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झारखंड में भूमि क्षरण, जल-क्षरण, खनन प्रभाव, मृदा संरक्षण, WDC-PMKSY 2.0 और JPSC उत्तर-लेखन के लिए आधिकारिक आँकड़ों सहित संपूर्ण नोट्स।
झारखंड में भूमि क्षरण और मृदा संरक्षण को पठारी ढाल, मानसूनी अपवाह, लाल-लेटराइट मिट्टी, वन-क्षरण, खनन और भूमि-उपयोग परिवर्तन के संयुक्त परिणाम के रूप में समझना चाहिए। समाधान भी खेत, जलग्रहण, वन और खदान—इन सभी स्तरों को जोड़कर ही प्रभावी होगा।
भूमि क्षरण का अर्थ केवल मिट्टी का कट जाना नहीं है। जब भूमि की जैविक या आर्थिक उत्पादकता घटती है, मिट्टी की ऊपरी उर्वर परत नष्ट होती है, वनस्पति विरल होती है, गली-नाले बनते हैं, जलभराव बढ़ता है अथवा खनन से भूमि-आकृति बदल जाती है, तब यह भूमि क्षरण है। मरुस्थलीकरण शब्द शुष्क, अर्द्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों में होने वाले भूमि क्षरण के लिए प्रयुक्त होता है; इसका अर्थ केवल रेत के मरुस्थल का फैलना नहीं है।
झारखंड में भूमि क्षरण की स्थिति
Space Applications Centre (ISRO) के Desertification and Land Degradation Atlas of India के 2018–19 आकलन के अनुसार झारखंड उन राज्यों में था जहाँ राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 50 प्रतिशत से अधिक भाग में मरुस्थलीकरण/भूमि क्षरण की प्रक्रिया दर्ज की गई। एटलस में झारखंड का अनुपात लगभग 68.77 प्रतिशत बताया गया है। यह उपग्रह-आधारित राज्य-स्तरीय वर्गीकरण है; इसे हर खेत की गुणवत्ता का प्रत्यक्ष माप नहीं समझना चाहिए।
Jharkhand Space Applications Center (JSAC) की राज्य-स्तरीय मैपिंग में क्षरित भूमि के कई रूप पहचाने गए हैं, जैसे शीट इरोजन, गलियाँ, रैवीन, सतही जलभराव, वनस्पति ह्रास तथा खनन-प्रभावित भूमि। जिला-स्तरीय मृदा रिपोर्टें बताती हैं कि क्षरण की तीव्रता ढाल, मूल शैल, वनस्पति, खेती और जलनिकास के अनुसार बहुत बदलती है। इसलिए राज्य के औसत आँकड़े के साथ स्थानीय भू-दृश्य को जोड़ना जरूरी है।
भूमि क्षरण के प्रमुख प्रकार
| प्रक्रिया | झारखंड में स्वरूप | मुख्य प्रभाव |
|---|---|---|
| शीट इरोजन | बारिश का बहाव ऊपरी मिट्टी की पतली परत को व्यापक क्षेत्र से हटाता है; शुरुआत में कम दिखाई देता है। | कार्बनिक पदार्थ, सूक्ष्म कण और पोषक तत्व घटते हैं। |
| रिल और गली कटाव | ढाल पर केंद्रित बहाव छोटी नालियाँ और बाद में गहरी गलियाँ बनाता है। | खेत विभाजित होते हैं, खेती योग्य क्षेत्र और जलधारण क्षमता घटती है। |
| वनस्पति ह्रास | अत्यधिक चराई, आग, कटाई और पुनर्जनन की कमी से भूमि खुली पड़ती है। | अपवाह और कटाव बढ़ते हैं; जैव विविधता व वन-आधारित आजीविका घटती है। |
| खनन-जनित क्षरण | टॉपसॉइल हटना, ओवरबर्डन डंप, धंसान, ढाल अस्थिरता, धूल और अम्लीय/प्रदूषित जलनिकास। | मृदा प्रोफाइल नष्ट, जलधारा में गाद, खेती और आवास पर दबाव। |
| जलभराव व सतही पॉन्डिंग | अवरुद्ध जलनिकास, निम्नभूमि या खनन से बदली सतह पर पानी ठहरना। | मिट्टी में वायु-संचार घटता है; फसल और भूमि-उपयोग सीमित होते हैं। |
| नदी-तट कटाव | सक्रिय नदी चैनल और बाढ़ के दौरान तट का कटना या रेत जमना। | कृषि भूमि का नुकसान और अवसाद जमाव। |
झारखंड में क्षरण अधिक क्यों है?
पठारी ढाल और संकेंद्रित वर्षा
राज्य की अधिकांश वर्षा मानसून के कुछ महीनों में होती है। उथली लाल और लेटराइट मिट्टी वाले खुले ढालों पर बूंदों की मार मिट्टी के कणों को अलग करती है और तेज सतही बहाव उन्हें नीचे ले जाता है। अधिक वर्षा होने के बावजूद जल का बड़ा हिस्सा भूमि में समाने के बजाय बह सकता है; परिणामस्वरूप मानसून के बाद नमी-संकट भी पैदा होता है।
वन और चरागाह पर दबाव
पेड़ों की छत्रछाया, पत्ती-कचरा और जड़ें मिट्टी को बचाती हैं। वनस्पति हटने, बार-बार आग लगने या अत्यधिक चराई से भूमि खुलती है, सतह कठोर होती है और प्राकृतिक पुनर्जनन घटता है। केवल पौधरोपण पर्याप्त नहीं; स्थानीय प्रजातियों की जीवितता और वन-समुदाय की भागीदारी जरूरी है।
खनन और अवसंरचना
कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट तथा अन्य खनिज झारखंड की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं, पर खुली खदानें और ओवरबर्डन डंप भूमि को तेजी से बदलते हैं। यदि टॉपसॉइल अलग सुरक्षित न किया जाए, ढाल स्थिर न हो और चरणबद्ध पुनर्वास न हो, तो बंद खदान के बाद भी भूमि अनुपयोगी रह सकती है। सड़क, शहरी विस्तार और निर्माण भी अपारगम्य सतह व कटे ढालों को बढ़ाते हैं।
अनुपयुक्त कृषि पद्धति
ढाल की दिशा में जुताई, खेत का लंबे समय तक खाली रहना, फसल-अवशेष हटाना और असंतुलित पोषण मिट्टी को कमजोर करते हैं। अम्लीय मिट्टी में बिना परीक्षण के उर्वरक या चूना प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं देता। भूमि की क्षमता के विपरीत खेती क्षरण को तेज करती है।
कानूनी और नीतिगत ढाँचा
- संविधान: अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण, वन और वन्यजीव की रक्षा व सुधार का निर्देश देता है; अनुच्छेद 51A(g) नागरिक का मूल कर्तव्य निर्धारित करता है।
- Environment (Protection) Act, 1986: पर्यावरणीय मानक, निर्देश और EIA Notification, 2006 जैसे नियामक उपायों का आधार। खनन परियोजनाओं की पर्यावरणीय स्वीकृति में भूमि, जल, डंप और पुनर्वास की शर्तें महत्वपूर्ण हैं।
- Van (Sanrakshan Evam Samvardhan) Adhiniyam, 1980: पहले Forest (Conservation) Act के नाम से जाना जाता था; वन भूमि के गैर-वन उपयोग पर केंद्रीय स्वीकृति व्यवस्था से जुड़ा है।
- Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 तथा Mineral Conservation and Development Rules, 2017: वैज्ञानिक खनन, खदान योजना, संरक्षण और प्रगतिशील/अंतिम mine closure से संबंधित ढाँचा देते हैं।
- Compensatory Afforestation Fund Act, 2016: प्रतिपूरक वनीकरण और संबंधित गतिविधियों के लिए CAMPA निधि का ढाँचा देता है।
- Forest Rights Act, 2006 और PESA, 1996: अनुसूचित क्षेत्रों में अधिकार, ग्रामसभा और समुदाय-आधारित संसाधन शासन को संरक्षण योजना से जोड़ते हैं।
मुख्य योजनाएँ और संस्थाएँ
WDC-PMKSY 2.0: भूमि संसाधन विभाग की Watershed Development Component योजना वर्षा-आधारित और क्षरित क्षेत्रों में जलग्रहण को संतृप्ति दृष्टिकोण से उपचारित करने, उत्पादकता और आजीविका सुधारने तथा जल-संग्रह संरचनाएँ बनाने पर केंद्रित है। इसके MIS में झारखंड की परियोजनाओं और जिलों की प्रगति दर्ज होती है।
MGNREGA: कंटूर ट्रेंच, खेत-तालाब, चेक डैम, भूमि विकास, जल-संरक्षण और वृक्षारोपण जैसे अनुमत प्राकृतिक-संसाधन कार्य ग्राम स्तर पर मृदा-जल संरक्षण को रोजगार से जोड़ सकते हैं। सफलता संरचना की सही साइटिंग, गुणवत्ता और रखरखाव पर निर्भर है।
राज्य संस्थाएँ: कृषि विभाग, मृदा एवं जल संरक्षण तंत्र, ग्रामीण विकास विभाग, वन विभाग, खान एवं भूविज्ञान विभाग, Jharkhand State Pollution Control Board, JSAC, पंचायतें और ग्रामसभाएँ अलग-अलग भूमिका निभाते हैं। जिला खनिज फाउंडेशन निधि का स्थानीय पर्यावरण और आजीविका सुधार में पारदर्शी उपयोग भी महत्वपूर्ण है।
भू-दृश्य के अनुसार संरक्षण उपाय
- ऊपरी ढाल: प्राकृतिक वनस्पति, नियंत्रित चराई, कंटूर ट्रेंच, स्टैगर्ड ट्रेंच और स्थानीय प्रजातियों से पुनर्वनीकरण।
- कृषि upland: कंटूर जुताई, घास पट्टी, मेड़बंदी, कवर फसल, दलहन चक्र और अवशेष वापसी।
- मध्य व निचली ढाल: graded bund, जलनिकास और छोटे harvesting structure; पानी को अचानक रोकने के बजाय सुरक्षित मार्ग देना।
- गली क्षेत्र: loose-boulder check, vegetative plug, gabion और head-cut stabilization—गली के आकार व प्रवाह के अनुसार।
- खदान क्षेत्र: टॉपसॉइल का पृथक भंडारण, सुरक्षित डंप ढाल, जलनिकास, backfilling, जैविक सुधार और चरणबद्ध closure monitoring।
- अम्लीय मिट्टी: soil test आधारित चूना, जैविक पदार्थ, संतुलित पोषण और उपयुक्त फसल; blanket dose से बचना।
नीति की प्रमुख चुनौतियाँ
विभागीय विखंडन: जलग्रहण, वन, खनन, कृषि और ग्रामीण विकास के अलग डेटाबेस व बजट एक ही भू-दृश्य पर काम करते हैं। साझा GIS योजना और ग्राम-स्तरीय परिसंपत्ति रजिस्टर आवश्यक हैं।
संरचना बनाम परिणाम: केवल तालाब या मेड़ की संख्या सफलता नहीं बताती। मृदा हानि, भूजल, वनस्पति, फसल-तीव्रता, आजीविका और संरचना की कार्यशीलता जैसे outcome मापने चाहिए।
रखरखाव: गाद से भरी संरचना, टूटी मेड़ या अस्थिर खदान डंप कुछ वर्षों में लाभ खो देता है। उपयोगकर्ता समूह, पंचायत और संबंधित विभाग की स्पष्ट जिम्मेदारी होनी चाहिए।
समुदाय और अधिकार: अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की सार्थक भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान और आजीविका को योजना का हिस्सा बनाना आवश्यक है; संरक्षण को अधिकार-विरोधी प्रतिबंध के रूप में नहीं थोपा जाना चाहिए।
JPSC उत्तर-लेखन ढाँचा
उत्तर की शुरुआत ISRO Atlas 2018–19 के लगभग 68.77 प्रतिशत आँकड़े और उसकी पद्धतिगत सावधानी से करें। फिर कारणों को प्राकृतिक—ढाल, मानसून, मिट्टी—और मानवीय—वनस्पति ह्रास, खनन, अनुचित खेती—में बाँटें। प्रभावों में कृषि उत्पादकता, जल-सुरक्षा, नदी में गाद, जैव विविधता और आदिवासी आजीविका लिखें। समाधान में ridge-to-valley watershed, mine closure, ग्रामसभा, GIS monitoring और convergence को जोड़ें।
त्वरित पुनरावृत्ति
- झारखंड में जल-क्षरण और वनस्पति ह्रास प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं।
- शीट इरोजन धीरे दिखाई देता है, पर सबसे उर्वर ऊपरी परत हटाता है।
- भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण समानार्थी नहीं; मरुस्थलीकरण drylands में भूमि क्षरण है।
- WDC-PMKSY 2.0 जलग्रहण विकास की प्रमुख केंद्रीय प्रायोजित योजना है।
- खनन पुनर्वास में topsoil management, dump stabilization और progressive mine closure जरूरी हैं।
- सफल नीति watershed boundary पर बनती है, केवल प्रशासनिक सीमा पर नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
झारखंड में कितनी भूमि क्षरणग्रस्त है?
SAC-ISRO के 2018–19 एटलस में राज्य के लगभग 68.77 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में मरुस्थलीकरण/भूमि क्षरण की प्रक्रिया मानचित्रित की गई। यह उपग्रह-आधारित राज्य-स्तरीय आकलन है।
झारखंड में भूमि क्षरण का प्रमुख प्राकृतिक कारण क्या है?
ढाल वाले पठार पर संकेंद्रित मानसूनी वर्षा से तेज सतही बहाव और जल-क्षरण प्रमुख प्राकृतिक चालक हैं।
शीट इरोजन क्या है?
जब बहता पानी विस्तृत क्षेत्र से मिट्टी की पतली ऊपरी परत को लगभग समान रूप से हटाता है, उसे शीट इरोजन कहते हैं।
WDC-PMKSY 2.0 की भूमिका क्या है?
यह जलग्रहण विकास, वर्षा जल संचयन, क्षरित भूमि उपचार, उत्पादकता और आजीविका सुधार को जोड़ने वाली केंद्र प्रायोजित योजना है।
खनन के बाद भूमि सुधार कैसे किया जाता है?
टॉपसॉइल संरक्षण, backfilling, सुरक्षित ढाल व जलनिकास, जैविक सुधार, स्थानीय वनस्पति और दीर्घकालीन निगरानी इसके मुख्य भाग हैं।
मृदा संरक्षण का सबसे प्रभावी दृष्टिकोण क्या है?
ridge-to-valley watershed approach, जिसमें ऊपरी ढाल से निचली घाटी तक अपवाह, मिट्टी, वनस्पति और आजीविका का संयुक्त उपचार हो।
संबंधित नोट्स
झारखंड की मिट्टियों, झारखंड के अपवाह तंत्र और पूरे JPSC Notes hub को साथ पढ़ें।
आधिकारिक स्रोत
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Sources and further reading
- SAC-ISRO: Desertification and Land Degradation Atlasvedas.sac.gov.in
- JSAC: National Land Degradation Mapping Project—Jharkhandjsac.jharkhand.gov.in
- Department of Land Resources: WDC-PMKSY 2.0wdcpmksy.dolr.gov.in
- Department of Forest, Environment & Climate Change, Jharkhandforest.jharkhand.gov.in
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