूमि के उपयोग को Forest Conservation Act, 1980 (Section 2) और Environment Protection Act, 1986 के तहत नियंत्रित किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के Samatha vs State of Andhra Pradesh (1997) के फैसले ने आदिवासी क्षेत्रों में खनन पट्टे देने पर रोक लगाई है, जिससे आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा होती है और शोषण रोका जाता है।

  • Article 244(2) और पांचवीं अनुसूची: झारखंड जैसे अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विशेष शासन
  • FRA 2006 के Sections 3(1)(m) और 4: आदिवासियों के वन अधिकारों की मान्यता
  • Forest Conservation Act 1980 Section 2: वन भूमि के उपयोग को नियंत्रित करता है
  • Samatha फैसला (1997): आदिवासी क्षेत्रों में खनन पट्टे प्रतिबंधित

वन कटाई और विस्थापन का आदिवासी समुदायों पर आर्थिक प्रभाव

खनन झारखंड की कुल राजस्व का लगभग 40% हिस्सा प्रदान करता है, जो राज्य की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ है। लेकिन इसके सामाजिक और पारिस्थितिक दुष्परिणाम भी बड़े हैं। 2015 से 2022 के बीच खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण 1.5 लाख से अधिक आदिवासी विस्थापित हुए हैं (JSLPS, 2023)। इनमें से केवल 45% को FRA के तहत औपचारिक पुनर्वास मिला है, जो क्रियान्वयन में बड़ी कमी दर्शाता है।

वन कटाई ने गैर-लकड़ी वन उत्पाद (NTFP) के बाजार को भी प्रभावित किया है, जिसका वार्षिक मूल्य ₹1200 करोड़ है (झारखंड वन विभाग, 2022)। वन क्षेत्र में कमी से पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाएं प्रभावित हुई हैं, जिससे आदिवासी जिलों में कृषि उत्पादन में लगभग 8% की गिरावट आई है (ICRISAT अध्ययन, 2021)। साथ ही, विस्थापन और वन संसाधनों की कमी के कारण इन जिलों में कुपोषण दर राज्य औसत से 12% अधिक है (NFHS-5, 2019-21)।

  • खनन क्षेत्र: राज्य राजस्व का 40%, लेकिन बड़े पैमाने पर आदिवासी विस्थापन का कारण
  • 2015-2022 में 1.5 लाख से अधिक आदिवासी विस्थापित, केवल 45% को पुनर्वास (JSLPS, 2023)
  • वन कटाई से NTFP बाजार को ₹1200 करोड़ का नुकसान
  • आदिवासी क्षेत्रों में कृषि उत्पादन में 8% की गिरावट (ICRISAT, 2021)
  • विस्थापन से जुड़े कारणों से आदिवासी जिलों में 12% अधिक कुपोषण (NFHS-5)

पर्यावरणीय परिणाम और जैव विविधता की हानि

झारखंड में वन क्षेत्रफल 2015 में 29.6% से घटकर 2021 में 27.8% रह गया है (FSI, 2021)। 2010-2020 के बीच वन भूमि के 65% हिस्से का उपयोग खनन के लिए हुआ है (MoEFCC रिपोर्ट)। यह कटाई पेलमाऊ टाइगर रिजर्व और दलमा वन्यजीव अभयारण्य जैसे जैव विविधता हॉटस्पॉट्स को खतरे में डालती है, जहां 50 से अधिक संकटग्रस्त प्रजातियां पाई जाती हैं (Wildlife Institute of India, 2022)। वन क्षेत्र की कमी से जल प्रबंधन, मिट्टी की उर्वरता और कार्बन संधारण जैसी पारिस्थितिक सेवाएं कमजोर हुई हैं।

  • वन क्षेत्र में गिरावट: 29.6% (2015) से 27.8% (2021)
  • वन भूमि के 65% हिस्से का खनन के लिए उपयोग (2010-2020)
  • जैव विविधता हॉटस्पॉट्स: पेलमाऊ टाइगर रिजर्व, दलमा वन्यजीव अभयारण्य
  • 50 से अधिक संकटग्रस्त प्रजातियां खतरे में (Wildlife Institute of India, 2022)
  • पारिस्थितिक सेवाओं का क्षरण, कृषि और जलवायु सहनशीलता प्रभावित

संस्थागत भूमिकाएं और क्रियान्वयन की चुनौतियां

झारखंड वन विभाग वन संरक्षण का प्रबंधन करता है, लेकिन संसाधनों की कमी और विकास की प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है। झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS) आदिवासी कल्याण और पुनर्वास की जिम्मेदारी संभालती है, लेकिन FRA के तहत केवल 45% पुनर्वास की सफलता दर्ज हुई है। Ministry of Tribal Affairs (MoTA) राष्ट्रीय स्तर पर FRA के क्रियान्वयन की निगरानी करता है, जबकि Forest Survey of India (FSI) वन क्षेत्र की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। National Mineral Development Corporation (NMDC) प्रमुख खनन ऑपरेटर है जो वनों पर प्रभाव डालता है। झारखंड स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (JSPCB) पर्यावरणीय अनुपालन की निगरानी करता है, लेकिन प्रवर्तन कमजोर है।

  • झारखंड वन विभाग: वन प्रबंधन और संरक्षण
  • JSLPS: आदिवासी कल्याण और पुनर्वास (45% औपचारिक पुनर्वास दर)
  • MoTA: केंद्रीय FRA क्रियान्वयन एजेंसी
  • FSI: वन क्षेत्र डेटा और निगरानी
  • NMDC: प्रमुख खनन ऑपरेटर
  • JSPCB: पर्यावरणीय अनुपालन निगरानी

तुलनात्मक अध्ययन: झारखंड बनाम ब्राजील के अमेज़न आदिवासी संरक्षण

पहलू झारखंड ब्राजील (अमेज़न क्षेत्र)
वन शासन ऊपर से नीचे, राज्य नियंत्रित, आदिवासी भागीदारी सीमित आदिवासी और समुदाय संचालित संरक्षण क्षेत्र (ICCAs) मॉडल, जनजातीय शासन शामिल
आदिवासी क्षेत्रों में वनों की कटाई दर वन क्षेत्र 29.6% से घटकर 27.8% (2015-2021) ICCAs में गैर-संरक्षित इलाकों की तुलना में 30% कम कटाई (FAO, 2022)
आदिवासी विस्थापन 1.5 लाख से अधिक विस्थापित, पुनर्वास अपर्याप्त सहभागी संरक्षण के कारण न्यूनतम विस्थापन
कानूनी ढांचा FRA 2006, Forest Conservation Act, Samatha फैसला संवैधानिक मान्यता और ICCA का कानूनी दर्जा
सामुदायिक सहमति Free, Prior and Informed Consent (FPIC) अक्सर सुनिश्चित नहीं ICCAs की स्थापना और प्रबंधन में FPIC अनिवार्य

नीतिगत कमियां और क्रियान्वयन की बाधाएं

सबसे बड़ी कमी FRA के कमजोर क्रियान्वयन और विशेषकर Free, Prior and Informed Consent (FPIC) की अनुपालना न होना है, जिससे वन भूमि के उपयोग से पहले आदिवासी समुदायों की सहमति नहीं ली जाती। इससे कानूनी विवाद और सामाजिक तनाव उत्पन्न होते हैं, जो सतत संरक्षण और आदिवासी कल्याण को नुकसान पहुंचाते हैं। राज्य एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी, पुनर्वास के लिए अपर्याप्त धन और स्थानीय शासन संस्थाओं की क्षमता की कमी समस्या को और बढ़ाती है।

  • वन भूमि उपयोग से पहले FPIC का अभाव
  • FRA के कमजोर क्रियान्वयन से कानूनी और सामाजिक संघर्ष
  • राज्य एजेंसियों के बीच कमज़ोर समन्वय और प्रवर्तन
  • पुनर्वास और आजीविका सहायता के लिए अपर्याप्त बजट
  • स्थानीय संस्थाओं की सहभागी शासन के लिए सीमित क्षमता

महत्त्व और आगे की राह

  • FRA के क्रियान्वयन को मजबूत करें, FPIC को अनिवार्य और शिकायत निवारण पारदर्शी बनाएं
  • झारखंड वन विभाग और JSLPS की संस्थागत क्षमता बढ़ाएं ताकि पुनर्वास प्रभावी हो सके
  • ब्राजील के ICCA मॉडल से प्रेरणा लेकर सामुदायिक वन प्रबंधन को बढ़ावा दें
  • आदिवासी कल्याण और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन के लिए ₹500 करोड़ से अधिक बजट आवंटित करें (झारखंड बजट 2023-24)
  • वन निगरानी और प्रभाव आकलन के लिए GIS, रिमोट सेंसिंग जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ाएं
  • खनन कंपनियों द्वारा Forest Conservation Act और Environment Protection Act का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें

झारखंड में Forest Rights Act (FRA), 2006 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. FRA अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है।
  2. FRA के क्रियान्वयन में वन भूमि उपयोग से पहले Free, Prior and Informed Consent (FPIC) लेना अनिवार्य है।
  3. यह अधिनियम वन भूमि उपयोग से संबंधित सभी मामलों में Forest Conservation Act, 1980 से ऊपर है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि FRA व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है। कथन 2 भी सही है क्योंकि FRA के तहत FPIC आवश्यक है। कथन 3 गलत है क्योंकि FRA, Forest Conservation Act, 1980 को प्रतिस्थापित नहीं करता, यह वन भूमि उपयोग को अलग से नियंत्रित करता है।

झारखंड के वन क्षेत्र और आदिवासी विस्थापन के बारे में निम्नलिखित तथ्यों पर विचार करें:

  1. वन क्षेत्र 2015 में 29.6% से घटकर 2021 में 27.8% हो गया।
  2. 2010-2020 के बीच वन भूमि के 65% हिस्से का उपयोग खनन के लिए हुआ।
  3. 80% से अधिक विस्थापित आदिवासियों को FRA के तहत औपचारिक पुनर्वास मिला है।

उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 और 2 Forest Survey of India और MoEFCC के अनुसार सही हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि केवल 45% विस्थापित आदिवासियों को औपचारिक पुनर्वास मिला है (JSLPS, 2023)।

मुख्य प्रश्न

खनन से प्रेरित वनों की कटाई का झारखंड में आदिवासी विस्थापन पर प्रभाव चर्चा करें। आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा में संवैधानिक प्रावधानों और वन संरक्षण कानूनों की प्रभावशीलता का विश्लेषण करें तथा नीति क्रियान्वयन सुधार के उपाय सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – शासन, पर्यावरण, आदिवासी कल्याण
  • झारखंड परिप्रेक्ष्य: वन क्षेत्र में गिरावट, आदिवासी विस्थापन, खनन राजस्व पर निर्भरता के राज्य-विशिष्ट आंकड़े
  • मुख्य बिंदु: FRA के क्रियान्वयन में कमी, पांचवीं अनुसूची के संवैधानिक संरक्षण, वनों की कटाई के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
झारखंड में आदिवासी क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए कौन से संवैधानिक प्रावधान हैं?

Article 244(2) और संविधान की पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों को विशेष सुरक्षा प्रदान करती हैं, जिससे आदिवासियों को स्वायत्त शासन और भूमि अधिकारों की रक्षा मिलती है।

झारखंड में Forest Rights Act, 2006 की क्या भूमिका है?

FRA अनुसूचित जनजाति और पारंपरिक वनवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है, ऐतिहासिक अन्यायों को सुधारने का प्रयास करता है और वन भूमि उपयोग से पहले सहमति लेना अनिवार्य करता है।

झारखंड ने हाल के वर्षों में कितना वन क्षेत्र खोया है?

2015 से 2021 के बीच झारखंड का वन क्षेत्र 29.6% से घटकर 27.8% रह गया है, जिसका मुख्य कारण खनन और औद्योगिक गतिविधियां हैं (Forest Survey of India, 2021)।

झारखंड में आदिवासी विस्थापन के मुख्य कारण क्या हैं?

खनन और औद्योगिक विस्तार मुख्य कारण हैं, जिनके चलते 2015-2022 के बीच 1.5 लाख से अधिक आदिवासी विस्थापित हुए हैं, जिनका पुनर्वास और आजीविका बहाली अपर्याप्त है।

ब्राजील के अमेज़न क्षेत्र से झारखंड को आदिवासी वन संरक्षण के लिए क्या सीख मिल सकती है?

झारखंड ब्राजील के Indigenous and Community Conserved Areas (ICCAs) जैसे सहभागी मॉडल अपना सकता है, जो आदिवासी शासन को संरक्षण के साथ जोड़ते हैं और वनों की कटाई व विस्थापन को कम करते हैं।