साल 2024 में ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS), नई दिल्ली ने एक अध्ययन प्रकाशित किया, जिसमें एक वर्ष की उम्र से पहले अधिक स्क्रीन समय के संपर्क और तीन साल की उम्र तक ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के लक्षणों के बीच मजबूत संबंध पाया गया। इस अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन बच्चों को उनके पहले जन्मदिन से पहले रोजाना दो घंटे से अधिक स्क्रीन समय मिला, उनमें तीन साल की उम्र तक ASD के संकेत दिखने की संभावना 3.5 गुना अधिक थी। यह शोध भारत में डिजिटल उपकरणों की बढ़ती पहुंच और शिशुओं के लिए स्क्रीन समय के कोई प्रभावी दिशानिर्देश न होने की स्थिति में खास महत्व रखता है।
UPSC प्रासंगिकता
- GS पेपर 2: स्वास्थ्य नीतियां, बाल कल्याण योजनाएं, स्वास्थ्य और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े संवैधानिक अधिकार।
- GS पेपर 3: स्वास्थ्य विकारों का आर्थिक प्रभाव, स्वास्थ्य व्यय, और डिजिटल अर्थव्यवस्था।
- निबंध: भारत में डिजिटल तकनीक और बाल विकास के बीच संतुलन।
AIIMS अध्ययन के निष्कर्ष और स्क्रीन समय व ऑटिज़्म पर आंकड़े
AIIMS के 2024 के अध्ययन ने एक वर्ष की उम्र से पहले स्क्रीन समय और शुरुआती ASD संकेतों के बीच मात्रात्मक संबंध स्थापित किया। इस शोध में तीन साल की उम्र तक बच्चों के स्क्रीन समय और न्यूरोविकास संबंधी परिणामों का लॉन्गिट्यूडिनल डेटा इस्तेमाल किया गया। मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:
- एक वर्ष से पहले रोजाना दो घंटे से अधिक स्क्रीन समय वाले बच्चों में तीन साल की उम्र तक ASD लक्षण दिखने का खतरा 3.5 गुना अधिक।
- 2018 में भारतीय शिशुओं का औसत स्क्रीन समय 30 मिनट प्रतिदिन था, जो 2023 तक बढ़कर 90 मिनट प्रतिदिन हो गया (NSSO 2023)।
- केवल 15% भारतीय माता-पिता को शुरुआती स्क्रीन एक्सपोजर के जोखिमों की जानकारी है (AIIMS सर्वे 2024)।
- भारत में तीन से छह वर्ष के बच्चों में ASD की प्रचलन दर 0.23% से 0.31% के बीच अनुमानित है (ICMR 2023)।
बाल स्वास्थ्य और डिजिटल सुरक्षा के लिए संवैधानिक एवं कानूनी ढांचा
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 स्वास्थ्य के अधिकार की गारंटी देता है, जो प्रारंभिक बचपन के न्यूरोविकास तक विस्तारित है। मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 की धारा 18 और 21 के तहत मानसिक विकारों, जिनमें ASD भी शामिल है, का समय पर पता लगाने और उपचार करने का प्रावधान है। जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2015 (धारा 2(14) और 101) बाल कल्याण और सुरक्षा पर जोर देता है, जो हानिकारक डिजिटल एक्सपोजर से बच्चों की रक्षा के लिए प्रासंगिक है।
नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन (NDHM) के दिशानिर्देश डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड को बढ़ावा देते हैं, जो बाल न्यूरोविकास मॉनिटरिंग में सहायक हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के.एस. पुत्तस्वामी (रिटायर्ड) बनाम भारत संघ (2017) के ऐतिहासिक फैसले ने निजता को मौलिक अधिकार माना, जो बच्चों की डिजिटल सुरक्षा और डेटा संरक्षण से जुड़ा है।
प्रारंभिक स्क्रीन एक्सपोजर और ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के आर्थिक पहलू
भारत अपनी GDP का केवल 0.06% मानसिक स्वास्थ्य विकारों पर खर्च करता है (राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017), जो बढ़ती न्यूरोविकास संबंधी चुनौतियों के लिए अपर्याप्त है। AIIMS अध्ययन के अनुसार, ऑटिज़्म देखभाल की लागत प्रति बच्चे सालाना ₹1.5 लाख से ₹3 लाख तक हो सकती है। बिना इलाज के ASD से होने वाली उत्पादकता हानि का अनुमान वार्षिक ₹10,000 करोड़ है। डिजिटल उपकरणों के बाजार की तेज़ बढ़ोतरी—2020 से 2023 तक 18% CAGR के साथ $30 बिलियन तक (India Brand Equity Foundation 2023)—स्क्रीन एक्सपोजर के जोखिमों को बढ़ा रही है।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत बाल स्वास्थ्य के लिए 2023-24 में ₹34,000 करोड़ आवंटित किए गए।
- स्क्रीन समय में वृद्धि से विशेष शिक्षा और पुनर्वास सेवाओं की मांग बढ़ सकती है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग ₹500 करोड़ वार्षिक है।
प्रारंभिक बचपन में स्क्रीन एक्सपोजर और ऑटिज़्म से निपटने में प्रमुख संस्थानों की भूमिका
- AIIMS: बाल न्यूरोविकास और ऑटिज़्म पर क्लिनिकल शोध करता है।
- NIMHANS: ASD के निदान और उपचार प्रोटोकॉल में विशेषज्ञता प्रदान करता है।
- MoHFW: बाल स्वास्थ्य और डिजिटल स्वास्थ्य नीतियां बनाता है।
- ICMR: ऑटिज़्म प्रचलन और जोखिम कारकों पर महामारी विज्ञान अनुसंधान का समर्थन करता है।
- UNICEF India: बाल अधिकारों की वकालत और डिजिटल सुरक्षा जागरूकता अभियान का नेतृत्व करता है।
- WHO SEARO: बाल विकास और स्क्रीन समय पर अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी करता है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना: दक्षिण कोरिया का समग्र दृष्टिकोण
दक्षिण कोरिया ने दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन समय सीमित करने के सख्त नियम लागू किए और साथ ही पूरे देश में माता-पिता के लिए शिक्षा कार्यक्रम चलाए। इस रणनीति से पांच वर्षों में शुरुआती ASD जोखिम संकेतों में 25% की कमी आई (कोरियाई स्वास्थ्य मंत्रालय 2022), जो नीति और जागरूकता के समन्वय की सफलता दर्शाता है।
| पहलू | भारत | दक्षिण कोरिया |
|---|---|---|
| 2 वर्ष से कम उम्र के लिए स्क्रीन समय दिशानिर्देश | प्रभावी सीमाएं नहीं; WHO शून्य स्क्रीन समय की सलाह देता है पर राष्ट्रीय स्तर पर लागू नहीं | सख्त सरकारी नियम जो 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के स्क्रीन समय को सीमित करते हैं |
| माता-पिता की जागरूकता | केवल 15% माता-पिता जोखिमों से परिचित (AIIMS 2024) | पूरे देश में व्यापक माता-पिता शिक्षा कार्यक्रम |
| ASD जोखिम में कमी | 2 घंटे से अधिक स्क्रीन समय पर 3.5 गुना अधिक जोखिम | 5 वर्षों में शुरुआती ASD जोखिम संकेतों में 25% कमी |
| नीति समन्वय | बाल स्वास्थ्य जांच में स्क्रीन समय मॉनिटरिंग का अभाव | डिजिटल मॉनिटरिंग और स्वास्थ्य जांच का समेकित मॉडल |
भारत में नीति की खामियां और चुनौतियां
भारत में अभी शिशुओं के लिए स्क्रीन समय सीमित करने वाले स्पष्ट और लागू करने योग्य दिशानिर्देश नहीं हैं। बाल स्वास्थ्य जांच के दौरान डिजिटल एक्सपोजर की नियमित मॉनिटरिंग नहीं होती, जिससे शुरुआती हस्तक्षेप के मौके खो जाते हैं। विकासात्मक विकारों, जिनमें ऑटिज़्म भी शामिल है, का उपचार अंतर 83% है (राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे 2016), जो प्रणालीगत कमियों को दर्शाता है।
आगे का रास्ता: नीति और कार्यक्रमगत हस्तक्षेप
- WHO की सिफारिशों के अनुरूप दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए स्पष्ट और लागू स्क्रीन समय दिशानिर्देश बनाएं।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत नियमित बाल स्वास्थ्य जांच में डिजिटल एक्सपोजर की मॉनिटरिंग को शामिल करें।
- UNICEF और MoHFW जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग कर माता-पिता की जागरूकता अभियानों का विस्तार करें।
- प्रारंभिक बचपन के न्यूरोविकास संबंधी विकारों के पता लगाने और देखभाल के लिए बजट आवंटन बढ़ाएं।
- NDHM का उपयोग कर डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड बनाएं जो न्यूरोविकास और स्क्रीन एक्सपोजर को ट्रैक करें।
- WHO SEARO और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ मिलकर दक्षिण कोरिया जैसे देशों की सफल नीतियां अपनाएं।
शिशुओं में स्क्रीन समय और ऑटिज़्म जोखिम के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- WHO दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए कोई स्क्रीन समय न रखने की सलाह देता है।
- AIIMS अध्ययन में पाया गया कि एक वर्ष से पहले रोजाना दो घंटे से अधिक स्क्रीन समय वाले बच्चों में तीन वर्ष की उम्र तक ASD के लक्षण दिखने का खतरा 3.5 गुना अधिक होता है।
- भारत में शिशुओं के लिए स्क्रीन समय सीमित करने वाले लागू करने योग्य राष्ट्रीय कानून हैं।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
उत्तर: (a)
कथन 1 WHO के 2019 के दिशानिर्देशों के अनुसार सही है। कथन 2 AIIMS 2024 अध्ययन के आधार पर सही है। कथन 3 गलत है क्योंकि भारत में अभी शिशुओं के लिए स्क्रीन समय सीमित करने वाले लागू कानून नहीं हैं।
मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:
- यह ऑटिज़्म सहित मानसिक विकारों के समय पर पता लगाने और उपचार का प्रावधान करता है।
- यह विकासात्मक विकारों को रोकने के लिए बच्चों के स्क्रीन समय को स्पष्ट रूप से नियंत्रित करता है।
- यह अनुच्छेद 21 के तहत मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच के अधिकार को मान्यता देता है।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
उत्तर: (b)
कथन 1 सही है; धारा 18 और 21 मानसिक विकारों के समय पर पता लगाने और उपचार का प्रावधान करती हैं। कथन 3 भी सही है क्योंकि यह एक्ट अनुच्छेद 21 के तहत मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के अधिकार का समर्थन करता है। कथन 2 गलत है; एक्ट स्क्रीन समय को नियंत्रित नहीं करता।
मेन्स प्रश्न
भारत में एक वर्ष से पहले अत्यधिक स्क्रीन समय के संपर्क के बाल न्यूरोविकास पर प्रभावों की आलोचनात्मक समीक्षा करें। मौजूदा नीति ढांचे पर चर्चा करें और शुरुआती डिजिटल एक्सपोजर से जुड़े जोखिमों को कम करने के उपाय सुझाएं।
झारखंड और JPSC प्रासंगिकता
- JPSC पेपर: पेपर 2 – स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण; बाल विकास नीतियां।
- झारखंड का दृष्टिकोण: ग्रामीण झारखंड में डिजिटल पहुंच बढ़ने से शिशुओं में अनियंत्रित स्क्रीन समय की चिंता बढ़ी है, साथ ही माता-पिता की जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं।
- मेन्स पॉइंटर: राज्य विशेष डिजिटल साक्षरता और स्वास्थ्य सेवा पहुंच की चुनौतियों को उजागर करें, और झारखंड के बाल स्वास्थ्य कार्यक्रमों में स्क्रीन समय दिशानिर्देशों के समावेशन का प्रस्ताव दें।
WHO के अनुसार दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन समय की सिफारिश क्या है?
WHO के 2019 के दिशानिर्देशों के अनुसार, दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए कोई भी स्क्रीन समय नहीं होना चाहिए ताकि न्यूरोविकास बेहतर हो सके।
भारत में बाल स्वास्थ्य की सुरक्षा कौन सा संवैधानिक अधिकार देता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसे स्वास्थ्य और प्रारंभिक बचपन के विकास के अधिकार के रूप में भी समझा जाता है।
भारत में विकासात्मक विकारों सहित ऑटिज़्म का उपचार अंतर कितना है?
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे 2016 के अनुसार, विकासात्मक विकारों सहित ऑटिज़्म का उपचार अंतर 83% है, जो निदान और देखभाल की अपर्याप्त पहुंच को दर्शाता है।
कौन सा एक्ट ऑटिज़्म सहित मानसिक विकारों के समय पर पता लगाने और उपचार का प्रावधान करता है?
मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 की धारा 18 और 21 के तहत ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर सहित मानसिक विकारों के समय पर पता लगाने और उपचार का प्रावधान है।
अत्यधिक स्क्रीन समय भारत की अर्थव्यवस्था पर कैसे प्रभाव डालता है?
अत्यधिक स्क्रीन समय से विकास में देरी होती है, जिससे विशेष शिक्षा और पुनर्वास सेवाओं की मांग बढ़ती है (लगभग ₹500 करोड़ वार्षिक) और उत्पादकता हानि का अनुमान ₹10,000 करोड़ वार्षिक है।