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Governance · Exam Notes

भारत के जलाशयों में जलस्तर गिरकर 45% क्षमता से नीचे: CWC डेटा का विश्लेषण और नीतिगत चुनौतियां

जून 2024 के केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, भारत के जलाशयों का कुल जलस्तर 45% क्षमता से नीचे आ गया है, जिसमें दक्षिणी और पश्चिमी क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हैं। यह कमी कृषि, पेयजल और आर्थिक विकास के लिए गंभीर खतरा है, जो संस्थागत विखंडन और समेकित जल प्रबंधन सुधारों की आवश्यकता को उजागर करती है।
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Governance
Exam Notes
GS Paper II

Constitution, governance, social justice and institutional analysis

In brief

जून 2024 के केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, भारत के जलाशयों का कुल जलस्तर 45% क्षमता से नीचे आ गया है, जिसमें दक्षिणी और पश्चिमी क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हैं। यह कमी कृषि, पेयजल और आर्थिक विकास के लिए गंभीर खतरा है, जो संस्थागत विखंडन और समेकित जल प्रबंधन सुधारों की आवश्यकता को उजागर करती है।

भारत के जलाशयों का संक्षिप्त परिचय (जून 2024)

केंद्रीय जल आयोग (CWC), जो जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत आता है, देश के 166 प्रमुख जलाशयों पर नजर रखता है, जो लगभग 71.2% कुल अनुमानित जलाशय क्षमता 257.812 अरब क्यूबिक मीटर (BCM) का प्रतिनिधित्व करते हैं। जून 2024 तक CWC के आंकड़ों से पता चलता है कि इन जलाशयों में कुल जल संचयन क्षमता 45% से नीचे गिर गई है, जो जल संकट की गंभीर स्थिति को दर्शाता है। यह गिरावट विशेष रूप से दक्षिणी और पश्चिमी भारत में तेज है, जहां जलाशयों के स्तर में भारी कमी आई है, जिससे गर्मियों में जल संकट की आशंका बढ़ गई है।

स्थिति को और जटिल बनाता है कि भारत की 20 प्रमुख नदी घाटियां 30% से 60% क्षमता के बीच काम कर रही हैं, जबकि कुछ घाटियां, जैसे बिहार के चंदन बांध की जल आपूर्ति, पूरी तरह सूख चुकी है। इस व्यापक कमी से कृषि उत्पादन, पेयजल उपलब्धता और जलविद्युत उत्पादन पर खतरा मंडरा रहा है, जिसके चलते जल संसाधन प्रबंधन में तात्कालिक सुधारों की जरूरत है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 2: शासन – जल संसाधन प्रबंधन, संस्थागत ढांचे
  • GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – जल संरक्षण, सूखा प्रबंधन
  • निबंध: जल संकट का सतत विकास और शासन सुधारों पर प्रभाव

जलाशयों की भूमिका और भारत की जल सुरक्षा

प्राकृतिक और कृत्रिम जलाशय सतही जल के महत्वपूर्ण भंडारण केंद्र हैं, जो सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक उपयोग और पारिस्थितिक संतुलन के लिए जल आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं। भारत में जलाशय लगभग 60% सिंचित क्षेत्र को समर्थन देते हैं, जो 42% कृषि कार्यबल का आधार हैं और देश की जीडीपी में लगभग 18% योगदान करते हैं (इकोनॉमिक सर्वे 2023-24)। सिंचाई देश में ताजे पानी की खपत का लगभग 90% हिस्सा है, जो खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए जलाशयों की अहमियत को दर्शाता है।

  • जलाशय क्षमता में गिरावट के कारण:
    • जलोढ़ जमाव: तलछट जमाव से जलाशयों की संचयन क्षमता कम होती है, कुछ जलाशयों में पिछले दो दशकों में 30% तक क्षमता घट गई है (CWC रिपोर्ट्स)।
    • जलग्रहण क्षेत्र का क्षरण: वनों की कटाई और खनन से मृदा अपरदन बढ़ता है, जिससे जलोढ़ का प्रवाह तेज होता है।
    • अतिक्रमण और शहरीकरण: जलाशय के जलग्रहण क्षेत्र और नालों पर अवैध कब्जे से जल संचयन क्षमता घटती है।
    • जलवायु अस्थिरता: अनियमित मानसून और लंबी सूखे की अवधि जल प्रवाह और पुनर्भरण को प्रभावित करती है।

जल संसाधन प्रबंधन के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचा

भारत में जल शासन संवैधानिक प्रावधानों, केंद्र सरकार के कानूनों और संस्थागत जिम्मेदारियों से संचालित होता है। संविधान के अनुच्छेद 48A के तहत राज्य को पर्यावरण और जल संसाधनों की सुरक्षा और सुधार का निर्देश दिया गया है। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 जल गुणवत्ता और उपलब्धता को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय कारकों को नियंत्रित करने का व्यापक अधिकार देता है।

नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 अंतर-राज्यीय नदी जल प्रबंधन के लिए नियम बनाता है, लेकिन इसका क्रियान्वयन सीमित रहा है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) जलाशयों और नदी घाटियों के जल स्तर की निगरानी करता है, जो जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के नियम, 2019 के तहत कार्य करता है। राष्ट्रीय जल नीति, 2012 सतत जल उपयोग, मांग प्रबंधन और सहभागिता आधारित शासन पर जोर देती है, लेकिन इसकी कानूनी बाध्यता नहीं है।

  • प्रमुख संस्थान:
    • CWC: जलाशय और नदी घाटी के जल स्तर की निगरानी, डेटा और तकनीकी सलाह प्रदान करता है।
    • जल शक्ति मंत्रालय: राष्ट्रीय जल नीतियों का निर्माण और क्रियान्वयन देखता है।
    • केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB): भूजल स्तर और गुणवत्ता की निगरानी करता है।
    • नीति आयोग: जल संसाधन सुधारों पर सलाह देता है और संयुक्त जल प्रबंधन सूचकांक जैसे रिपोर्ट प्रकाशित करता है।
    • राज्य जल संसाधन विभाग: राज्य स्तर पर जल प्रबंधन और जलाशय संचालन का कार्यान्वयन करता है।

जलाशयों के घटते जलस्तर के आर्थिक प्रभाव

जल संकट सीधे कृषि को प्रभावित करता है, जो भारत के लगभग 42% कार्यबल को रोजगार देता है और देश की जीडीपी में लगभग 18% योगदान करता है (इकोनॉमिक सर्वे 2023-24)। जलाशय सिंचाई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जो लगभग 60% सिंचित भूमि को समर्थन देते हैं। नीति आयोग की 2023 रिपोर्ट के अनुसार, जलाशयों के घटते जलस्तर से प्रभावित क्षेत्रों में फसल उत्पादन 20% तक कम हो सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण संकट बढ़ेगा।

सरकार की जल जीवन मिशन (2021-26) के तहत जल अवसंरचना सुधार और शुद्ध पेयजल आपूर्ति के लिए ₹60,000 करोड़ (~$8 बिलियन) आवंटित किए गए हैं। फिर भी, जल संकट के कारण 2050 तक जीडीपी का 6% तक आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है (विश्व बैंक, 2022), जो जल संसाधन प्रबंधन में सुधार की तात्कालिकता को दर्शाता है।

तुलनात्मक अध्ययन: भारत और ऑस्ट्रेलिया के मरे-डार्लिंग बेसिन

पहलूभारतऑस्ट्रेलिया (मरे-डार्लिंग बेसिन)
शासनकेंद्र और राज्यों के बीच विखंडित, एजेंसियों का ओवरलैप, कमजोर प्रवर्तनएकीकृत बेसिन प्राधिकरण (मरे-डार्लिंग बेसिन अथॉरिटी) के तहत स्पष्ट जिम्मेदारियां
जल आवंटनमुख्यतः आदेश-आधारित, सीमित बाजार तंत्रजल व्यापार की अनुमति, कुशल आवंटन और मांग प्रबंधन सक्षम
पर्यावरणीय प्रवाहसीमित ध्यान, अक्सर सिंचाई मांगों के कारण प्रभावितपारिस्थितिकी स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए कड़े पर्यावरणीय प्रवाह नियम
डेटा प्रबंधनवास्तविक समय का एकीकृत डेटा सिस्टम नहींउन्नत निगरानी, वास्तविक समय डेटा एकीकरण और पारदर्शिता
परिणामजलाशय का कुशल उपयोग नहीं, जल संकट बढ़ रहा हैबार-बार सूखे के बावजूद जल उपयोग दक्षता में सुधार

भारत के जल संसाधन प्रबंधन में मुख्य कमियां

  • संस्थागत विखंडन: कई एजेंसियों के ओवरलैप से समन्वय में विफलता।
  • डेटा की कमी: वास्तविक समय, एकीकृत डेटा प्रणाली का अभाव।
  • भूजल की अनदेखी: कई राज्यों में भूजल अत्यधिक दोहन बिना नियमन के हो रहा है, जिससे जलाशय पुनर्भरण प्रभावित।
  • मांग प्रबंधन की कमी: जल उपयोग दक्षता, संरक्षण और मूल्य निर्धारण सुधारों पर कम ध्यान।
  • नीति प्रवर्तन की कमजोरी: राष्ट्रीय जल नीति की कानूनी बाध्यता न होने से अनुपालन कम।

आगे का रास्ता: नीतिगत और संस्थागत सुधार

  • बेसिन स्तर पर शासन मजबूत करें: सशक्त नदी बेसिन प्राधिकरण स्थापित करें जिनके पास स्पष्ट अधिकार और हितधारकों की भागीदारी हो।
  • डेटा सिस्टम एकीकृत करें: वास्तविक समय जलाशय और भूजल निगरानी प्रणाली लागू करें जो निर्णय समर्थन से जुड़ी हो।
  • जल बाजार को बढ़ावा दें: नियंत्रित जल व्यापार को प्रोत्साहित करें ताकि जल का कुशल आवंटन और संरक्षण हो सके।
  • मांग प्रबंधन बढ़ाएं: जल मूल्य निर्धारण सुधार लागू करें और सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दें।
  • भूजल नियमन करें: मौजूदा कानूनों का कड़ाई से पालन कराएं और पुनर्भरण के उपायों को प्रोत्साहित करें।
  • नीतियों को कानूनी रूप दें: राष्ट्रीय जल नीति के सिद्धांतों को लागू करने वाले कानून बनाएं।

प्रश्नावली

भारत के जलाशय जल प्रबंधन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. केंद्रीय जल आयोग सतही और भूजल दोनों संसाधनों की निगरानी करता है।
  2. नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 अंतर-राज्यीय नदी जल प्रबंधन के लिए ढांचा प्रदान करता है।
  3. राष्ट्रीय जल नीति, 2012 एक कानूनी बाध्यकारी दस्तावेज है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि केंद्रीय जल आयोग मुख्यतः सतही जल और नदी घाटियों की निगरानी करता है, जबकि भूजल की निगरानी केंद्रीय भूजल बोर्ड करता है। कथन 2 सही है कि नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 अंतर-राज्यीय नदी जल प्रबंधन के लिए है। कथन 3 गलत है क्योंकि राष्ट्रीय जल नीति, 2012 एक मार्गदर्शक नीति है, कानूनी बाध्यकारी नहीं।

भारत में जल उपयोग के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. भारत में ताजे पानी के उपयोग में सिंचाई का हिस्सा लगभग 90% है।
  2. जलाशय भारत में सिंचित भूमि का लगभग 30% हिस्सा समर्थन करते हैं।
  3. जल संकट से 2050 तक जीडीपी का 6% तक आर्थिक नुकसान हो सकता है।

इनमें से कौन-से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 3
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

कथन 1 सही है क्योंकि सिंचाई ताजे पानी के लगभग 90% उपयोग के लिए जिम्मेदार है। कथन 2 गलत है क्योंकि जलाशय लगभग 60% सिंचित भूमि का समर्थन करते हैं, न कि 30%। कथन 3 सही है, जो विश्व बैंक के अनुमानों पर आधारित है।

मुख्य प्रश्न

केंद्रीय जल आयोग के जून 2024 के आंकड़ों के अनुसार भारत के जलाशयों के जलस्तर 45% क्षमता से नीचे गिरने के प्रभावों पर चर्चा करें। जल संसाधन प्रबंधन में संस्थागत चुनौतियों का विश्लेषण करें और जल संकट से निपटने के लिए सुधार सुझाएं।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (शासन और पर्यावरण), पेपर 3 (कृषि और जल संसाधन)
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड के जलाशय जैसे कोनार और तेनुघाट में जल स्तर में उतार-चढ़ाव सिंचाई और पेयजल आपूर्ति को प्रभावित कर रहा है।
  • मुख्य बिंदु: राज्य-विशिष्ट जल संकट, झारखंड जल संसाधन विभाग और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय, और जलाशय प्रबंधन में वाटरशेड प्रबंधन की भूमिका पर प्रकाश डालें।
केंद्रीय जल आयोग द्वारा निगरानी किए जाने वाले जलाशयों की कुल जीवित संचयन क्षमता क्या है?

CWC 166 जलाशयों की निगरानी करता है जिनकी संयुक्त जीवित संचयन क्षमता 183.565 अरब क्यूबिक मीटर (BCM) है, जो भारत की कुल अनुमानित जलाशय क्षमता 257.812 BCM का लगभग 71.2% है (CWC, जून 2024)।

भारत के संविधान में कौन-सा प्रावधान जल संरक्षण से संबंधित पर्यावरण संरक्षण का निर्देश देता है?

संविधान का अनुच्छेद 48A एक निर्देशात्मक सिद्धांत है, जो राज्य को पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार, जिसमें जल संसाधन भी शामिल हैं, का निर्देश देता है।

भारत में जलाशय क्षमता में गिरावट के मुख्य कारण क्या हैं?

मुख्य कारणों में तलछट जमाव, जलग्रहण क्षेत्र का क्षरण, अतिक्रमण और शहरीकरण, तथा जलवायु अस्थिरता शामिल हैं, जो जल प्रवाह और पुनर्भरण को प्रभावित करते हैं।

भारत के जल शासन की तुलना ऑस्ट्रेलिया के मरे-डार्लिंग बेसिन से कैसे की जा सकती है?

भारत का जल शासन विखंडित है, एजेंसियों के ओवरलैप और कमजोर प्रवर्तन के साथ, जबकि ऑस्ट्रेलिया का मरे-डार्लिंग बेसिन अथॉरिटी एकीकृत बेसिन प्रबंधन, जल व्यापार और कड़े पर्यावरणीय प्रवाह नियमों के माध्यम से बेहतर जल उपयोग दक्षता सुनिश्चित करता है।

जल संकट के कारण भारत को 2050 तक कितने आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है?

विश्व बैंक (2022) के अनुसार, जल संकट के कारण 2050 तक भारत की जीडीपी का लगभग 6% तक आर्थिक नुकसान हो सकता है।

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