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Governance · Exam Notes

2100 तक भारत के वनों में कार्बन भंडारण की क्षमता और जलवायु संरक्षण

2013 से 2023 के बीच भारत के वनों में कार्बन भंडार 6.94 से बढ़कर 7.29 बिलियन टन हो गया है। अनुमान बताते हैं कि 2100 तक यह मात्रा लगभग दोगुनी हो सकती है, खासकर बढ़े हुए CO2 स्तर और वर्षा में वृद्धि के कारण, जो शुष्क क्षेत्रों में अधिक प्रभावी होगी। वन संरक्षण अधिनियम और वन अधिकार अधिनियम जैसे कानूनी ढांचे वन प्रबंधन को नियंत्रित करते हैं, जबकि आर्थिक प्रोत्साहन और संस्थागत समन्वय इस क्षमता को जलवायु संरक्षण में उपयोगी बनाने के लिए जरूरी हैं।
1 min read GS Paper II
Governance
Exam Notes
GS Paper II

Constitution, governance, social justice and institutional analysis

In brief

2013 से 2023 के बीच भारत के वनों में कार्बन भंडार 6.94 से बढ़कर 7.29 बिलियन टन हो गया है। अनुमान बताते हैं कि 2100 तक यह मात्रा लगभग दोगुनी हो सकती है, खासकर बढ़े हुए CO2 स्तर और वर्षा में वृद्धि के कारण, जो शुष्क क्षेत्रों में अधिक प्रभावी होगी। वन संरक्षण अधिनियम और वन अधिकार अधिनियम जैसे कानूनी ढांचे वन प्रबंधन को नियंत्रित करते हैं, जबकि आर्थिक प्रोत्साहन और संस्थागत समन्वय इस क्षमता को जलवायु संरक्षण में उपयोगी बनाने के लिए जरूरी हैं।

भारत के वनों में कार्बन भंडारण: वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाएँ

वन सर्वेक्षण भारत (FSI) 2023 के अनुसार, भारत के वनों में वर्तमान में लगभग 7.29 बिलियन टन कार्बन संग्रहित है, जो 2013 में 6.94 बिलियन टन था। यह कार्बन वनों की उपरी और जमीनी जैव द्रव्यमान, मृत लकड़ी, पत्तियों के गिरावट, और मिट्टी के कार्बनिक कार्बन स्रोतों में जमा होता है। हाल ही में Environmental Research: Climate (2024) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, विभिन्न ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन परिदृश्यों के तहत 2100 तक भारत के वनस्पति कार्बन जैव द्रव्यमान में लगभग दोगुनी वृद्धि हो सकती है, जिसका मुख्य कारण वायुमंडलीय CO2 की बढ़ती मात्रा और वर्षा में वृद्धि है।

  • भारत का वन क्षेत्र देश की भौगोलिक सीमा का 21.71% है (India State of Forest Report 2023)।
  • राष्ट्रीय पुनर्वनीकरण कार्यक्रम के तहत वृक्षारोपण प्रयासों से लगभग 2.5 मिलियन हेक्टेयर वन क्षेत्र बढ़ा है (MoEFCC, 2023)।
  • राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश जैसे शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र उच्च उत्सर्जन परिदृश्यों में वनस्पति कार्बन में 60% से अधिक वृद्धि देख सकते हैं।

वन कार्बन संचयन में वृद्धि के मुख्य कारण

वन कार्बन भंडारण में अनुमानित वृद्धि के पीछे दो प्रमुख कारण हैं: वायुमंडलीय CO2 का बढ़ना और वर्षा का बढ़ना। CO2 की अधिकता पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता और जल उपयोग दक्षता को बढ़ाती है, जिससे जैव द्रव्यमान में वृद्धि होती है। वहीं, वर्षा में बढ़ोतरी मिट्टी की नमी को बेहतर बनाती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पानी की कमी होती है। हालांकि, जैव विविधता से भरपूर क्षेत्रों जैसे पश्चिमी घाट और हिमालय में पारिस्थितिक संतृप्ति और जलवायु सीमाएं कार्बन संचयन को बाधित कर सकती हैं।

  • बढ़ा हुआ CO2 उर्वरक की तरह काम करता है, जिससे शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता बढ़ती है।
  • वर्षा में वृद्धि से शुष्क भूमि के वन विस्तार के लिए जरूरी नमी बढ़ती है।
  • परिपक्व वनों में पारिस्थितिक संतृप्ति अतिरिक्त कार्बन अवशोषण को सीमित करती है।
  • तापमान वृद्धि और जलवायु चरम स्थितियां कुछ क्षेत्रों में लाभ को कम कर सकती हैं, इसलिए अनुकूल वन प्रबंधन जरूरी है।

भारत में वन कार्बन प्रबंधन के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा

भारत के वन कार्बन प्रबंधन में संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने वाला व्यापक कानूनी और संवैधानिक ढांचा शामिल है। वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए परिवर्तन को नियंत्रित करता है, जिससे अनियंत्रित वनों की कटाई रोकी जाती है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 वन सहित पर्यावरण सुरक्षा के लिए व्यापक अधिकार प्रदान करता है। भारतीय वन अधिनियम, 1927 वन प्रबंधन और संरक्षण का शासन करता है। राष्ट्रीय वन नीति, 1988 वृक्षारोपण और सतत वन प्रबंधन को बढ़ावा देती है।

  • अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 आदिवासी समुदायों के वन अधिकारों को मान्यता देता है, जिससे सामाजिक न्याय और संरक्षण जुड़ते हैं।
  • संविधान के अनुच्छेद 48A राज्य को वन और वन्यजीव संरक्षण का निर्देश देता है।
  • अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों पर पर्यावरण संरक्षण का मौलिक कर्तव्य लगाता है।
  • जमीन के टुकड़े-टुकड़े होना और समुदाय के अधिकारों का अधूरा समावेश वन कार्बन वृद्धि में चुनौतियां हैं।

वन कार्बन भंडारण के आर्थिक पहलू

भारत हर साल लगभग ₹3,000 करोड़ प्रतिपूर्ति वृक्षारोपण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA) के माध्यम से वन संरक्षण और वृक्षारोपण में निवेश करता है। वन क्षेत्र भारत की GDP में लगभग 1.76% का योगदान देता है (Economic Survey 2023)। कार्बन संचयन में वृद्धि से कार्बन क्रेडिट बाजारों के जरिए आय के नए रास्ते खुलते हैं, जिनका वैश्विक मूल्य 2023 में $1 बिलियन था (Ecosystem Marketplace)। वन से जुड़ी गतिविधियां 1 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देती हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सहारा हैं।

  • वृक्षारोपण और सतत वन प्रबंधन से कार्बन क्रेडिट प्राप्त किए जा सकते हैं, जो स्वैच्छिक और अनिवार्य बाजारों में बिकते हैं।
  • कार्बन आय निजी भूमि मालिकों और समुदायों को वन संरक्षण में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।
  • वन आधारित रोजगार वृक्षारोपण, संरक्षण और गैर-लकड़ी वन उत्पाद संग्रहण में फैला हुआ है।
  • वनों से मिलने वाली पारिस्थितिक सेवाओं का आर्थिक मूल्यांकन नीति में अभी भी कम उपयोग में है।

वन कार्बन प्रबंधन के लिए संस्थागत व्यवस्था

भारत में वन कार्बन की निगरानी, नीति, अनुसंधान और क्रियान्वयन के लिए कई संस्थान काम करते हैं। वन सर्वेक्षण भारत (FSI) प्रत्येक दो साल में वन संसाधन और कार्बन भंडार का आंकलन करता है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) नीतियां बनाता और कार्यान्वयन देखता है। भारतीय वन अनुसंधान और शिक्षा परिषद (ICFRE) वन अनुसंधान करता है। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) जैव विविधता संरक्षण और सतत उपयोग सुनिश्चित करता है। राज्य वन विभाग जमीन पर वन प्रबंधन और संरक्षण करते हैं।

  • FSI का India State of Forest Report वन आवरण और कार्बन भंडार के रुझानों का मुख्य स्रोत है।
  • MoEFCC राष्ट्रीय वन नीतियों और REDD+ जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का समन्वय करता है।
  • ICFRE कार्बन संचयन बढ़ाने के लिए सिल्विकल्चरल प्रथाएं विकसित करता है।
  • राज्य वन विभाग वृक्षारोपण, संरक्षण और समुदाय सहभागिता कार्यक्रम लागू करते हैं।

तुलनात्मक दृष्टि: भारत बनाम ब्राजील के अमेज़न कार्बन सिंक

पहलूभारतब्राजील (अमेज़न)
वन कार्बन भंडार7.29 बिलियन टन (2023)86 बिलियन टन (INPE, 2023)
वन आवरण प्रतिशतभौगोलिक क्षेत्र का 21.71%राष्ट्रीय क्षेत्र का लगभग 49%
कानूनी ढांचावन संरक्षण अधिनियम, वन अधिकार अधिनियम, राष्ट्रीय वन नीतिवन कोड निजी भूमि पर 80% वन आवरण का आदेश देता है
चुनौतियांटुकड़े-टुकड़े भूमि स्वामित्व, निजी प्रोत्साहनों की कमीकृषि, खनन, इन्फ्रास्ट्रक्चर के कारण वनों की कटाई
भारत के लिए नीति सबकनिजी भूमि प्रोत्साहन और समुदाय समावेशन की जरूरतकठोर वन आवरण आदेश और प्रवर्तन तंत्र

भारत के वन कार्बन संवर्धन में मुख्य चुनौतियां

अधिक संभावनाओं के बावजूद, भारत के वन कार्बन संचयन में कई बाधाएं हैं। जमीन के टुकड़े-टुकड़े होना समन्वित वृक्षारोपण और कार्बन लेखांकन को मुश्किल बनाता है। वन अधिकार अधिनियम, 2006 पूरी तरह से कार्बन परियोजनाओं में शामिल नहीं हो पाया है, जिससे समुदाय की भागीदारी सीमित रह जाती है। निजी भूमि मालिकों के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं हैं। साथ ही, कार्बन क्रेडिट की निगरानी और सत्यापन प्रणालियों को मजबूत करने की जरूरत है ताकि पारदर्शिता और प्रभावशीलता बनी रहे।

  • भूमि स्वामित्व का विखंडन वन प्रबंधन और कार्बन लेखांकन में कमियां लाता है।
  • समुदाय के वन अधिकारों की अधूरी मान्यता स्थानीय संरक्षण को बाधित करती है।
  • निजी हितधारकों के लिए मजबूत कार्बन बाजार और वित्तीय प्रोत्साहन का अभाव है।
  • मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) प्रणाली में क्षमता निर्माण आवश्यक है।

UPSC प्रासंगिकता

  • GS पेपर 3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – वन और जलवायु परिवर्तन; कार्बन संचयन के तरीके; वन नीतियां और अधिनियम।
  • GS पेपर 1: भूगोल – वन आवरण के रुझान और क्षेत्रीय भिन्नताएं।
  • निबंध: प्राकृतिक जलवायु समाधान और भारत की वैश्विक जलवायु संरक्षण में भूमिका।

महत्व और आगे की राह

2100 तक भारत के वन कार्बन भंडार में अनुमानित दोगुनी वृद्धि इसे जलवायु संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन बनाती है। इस क्षमता का पूरा लाभ उठाने के लिए नीति निर्माताओं को भूमि स्वामित्व की स्पष्टता, समुदाय के अधिकारों का समावेश, और निजी भूमि पर वृक्षारोपण के लिए बाजार आधारित प्रोत्साहनों पर ध्यान देना होगा। संस्थागत समन्वय को मजबूत करना और MRV ढांचे को विकसित करना कार्बन लेखांकन को बेहतर बनाएगा और कार्बन वित्त के अवसर खोलेगा। ब्राजील के वन कोड के कुछ पहलुओं को अपनाकर विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। अंततः, भारत के वन कार्बन सिंक का उपयोग पेरिस समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने और सतत विकास लक्ष्यों के समर्थन में सहायक होगा।

  • भूमि स्वामित्व स्पष्टता के लिए नीति सुधार लागू करें और निजी वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करें।
  • वन अधिकार अधिनियम की धाराओं को कार्बन संचयन कार्यक्रमों में पूरी तरह शामिल करें।
  • सत्यापित वन कार्बन लाभों से जुड़े पारदर्शी कार्बन क्रेडिट बाजार विकसित करें।
  • FSI और ICFRE जैसी संस्थाओं की निगरानी और अनुसंधान क्षमता बढ़ाएं।
  • पारिस्थितिक और जलवायु सीमाओं को ध्यान में रखकर क्षेत्रीय वृक्षारोपण रणनीतियां अपनाएं।

भारत में वन कार्बन भंडारण के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. भारत के वन कार्बन भंडार में केवल उपरी जैव द्रव्यमान और मिट्टी के कार्बनिक कार्बन शामिल हैं।
  2. वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन भूमि को गैर-वन उपयोग के लिए परिवर्तित करने को नियंत्रित करता है।
  3. वायुमंडलीय CO2 की बढ़ोतरी और वर्षा में वृद्धि से 2100 तक वन कार्बन जैव द्रव्यमान में वृद्धि का अनुमान है।

उपरोक्त में से कौन सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (b)

कथन 1 गलत है क्योंकि वन कार्बन भंडार में उपरी जैव द्रव्यमान के साथ-साथ जमीनी जैव द्रव्यमान, मृत लकड़ी और पत्तियां भी शामिल हैं। कथन 2 और 3 वन संरक्षण अधिनियम और हालिया वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार सही हैं।

भारत के वन संबंधित संस्थाओं के बारे में निम्नलिखित पर विचार करें:

  1. वन सर्वेक्षण भारत वन संसाधन आकलन और कार्बन भंडार अनुमान के लिए जिम्मेदार है।
  2. भारतीय वन अनुसंधान और शिक्षा परिषद (ICFRE) वन नीतियों का निर्धारण करता है।
  3. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण जैव विविधता संरक्षण और सतत उपयोग पर केंद्रित है।

उपरोक्त में से कौन सा/से कथन सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3 सभी

उत्तर: (c)

कथन 2 गलत है क्योंकि नीति निर्धारण मुख्य रूप से MoEFCC का कार्य है, न कि ICFRE का। कथन 1 और 3 सही हैं।

मुख्य प्रश्न

2100 तक भारत के वन कार्बन भंडार के अनुमानित दोगुनी वृद्धि में योगदान देने वाले कारकों पर चर्चा करें और इस क्षमता का जलवायु परिवर्तन संरक्षण के लिए उपयोग करने में आने वाली चुनौतियों और आवश्यक नीतिगत उपायों का विश्लेषण करें।

झारखंड और JPSC प्रासंगिकता

  • JPSC पेपर: पेपर 2 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी) – वन आवरण और कार्बन संचयन के रुझान।
  • झारखंड का दृष्टिकोण: झारखंड में 29.2% वन आवरण है (India State of Forest Report 2023), जहां बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय वनों पर निर्भर हैं; कार्बन संचयन क्षमता राज्य के जलवायु कार्रवाई योजनाओं में सहायक हो सकती है।
  • मुख्य बिंदु: झारखंड के वन कार्बन भंडार के रुझान, वन अधिकार अधिनियम के तहत आदिवासी अधिकार, और राष्ट्रीय नीतियों के अनुरूप राज्य स्तरीय वृक्षारोपण पहलों को उजागर करें।
भारत में वन कार्बन भंडार के मुख्य घटक क्या हैं?

वन कार्बन भंडार में उपरी जैव द्रव्यमान (पेड़, झाड़ियां), जमीनी जैव द्रव्यमान (जड़ें), मृत लकड़ी, पत्ते और मिट्टी का कार्बनिक कार्बन शामिल होता है, जैसा कि वन सर्वेक्षण भारत 2023 में बताया गया है।

भारत में वन भूमि परिवर्तन को कौन सा अधिनियम नियंत्रित करता है?

वन संरक्षण अधिनियम, 1980 वन भूमि के गैर-वन उपयोग के लिए परिवर्तन को नियंत्रित करता है, जिसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति आवश्यक होती है।

बढ़ा हुआ CO2 वन कार्बन भंडारण को कैसे प्रभावित करता है?

बढ़ा हुआ वायुमंडलीय CO2 प्रकाश संश्लेषण और जल उपयोग दक्षता को बढ़ाता है, जिससे जैव द्रव्यमान की वृद्धि होती है और परिणामस्वरूप वन कार्बन भंडारण बढ़ता है, जैसा हाल के जलवायु अध्ययनों में देखा गया है।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 वन कार्बन प्रबंधन में क्या भूमिका निभाता है?

यह अधिनियम आदिवासी समुदायों के वन अधिकारों को मान्यता देता है, जिससे वे वन प्रबंधन और कार्बन संचयन गतिविधियों में भाग ले सकते हैं, हालांकि कार्बन परियोजनाओं में इसका समावेश अभी सीमित है।

भारत का वन कार्बन भंडार ब्राजील के अमेज़न से कैसे तुलना करता है?

भारत का वन कार्बन भंडार लगभग 7.29 बिलियन टन है, जबकि ब्राजील के अमेज़न में लगभग 86 बिलियन टन कार्बन संग्रहित है, जो वनों के विस्तार और घनत्व के अंतर को दर्शाता है (INPE, 2023)।

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