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डेटा प्रवाह: भारत और यूरोपीय संघ ने निर्णय टाला, बाद में करेंगे समीक्षा

22 MB/s या बर्फ पर कूटनीति: डेटा प्रवाह की कहानी

भारत-यूरोपीय संघ (EU) व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (TTC), जो 1 मार्च 2026 को ब्रुसेल्स में आयोजित हुई, ने सीमा पार डेटा प्रवाह विवादों को सुलझाने के एक महत्वपूर्ण अवसर को खो दिया। इसके बजाय, “मामले की समीक्षा बाद में करने” का एक वचन पत्र पर हस्ताक्षर किया गया, जिससे किसी भी महत्वपूर्ण समाधान में देरी हुई। यह तब हुआ जब 2023 के बॉलपार्क समझौते के तीन साल बीत चुके थे — जो भारतीय और EU संस्थाओं के बीच डेटा हस्तांतरण के लिए नियामक मानदंडों को निर्धारित करने वाला था। विडंबना यह है कि भारत के EU को आईटी निर्यात, जो FY27 में $22 बिलियन से अधिक होने की उम्मीद है, बढ़ रहे हैं, जबकि नियामक अनिश्चितता गहराती जा रही है।

एक परिचित स्थगन का पैटर्न

यह अस्पष्ट कूटनीतिक परिणाम अप्रत्याशित नहीं है, लेकिन यह पूर्व की भाषा की तुलना में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। 2024 में, केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भारत को EU के सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR) के तहत उपयुक्तता स्थिति प्राप्त करने के “एक इंच दूर” बताया था। उपयुक्तता स्थिति भारत को डेटा हस्तांतरण पर प्रतिबंधों से मुक्त कर देगी, जिससे निर्बाध डिजिटल वाणिज्य को सक्षम किया जा सकेगा। इसके बजाय, EU अब भारत के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के बारे में चिंताएँ व्यक्त कर रहा है, विशेष रूप से धारा 17 के बारे में, जो केंद्रीय सरकार को सार्वजनिक हित के खिलाफ मानते हुए सीमा पार डेटा हस्तांतरण को अवरुद्ध करने की अनुमति देती है। EU के वार्ताकारों का तर्क है कि यह GDPR के डेटा अधिकार क्षेत्र पर सख्त भौगोलिक प्रतिबंधों के साथ संघर्ष करता है।

यह गतिरोध भारत की विदेश नीति की बातचीत की स्थिति में एक व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाता है: जहां स्पष्टता असंभव होती है, वहाँ देरी और अस्पष्टता। अतीत के उदाहरणों में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) को अंतिम रूप देने में देरी या WTO ई-कॉमर्स चर्चाओं को कम करना शामिल है। इस सप्ताह TTC का परिणाम उसी लय का विस्तार है — सतही प्रगति के पक्ष में सामग्री से बचना।

विवाद के तंत्र

EU की संदेहवादिता मुख्य रूप से तीन आपस में जुड़े ढांचों के प्रबंधन से उत्पन्न होती है: GDPR, उपयुक्तता वार्ता, और भारत के हाल के डेटा कानून। तनाव के केंद्र में दो महत्वपूर्ण चिंताएँ हैं:

  • भारत के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDPA) की धारा 17: जबकि कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत में डेटा स्थानीयकरण की आवश्यकताएँ विधेयक के प्रारंभिक मसौदों की तुलना में अधिक लचीली हैं, धारा 17 केंद्रीय सरकार को विशाल विवेकाधिकार देती है। पारदर्शिता तंत्र स्पष्ट नहीं हैं।
  • EU की प्रतिबंधात्मकता: GDPR, जिसे वैश्विक स्तर पर स्वर्ण मानक माना जाता है, अपने सदस्यों को बिना समानता के गोपनीयता सुरक्षा वाले क्षेत्रों में व्यक्तिगत डेटा को स्वतंत्र रूप से स्थानांतरित करने से रोकता है। इसके विपरीत, भारत “विश्वासपात्र” भौगोलिक क्षेत्रों में डेटा स्थानांतरण की अनुमति देता है, जैसा कि कार्यकारी आदेशों द्वारा परिभाषित किया गया है, जिससे नियामक समानता का आकलन करना कठिन हो जाता है।

इसके अलावा, 2023 के अधिनियम के तहत पूर्ण रूप से स्थापित डेटा संरक्षण बोर्ड की कमी भारत की तत्परता को कमजोर करती है। फरवरी 2026 तक, बोर्ड की नियुक्ति तात्कालिक थी, जिससे भारतीय हितधारकों और EU नियामकों के बीच मध्यस्थता करने की कोई संस्थागत क्षमता नहीं थी।

कंपनियों को क्या सामना करना पड़ता है?

भारतीय आईटी पारिस्थितिकी तंत्र — जिसमें इन्फोसिस, विप्रो, और टीसीएस जैसे बहुराष्ट्रीय दिग्गज शामिल हैं — एक दुविधा में है। EU से प्राप्त डेटा प्रोसेसिंग अनुबंधों ने FY25 में उनके निर्यात राजस्व का लगभग 27% हिस्सा बनाया। इसके अलावा, उद्योग निकाय जैसे NASSCOM का अनुमान है कि यदि EU की आउटसोर्सिंग पर प्रतिबंध सख्त होते हैं, तो वार्षिक रूप से ₹23,000 करोड़ के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

भारतीय सरकार, अपनी ओर से, रणनीतिक संप्रभुता की कथा को बढ़ावा देती है, यह दावा करते हुए कि “जो हमारे लिए लागू होता है, वह दूसरों पर भी लागू होता है” — यह एक छिपा हुआ संदर्भ है यूरोपीय डिजिटल सेवाएँ अधिनियम (2022) और इसके लिए अमेरिकी तकनीकी कंपनियों की अनिवार्य अनुपालन। लेकिन यह बात छूट जाती है कि भारत में अनुपालन की तत्परता सबसे अच्छी स्थिति में भी असमान है। NITI Aayog के 2024 के सर्वेक्षण में पाया गया कि केवल 16% कंपनियाँ DPDPA के तहत अपने डेटा संरक्षण के दायित्वों के प्रति जागरूक थीं।

जापान से सीखने के पाठ

यदि भारत आगे बढ़ने का रास्ता तलाश रहा है, तो जापान एक प्रकट विरोधाभास प्रस्तुत करता है। 2018 में, जापान EU की उपयुक्तता स्थिति प्राप्त करने वाला पहला एशियाई देश बना, जिसका कारण GDPR के नियमों को अपने घरेलू कानून में शामिल करने वाला एक समझौता था। महत्वपूर्ण रूप से, जापान ने स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की — जिसे भारत अब तक स्वीकार करने से हिचक रहा है। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उपयुक्तता की पहचान ने जापानी डिजिटल सेवाओं में महत्वपूर्ण गतिशीलता डाली, विशेष रूप से क्लाउड कंप्यूटिंग निर्यात में, जो दो वर्षों में $5 बिलियन बढ़ गई।

इसके विपरीत, भारत ने उपयुक्तता को आर्थिक अवसर के रूप में कम और संप्रभुता और गैर-गठबंधन के दृष्टिकोण से अधिक देखा है। जबकि ऐसा रुख घरेलू स्तर पर काम करता है, यह भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर तुलना में नुकसान में छोड़ देता है।

वास्तविक प्रश्न: रणनीति या ठहराव?

TTC प्रक्रिया — और इसके हालिया स्थगन — के बारे में जो बात ध्यान खींचती है, वह न केवल समझौते की अनुपस्थिति है, बल्कि इसकी भविष्यवाणी भी है। दोनों पक्ष “तकनीकी भिन्नताओं” का हवाला देते हैं लेकिन कमरे में हाथी को स्वीकार करने से इनकार करते हैं: असंगत संस्थागत तंत्र। जहां EU सिद्धांत आधारित विनियमन के माध्यम से GDPR के तहत कार्य करता है, भारत कार्यकारी विवेकाधिकार का उपयोग करता है। नतीजतन, वार्ताएँ हमेशा उसी गतिरोध पर पहुँचती हैं।

असुविधाजनक सच यह है कि न तो पक्ष वास्तव में उपयुक्तता की इच्छा रखते हैं। EU के लिए, भारत की नियामक अस्पष्टता GDPR की वैश्विक विश्वसनीयता को कमजोर करने का जोखिम उठाती है। भारत के लिए, उपयुक्तता को स्वीकार करने से वह विवेकाधिकार सीमित हो सकता है जिसे वह डिजिटल कानून निर्माण में fiercely संरक्षित करता है। यह गतिरोध राजनीतिक प्रदर्शन को बढ़ावा देता है लेकिन उद्योग को महत्वपूर्ण स्पष्टता से वंचित करता है।

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न

  • प्रश्न 1: भारत के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 की कौन सी धारा सीमा पार डेटा प्रवाह पर प्रतिबंधों से संबंधित है? (क) धारा 7 (ख) धारा 17 (ग) धारा 13 (घ) धारा 22 उत्तर: (ख) धारा 17
  • प्रश्न 2: कौन सा देश EU के साथ GDPR उपयुक्तता स्थिति प्राप्त करने वाला पहला एशियाई देश था? (क) दक्षिण कोरिया (ख) सिंगापुर (ग) जापान (घ) मलेशिया उत्तर: (ग) जापान

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: यह मूल्यांकन करें कि क्या भारत की सीमा पार डेटा प्रवाह के प्रति दृष्टिकोण आर्थिक आवश्यकताओं और डेटा संप्रभुता की चिंताओं के बीच प्रभावी संतुलन स्थापित करता है। (250 शब्द)