भारत में मातृ मृत्यु का संक्षिप्त परिचय
The Lancet में प्रकाशित 2024 के एक अध्ययन के अनुसार, 2023 में भारत में लगभग 24,700 मातृ मृत्यु हुईं, जिससे भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहाँ मातृ मृत्यु दर सबसे अधिक है, जैसे नाइजीरिया, पाकिस्तान और इथियोपिया। Sample Registration System (SRS) के आंकड़ों के मुताबिक, मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) 2014-16 में 130 से घटकर 2020-22 में 103 हो गया है। लेकिन 2015 के बाद इस गिरावट की रफ्तार धीमी पड़ गई है। यह रुकावट स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की कमियों और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को दर्शाती है, जो आगे की प्रगति में बाधक हैं।
UPSC से जुड़ाव
- GS पेपर 2: स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे, जननी सुरक्षा योजना जैसे सरकारी कार्यक्रम और स्वास्थ्य के संवैधानिक अधिकार।
- GS पेपर 3: स्वास्थ्य अवसंरचना, मातृ मृत्यु के आर्थिक प्रभाव और सतत विकास लक्ष्य।
- निबंध: भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियाँ और नीतिगत सुधार।
मातृ स्वास्थ्य के लिए संवैधानिक और कानूनी ढांचा
भारतीय संविधान का Article 21, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य अधिकार के रूप में व्याख्यायित किया है, मातृ स्वास्थ्य सेवा का कानूनी आधार है। Paschim Banga Khet Mazdoor Samity v. State of West Bengal (1996) जैसे फैसलों ने राज्य की जिम्मेदारी को स्पष्ट किया है। Medical Termination of Pregnancy (Amendment) Act, 2021 ने सुरक्षित गर्भपात सेवा को बढ़ावा दिया है, जिससे असुरक्षित गर्भपात से होने वाली मातृ मृत्यु में कमी आई है। Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques (PCPNDT) Act, 1994 महिला भ्रूण हत्या रोकने के लिए है, जो अप्रत्यक्ष रूप से मातृ स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। National Health Mission (NHM) स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों को RMNCH+A रणनीति के माध्यम से लागू करता है।
- Article 21 जीवन के अधिकार के तहत स्वास्थ्य का अधिकार सुनिश्चित करता है।
- Medical Termination of Pregnancy (Amendment) Act, 2021 के तहत कुछ परिस्थितियों में गर्भपात 24 सप्ताह तक वैध है।
- PCPNDT Act, 1994 लिंग आधारित भ्रूण हत्या रोकता है, जो मातृ स्वास्थ्य पर प्रभाव डालता है।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले राज्य की मातृ स्वास्थ्य सेवा की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हैं।
- NHM मातृ स्वास्थ्य हस्तक्षेपों को लागू करने का मंच प्रदान करता है।
मातृ मृत्यु के आर्थिक पहलू
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय GDP का लगभग 2.5% है (National Health Profile 2023), जिसमें NHM के RMNCH+A घटक के तहत मातृ स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण राशि आवंटित होती है। 2023-24 के NHM बजट ₹37,000 करोड़ था, जो सरकार की प्रतिबद्धता दर्शाता है, लेकिन जनसंख्या के सापेक्ष संसाधनों की कमी भी उजागर करता है। मातृ मृत्यु और बीमारी से महिला श्रम भागीदारी घटती है और स्वास्थ्य खर्च बढ़ता है, जिससे आर्थिक नुकसान होता है, जिसकी वार्षिक राशि अरबों में आंकी गई है (World Bank)। मातृ स्वास्थ्य में सुधार से न केवल महिला सशक्तिकरण बल्कि आर्थिक विकास और लिंग समानता जैसे SDG लक्ष्यों की प्राप्ति भी संभव है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय: GDP का 2.5% (NHP 2023)।
- NHM बजट 2023-24: ₹37,000 करोड़, RMNCH+A पर केंद्रित।
- मातृ मृत्यु से आर्थिक नुकसान में उत्पादकता हानि और स्वास्थ्य खर्च शामिल हैं (World Bank)।
- मातृ स्वास्थ्य सुधार से महिला श्रम भागीदारी और SDG लक्ष्य बेहतर होते हैं।
संस्थागत तंत्र और डेटा निगरानी
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) मातृ स्वास्थ्य नीतियाँ बनाता है और कार्यान्वयन की निगरानी करता है। National Health Mission (NHM) RMNCH+A कार्यक्रमों को जमीनी स्तर पर लागू करता है। National Institute of Health and Family Welfare (NIHFW) क्षमता निर्माण और अनुसंधान में मदद करता है। Registrar General of India (RGI) Sample Registration System (SRS) के माध्यम से MMR डेटा एकत्र करता है। वैश्विक स्तर पर World Health Organization (WHO) तकनीकी मार्गदर्शन और मानक प्रदान करता है। The Lancet के ताजा अध्ययन ने नीतिगत पुनर्समीक्षा के लिए महत्वपूर्ण महामारी विज्ञान संबंधी जानकारी दी है।
- MoHFW: नीति निर्माण और पर्यवेक्षण।
- NHM: RMNCH+A कार्यक्रमों का क्रियान्वयन।
- NIHFW: प्रशिक्षण और अनुसंधान सहायता।
- RGI: SRS डेटा संग्रह और मातृ मृत्यु निगरानी।
- WHO: वैश्विक तकनीकी मानक।
- The Lancet: महामारी विज्ञान अनुसंधान और वैश्विक तुलना।
डेटा विश्लेषण: मातृ मृत्यु दर में रुझान और असमानताएँ
| सूचक | भारत (2020-22) | वैश्विक औसत (2023) | नाइजीरिया (2023) |
|---|---|---|---|
| मातृ मृत्यु अनुपात (प्रति 100,000 जीवित जन्म) | 103 (SRS) | 152 (WHO) | 512 (WHO) |
| मातृ मृत्यु (संख्या) | 24,700 (The Lancet) | 240,000 (The Lancet) | ~50,000 (WHO अनुमान) |
| संस्थागत प्रसव दर | 89% (NFHS-5) | वैश्विक भिन्नता | ~40% (WHO) |
| पूर्ण प्रसवपूर्व देखभाल (ग्रामीण) | 58% (NFHS-5) | वैश्विक भिन्नता | ~40% (WHO) |
| प्रसवोत्तर देखभाल कवरेज | <50% (NFHS-5) | वैश्विक भिन्नता | कम (WHO) |
भारत में संस्थागत प्रसव बढ़े हैं, लेकिन देखभाल की गुणवत्ता और प्रसवोत्तर फॉलोअप ग्रामीण और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों में अभी भी कमज़ोर है। मातृ मृत्यु के मुख्य कारण ज्यादातर रोकथाम योग्य हैं, जैसे रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, संक्रमण और पूर्व मौजूद बीमारियों से जटिलताएं।
तुलनात्मक अध्ययन: नाइजीरिया बनाम भारत
नाइजीरिया का MMR 512 है जो भारत के 103 से काफी अधिक है, फिर भी नाइजीरिया ने ग्रामीण इलाकों में सामुदायिक दाई कार्यक्रम और शर्तों पर नकद सहायता जैसे उपाय लागू किए हैं, जिनसे सुधार दिखा है। भारत में 2015 के बाद प्रगति धीमी होने का मतलब है कि ग्रामीण-शहरी और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करने के लिए सामुदायिक भागीदारी और वित्तीय प्रोत्साहन को मजबूत करने की जरूरत है।
- नाइजीरिया ग्रामीण इलाकों में सामुदायिक दाइयों का उपयोग करता है।
- नाइजीरिया में शर्तों पर नकद सहायता से मातृ देखभाल बढ़ी है।
- भारत में कार्यक्रम अधिकतर संस्थागत प्रसव संख्या पर केंद्रित हैं, देखभाल गुणवत्ता पर नहीं।
- भारत को प्रसवोत्तर देखभाल और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाओं को दूर करने की जरूरत है।
भारत की मातृ स्वास्थ्य रणनीति में प्रमुख कमियाँ
भारत के मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रम संस्थागत प्रसव बढ़ाने पर जोर देते हैं, लेकिन देखभाल की गुणवत्ता और प्रसवोत्तर सेवाओं की निरंतरता को अक्सर नजरअंदाज करते हैं, जो रोकथाम योग्य मौतों को घटाने में अहम हैं। लिंग पक्षपात, महिलाओं की कम साक्षरता जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएं देखभाल तक पहुँच में रुकावट बनती हैं। ग्रामीण और वंचित इलाकों में स्वास्थ्य अवसंरचना की कमी सेवा वितरण को प्रभावित करती है। ये कमियाँ अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं से मेल नहीं खातीं, जो सामुदायिक भागीदारी, वित्तीय प्रोत्साहन और मातृ स्वास्थ्य के सम्पूर्ण चक्र को शामिल करती हैं।
- संस्थागत प्रसव की संख्या पर अधिक जोर, गुणवत्ता पर कम ध्यान।
- प्रसवोत्तर देखभाल कवरेज 50% से कम, जिससे देर से जटिलताएं बढ़ती हैं।
- ग्रामीण और सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ बनी हुई हैं।
- सामुदायिक भागीदारी और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील हस्तक्षेपों की कमी।
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और रेफरल सिस्टम में अवसंरचनात्मक कमियाँ।
आगे का रास्ता: नीतिगत और कार्यक्रमगत सुझाव
- मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की मात्रा से गुणवत्ता की ओर ध्यान केंद्रित करें, जिसमें कुशल प्रसव सहायता और आपातकालीन प्रसूति देखभाल शामिल हो।
- घर-घर जाकर और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मदद से प्रसवोत्तर देखभाल कवरेज बढ़ाएं।
- वंचित समूहों में सेवा उपयोग बढ़ाने के लिए लक्षित वित्तीय प्रोत्साहन और शर्तों पर नकद सहायता लागू करें।
- मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे उच्च MMR वाले राज्यों में प्राथमिक और द्वितीयक स्तर की स्वास्थ्य अवसंरचना मजबूत करें।
- डिजिटल स्वास्थ्य उपकरणों के जरिए रियल-टाइम डेटा निगरानी और जवाबदेही प्रणाली विकसित करें।
- सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाओं को जागरूकता अभियानों और महिला शिक्षा के माध्यम से दूर करें।
- नाइजीरिया जैसे देशों से सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाएं, जैसे सामुदायिक दाई मॉडल और नकद सहायता योजनाओं को भारतीय संदर्भ में ढालना।
मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- MMR प्रति 1,000 जीवित जन्म पर मातृ मृत्यु की संख्या मापता है।
- MMR में गर्भावस्था से संबंधित कारणों से गर्भावस्था समाप्ति के बाद 42 दिनों तक की मौतें शामिल होती हैं।
- MMR प्रसवपूर्व और प्रसव देखभाल की गुणवत्ता का सीधा संकेतक है।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर: (b)
कथन 1 गलत है क्योंकि MMR प्रति 100,000 जीवित जन्म मापा जाता है, न कि प्रति 1,000। कथन 2 सही है क्योंकि MMR में प्रसव के बाद 42 दिनों तक की मौतें शामिल होती हैं। कथन 3 भी सही है क्योंकि MMR प्रसवपूर्व और प्रसव देखभाल की गुणवत्ता को दर्शाता है।
भारत में संस्थागत प्रसव के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- NFHS-5 के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत प्रसव दर लगभग 90% हो गई है।
- उच्च संस्थागत प्रसव दर से मातृ मृत्यु दर कम होना सुनिश्चित होता है।
- प्रसवोत्तर देखभाल कवरेज सामान्यतः प्रसवपूर्व देखभाल से अधिक होती है।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
उत्तर: (a)
कथन 1 सही है क्योंकि NFHS-5 के अनुसार संस्थागत प्रसव दर 89% है। कथन 2 गलत है क्योंकि उच्च संस्थागत प्रसव दर के बावजूद बिना गुणवत्ता वाली देखभाल के मातृ मृत्यु दर कम नहीं होती। कथन 3 भी गलत है क्योंकि प्रसवोत्तर देखभाल कवरेज 50% से कम है, जो प्रसवपूर्व देखभाल से कम है।
मेनस प्रश्न
2015 के बाद भारत में मातृ मृत्यु दर में गिरावट धीमी पड़ने के कारणों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें, जबकि संस्थागत प्रसवों की संख्या बढ़ी है। वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप प्रगति तेज करने के लिए नीतिगत उपाय सुझाएं।
झारखंड एवं JPSC से सम्बंधित
- JPSC पेपर: सामान्य अध्ययन पेपर 2 – स्वास्थ्य और सामाजिक मुद्दे।
- झारखंड का नजरिया: झारखंड में राष्ट्रीय औसत से अधिक MMR है (NFHS-5 के अनुसार लगभग 92 प्रति 100,000 जीवित जन्म), जहाँ ग्रामीण और आदिवासी आबादी को स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच में बड़ी चुनौतियाँ हैं।
- मेनस के लिए सुझाव: राज्य की विशेष चुनौतियाँ जैसे खराब स्वास्थ्य अवसंरचना, सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएं और आदिवासी क्षेत्रों में लक्षित NHM हस्तक्षेपों की जरूरत को उजागर करें।
भारत में मातृ मृत्यु के मुख्य कारण क्या हैं?
मुख्य कारणों में रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, संक्रमण और पूर्व मौजूद बीमारियों से जटिलताएं शामिल हैं। ये ज्यादातर समय पर और गुणवत्ता युक्त देखभाल से रोकी जा सकती हैं (The Lancet, 2024)।
Medical Termination of Pregnancy (Amendment) Act, 2021 मातृ स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है?
यह अधिनियम सुरक्षित गर्भपात की अवधि को कुछ श्रेणियों के लिए 24 सप्ताह तक बढ़ाता है, जिससे असुरक्षित गर्भपात और उससे होने वाली मातृ मृत्यु में कमी आती है।
भारत में 2015 के बाद मातृ मृत्यु दर में गिरावट धीमी क्यों हुई?
यह धीमापन स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता में कमी, अपर्याप्त प्रसवोत्तर देखभाल, सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और ग्रामीण क्षेत्रों में असमान स्वास्थ्य अवसंरचना के कारण है (The Lancet, 2024)।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) मातृ स्वास्थ्य में क्या भूमिका निभाता है?
NHM RMNCH+A कार्यक्रमों के माध्यम से प्रसवपूर्व, प्रसव और प्रसवोत्तर देखभाल में सुधार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और सुविधाओं को सशक्त बनाता है।
सामाजिक-आर्थिक कारक भारत में मातृ मृत्यु को कैसे प्रभावित करते हैं?
निम्न सामाजिक-आर्थिक वर्ग और ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं गुणवत्तापूर्ण मातृ स्वास्थ्य सेवा तक कम पहुँच पाती हैं, जिससे उनकी मृत्यु दर अधिक होती है (NFHS-5)।