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Governance · Exam Notes

हिमालयी भारत में भूकंप-रोधी भवन कोड अपडेट में लागत को लेकर अड़चन

1 min read GS Paper II

भारत के भूकंप-रोधी भवन कोड में देरी का सिंहावलोकन

भारत के भूकंपीय सुरक्षा ढांचे को 2023 में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ा जब भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने भवनों के लिए अपडेट किए गए भूकंपीय डिजाइन मानदंड वापस ले लिए। यह संशोधन एक दशक से अधिक वैज्ञानिक शोध, जिसमें भूकंप विज्ञानी और संरचनात्मक इंजीनियर शामिल थे, के आधार पर तैयार किए गए थे और हिमालयी क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ाने के लिए थे। लेकिन कैबिनेट सचिवालय द्वारा उठाई गई लागत संबंधी आपत्तियों के कारण इन्हें रोक दिया गया। इस वापसी से उस क्षेत्र में आपदा सहनशीलता कमजोर होने का खतरा है, जहां भूकंपीय खतरे के आंकड़ों में पिछले मानचित्रों की तुलना में पीक ग्राउंड एक्सीलरेशन में 15-20% की वृद्धि देखी गई है (भारतीय मौसम विभाग, 2022)।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: आपदा प्रबंधन – भूकंप-रोधी भवन कोड, कानूनी ढांचे और संस्थागत भूमिकाएं
  • GS पेपर 2: भारतीय संविधान – अनुच्छेद 253 और आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005
  • निबंध: बुनियादी ढांचे के विकास में आर्थिक लागत और आपदा तैयारी का संतुलन

भूकंप सहनशीलता के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों को लागू करने के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, जिनमें आपदा प्रबंधन से संबंधित संधियां भी शामिल हैं। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 6 और 10 के तहत तैयारी और जोखिम न्यूनीकरण की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों पर है, जिन्हें सुरक्षा मानकों को अपनाना अनिवार्य है। भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 IS 1893 जैसे मानकों के निर्माण और प्रवर्तन को नियंत्रित करता है, जो भूकंपीय डिजाइन मानदंड निर्धारित करता है। सुप्रीम कोर्ट के M.C. Mehta v. Union of India (1987) जैसे फैसलों ने पर्यावरण और संरचनात्मक सुरक्षा मानकों की अहमियत को रेखांकित किया है, जिससे भवन कोड के प्रवर्तन के लिए न्यायिक मिसाल कायम हुई है।

IS 1893 और भारत में भूकंपीय क्षेत्रीकरण

IS 1893 भाग 1 (2016) के अनुसार भारत को चार भूकंपीय जोनों में बांटा गया है: II (कम जोखिम), III, IV, और V (सबसे अधिक जोखिम वाला)। हिमालयी क्षेत्र मुख्यतः जोन V में आता है, जो उच्चतम भूकंपीय खतरे को दर्शाता है (BIS, 2016)। 2023 में प्रस्तावित ड्राफ्ट में न्यूनतम पार्श्व भार सहनशीलता को 25% बढ़ाने का सुझाव था, जो भारतीय मौसम विभाग द्वारा जारी 15-20% पीक ग्राउंड एक्सीलरेशन वृद्धि के आंकड़ों पर आधारित था। भारत की 60% से अधिक आबादी जोन III से V में रहती है, जो भूकंपीय जोखिम की व्यापकता को दर्शाता है (जनगणना 2011)।

कठोर भूकंपीय कोड के आर्थिक प्रभाव

सुधारित भूकंपीय मानकों को लागू करने से निर्माण लागत में 5-10% की वृद्धि होने का अनुमान है, जो वार्षिक ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक के बुनियादी ढांचे के बजट को प्रभावित करता है (आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय, 2023)। भूकंपीय जोन में मेट्रो रेल परियोजनाओं में पहले ही लागत वृद्धि और देरी देखी गई है, जो बढ़ती अनुपालन आवश्यकताओं के कारण हैं। वहीं, कोड न अपडेट करने पर भूकंपीय आपदाओं से औसतन ₹7,000 करोड़ वार्षिक आर्थिक नुकसान होने का खतरा है (विश्व बैंक रिपोर्ट, 2022)। 2015 के नेपाल भूकंप ने भारतीय सीमा क्षेत्रों को ₹5,000 करोड़ से अधिक का आर्थिक नुकसान पहुंचाया, जो अपर्याप्त तैयारी की भारी कीमत दर्शाता है (NDMA, 2016)।

संस्थागत भूमिकाएं और समन्वय की चुनौतियां

  • भारतीय मानक ब्यूरो (BIS): IS 1893 भूकंपीय डिजाइन कोड विकसित और अपडेट करता है।
  • कैबिनेट सचिवालय: मंत्रालयों के बीच समन्वय करता है; लागत संबंधी आपत्तियों के कारण अपडेटेड मानदंड वापस लिए गए।
  • भारतीय मौसम विभाग (IMD): भूकंपीय खतरे के आंकड़े और निगरानी प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA): राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण नीतियां बनाता है।
  • आवास और शहरी मामलों का मंत्रालय (MoHUA): शहरी बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं और भवन कोड के कार्यान्वयन की देखरेख करता है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत बनाम जापान के भूकंपीय भवन नियम

पहलूभारतजापान
भूकंपीय कोड अपडेटदेरी; 2023 का अपडेट लागत कारणों से वापस लिया गया1995 कोबे भूकंप के बाद नियमित संशोधन
प्रवर्तनराज्यों में भिन्न; कमजोर अनुपालनसख्त, पूरे देश में लागू और दंडात्मक
भूकंपीय क्षेत्रीकरणजोन II से V; हिमालयी क्षेत्र जोन Vविस्तृत क्षेत्रीकरण और माइक्रोजोनिंग
भवन सुरक्षा पर प्रभावमुख्य भूकंपों में उच्च भवन गिरावट दरमुख्य भूकंपों में 90% गिरावट में कमी (कैबिनेट ऑफिस, जापान, 2020)
लागत संबंधी विचारलागत के कारण कोड अपडेट में देरीउच्च लागत के बावजूद सुरक्षा को प्राथमिकता

महत्वपूर्ण नीति अंतर: विज्ञान और नीति का फासला

मुख्य समस्या यह है कि अद्यतन भूकंपीय खतरे के आंकड़ों को लागू भवन नियमों में शामिल नहीं किया गया। अल्पकालिक लागत को लेकर निर्णय लेने की प्रवृत्ति दीर्घकालिक आपदा जोखिम कम करने को नजरअंदाज कर रही है। यह फासला हिमालयी भूकंपीय हॉटस्पॉट्स में भारी मानवीय और आर्थिक नुकसान का खतरा पैदा करता है, जहां टेक्टोनिक तनाव बढ़ रहा है लेकिन संरचनात्मक सुरक्षा उपाय अपर्याप्त हैं।

महत्व और आगे का रास्ता

  • वर्तमान खतरे के आंकड़ों के अनुसार भूकंपीय कोड को तुरंत अपनाएं।
  • राज्यों में प्रवर्तन तंत्र मजबूत करें और स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित करें।
  • डिजाइन मानकों में स्थानीय मिट्टी और भूवैज्ञानिक स्थितियों को शामिल करें।
  • प्रारंभिक लागत वृद्धि को पूरा करने के लिए आपदा सहनशीलता के लिए विशेष फंड आवंटित करें।
  • BIS, NDMA, IMD और MoHUA के बीच समन्वय बढ़ाएं।
  • सहज संरचना वित्तपोषण के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा दें।

IS 1893 भूकंपीय क्षेत्रीकरण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. जोन V भारत के सबसे अधिक भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है, जो मुख्यतः हिमालयी क्षेत्र को कवर करता है।
  2. IS 1893 के भूकंपीय जोन भूकंप की तीव्रता माप पर आधारित हैं।
  3. 2023 के ड्राफ्ट अपडेट में न्यूनतम पार्श्व भार सहनशीलता को 25% बढ़ाने का प्रस्ताव था।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

कथन 1 सही है क्योंकि जोन V में सबसे अधिक जोखिम वाले हिमालयी क्षेत्र आते हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि भूकंपीय जोन पीक ग्राउंड एक्सीलरेशन पर आधारित हैं, तीव्रता माप पर नहीं। कथन 3 सही है क्योंकि 2023 का ड्राफ्ट न्यूनतम पार्श्व भार सहनशीलता में 25% वृद्धि का प्रस्ताव था।

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. यह धारा 6 और 10 के तहत आपदा तैयारी और जोखिम न्यूनीकरण के उपाय अनिवार्य करता है।
  2. यह राज्यों को केंद्र के मानकों से स्वतंत्र रूप से भवन कोड बनाने का अधिकार देता है।
  3. यह अनुच्छेद 253 के तहत अंतरराष्ट्रीय आपदा संधियों को लागू करने के लिए बनाया गया था।

इनमें से कौन-सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 1 और 3
  • (c) केवल 2 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 सही है क्योंकि धारा 6 और 10 तैयारी और जोखिम न्यूनीकरण को अनिवार्य करते हैं। कथन 3 भी सही है क्योंकि अधिनियम अनुच्छेद 253 के तहत अंतरराष्ट्रीय संधियों के कार्यान्वयन के लिए है। कथन 2 गलत है क्योंकि भवन कोड केंद्रीय रूप से BIS द्वारा बनाए जाते हैं, हालांकि राज्य सख्त मानक अपना सकते हैं।

मेन प्रश्न

हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते भूकंपीय खतरों के बावजूद भारत के भूकंप-रोधी भवन कोड अपडेट में देरी के कारणों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें। इसमें आर्थिक और संस्थागत चुनौतियों पर चर्चा करें और प्रभावी कोड कार्यान्वयन के जरिए आपदा सहनशीलता बढ़ाने के उपाय सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 – आपदा प्रबंधन और पर्यावरण सुरक्षा
  • झारखंड दृष्टिकोण: झारखंड के कुछ हिस्से भूकंपीय जोन III में आते हैं; शहरी बुनियादी ढांचे के विकास में भूकंपीय कोड का पालन जरूरी है।
  • मेन पॉइंट: भूकंपीय जोनों में कोड अपडेट की आवश्यकता, संस्थागत समन्वय और आर्थिक चुनौतियों के बीच संतुलन पर उत्तर तैयार करें।
IS 1893 का भूकंप-रोधी निर्माण में क्या महत्व है?

IS 1893 भारत में भवनों और बुनियादी ढांचे के लिए अनिवार्य भूकंपीय डिजाइन मानदंड प्रदान करता है। यह भूकंपीय जोन निर्धारित करता है और पार्श्व भार सहनशीलता के मानक तय करता है ताकि संरचनाएं अपेक्षित भूकंपीय झटकों का सामना कर सकें।

2023 में अपडेटेड भूकंपीय कोड क्यों वापस लिए गए?

कैबिनेट सचिवालय द्वारा उठाई गई लागत संबंधी चिंताओं के कारण, यह माना गया कि कड़े मानक निर्माण लागत बढ़ाएंगे और मेट्रो रेल जैसी चल रही परियोजनाओं में बाधा डालेंगे, इसलिए अपडेटेड कोड वापस लिए गए।

अनुच्छेद 253 का आपदा प्रबंधन कानूनों से क्या संबंध है?

अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों को लागू करने वाले कानून बनाने का अधिकार देता है, जिससे केंद्र सरकार आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 जैसे कानून बना सकती है।

भारत को भूकंपीय आपदाओं से वार्षिक आर्थिक नुकसान कितना होता है?

भारत को भूकंपीय आपदाओं से औसतन ₹7,000 करोड़ का आर्थिक नुकसान होता है, जिसमें 2015 के नेपाल भूकंप ने भारतीय सीमा क्षेत्रों को ₹5,000 करोड़ से अधिक का नुकसान पहुंचाया।

जापान का भूकंपीय भवन कोड भारत से कैसे अलग है?

जापान में कड़े, नियमित रूप से अपडेट किए जाने वाले भूकंपीय कोड लागू हैं और उनका सख्ती से पालन होता है, जिससे बड़े भूकंपों में भवन गिरने की घटनाओं में 90% कमी आई है। भारत में लागत संबंधी चिंताओं के कारण कोड अपडेट में देरी होती है और प्रवर्तन कमजोर है।

Sources and further reading

Tags:Governance