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भारत में फ्रूट फ्लाई की नई प्रजाति की खोज: UPSC के लिए

संपादकीय संदर्भ: प्रजातियों की खोज का महत्व

उदाहरण के लिए, पश्चिमी घाट में पाई गई फल मक्खी की एक नई प्रजाति, जिसे काल्पनिक रूप से ड्रोसोफिला इंडिका कहा जा सकता है, भारत की अतुलनीय जैव विविधता और मजबूत वर्गीकरण अनुसंधान की निरंतर आवश्यकता को रेखांकित करती है। ऐसी खोजें केवल अकादमिक जिज्ञासाएँ नहीं हैं; ये पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण संकेतक, जैव-प्रौद्योगिकी नवाचार के संभावित स्रोत और संरक्षण रणनीतियों के लिए महत्वपूर्ण डेटा बिंदु के रूप में काम करती हैं। भले ही यह विशेष फल मक्खी मामूली लग सकती है, लेकिन इसका अस्तित्व पृथ्वी के जीवन के जटिल ताने-बाने को समझने, उसका मानचित्रण करने और उसे सुरक्षित रखने के बड़े वैज्ञानिक प्रयास को दर्शाता है, जो पर्यावरण प्रबंधन और सतत विकास में नीतिगत निर्णयों को सीधे प्रभावित करता है।

प्रजाति पहचान की यह चल रही प्रक्रिया, विशेष रूप से भारत जैसे जैव विविधता हॉटस्पॉट में, प्राकृतिक विरासत की समृद्धि और मानवजनित गतिविधियों से पड़ने वाले समवर्ती दबावों दोनों को उजागर करती है। यह वर्गीकरण और संरक्षण में भारत की संस्थागत क्षमता, कानूनी ढाँचे और अनुसंधान प्राथमिकताओं की गहन जांच की आवश्यकता पर बल देती है। इन गतिशीलता को समझना ऐसी नीति-निर्माण के लिए आवश्यक है जो विकासात्मक आकांक्षाओं और पारिस्थितिक अनिवार्यताओं के बीच प्रभावी संतुलन स्थापित करे।

UPSC के लिए प्रासंगिकता

  • GS-III: पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी (जैव विविधता, संरक्षण), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (जैव प्रौद्योगिकी, प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण, अनुसंधान एवं विकास), आपदा प्रबंधन (पारिस्थितिक जोखिम)।
  • GS-I: भूगोल (जैव-भूगोल, जैव विविधता हॉटस्पॉट)।
  • निबंध: विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं समाज; पर्यावरणीय नैतिकता एवं सतत विकास; भारत की जैविक विरासत।

जैव विविधता की खोज और संरक्षण के लिए संस्थागत और कानूनी ढाँचा

भारत के पास जैव विविधता अनुसंधान, खोज और संरक्षण को सुविधाजनक बनाने के लिए एक बहुस्तरीय संस्थागत और कानूनी ढाँचा है, जिसका प्रबंधन मुख्य रूप से पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा किया जाता है।

वर्गीकरण अनुसंधान और जैव विविधता मूल्यांकन के लिए प्रमुख संस्थान

  • भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI): 1916 में स्थापित, ZSI प्राणी संबंधी अनुसंधान और अध्ययन के लिए भारत का प्रमुख संगठन है। यह पूरे भारत में प्राणि विविधता की खोज, सर्वेक्षण, सूचीकरण और निगरानी का कार्य करता है। ZSI की ‘एनिमल डिस्कवरीज़’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रति वर्ष औसतन 400-500 नई पशु प्रजातियाँ जुड़ती हैं, जिनमें अकशेरुकी, फल मक्खियों जैसे कीड़ों सहित, एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं।
  • भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI): 1890 में स्थापित, BSI देश की वनस्पति विविधता का सर्वेक्षण और सूचीकरण करने के लिए जिम्मेदार है। यह गहन वानस्पतिक अन्वेषण करता है और हर्बेरियम का रखरखाव करता है।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA): जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत गठित, NBA वाणिज्यिक उपयोग या जैव-सर्वेक्षण और जैव-उपयोग के लिए जैविक संसाधनों और संबंधित पारंपरिक ज्ञान तक पहुँच को विनियमित करता है, जिससे लाभों का समान वितरण सुनिश्चित होता है।
  • राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBBs): राज्य स्तर पर कार्यरत, SBBs जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों को लागू करते हैं, जिसमें जैव विविधता रजिस्टर का प्रबंधन और पहुँच अनुरोधों को मंजूरी देना शामिल है।
  • वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR): CSIR की विभिन्न प्रयोगशालाएँ जैविक विविधता के आनुवंशिक और आणविक अध्ययनों में योगदान करती हैं, जिसमें DNA बारकोडिंग जैसी उन्नत वर्गीकरण तकनीकें शामिल हैं।

जैव विविधता संरक्षण के लिए कानूनी और नीतिगत ढाँचा

  • जैविक विविधता अधिनियम, 2002: यह ऐतिहासिक अधिनियम भारत में जैविक विविधता अभिसमय (CBD) के प्रावधानों को लागू करता है। इसका उद्देश्य जैविक विविधता का संरक्षण, इसके घटकों का सतत उपयोग और जैविक संसाधनों के उपयोग से उत्पन्न होने वाले लाभों का उचित और समान वितरण सुनिश्चित करना है। यह भारतीय जैविक संसाधनों तक पहुँच के लिए पूर्व सूचित सहमति को अनिवार्य करता है।
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (संशोधित): यह जंगली जानवरों, पक्षियों और पौधों के संरक्षण पर केंद्रित है, संरक्षित क्षेत्रों (राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य) की स्थापना करता है और वन्यजीवों में व्यापार को विनियमित करता है। हालाँकि यह सीधे प्रजातियों की खोज के लिए नहीं है, यह उन आवासों की रक्षा करता है जहाँ अक्सर नई प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना (NBAP): CBD पर आधारित, भारत की NBAP जैव विविधता संरक्षण के लिए राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और रणनीतियों को रेखांकित करती है, जिसमें अनुसंधान, दस्तावेजीकरण और जागरूकता शामिल है।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986: यह एक व्यापक छाता कानून है जो केंद्र सरकार को जैव विविधता सहित पर्यावरणीय गुणवत्ता में सुधार और सुरक्षा के लिए उपाय करने की अनुमति देता है।

जैव विविधता की खोज और संरक्षण में प्रमुख चुनौतियाँ

मजबूत ढाँचे के बावजूद, भारत को अपनी जैव विविधता का प्रभावी ढंग से मानचित्रण और संरक्षण करने में कई प्रणालीगत चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो नई प्रजातियों की खोज के निहितार्थों को सीधे प्रभावित करती हैं।

‘वर्गीकरण बाधा’ (Taxonomic Impediment)

  • प्रशिक्षित वर्गीकरण विशेषज्ञों की कमी: भारत समर्पित वर्गीकरण विशेषज्ञों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट से जूझ रहा है, विशेष रूप से कीड़े और सूक्ष्मजीवों जैसे कम ज्ञात समूहों के लिए, जिससे अज्ञात नमूनों का एक बैकलॉग बन गया है। ZSI की रिपोर्टें विशेष कीटविज्ञानी (entomologists) और मोलस्कविज्ञानी (malacologists) में कमी का संकेत देती हैं।
  • दीर्घकालिक अनुसंधान के लिए अपर्याप्त धन: वर्गीकरण अनुसंधान अक्सर दीर्घकालिक और संसाधन-गहन होता है, फिर भी इसे अधिक अनुप्रयुक्त जैविक विज्ञानों की तुलना में अपेक्षाकृत कम धन प्राप्त होता है, जिससे व्यापक सर्वेक्षण और आणविक अध्ययनों में बाधा आती है।
  • खंडित डेटा प्रबंधन: विभिन्न संस्थानों और व्यक्तिगत शोधकर्ताओं द्वारा एकत्र किया गया जैव विविधता डेटा अक्सर एक सामान्य, सुलभ डेटाबेस में एकीकृत नहीं होता है, जिससे व्यापक विश्लेषण और नीति निर्माण में बाधा आती है।

संरक्षण अंतराल और मानवजनित दबाव

  • आवास विखंडन और हानि: तीव्र शहरीकरण, औद्योगीकरण और कृषि विस्तार प्राकृतिक आवासों के विनाश और विखंडन का कारण बनते हैं, अक्सर नई प्रजातियों की खोज या अध्ययन से पहले ही।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: बदलती जलवायु क्षेत्र और अत्यधिक मौसम की घटनाएँ सीधे प्रजातियों को खतरे में डालती हैं, विशेष रूप से संकीर्ण पारिस्थितिक निकेत वाली प्रजातियों को, जिससे अज्ञात टैक्सोन के विलुप्त होने की संभावना बढ़ जाती है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष: जैव विविधता-समृद्ध क्षेत्रों में बढ़ता संघर्ष संरक्षण संसाधनों को मोड़ता है और संरक्षण प्रयासों के लिए स्थानीय समुदाय के समर्थन को प्रभावित करता है।

जैव-पायरेसी और लाभ-साझाकरण के मुद्दे

  • पहुँच और लाभ-साझाकरण (ABS) के लिए प्रवर्तन चुनौतियाँ: जैविक विविधता अधिनियम के बावजूद, जैव-पायरेसी के मामले बने हुए हैं, जहाँ विदेशी संस्थाएँ या व्यक्ति उचित अनुमति या समान लाभ-साझाकरण के बिना भारत के आनुवंशिक संसाधनों या पारंपरिक ज्ञान तक अवैध रूप से पहुँच प्राप्त करते हैं।
  • जागरूकता की कमी: ABS तंत्र के तहत अपने अधिकारों के बारे में स्थानीय समुदायों के बीच और अनुपालन प्रक्रियाओं के बारे में शोधकर्ताओं के बीच सीमित जागरूकता अक्सर प्रक्रिया को जटिल बनाती है।

जैव विविधता डेटा प्रबंधन के लिए तुलनात्मक दृष्टिकोण

जैव विविधता डेटा का व्यवस्थित संग्रह, डिजिटलीकरण और साझाकरण प्रभावी संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है। भारत का दृष्टिकोण, हालांकि इसमें सुधार हो रहा है, फिर भी अधिक एकीकृत वैश्विक मॉडलों के साथ विरोधाभास प्रस्तुत करता है।

विशेषता भारत का दृष्टिकोण (ZSI, BSI, NBA) वैश्विक सर्वोत्तम अभ्यास (उदा. GBIF, यूरोपीय संघ जैव विविधता प्लेटफॉर्म)
डेटा संग्रह और डिजिटलीकरण मुख्य रूप से संस्थागत-प्रेरित; चल रहे डिजिटलीकरण के प्रयास (उदा. ZSI राष्ट्रीय प्राणी संग्रह, BSI हर्बेरियम); अक्सर खंडित डेटा। सहयोगात्मक, बहु-हितधारक प्लेटफॉर्म; नागरिक विज्ञान पर जोर; मानकीकृत डेटा प्रोटोकॉल (उदा. डार्विन कोर); व्यापक वैश्विक एकीकरण।
वर्गीकरण विशेषज्ञता और वित्तपोषण विशेषज्ञों की कमी; मूलभूत वर्गीकरण के लिए असंगत वित्तपोषण; आणविक उपकरणों के बढ़ते उपयोग के साथ पारंपरिक तरीकों पर निर्भरता। समर्पित अनुसंधान कार्यक्रम; अंतर्राष्ट्रीय सहयोगात्मक परियोजनाएँ; पारंपरिक और आणविक वर्गीकरण दोनों के लिए मजबूत वित्तपोषण; सक्रिय विशेषज्ञ नेटवर्क।
पहुँच और लाभ-साझाकरण (ABS) जैविक विविधता अधिनियम, 2002 द्वारा विनियमित; राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय पहुँच के लिए NBA और SBBs के माध्यम से जटिल अनुमोदन प्रक्रियाएँ। देश के अनुसार भिन्न होता है, अक्सर नागोया प्रोटोकॉल सिद्धांतों द्वारा निर्देशित; पारदर्शी संविदात्मक समझौतों और डिजिटल परमिट प्रणालियों पर जोर।
सार्वजनिक पहुँच और उपयोग बढ़ती ऑनलाइन उपस्थिति (उदा. ZSI, BSI वेबसाइटें); अभी भी खंडित; अधिक एकीकरण और उपयोगकर्ता-अनुकूल इंटरफेस की संभावना। खुले पहुँच वाले डेटा पोर्टल (उदा. ग्लोबल बायोडायवर्सिटी इंफॉर्मेशन फैसिलिटी – GBIF) जो अनुसंधान, नीति और सार्वजनिक जुड़ाव को सक्षम करते हैं; डेटा उपयोग के लिए मजबूत API।
नीति एकीकरण डेटा राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना को सूचित करता है; भूमि-उपयोग योजना और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में वास्तविक समय एकीकरण में चुनौतियाँ। जैव विविधता डेटा सीधे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, रणनीतिक योजना और SDG निगरानी में एकीकृत।

महत्वपूर्ण मूल्यांकन: ‘अज्ञात जैव विविधता’ विरोधाभास

फल मक्खी जैसी नई प्रजातियों की खोज एक विरोधाभास प्रस्तुत करती है: यह भारत की विशाल जैव विविधता का उत्सव मनाती है, जबकि साथ ही इसके दस्तावेजीकरण और संरक्षण प्रयासों में कमजोरियों और प्रणालीगत कमियों को उजागर करती है। भारत की दोहरी नियामक संरचना—जहाँ राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत व्यापक दिशानिर्देश निर्धारित करता है, लेकिन कार्यान्वयन और स्थानीय संसाधन प्रबंधन राज्य जैव विविधता बोर्डों (SBBs) और जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) के जिम्मे आता है—समन्वय संबंधी चुनौतियाँ पैदा करती है। यह विखंडन विभिन्न क्षेत्रों में डेटा संग्रह, क्षमता निर्माण और ABS प्रावधानों के प्रवर्तन में विसंगतियों को जन्म दे सकता है। इसके अलावा, वर्गीकरण विशेषज्ञों की बढ़ती उम्र और इस क्षेत्र में अपर्याप्त अकादमिक रुचि से चिह्नित ‘वर्गीकरण बाधा’ का लगातार बने रहना यह दर्शाता है कि भारत की जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा औपचारिक रूप से पहचाने और अध्ययन किए जाने से पहले ही खो सकता है, जिससे संरक्षण के प्रयास सक्रिय होने के बजाय प्रतिक्रियात्मक हो जाते हैं। BMCs की परिचालन प्रभावशीलता, जो जमीनी स्तर पर डेटा संग्रह और लाभ-साझाकरण के लिए महत्वपूर्ण हैं, में भी व्यापक भिन्नता है, जो वैधानिक जनादेश और जमीनी स्तर की क्षमता के बीच के अंतर को दर्शाती है।

संरचित मूल्यांकन: नीति, शासन और व्यवहारिक आयाम

  • नीति डिजाइन की गुणवत्ता: भारत के पास एक यथोचित सुव्यवस्थित कानूनी ढाँचा (उदा. जैविक विविधता अधिनियम, 2002) है जो CBD जैसे अंतर्राष्ट्रीय अभिसमयों के अनुरूप है। हालाँकि, इसकी प्रभावशीलता अक्सर इसकी सामान्य प्रकृति से सीमित होती है, जो कभी-कभी स्थानीय पारिस्थितिक तंत्रों और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों की सूक्ष्म वास्तविकताओं को ध्यान में रखने में विफल रहती है। विनियमन पर तो मजबूत ध्यान है लेकिन सक्रिय संरक्षण के लिए प्रोत्साहन पर कम।
  • शासन और कार्यान्वयन क्षमता: शासन क्षमता में महत्वपूर्ण अंतराल मौजूद हैं, विशेष रूप से राज्य और स्थानीय स्तरों पर। इसमें अपर्याप्त मानव संसाधन (विशेषज्ञ वर्गीकरण विशेषज्ञ, प्रवर्तन कर्मी), दीर्घकालिक निगरानी और अनुसंधान के लिए अपर्याप्त धन, और अनुसंधान संस्थानों (ZSI, BSI), नियामक निकायों (NBA, SBBs) और स्थानीय स्व-सरकारों के बीच कमजोर अंतर-एजेंसी समन्वय शामिल है। डेटा का अलग-अलग रहना व्यापक जैव विविधता आकलन में बाधा डालने वाला एक लगातार मुद्दा बना हुआ है।
  • व्यवहारिक और संरचनात्मक कारक: जैव विविधता और वर्गीकरण अनुसंधान के महत्व के बारे में सामाजिक जागरूकता कम बनी हुई है, जो सार्वजनिक वित्तपोषण और अकादमिक करियर विकल्पों को प्रभावित करती है। आर्थिक विकास के दबाव अक्सर नीतिगत प्राथमिकताओं में जैव विविधता संबंधी चिंताओं को ढक देते हैं, जिससे आवासों का विनाश होता है। इसके अलावा, अकादमिक प्रणाली ने ऐतिहासिक रूप से मूलभूत वर्गीकरण को कम महत्व दिया है, अनुप्रयुक्त विज्ञानों को प्राथमिकता दी है, जिससे विशेषज्ञता में एक संरचनात्मक कमी आई है जिसे जल्दी से दूर करना मुश्किल है।

परीक्षा अभ्यास

भारत में जैव विविधता संरक्षण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है।
  2. भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) प्राणि विविधता की खोज, सर्वेक्षण और सूचीकरण के लिए जिम्मेदार प्राथमिक संस्था है।
  3. नागोया प्रोटोकॉल, जिस पर भारत एक हस्ताक्षरकर्ता है, मुख्य रूप से आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच और उनके उपयोग से उत्पन्न होने वाले लाभों के उचित और समान वितरण से संबंधित है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

जैव विविधता संरक्षण के संदर्भ में ‘वर्गीकरण बाधा’ (Taxonomic Impediment) का सबसे अच्छा वर्णन निम्नलिखित में से कौन सा करता है?

  1. नई खोजी गई प्रजातियों के लिए पर्याप्त कानूनी सुरक्षा का अभाव।
  2. आक्रामक विदेशी प्रजातियों और देशी प्रजातियों के बीच अंतर करने में कठिनाई।
  3. प्रजातियों की पहचान और वर्गीकरण के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों और संसाधनों की कमी।
  4. जैव विविधता हॉटस्पॉट के प्रबंधन में स्थानीय समुदायों द्वारा सामना की जाने वाली वित्तीय बाधाएँ।

सही विकल्प चुनें:

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2 और 4
  • (c) केवल 3
  • (d) 1, 3 और 4

उत्तर: (c)

मुख्य परीक्षा प्रश्न: “नई प्रजातियों की खोज, जहाँ एक ओर भारत की समृद्ध जैव विविधता को उजागर करती है, वहीं दूसरी ओर वर्गीकरण अनुसंधान और संरक्षण में महत्वपूर्ण चुनौतियों को भी रेखांकित करती है। ‘वर्गीकरण बाधा’ (Taxonomic Impediment) को संबोधित करने और अपने जैविक संसाधनों से लाभों का समान वितरण सुनिश्चित करने में भारत के संस्थागत और नीतिगत ढाँचे का समालोचनात्मक मूल्यांकन करें। (250 शब्द)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फल मक्खियों जैसी नई कीट प्रजातियों की खोज का क्या महत्व है?

नई कीट प्रजातियों की खोज महत्वपूर्ण है क्योंकि कीट स्थलीय जैव विविधता का अधिकांश हिस्सा बनाते हैं, जो परागणकों, अपघटकों और खाद्य स्रोतों के रूप में पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नई खोजें जैव प्रौद्योगिकी के लिए अद्वितीय आनुवंशिक सामग्री को उजागर कर सकती हैं, विशिष्ट आवासों के स्वास्थ्य का संकेत दे सकती हैं, और विकासवादी जीव विज्ञान और पारिस्थितिक अंतःक्रियाओं के बारे में हमारी समझ को गहरा कर सकती हैं।

‘वर्गीकरण बाधा’ (Taxonomic Impediment) क्या है और यह भारत के लिए चिंता का विषय क्यों है?

‘वर्गीकरण बाधा’ का तात्पर्य प्रशिक्षित वर्गीकरण विशेषज्ञों की वैश्विक कमी, अपर्याप्त वित्तपोषण और खंडित डेटा प्रणालियों से है जो प्रजातियों की पहचान और वर्गीकरण में बाधा डालती हैं। भारत जैसे अत्यधिक जैव विविध देश के लिए, यह एक बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में प्रजातियाँ अज्ञात बनी हुई हैं, जिससे खोज से पहले ही उनके विलुप्त होने की संभावना है और प्रभावी संरक्षण रणनीतियाँ बनाना मुश्किल हो जाता है।

जैविक विविधता अधिनियम, 2002, जैव-पायरेसी संबंधी चिंताओं को कैसे संबोधित करता है?

जैविक विविधता अधिनियम, 2002, भारत के जैविक संसाधनों और संबंधित पारंपरिक ज्ञान तक पहुँच के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) या राज्य जैव विविधता बोर्डों (SBBs) से पूर्व सूचित सहमति को अनिवार्य करके जैव-पायरेसी को रोकने का लक्ष्य रखता है। यह उनके वाणिज्यिक उपयोग से उत्पन्न होने वाले लाभों के उचित और समान वितरण को भी सुनिश्चित करता है, जिससे स्वदेशी समुदायों के अधिकारों और बौद्धिक संपदा की रक्षा होती है।

भारत के जैव विविधता संरक्षण में ZSI और BSI जैसे संस्थानों की क्या भूमिका है?

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI) क्रमशः भारत की प्राणि और वनस्पति विविधता का सर्वेक्षण, दस्तावेजीकरण और निगरानी करने के लिए जिम्मेदार मूलभूत संस्थान हैं। उनका कार्य प्रजातियों के वितरण, स्थानिकवाद और जनसंख्या प्रवृत्तियों पर आधारभूत डेटा प्रदान करता है, जो संरक्षण नीतियों को सूचित करने, संरक्षित क्षेत्रों को नामित करने और पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रभाव का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण है।